भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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पृष्ठ 629

६०४ रसतरङ्गिणी भा.टी.—शुद्ध हीरे का चूर्ण, पारदभस्म ( रससिन्दूर ), शुद्ध मैनसिल और शुद्ध गन्धक; सबको समभाग लेकर एकत्र खरल में मर्दन करके सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूँकें जबतक कि उसकी अच्छी तरह भस्म न हो जाय । परन्तु पहिले पुट के बाद पुट देने में पारदभस्म नहीं डालनी चाहिए । इस तरह चौदह पुटों में हीरे की अवश्य भस्म हो जाती है, हीरे की भस्म करने का यह सरल तथा अनुभूत प्रकार है ॥ १८-२१ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः हीरकं विमलं तालं तथा रोगशिलामला । समं समं समादाय खरखल्वे विमर्दयेत् ॥ २२॥ त्रिवर्षारूढकार्पासशिफास्वरसयोगतः । सम्पेष्य कामं यामैकं निदाघे परिशोषयेत् ॥ २३ ॥ विशुष्कं सम्पुटे न्यस्य पुटयेत्तु महापुटे । एवं चतुर्दशपुटैर्हीरकं याति पञ्चताम् ॥ २४ ॥ रोगशिला मनःशिला अमला इति च्छेदः । खरखल्वे कठिनतमपाषाणो- पादाने खल्वे । शिफा मूलम् । निदाघे घर्मे ॥ २२-२४ ॥ भा.टी.—शुद्ध हीरा, शुद्ध हरताल तथा शुद्ध मैनसिल, इन तीनों को समभाग में एकत्र करके खरल में घोंटे, फिर इसमें तीन वर्ष के पुराने कपास की जड़ का रस डालकर धूप में तीन घंटे तक खूब रगड़ाई करें । जब रगड़ते हुए खुश्क हो जाय तो इसे सम्पुट में बन्द करके महापुट में फूँक देवें । इस विधि से चौदह पुट देने से हीरे की भस्म हो जाती है ॥ २२-२४ ॥ मृतहीरकस्य गुणाः सुमृतं हीरकं हृद्यं परमं षड्रसान्वितम् । योगवाहि मतञ्चैतत्सर्वोत्कृष्टं रसायनम् ॥ २५ ॥ राजयक्ष्मप्रशमनं मेहमेदोविनाशनम् । पाण्डुशोथोदरहरं तथा क्लैब्यहरं परम् ॥ २६ ॥ वृष्यं महायुष्यमतीव नेत्र्यं बल्यं त्रिदोषघ्नमतीव वर्ण्यम् । मेध्यं विशेषाद्विविधामयघ्नं सुधोपमं स्यात्सुमृतं तु हीरम् ॥ २७ ॥ भा.टी.—उत्तम विधि से बनायी हुई हीरे की भस्म अत्यन्त हृद्य ( हृदय बलदायक ) षड् रसयुक्त द्रव्य के समान गुणकारी होती है। अर्थात् हीरकभस्म, पारदभस्म के समान गुणकारी होती है । अथवा इसमें छहों रस होते हैं । यह