भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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६०६ रसतरङ्गिणी सर्वलक्षणयुक्त राजयक्ष्मा रोग में हीरकभस्म को स्वर्णभस्म तथा रससिन्दूर के साथ मिलाकर सेवन करने से आश्चर्यजनक लाभ होता है । सब प्रकार की नपुंसकतात्रों को दूर करने के लिए हीरे की भस्म को मकरध्वज में मिलाकर सेवन करने से शीघ्र ही लाभ होता है ॥ ३१-३३ ॥ कन्दर्पकोकिलरसः सकर्पूरो हीरः प्रचुररससिन्दूरसहितः सितैलासम्मिश्रः प्रचुररससंयुक्तपयसा । निपीतः षण्मासं जनयति समिष्टाशनयुतो नरं नानानानारोनिधुवनसमासक्तहृदयम् ॥३४॥ लावण्येऽमलमौक्तिकं रतिपतिं रूपे च सम्मोहने भीमं भोजनभक्षणे खगपति दूरात्सदा वीक्षणे । सिंहं संहतगात्रताभवमदे बुद्धौ तु वाचस्पतिं हीरस्येह तु सेवको नरवरः प्रस्पर्द्धते निर्भरम् ॥ ३५ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो नाम्ना कन्दर्पकोकिलः सेवितव्यः सदा यत्नाच्छरीरबलवृद्धये ॥ ३६ ॥ कन्दर्पकोकिलरसः—प्रचुरं यत् रससिन्दूरं तेन सहितः इति समासः । मात्रा- निर्माणप्रकारोक्तविधानेन रससिन्दूरं हीरकभस्मना सह सम्मेल्य मात्रायामाहृत्य कर्पूरसितैलाभिः सह सम्मिश्रय यथोक्तानुपानेन याज्यम् ॥ ३४-३६ ॥ भा.टी.—हीरकभस्म मात्रा निर्माण विधि के अनुसार रससिन्दूरयुक्त हीरे की भस्म में कपूर, खांड तथा इलायचीबीजचूर्ण मिलाकर इसको उत्तम स्वादिष्ट दूध के अनुपान के साथ निरन्तर छः महीने तक सेवन करने से और प्रायः मधुर द्रव्यों का भोजन करने से पुरुष में अनेक स्त्रियों के साथ समागम करने की शक्ति आ जाती है । इसके सेवन से पुरुष मुक्ता के समान सुन्दरता, कामदेव के समान रूप और मुग्धता, भोजन में भीम की समानता, देखने अर्थात् दृष्टि में गरुड़ की समानता, शरीर के सुडौलपने में शेर की समानता और बुद्धि में बृह- स्पति की समानता करने में समर्थ हो जाता है । अर्थात् उक्त रस के सेवन से शरीर में सुन्दरता, रूप, तीव्र पाचनशक्ति, अतुल बल, तीव्र दृष्टि और प्रखर बुद्धि प्राप्त होती है । इस रस को कन्दर्पकोकिल रस कहते हैं । इसको शरीर की बलवृद्धि के लिए सेवन करना चाहिए ॥ ३४-३६ ॥