भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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त्रयोविंशस्तरङ्गः ६०५ भस्म योगवाही होती है और सर्वोत्तम रसायन है। राजयक्ष्मा, प्रमेह तथा मेदोविकारों को नष्ट करती है। इसके सेवन से पाण्डुरोग, शोथ तथा उदररोग शान्त हो जाते हैं। हीरकभस्म नपुंसकता की अद्वितीय औषधि है। यह वृष्य (उत्पादक अंगों को बल देनेवाला) आयुवर्धक, नेत्रज्योतिवर्धक, बलवर्धक, त्रिदोषप्रकोपनाशक, वय्यं, मेधावर्धक होती है। इसके अतिरिक्त उत्तम हीरक भस्म अनेक रोगों को नष्ट करने के कारण अमृत के समान गुणदायक औषधि है ॥ २५-२७ ॥ मृतहीरकस्य मात्रा रक्तिकाया नेत्रगुणभागतस्तु कलांशकम् । मृतं हीरं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ २८ ॥ भा.टी.- रोग और रोगी का बल-काल आदि का पूर्ण निर्णय करके आवश्यकतानुसार रत्ती के बत्तीसवें भाग से लेकर रत्ती के सोलहवें भाग तक हीरे की भस्म की मात्रा समझनी चाहिए ॥ २८ ॥ हीरकस्य मात्रानिर्माणप्रकारः रक्तिकैकमितं हीरं रम्ये खल्वे विनिक्षिपेत् । मेलयेद्रससिन्दूरं चतुर्माषकसंमितम् ॥ २६ ॥ सम्पेष्य त्वतियत्नेन रसतन्रविचक्षणः । गुञ्जैकतः समारभ्य द्विगुञ्ज विनियोजयेत् ॥ ३० ॥ भा.टी.-एक रत्ती उत्तम हीरकभस्म को एक उत्तम खरल में डालकर उसमें चार मासा उत्तम रससिन्दूर मिलाकर अच्छी तरह पीसकर रख लें। अब आवश्यकता पड़ने पर इसमें से एक रत्ती से लेकर दो रत्ती तक की मात्रा में प्रयोग करें ॥ २६, ३० ॥ मृतहीरकस्य आमयिकः प्रयोगः हीरकं रससिन्दूरयुतं सन्तानिकान्वितम् । निषेवितं निहन्त्याशु ध्वजभङ्गं सुदारुणम् ॥ ३१ ॥ हीरकं सहिरणयन्तु रससिन्दूरसंयुतम् । विनिहन्त्यचिरादेव राजयक्ष्मासमुल्बणम् ॥ ३२ ॥ मकरध्वजसंयुक्तं हीरकं परिशीलितम् । नाशयत्यचिरादेव क्लैब्यरोगान् विशेषतः ॥ ३३ ॥ भा.टी.-हीरकभस्म में रससिन्दूर मिलाकर मलाई के साथ कुछ दिन सेवन कराने से भयंकर नपुंसकता रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। भयंकर और