रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 627, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें६०२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—हीरे को एक वस्त्र में बाँधकर पोटली बना ले, इस पोटली को दोलायन्त्र में कोद्रव ( कोदो ) क्वाथ भरकर उसमें लटका दें । इस तरह सात दिन तक निरन्तर इसी द्रवक्वाथ में पकाने से हीरा निश्चित ही शुद्ध हो जाता है ॥ १० ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः कुलत्थक्वाथसंयुक्तं हीरं दोलाख्ययन्त्रगम् । स्विन्नं दिनत्रयं यत्नाद्विशिष्टां शुद्धिमाप्नुयात् ॥ ११ ॥ भा.टी.—हीरे को वस्त्र की पोटली में बाँधकर दोलायन्त्र विधि से कुलथी के क्वाथ में तीन दिन निरन्तर पकाने से वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥११॥ तृतीयः शोधनप्रकारः हीरकं परिसन्तप्तं सुधाक्षीरे निषेचितम् । शतवारं प्रयत्नेन शुद्धिमाप्नोत्यसंशयम् ॥ १२ ॥ भा.टी.—हीरे को अग्नि में गरम करके थोहर के दूध में बुझा दें । इस विधि को सौ बार दुहराने से हीरा उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ १२ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः हीरकं परिसन्तप्तं प्रखरानलयोगतः । शतधा वापितं सूते शुद्धे शुद्धिमवाप्नुयात् ॥ १३ ॥ एवं निर्वापितं हीरं चूर्णतामेति सत्वरम् । अनुभूतः प्रकारोऽयं समाख्यातो महोत्तमः ॥ १४ ॥ शुद्धे सूते पारदे । अनुभूतः प्रकारोऽयमिति श्रद्धातिशयो ध्वनितः । महोत्तम इति प्रकारान्तरान्निर्द्धारणम् ॥ १३ ॥ भा.टी.—हीरे को कोयले की तेज आँच में गरम करके पारद में बुझा दें ! इस प्रकार सौ बार पारद में हीरे को बुझाने से वह शुद्ध हो जाता है, इस शोधन में बीस पच्चीस बार गरम पारद में बुझाने पर हीरे खण्ड-खण्ड हो जाते हैं, फिर चूर्ण रूप में होने लगता है । यह अत्युत्तम अनुभूत शोधन प्रकार है ॥१३,१४॥ हीरकमारणस्य प्रथमः प्रकारः शोधितं हीरकं यत्नतश्चूर्णितं तालकं गन्धकं हिंगुलं तन्मितम् । माक्षिकं मारितञ्चैव हीरोन्मितं राजकोलद्रवेणैव सम्पेेषयेत् ॥१५॥ पिप्पलोत्थद्रवैर्भावयेत्सप्तधा भावितस्यास्य वै कारयेद् गोलकम् । उपलस्याग्निना वारणाख्ये पुटे सम्पुटस्थं ततो पाचयेद्यत्नतः ॥१६॥