भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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त्रयोविंशस्तरङ्गः ६०३ हीरकं पञ्चतां नैति यावद् भृशं तावदेवं पुटेद्यत्नतः कोविदः । माक्षिकं न क्षिपेद्वै द्वितीये पुटे हीरकं पञ्चतामेति सर्वात्मना ॥१७॥ हीरकमारणं शोधितं हीरकमित्यादिना । तन्मितं हीरकमानम् । राजकोलं बृहद्बदरीफलम् । यावत् इति प्रायः पञ्चदशभिः पुटैः सिद्धयति । प्रतिपुटदाना- नन्तरं दृढहस्तेनातिदृढप्रस्तरमये खल्वे पेषणं कर्तव्यम् ॥ १५-१७ ॥ भा.टी.—उक्त विधि से शुद्ध चूर्ण किए हुए हीरे में शुद्ध हरताल, शुद्ध गन्धक और शुद्ध हिंगुल तथा स्वर्णमाक्षिकभस्म, प्रत्येक बार हीरे के चूर्ण के समभाग मिलाकर एकत्र खरल में बड़े बेर के फलस्वरस से खूब अच्छी तरह मर्दन करें । इसके बाद इसको पीपलवृक्ष त्वक्-स्वरस की सात भावना दें और अन्त में एक गोला सा बना लें और अच्छी तरह धूप में सुखा लें । अब इस गोले को एक सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में उपलों की अग्नि में फूँक देवें । इस विधि से तब तक गजपुट में फूँकते रहें जबतक हीरे की उत्तम भस्म न हो जाय । परन्तु पहिले पुट के बाद दिये जानेवाले पुटों में स्वर्णमा- क्षिकभस्म नहीं डालनी चाहिए । हरताल आदि द्रव्य अवश्य डालने चाहिए । इस तरह कुछ ही पुटों में हीरे की भस्म हो जाती है ॥ १५-१७ ॥ वक्तव्य—पुट देकर द्रव्य को एक पक्के न घिसनेवाले खरल में खूब घोटना चाहिए, फिर उसमें हरतालादि मिलाकर पुट देना चाहिए । अर्थात् पर्याप्त मर्दन इसके लिए आवश्यक है । प्रायः खूब मर्दन करके उक्त विधि से पुट देने पर १५ पुटों में इसकी भस्म हो जाती है । द्वितीयो मारणप्रकारः हीरकं विमलं सूतं मृतन्तु समभागिकम् । मनःशिला गन्धकञ्च समं दत्त्वा विमर्दयेत् ॥ १८ ॥ सम्पुटस्थं तु पुटयेद् वारणाख्ये पुटे भृशम् । तावत्पुटेत्प्रयत्नेन यावन्नायाति पञ्चताम् ॥ १६ ॥ द्वितीयादिपुटेष्वत्र सूतं न विनियोजयेत् । एवं चतुर्दशपुटैर्हीरकं म्रियते ध्रुवम् ॥ २० ॥ अनुभूतः प्रकारोऽयं सुगमस्तु प्रकाशितः । एवं मृतं हीरकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २१ ॥ द्वितीयः प्रकारः-मृतं सूतं पारदमिति सम्बन्धः । द्वितीयादिपुटेषु पारदभस्म न योजयेत् ॥ १८-२१ ॥