रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशस्तरङ्गः ५११ एवं लौह सेवन करनेवाले मनुष्य का मल प्रायः कालेरंग का हो जाता है। लोह और लोह के योग आँतों में पहुँचकर कुछ मलबन्ध भी करते हैं। यद्यपि लोहभस्म विशेष मलबन्ध नहीं करती है, क्योंकि इसके शोधन-मारण में पित्त- विरेचक द्रव्य त्रिफला के द्वारा विशेष काम लिया जाता है और भस्म सेवन- काल में प्रायः पित्तविरेचक द्रव्यों के साथ लोहभस्म का सेवन कराया जाता है। जिस तरह लोहभस्म आँतों के लिये मलबन्धक है उसी तरह यह शरीर में से होनेवाले अन्य स्रावों के लिए ग्राही भी है। अतः लोहभस्म को रक्तपित्त, रक्तप्रदर, रक्तस्राव और श्लेष्मस्राव आदि में दिया जाता है। लौह आंतों की अन्तःकला द्वारा रक्त में प्रवेश करता है और यहाँ से यकृत् में पहुँच जाता जाता है। यकृत् में इस लोह के कुछ ऐसे ऐन्द्रियिक समास बनते हैं जो शरीर मे लग सकते हैं। यह समास रक्त के रञ्जकद्रव—(Himo globin) से बहुत कुछ मिलते-जुलते होते हैं और बहुत संभव है कि वह समास हिमांग्लोबिन में बदल जाते हों। इसी लिए पाण्डुरोग में लोह के देने से रक्त में रक्ताणु तथा रञ्जकद्रव्य दोनों ही बढ़ जाते हैं। अतः लोहभस्म उत्तम रञ्जक और रक्तवर्धक है। रक्त में रक्ताणु तथा रञ्जकद्रव्य के बढ़ जाने से शरीर के सब ही अवयवों में ओषजन अधिक मात्रा में पहुँचने लगती है जिससे शारीरिक अवयवों की कार्यक्षमता बढ़ जाती है। अतः लोह सर्वाङ्गबल्य होता है। उत्तम लोहभस्म, शाखाश्रित अथवा कोष्ठसमाश्रित मूलभूत बढ़े हुए पित्तको शमन करती है। अथास्य विशिष्टा गुणाः शाखाश्रितं कोष्ठसमाश्रितं वा पित्तं विवृद्धन्तु मलाभिधेयम् । मृतन्तु लौहं शमयेन्नितान्तं यथा समीरः खलु मेघवृन्दम् ॥ ६७ ॥ भा.टी.—हाथ पैर एवं आँतों में रहनेवाला पित्त-विकार लोहभस्म खाने से शीघ्र नष्ट होता है जैसे वायु मेघसमूह को नष्ट करता है ॥ ६७ ॥ अस्य मात्रानिरूपणम् आरभ्य गुञ्जापादांशात् गुञ्जाद्वितयसंमितम् । मृतं लौहं प्रयुञ्जीत प्राणाचार्यः प्रयत्नतः ॥ ६८ ॥ मात्रानिरूपणं देशकालापेक्षमुचितमेव । प्राचीनैस्तु “गुञ्जामेकां समारभ्य यावत् स्युर्नवरक्तिकाः । तावल्लोहं समश्नीयात्” इत्युक्तं यद्यपि, तथापि यथादो- षबलं द्विगुञ्जैवमात्राऽधुना युक्तमिति ॥ ६८ ॥