भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 548

एकविंशस्तरङ्गः ५२३

उसमें कदलीकन्दस्वरस भी भर दें । अब इस पात्र को एक घंटे तक तीव्र अग्नि में पकायें तो स्वर्णमाक्षिक शुद्ध हो जाता है ॥ १८ ॥ वक्तव्य—स्वर्णमाक्षिकचूर्ण की पोटली बनाकर उसको दोलायन्त्र में कदलीकन्दस्वरस में स्वेदन करना चाहिये । जब चूर्ण कपड़े में से छनकर नीचे पात्र में आ जाय तो पोटली को निकाल कर स्वर्णमाक्षिक चूर्ण को जल से साफ करके सुखा लेना चाहिए। अथ स्वर्णमाक्षिकस्य प्रथमो मारणप्रकारः ताप्यं निम्ब्वम्लसंपक्वं पुनर्निम्बूरुवारिणा । सम्पेष्य सम्पुटस्थन्तु पुटयेत् कृतचक्रिकम् ॥ १६ ॥ एवं दशपुटैरेव पञ्चतामेति माक्षिकम् । रक्तोत्पलदलच्छायं जायते चातिशोभनम् ॥ २० ॥ अथास्य मारणमाह—निम्बुशोधितं माक्षिकं पुनर्निम्बूरसेनैव पिष्ट्वा दश- वारं पुटेत्, तद् वर्णतः रक्तं भवतीति ॥ १६, २० ॥ भा.टी.—निम्बू के रस में पकाकर शुद्ध की हुई सोनामाखी को फिर नींबू के रस में घोलकर सुखा लें और टिकिया बनाकर सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक दें । इस प्रकार नींबूरस में घोटकर टिकिया बना सम्पुट में बन्दकर दस बार पुट देने से स्वर्णमाक्षिक की रक्तकमलपत्र के सदृश वर्ण की उत्तम भस्म हो जाती है ॥ १६, २० ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः विशोधितं माक्षिकन्तु बलिञ्च समभागिकम् । खल्वे सम्पेषयेद्यत्नाद् भृशं निम्बूकवारिणा ॥ २१ ॥ संशोष्य सम्पुटे न्यस्य पुटयेत् कृतचक्रिकम् । एवं पञ्चपुटैरेव म्रियते हेममाक्षिकम् ॥ २२ ॥ समगन्धकनिक्षेपद्वारा पुटनेन पञ्चभिरेव पुटैः माक्षिकं भस्मीभवतीति॥२१,२२ भा.टी.—शुद्ध स्वर्णमाक्षिक और शुद्ध गन्धक दोनों को समभाग में लेकर एकत्र खरल में डाल नींबूरस से अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें । अब शुष्कचूर्ण को अथवा इसकी टिकियाओं को सम्पुट में बन्द कर पुट में फूँक दें । इस प्रकार पाँच पुट देने से स्वर्णमाक्षिक की उत्तम भस्म हो जाती है॥२१,२२॥

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक) · पृष्ठ 548, कुल 799 में से · BharatKosha