भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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एकविंशस्तरङ्गः ५२५ न पन्नगैर्नापि गरैर्न वृश्चिकैः। न पाण्डुमेहज्वरशोफयक्ष्मभिर्न कण्ठनेत्रश्रवणत्व- गामयैः ॥” इति । अनिद्राहरगुणवत्त्वं चास्य बहुधानुभूतचरम् ॥२६-२८॥ भा.टी.—उत्तम स्वर्णमाक्षिक भस्म वृष्य, मधुररस और रसायनगुण होती है। इसमें किञ्चित् तिक्तरस भी होता है। यह स्वर के लिये लाभदायक, नेत्र- हितकर, अत्यन्त त्रिदोषहर है। इसको क्षय, अर्श, प्रमेह, विविध प्रकार की वस्तिपीड़ा, पाण्डुरोग, शोथ, कुष्ठ और शरीरगत विषविकारों को दूर करने के लिए सेवन किया जाता है। यह जीर्णज्वर, अपस्मार, मन्दाग्नि, अरुचि तथा अनिद्रा-रोग को नष्ट करती है और उत्तम योगवाही (जैसे द्रव्य के साथ दी जाय उसी के गुण को बढ़ानेवाली ) है ॥ २६-२८ ॥ वक्तव्य—स्वर्णमाक्षिक लोहसमास होते हुए भी लोह से अल्प गुणवाला नहीं है। सम्भवतः माक्षिकभस्म, लोहांश के बहुत न्यून और लघु रूप में होने के कारण ही लोह की अपेक्षा लघु होती है। अतएव शरीर पोषक तथा नाड़ियों में बलवर्धन के लिये लोह तथा स्वर्ण के स्थान पर इसका प्रयोग पाया जाता है। प्रमेह, क्षय, जीर्णज्वर और मन्दाग्निजन्य पांडुरोगों में यह अग्नि को दीप्त करता हुआ रक्त के लाल कणों को शीघ्र पोषित करता है जिससे शरीर में शीघ्र बल अनुभव होता है। शरीर के किसी भाग के विशेषतः आँतों के स्राव को यह कम करती है। अतः इसे कफपित्तहर भी माना गया है। लोहसमास लघु के अतिरिक्त ग्राही भी होते हैं, यह स्थानिक रक्तवाहिनियों को संकुचित कर देते हैं जिससे वहाँ से होनेवाला रक्तस्राव बन्द हो जाता है। इसी कारण रक्तपित्त में स्वर्णमाक्षिकभस्म विशेष गुणकारी होती है। स्वर्णमाक्षिकभस्म पारदीय क्रियात्मकशक्ति की वर्धक (प्राण) मानी जाती है। पित्तप्रकोपजन्य भ्रमरोग (चक्कर) में यह अद्वितीय औषधि है। यदि शीतज्वर में कुनीन का सेवन किया हो और उससे शरीर में कुनीनविष के लक्षण उत्पन्न हो गये हों अथवा प्लीहावृद्धि, उदररोग, शोथ आदि लक्षण उत्पन्न हो गये हों तो स्वर्णमाक्षिकभस्म सेवन से शीघ्र लाभ होता है। स्वर्णमाक्षिकस्य मात्रानिरूपणम् गुञ्जाद्वेः समारभ्य बलकालाद्यपेक्षया । गुञ्जाद्वितयपर्यन्तं माक्षिकं योजयेद्भिषक् ॥२९॥ भा. टी.—रोग और रोगी का बल तथा काल आदि का पूर्ण विचार