रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२२ रसतरङ्गिणी दिनैकमेव माक्षिकं विपाचितं विधानतः । विशुद्धिमेत्यनुत्तमां न कांश्चदत्र संशयः ॥ १४ ॥ द्वितीयः प्रकारो दोलायन्त्रसाध्यः । अश्रुक्रमरिषः 'मर्सा' इति प्रसिद्धः शाक- विशेषः । अत्र च सुसूक्ष्मचूर्णितं माक्षिकं निक्षिप्य शोधनीयम्, तच्च द्रुतं जल- विलीनमधः पतति पाषाणांशश्च न पततीति विशेषः अयं च प्राचीनरोक्तो विधिः ॥ १२-१४ ॥ भा.टी.—उत्तम स्वर्णमाक्षिक को लेकर उसका चूर्ण बना लें । अब इस चूर्ण को कपड़े में पोटली बनाकर दोलायन्त्र में लटका दें और पात्र में काला मर्सा का कषाय भर दें और अग्निमें पकायें । इस तरह एक दिनतक पक ने से दोलायन्त्र में स्वर्णमाक्षिक पोटली वस्त्र से छन कर नीचे पात्र में आ जाता है और पत्थर का भाग वस्त्र में ही रह जाता है । इसे सुखाकर काम में लाना चाहिये । यह शुद्ध स्वर्ण माक्षिक है ॥ १२-१४ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः वरं सुवर्णमाक्षिकं प्रताप्य तीव्रपावके । निषेचयेद्विधानवित् प्रशस्तनिम्बूकोदके ॥ १५ ॥ त्रिसप्तवारमेव वै निषेचितं तु माक्षिकम् । विशुद्धिमेत्यनुत्तमां जवेन नात्र संशयः ॥ १६ ॥ प्रयासशून्यमार्गतस्त्वनेन गोत्रदूषणम् । सुवर्णमाक्षिकस्थितं विनश्यतीति निश्चितम् ॥ १७ ॥ तृतीयो निर्माणप्रकारः सुगमः । गोत्रदूषणं खनिदोषः, अयञ्च प्रकारः शोध- नाय सर्वोत्तमः पाषाणांशस्य द्रवीभावात् इत्यवधेयम् ॥ १५-१७ ॥ भा.टी.—स्वर्णमाक्षिक के टुकड़ों को तीव्र अग्नि में तपाकर नींबू के रस में बुझा दें । इस प्रकार इक्कीस बार गरम करके नींबू के रस में बुझा देने से स्वर्णमाक्षिक उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है । इस सरल विधि से स्वर्णमा- क्षिक शोधन करने पर उसका खनिदोष निश्चित ही नष्ट हो जाता है ॥१५-१७॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः सुचूर्णितं माक्षिकन्तु कदलीकन्दवारिणा । घटिकाद्वितयं पक्वं विशुष्यति न संशयः ॥ १८ ॥ चतुर्थः कदलीकन्दवारिणा स्वेदनाव् सम्पादनीयः ॥ १८ ॥ भा.टी.—स्वर्णमाक्षिक का सूक्ष्म चूर्ण बनाकर एक पात्र में डाल दे और