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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६०५ भस्म योगवाही होती है और सर्वोत्तम रसायन है। राजयक्ष्मा, प्रमेह तथा मेदोविकारों को नष्ट करती है। इसके सेवन से पाण्डुरोग, शोथ तथा उदररोग शान्त हो जाते हैं। हीरकभस्म नपुंसकता की अद्वितीय औषधि है। यह वृष्य (उत्पादक अंगों को बल देनेवाला) आयुवर्धक, नेत्रज्योतिवर्धक, बलवर्धक, त्रिदोषप्रकोपनाशक, वय्यं, मेधावर्धक होती है। इसके अतिरिक्त उत्तम हीरक भस्म अनेक रोगों को नष्ट करने के कारण अमृत के समान गुणदायक औषधि है ॥ २५-२७ ॥ मृतहीरकस्य मात्रा रक्तिकाया नेत्रगुणभागतस्तु कलांशकम् । मृतं हीरं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ २८ ॥ भा.टी.- रोग और रोगी का बल-काल आदि का पूर्ण निर्णय करके आवश्यकतानुसार रत्ती के बत्तीसवें भाग से लेकर रत्ती के सोलहवें भाग तक हीरे की भस्म की मात्रा समझनी चाहिए ॥ २८ ॥ हीरकस्य मात्रानिर्माणप्रकारः रक्तिकैकमितं हीरं रम्ये खल्वे विनिक्षिपेत् । मेलयेद्रससिन्दूरं चतुर्माषकसंमितम् ॥ २६ ॥ सम्पेष्य त्वतियत्नेन रसतन्रविचक्षणः । गुञ्जैकतः समारभ्य द्विगुञ्ज विनियोजयेत् ॥ ३० ॥ भा.टी.-एक रत्ती उत्तम हीरकभस्म को एक उत्तम खरल में डालकर उसमें चार मासा उत्तम रससिन्दूर मिलाकर अच्छी तरह पीसकर रख लें। अब आवश्यकता पड़ने पर इसमें से एक रत्ती से लेकर दो रत्ती तक की मात्रा में प्रयोग करें ॥ २६, ३० ॥ मृतहीरकस्य आमयिकः प्रयोगः हीरकं रससिन्दूरयुतं सन्तानिकान्वितम् । निषेवितं निहन्त्याशु ध्वजभङ्गं सुदारुणम् ॥ ३१ ॥ हीरकं सहिरणयन्तु रससिन्दूरसंयुतम् । विनिहन्त्यचिरादेव राजयक्ष्मासमुल्बणम् ॥ ३२ ॥ मकरध्वजसंयुक्तं हीरकं परिशीलितम् । नाशयत्यचिरादेव क्लैब्यरोगान् विशेषतः ॥ ३३ ॥ भा.टी.-हीरकभस्म में रससिन्दूर मिलाकर मलाई के साथ कुछ दिन सेवन कराने से भयंकर नपुंसकता रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। भयंकर और

६०६ रसतरङ्गिणी सर्वलक्षणयुक्त राजयक्ष्मा रोग में हीरकभस्म को स्वर्णभस्म तथा रससिन्दूर के साथ मिलाकर सेवन करने से आश्चर्यजनक लाभ होता है । सब प्रकार की नपुंसकतात्रों को दूर करने के लिए हीरे की भस्म को मकरध्वज में मिलाकर सेवन करने से शीघ्र ही लाभ होता है ॥ ३१-३३ ॥ कन्दर्पकोकिलरसः सकर्पूरो हीरः प्रचुररससिन्दूरसहितः सितैलासम्मिश्रः प्रचुररससंयुक्तपयसा । निपीतः षण्मासं जनयति समिष्टाशनयुतो नरं नानानानारोनिधुवनसमासक्तहृदयम् ॥३४॥ लावण्येऽमलमौक्तिकं रतिपतिं रूपे च सम्मोहने भीमं भोजनभक्षणे खगपति दूरात्सदा वीक्षणे । सिंहं संहतगात्रताभवमदे बुद्धौ तु वाचस्पतिं हीरस्येह तु सेवको नरवरः प्रस्पर्द्धते निर्भरम् ॥ ३५ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो नाम्ना कन्दर्पकोकिलः सेवितव्यः सदा यत्नाच्छरीरबलवृद्धये ॥ ३६ ॥ कन्दर्पकोकिलरसः—प्रचुरं यत् रससिन्दूरं तेन सहितः इति समासः । मात्रा- निर्माणप्रकारोक्तविधानेन रससिन्दूरं हीरकभस्मना सह सम्मेल्य मात्रायामाहृत्य कर्पूरसितैलाभिः सह सम्मिश्रय यथोक्तानुपानेन याज्यम् ॥ ३४-३६ ॥ भा.टी.—हीरकभस्म मात्रा निर्माण विधि के अनुसार रससिन्दूरयुक्त हीरे की भस्म में कपूर, खांड तथा इलायचीबीजचूर्ण मिलाकर इसको उत्तम स्वादिष्ट दूध के अनुपान के साथ निरन्तर छः महीने तक सेवन करने से और प्रायः मधुर द्रव्यों का भोजन करने से पुरुष में अनेक स्त्रियों के साथ समागम करने की शक्ति आ जाती है । इसके सेवन से पुरुष मुक्ता के समान सुन्दरता, कामदेव के समान रूप और मुग्धता, भोजन में भीम की समानता, देखने अर्थात् दृष्टि में गरुड़ की समानता, शरीर के सुडौलपने में शेर की समानता और बुद्धि में बृह- स्पति की समानता करने में समर्थ हो जाता है । अर्थात् उक्त रस के सेवन से शरीर में सुन्दरता, रूप, तीव्र पाचनशक्ति, अतुल बल, तीव्र दृष्टि और प्रखर बुद्धि प्राप्त होती है । इस रस को कन्दर्पकोकिल रस कहते हैं । इसको शरीर की बलवृद्धि के लिए सेवन करना चाहिए ॥ ३४-३६ ॥

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६०७ अथ हीरकरसायनम् हीरं तार्क्ष्यञ्च माणिक्यं पुष्परागं च नीलकम्॥ वैदूर्यमथ गोमेदं चन्द्ररत्नञ्च विद्रुमम् ॥ ३७ ॥ भागोत्तरमिदं तस्मात्पञ्चगुञ्जोन्मितं हरेत् । योजयेन्मृतवैक्रान्तं तस्मादष्टगुणं ततः ॥ ३८ ॥ माक्षिकद्वयजं भस्म पृथग् वैक्रान्तसम्भवम् । तथा सर्वत्रिगुणितां समगन्धेशकज्जलीम् ॥ ३६ ॥ पिष्ट्वाऽपयसोश्चैव बन्ध्याकर्कोटकीद्रवैः । वन्योपलैः कलावारं पादायुधपुटे पुटेत् ॥ ४० ॥ भिषग्वरैः समाख्यातमेतद्धीररसायनः गर्भिणीनान्तु नारीणां विविधागयनाशनम् ॥ ४१ ॥ हीराद्यं विमलं रसायनमिदं सन्दीपनं पाचनम् बल्यं मेध्यमलं तथैव महिलासौभाग्यसंवर्द्धनम् योनिव्याधिनिबर्हण खलु नृणां बन्ध्यत्वरोगापहं वन्ध्यानां खलु पुत्ररत्नजननं काकादिसंज्ञवताम् ॥ ४२ ॥ हीरकरसायनम्—चन्द्ररत्नं मुक्तां, विद्रुमं प्रवालम् । भागोत्तरमिति क्रमशः यथोत्तरं प्रवर्धमानैकभागम्। समगन्धेशकज्जलीमिति पारदगन्धौ समौ कृत्वा कृतां कज्जलीमित्यर्थः। कलावारं षोडशवारम् । पादायुधपुटे कुक्कुटपुटे । वन्ध्यत्वं पुंसः शुक्रादिदुष्ट्याऽपत्यजननेऽसमर्थत्वम् । काकबन्ध्या च “पूर्वे पुत्रवती या सा कचिद् वन्ध्या भवेद् यदि । काकबन्ध्या तु सा ज्ञेया” इत्युक्तलक्षणा सकृत् प्रसूता इत्यर्थः। “काकबन्ध्या सकृत्प्रसूः” इति स्मरणात् । व्याख्यासमानमन्यत् ॥ ३७–४२ ॥ भा.टी.—हीरकभस्म, तार्क्ष्यमणिभस्म, माणिक्यभस्म, पुखराजभस्म नीलम- भस्म, वैदूर्यभस्म, गोमेदभस्म, मुक्ताभस्म, प्रवालभस्म को क्रमशः उत्तरोत्तर एक- एक भाग वृद्धि से लेकर अर्थात् हीरकभस्म एक भाग, तार्क्ष्य दो भाग, माणिक्य तीन भाग, पुखराज चार भाग, नीलम पाँच भाग, वैदूर्य छः भाग, गोमेद सात भाग, मुक्ता आठ भाग, प्रवाल नौ भाग लेकर सबको एकत्र पीसकर रख लें । अब इस मिश्रित ओषधि में से पाँच रत्ती मात्रा में लेकर उसमें वैक्रान्तभस्म चालीस रत्ती, स्वर्णमाक्षिकभस्म चालीस रत्ती, रूपामाक्षीभस्म चालीस रत्ती मिलायें, जितना यह सब मिलकर हो अर्थात् एक सौ पच्चीस रत्ती के इसमें सम-

भाग पारद गन्धक की बनी हुई उत्तम कज्जली त्रिगुण अर्थात् तीन सौ पचह- त्तर रत्ती मिलाकर बकरी के दूध तथा बांझ ककोड़े के स्वरस में पीसकर सुखा लें। फिर इसको एक सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके जङ्गली उपलों के कुक्कुटपुट में फूँक दें। सम्पुट के स्वांगशीत होने पर औषधि को निकाल पुनः बकरी के दूध तथा ककोड़े के स्वरस में घोंटकर कुक्कुटपुट में फूँक दें। इस प्रकार सोलह पुट देवें। अन्त में पीसकर शीशी में रख लें। इस योग को वैद्य लोग हीरक-रसायन कहते हैं। यह रसायन गर्भिणी स्त्रियों के रोग को नष्ट करता है। इसके सेवन से पाचकाग्नि तीव्र होती है और आमदोष का परिपाक होता है। यह बलवर्धक, स्त्री सौभाग्यवर्धक, योनिरोगनाशक, पुरुषों के वन्ध्यत्वदोष- नाशक तथा काकवन्ध्या स्त्री के बांझ दोष का नाशक है ॥ ३७-४२ ॥ अथ माणिक्यस्य नामानि माणिक्यं रङ्गमाणिक्यं पद्मरागसमाह्वयम् । रविरत्नं शोणरत्नं कुरुविन्दं च लोहितम् ॥ ४३ ॥ भा.टी.-माणिक्य, रंगमाणिक्य, पद्मराग, रवि (सूर्य) रत्न, शोणरत्न, कुरु- विन्द तथा लोहित, ये सब नाम माणिक्य मणि अथवा लाल के कहे जाते हैं ॥४३॥ जात्यमाणिक्यस्वरूपम् रक्तोत्पलदलच्छायं रम्यं दीप्तप्रभं परम् । वृत्तायतं, समाङ्गञ्च माणिक्यं जात्यमुच्यते ॥ ४४ ॥ माणिक्यपरिचयः-तत्र ग्राह्यमाणिक्यस्वरूपं रक्तोत्पलदलच्छायमित्यादिना।४४। भा.टी.-माणिक्यमणि वह उत्तम समझी जाती है जो देखने में रक्त- कमलपत्रवत् छायावाली, सुन्दर चमकीली, गोल लम्बे आकार की, एक-सी बनावट की हो ॥ ४४ ॥ त्याज्यमाणिक्यस्वरूपम् विच्छायं लघु धूमाभं विरूपं कर्कशं परम् । मलिनं चिपिटं वक्रं माणिक्यं त्याज्यमुच्यते ॥ ४५ ॥ त्याज्यञ्च विच्छायमिति । आहुश्च "कुशेशयदलच्छायं स्वच्छं स्निग्धं महत् स्फुटम् । वृत्तायतं समं गात्रं माणिक्यं त्वष्टधा शुभम् ॥" तथा-"यद्विच्छायं शर्करिलं कर्कशभ्रूभ्रं स्वरागविकलञ्च विरूपं लघु माणिक्यं तद् दोषावहं त्याज्यम्" इति च ॥४५ ॥ भा.टी.-चमक रहित, लघुभार, धूम्रवर्णा, बेडौल, खुरदरी, मैली तथा चपटी और टेढ़ी माणिक्य उत्तम नहीं होती है ॥ ४५ ॥

३६ त्रयोविंशस्तरङ्गः ६०६ माणिक्यशोधनस्य प्रथमः प्रकारः निम्बूकस्वरसेनेह दोलायन्त्रे विधानतः । यामैकं स्वेदितं कामं माणिक्यं शुद्धिमाप्नुयात् ॥ ४६ ॥ अम्लवर्गोक्तभैषज्यैर्दोलायन्त्रयोगतः । विपाचितं तु माणिक्यं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ४७ ॥ एतच्छोधनप्रकारः—निम्बूकरसेन दोलायन्त्रे स्वेदनाद् यामम् ॥४६,४७ ॥ भा.टी.—माणिक्यमणि को दोलायन्त्र में निम्बूस्वरस भरकर उसमें तीन घंटे तक स्वेदन करने से वह शुद्ध हो जाती है । इसी तरह किसी अम्लवर्गोक्त द्रव्य के स्वरस आदि को दोलायन्त्र में भरकर उसमें माणिक्य को तीन घंटे तक स्वेदन करने से माणिक्य उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ ४६, ४७ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः निम्बूकाम्लयुतं वारा माणिक्यं चषकस्थितम् । सुराप्रदीपे संपक्वं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ४८ ॥ आविष्कृतो विधिरयं गुरुवर्यमहोदयैः । प्रकाशितः खलु मया भिषजां हितकाम्यया ॥ ४६ ॥ द्वितीयः प्रकारः—सुगमसाधनो नवाविष्कृतश्चेति ध्वनयति-आविष्कृतो विधिरयमित्यादिना ॥ ४८, ४६ ॥ भा.टी.—निम्बूकाम्ल (साइट्रिक एसिड) को जल में घोलकर रख लें । अब एक प्याले में माणिक्य रखकर उसमें उक्त निम्बूकाम्ल एवं जल भर दें और प्याले को त्रिपादिका पर रख नीचे सुराप्रदीप की अग्नि जलायें। इस तरह दो- तीन घण्टे निम्बूस्वरस में उबाल लेने से माणिक्य शुद्ध हो जाता है ॥४८,४६॥ माणिक्यमारणस्य प्रथमः प्रकारः विमलीकृतमत्यर्थं माणिक्यं सुविचूर्णितम् । शिलालगन्धैर्विमलैः पृथक् तु समभागिकैः ॥ ५० ॥ निम्बूकस्वरसेनेह पेषयेद्दिनसप्तकम् । विन्यसेत्सम्पुटे घर्म विशुष्कं कृतचक्रिकम् ॥ ५१ ॥ ततस्तु पुटयेद्धीमान् पुटे वारणसंज्ञके । रीत्यानया सुपुटितमष्टवारं प्रयत्नतः ॥ ५२ ॥ माणिक्यं म्रियते भस्म जायते पाण्डुरप्रभम् । पिष्टं तु लकुचद्रावैः पुटेदेवमथापि वा ॥ ५३ ॥

६१० रसतरङ्गिणी माणिक्यमारणम्—शिला मनःशिला, आलं हरितालम्, गन्धः गन्धकः, प्रत्येकं माणिक्यसमानम् । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ५०-५३ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह शुद्ध किये हुए माणिक्य को खरल में डालकर अच्छी तरह चूर्ण कर लें । अब इसमें माणिक्य समभाग (पृथक्-पृथक्) शुद्ध मैनसिल, शुद्ध हरताल, शुद्ध गन्धकचूर्ण मिलाकर निम्बू के रस से सात दिन तक मर्दन करें। जब टिकिया बनाने योग्य हो जाय तो टिकिया बनाकर धूप में सुखा लें। अब इनको एक सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें। इस विधि को आठ बार दुहराने से माणिक्य की पाण्डुरवर्ण की भस्म हो जाती है। निम्बूरस के स्थान पर लकुच (बड़हल) स्वरस से पीसकर आठ पुट देने से भी माणिक्य की भस्म हो जाती ॥ ५०-५३ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः चूर्णीकृतं शोणरत्नं विसलैः समभागिकैः । पेषयेन्निम्बुकद्रावैर्बलिरोगशिलेङ्गुलेः ॥ ५४ ॥ विमर्द्य सुदृढे खल्वे यत्नेन सप्तवासरम् । पुटयेद्वारुणपुटे विशुष्कं कृतचक्रिकम् ॥ ५५ ॥ रीत्यानयापि पुटितमष्टवारमसंशयम् । माणिक्यमचिरादेव मृतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ ५६ ॥ द्वितीयप्रकारः—तालकस्थाने हिङ्गुलक्षेपः । सर्वमन्यत्पूर्ववत् । "निम्बूरसाभ्यां वा केवलं मारितं शुभम् । गन्धहिङ्गुलनिम्बूकैर्मारितं वा भवेत् शुभम्" इत्यपि ज्ञेयम् । माणिक्यगुणा व्याख्यातप्रायाः । प्राञ्चस्तु—"माणिक्यं दीपनं वृष्यं कफवातक्षयार्त्तिनुत् । भूतवेतालपापघ्नं कर्मजव्याधिनाशनम्" इत्याहुः॥५४-५६॥ भा.टी.—शुद्ध माणिक्य चूर्ण में, माणिक्यसमभाग शुद्ध गन्धक, शुद्ध मैनसिल, तथा शुद्ध हरताल चूर्ण मिला निम्बू के रस से खूब अच्छी तरह मर्दन- कर टिकिया बनाकर सुखा लें । अब इन टिकियाओं को सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूँक दें । इस विधि से आठ गजपुट देने मे शीघ्र ही माणिक्य की उत्तम भस्म बन जाती है ॥५४-५६ ॥ अथ मृतमाणिक्यस्य गुणाः माणिक्यं सुमृतं मेध्यं मधुरं तु रसायनम् । दीपनं वृष्यमायुष्यं वातपित्तहरं परम् ॥ ५७ ॥

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६११ कफप्रशमनं स्निग्धं क्षयरोगनिषूदनम् । वाजीकरणमत्यन्तं ध्वजभङ्गहरं मतम् ॥ ५८ ॥ भा.टी.—उत्तम माणिक्य भस्म मेधावर्धक, मधुररस, रसायनगुण, दीपक, उत्पादक अंगों के लिए बलदायक, आयुवर्धक तथा उत्तम वात-पित्त दोषहर है । इसके सेवन से कफ प्रकोप शान्त हो जाता है । यह अंगों में स्निग्धता उत्पन्न करती है और क्षय रोग को नष्ट करती है । इसके सेवन से उत्पादक अंगों की शिथिलता दूर होकर उनमें उत्तेजना आती है और नपुंसकता नष्ट हो जाती है ॥ ५७, ५८ ॥ अथ माणिक्यस्य मात्रा आरभ्य गुंजापादांशात् गुञ्जार्द्धप्रमितं मृतम् । माणिक्यं योजयेद्धीमान् बलकालाद्यपेक्षया ॥ ५६ ॥ भा.टी.—बल काल आदि का विचार कर आवश्यकतानुसार माणिक्य भस्म की चौथाई रत्ती से लेकर आधी रत्ती तक की मात्रा प्रयोग की जाती है। ५६। माणिक्यमिहिरोदरसायनम् माणिक्यं कनकं रौप्यं तार्क्ष्यं तु समभागिकम् । कस्तूरिकाञ्च सर्वार्द्धां दत्त्वा कन्याम्भसा ततः ॥ ६० ॥ पिष्ट्वा द्विगुञ्जप्रमिता वटिकाः कारयेद्भिषक् । रसोऽयं तु समाख्यातो माणिक्यमिहिरोदयः ॥ ६१ ॥ रसायनमिदं वृष्यं बल्यं वह्निप्रदीपनम् । क्लैब्यापहं विशेषेण ध्वजभङ्गहरं मतम् ॥ ६२ ॥ माणिक्यमिहिरोदरसायनम्—तार्क्ष्यं गरुडमणिः ॥ ६०-६२ ॥ भा.टी.—माणिक्य भस्म एक भाग, स्वर्णभस्म एकभाग, रजतभस्म एक- भाग, तार्क्ष्य भस्म एक भाग और उत्तम कस्तूरी दो भाग (सबसे आधा भाग) लेकर खरल में डालकर घीकुआर के गूदे से मर्दन करके दो रत्ती की गोलियाँ बना लें । यह रस “मणिक्य मिहिरोदय” नाम से कहा जाता है । यह रस रसायन, वृष्य, बल तथा अग्निदीपक और विशेषरूप से नपुंसकता और ध्वज- भंग (नामर्दी) को दूर करता है ॥ ६०-६२ ॥ अथ मौक्तिकस्य नामानि मुक्ता मुक्ताफलञ्चैव मौक्तिकं मौक्तिकैककम् । शुक्तिजं शौक्तिकेयञ्च शशिरत्नं शशिप्रियम् ॥ ६३ ॥ भा.टी.—मुक्ता, मुक्ताफल, मौक्तिक, शुक्तिज, शौक्तिकेय, शशिरत्न तथा शशिप्रिय ये सब नाम मोती के कहे जाते हैं ॥ ६३ ॥

६१२ रसतरङ्गिणी जात्यमौक्तिकस्य स्वरूपम् चन्द्रोद्भासि स्थूलमत्यन्तरम्यं स्निग्धं वृत्तं निर्व्रणं निर्मलं यत् । धत्ते न्यस्तं यत्तुलायां गुरुत्वं प्राज्ञैरुक्तं मौक्तिकं तत्तु जात्यम् ॥६४॥ विमर्दितं शालितुषैर्गोमूत्रपटुना भृशम् । यन्नैति विकृतिं किञ्चित्तन्मौक्तिकमकृत्रिमम् ॥ ६५ ॥ मौक्तिकपरिचयः—चन्द्रोद्भासीति ग्राह्यमौक्तिकस्वरूपमाह । विमर्दितमिति अकृत्रिममौक्तिकपरीक्षा, आपणे कृत्रिममुक्तानां बहुधोपलम्भात् । निगदव्याख्यात- मन्यत् । उक्तञ्च—लवणक्षारक्षोदिनि पात्रे गोमूत्रपूरिते क्षिप्तम् । मर्दितमपि शालितुषैर्यदविकृतं तत्त मौक्तिकं जात्यम्" इति ॥ ६४, ६५ ॥ भा.टी.—उत्तम (जात्य) मोती चन्द्रमा की सी चमकवाली, मोटेदल और दाने की, अत्यन्त सुन्दर, चिकना स्पर्श, गोलाकार, गढा या दाग रहित स्वच्छ गुरुभार होती है । उत्तम मोती को धानों की भूसी से रगड़ने अथवा गोमूत्र में लवण मिलाकर उसमें मलने से मोती की चमक में कोई परिवर्तन नहीं आता है । उक्त लक्षण युक्त मोती प्राकृतिक मोती कही जाती है ॥ ६४, ६५ ॥ त्याज्यमौक्तिकस्य लक्षणम् दीर्घं पार्श्वकृशं रूक्षं त्र्यस्रं श्यामञ्च सत्रणम् । हतप्रभं क्षुद्रकायं मौक्तिकं हेयमीरितम् ॥ ६६ ॥ दीर्घं पार्श्वकृशमिति त्याज्यमौक्तिकस्वरूपम् । उक्तञ्च—"यदिच्छ्यायं मौक्तिकं व्यङ्गकायं शुक्तिस्पर्शो श्यामतां चातिधत्ते । मत्स्याक्षीकं रूक्षममुक्तान- निम्नं नैतद्धार्य्यं धीमताऽसौख्यदायि" इति ॥ ६६ ॥ भा.टी.—लम्बे आकार के बेडौल, एक तरफ मोटे एक तरफ पतले, रूक्षस्पर्श, तिकोने, श्यामवर्ण के, गढ़ेवाले, बिना चमक के छोटे-छोटे मोती निकृष्ट समझने चाहिए ॥ ६६ ॥ मौक्तिकशोधनस्य प्रथमः प्रकारः जयन्तीस्वरसेनेह दोलायन्त्र विधानतः । यामैकं सततं स्विन्नं मौक्तिकं शुद्धिमाप्नुयात् ॥ ६७ ॥ भा.टी.—मोतियों को एक कपड़े की पोटली में बाँधकर दोलायन्त्र में जयन्ती (अरणी) स्वरस डालकर उसमें तीन घंटे तक स्वेदन करने से वह शुद्ध हो जाती है ॥ ६७ ॥

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६१३. द्वितीयः शोधनप्रकारः अगस्त्यद्रवयोगेन यामं स्विन्नमनारतम् । दोलायन्त्रे पोट्टलीस्थं शुद्धिमायाति मौक्तिकम् ॥ ६८ ॥ जयन्तीस्वरसेनेति मौक्तिकशोधनम्—"जयन्त्या मौक्तिकं शुचि" इति स्मरणात् , अथवा अगस्त्यपत्रस्वरसेन स्वेदनात् शुद्धयति । तथा सुराप्रदीपवह्निना चूर्णोदकेन पाचितं शुद्धयति मौक्तिकम् ॥ ६८ ॥ भा.टी.—मोतियों को एक कपड़े की पोटली में बाँधकर दोलायन्त्र में अगस्त्यस्वरस डालकर उसमें एक याम ( तीन घण्टे ) तक स्वेदन कर लेने से वे शुद्ध हो जाती हैं ॥ ६८ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः सुराप्रदीपवह्निना शरावगं तु मौक्तिकम् ! सुधोदकेन पाचितं विशुद्धिमेत्यनुत्तमाम् ॥ ६६ ॥ भा.टी.—मोतियों को एक शराव ( चीनी के प्याले ) में रख उसमें चूने का जल डालकर इस प्याले को सुराप्रदीप की अग्नि से तीन घंटे पका लेने से भी मुक्ता शुद्ध हो जाती है ॥ ६६ ॥ मौक्तिकमारणस्य प्रथमः प्रकारः विमलं मौक्तिकं गव्यपयसा परिपेषितम् । त्रिधा लघुपुटे पक्वं मृतं स्याच्छशिसुन्दरम् ॥ ७० ॥ भा.टी.--शुद्ध की हुई मोतियों को एक उत्तम खरल में डालकर गोदुग्ध के साथ अच्छी तरह घोंटकर सुखा लें । अब इस श्वेतचूर्ण को एक सम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक देवें। इस तरह तीन लघुपुट देने से मौक्तिक की चन्द्रमा के समान स्वच्छ वर्ण की भस्म हो जाती है ॥ ७० ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः मुक्ताफलन्तु तरुणीपरिस्रुतजलान्वितम् । पिष्टं त्रिवारं पुटितं मृतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ ७१ ॥ मारणप्रकारः--गोपयसा यद्वा तरुणीपरिस्रुतजलेन शतपत्रीपुष्पार्केण "अर्क गुलाब" इति प्रसिद्धेन पेषितं त्रिधा पुटितं भस्मीभवति मुक्ताफलम् ॥ ७१ ॥ भा.टी.—शुद्ध मोतियों को एक उत्तम खरल में डालकर उसमें उत्तम अर्क गुलाब डालकर खूब अच्छी तरह घोटें और सुखा लें । अब इसको सम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक दें । इस विधि से तीन पुट देने से मोतियों की भस्म हो जाती है ॥ ७१ ॥

६१४ रसतरङ्गिणी मृतमौक्तिकस्य गुणाः मौक्तिकं वृष्यमायुष्यं मधुरं शिशिरं परम् । दीपनं दाहशमनं नेत्र्यं वर्ण्यं च कीर्तितम् ॥ ७२ ॥ जीर्णज्वरप्रशमनं त्वस्थिदन्तविवर्द्धनम् । हृद्यं मेहहरं मेध्यं दन्तोद्भेदज्वरापहम् ॥ ७३ ॥ मौक्तिकं सुशिशिरं क्षयापहं श्वासकासपरिक्षोपनाशनम् । अस्थिशोषशमनं विषापहं देहवीर्यबलवृद्धिवर्धनम् ॥ ७४ ॥ मृतञ्च मौक्तिकं सेवनतः वृष्यादिगुणम् । बालस्य दन्तोद्भेदसमये तदुपद्रव- रूपेण जातो ज्वरो दन्तोद्भेदज्वरः । स्पष्टमन्यत् । उक्तं हि—"कफपित्तास्रक्षयध्वंस कासश्वासाग्निमान्द्यजित् । पुष्टिदं वृष्यमायुष्यं दाहघ्नं मौक्तिकं मतम्" इति । भा.टी.—मुक्ता वृष्य, आयुवर्धक, मधुररस, अत्यन्त शीतवीर्य द्रव्य है । इसके सेवन से अग्नि की दीप्ति होती है, हाथ, पैरों तथा सर्वांगीण भीतरी दाह को शान्त करता है । इससे नेत्रों की ज्योति बढ़ती है और त्वचा का वर्ण सुन्दर हो जाता है । मुक्तासेवन से जीर्ण ज्वर नष्ट हो जाता है, अस्थियों का पोषण और दाँत शीघ्र निकलने लगते हैं । यह हृदय के लिए उत्तम बल्य, प्रमेहहर, मेधावर्धक और दाँत निकलते समय के ज्वर को नष्ट करता है । मुक्ता शीतगुण, क्षयरोग नाशक, श्वास तथा कासरोग शामक है। इसके सेवन से अस्थिशोष नष्ट होता है, शरीरगत बाह्य विषों के प्रभाव को नष्ट करता है, शरीर में वीर्य, बल और बुद्धि की वृद्धि करता है ॥ ७२–७४ ॥ वक्तव्य—मुक्ताखटिक कार्बोनिट् ( Calciam corbonate ) होते हुए भी उसको उत्पन्न करनेवाले जीव के ऐन्द्रियक भाग की उपस्थिति से मुक्ता अन्य खटिक धातुओं में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है । मुक्ता बाह्य प्रयोग में क्षतों के लिये ग्राही और स्रावहर है । खटिकधातु क्षारीय होने के कारण आमाशय में उत्पन्न होनेवाले अनेक प्रकार के अम्लों को जो कि शूल और अम्लपित्त के कारण बनते हैं उदासीन कर देती है । आँतों पर इसका ग्राही प्रभाव विशेष रूप से होता है । इसी तरह शरीर के किसी मार्ग से निकलनेवाले स्राव, रक्तस्राव मलस्राव, मूत्रस्राव को यह सुखा देती है । गर्भावस्था में माता के शरीर में “विटामिन्स” की कमी को मुक्ता पूर्ण कर देती है । मुक्ता विशेषतः क्षयहर है । इसके देने से कफ की कमी के साथ रात्रिखेद और रक्तनिष्ठीवन में भी आराम आता है । इसी कारण से क्षय में मालतीवसन्त विशेष उपयोगी औषधि है ।

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६१५ मुक्ता पुट.में फूँककर भस्म बना लेने की अपेक्षा उसको शुद्ध करके गुलाब जल में २१ दिन तक खरल करके पिष्टी बनाकर प्रयोग करना अधिक गुणकारी माना जाता है। अतः इस पिष्टी का सेवन करना ही आजकल प्रचलित हो गया है। यह पिष्टी मानसिक दुर्बलता जैसे—साधारण कारण से क्रोध करना, विचारहीनता, ऊँचा शब्द सुनना, भीड़ में होने से जी घबड़ाना; इन रोगों में विशेष लाभदायक होती है। तीव्र मानसिक आघात, शराब, गाँजा, धत्तूरा आदि तीक्ष्णवीर्य, उष्ण, रूक्ष पदार्थों के अतिःसेवन से मस्तिष्क में विकृत होकर उन्मादरोग होने पर मुक्तापिष्टी उत्तम गुण करती है। रक्तपित्त, रक्ता- तिसार, रक्तप्रदर में भी इसका विशेष लाभ देखा गया है॥ ७२-७४॥ मृतमौक्तिकस्य मात्रानिरूपणम् आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं मृतम्। मौक्तिकं विनियुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ७५ ॥ भा.टी.-मोती के भस्म को रोग, रोगी का बल तथा काल आदि अच्छी तरह विचार करके चौथाई रत्ती से लेकर एक रत्ती तक मात्रा में प्रयोग किया जाता है॥ ७५॥ मृतमौक्तिकस्य आमयिकः प्रयोगः रससिन्दूरसंयुक्तं मौक्तिकं परिशीलितम् । विनिहन्त्यचिरादेव दन्तोद्भेदभवं ज्वरम् ॥ ७६ ॥ मृतविद्रुमगन्धेशसंयुक्तं मृतमौक्तिकम् । बीजपूराम्भसा पिष्टं पक्वं लघुपुटे ततः॥ ७७ ॥ भक्षितं सततञ्चैतद् गुञ्जाद्वितयसंमितम् । मासमात्रप्रयोगेण निहन्ति क्षयमुल्बणम् ॥ ७८ ॥ मृतविद्रुमसंयुक्तं मौक्तिक परिशीलितम् । हन्ति फुप्फुसदौर्बल्यं चिरकालसमुद्भवम् ॥ ७६ ॥ कटुकीगैरिकोपेतं सुमृतं मौक्तिकेयकम्। निषेवितं निहन्त्याशु हिक्काः परमदारुणाः ॥ ८० ॥ स्वर्णाक्कैकान्तभसितसमेत खलु मौक्तिकम् । बीजपूरस्य तोयेन हिक्कां जयति दारुणाम् ॥ ८१ ॥ रोगयोग्यः प्रयोगोऽस्य रससिन्दूरेति—स्वर्णम्, अर्कः ताम्रम्, कान्तं कान्त- लोहं, तेषां भस्मानि, तैः समेतम्। निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ७६-८१ ॥

५१६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—बच्चों के दाँत निकलते समय होनेवाले ज्वर में मुक्ताभस्म को रससिन्दूर के साथ मिलाकर सेवन कराने से शीघ्र आराम आता है। मुक्ताभस्म में प्रवालभस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारद, प्रत्येक समभाग मिलाकर अर्थात् पारद गन्धक की कजली कर उसमें मुक्ता आदि मिलाकर इसको बिजौरानींबू के स्वरस से मर्दन कर लघुपुट में फूँक देवें। अब इस औषधि में से दो रत्ती की मात्रा लेकर निरन्तर एक मास तक सेवन कराने से भयंकररूपयुक्त राजयक्ष्मा में आराम आता है। फेफड़ों की पुरानी दुर्बलता में मुक्ताभस्म में प्रवालभस्म मिलाकर सेवन करने से आराम आता है। भयंकर हिचकी की बीमारी में मुक्ता को कुटकी तथा स्वर्णगैरिकचूर्ण के साथ सेवन कराने से शीघ्र आराम आता है। इसी तरह मुक्ताभस्म में स्वर्णभस्म, ताम्रभस्म तथा कान्तलोहभस्म मिलाकर बिजौरानींबूरस के साथ सेवन करने से दारुण हिचकी में आराम आता है ॥ ७६–८१ ॥ अथ मुक्तापञ्चामृतरसायनम् मौक्तिकं विद्रुमं वङ्गं शङ्खं मुक्तागृहं तथा । वसुदेवाब्धिचन्द्रेन्दुभागिकं क्रमशः पृथक् ॥८२॥ वरीविदारीकन्येक्षुदुग्धहंसपदीरसैः । पृथक् सम्पेष्य यत्नेन पञ्चधा पुटपाचितम् ॥८३॥ ततः काचपिधानेन विदध्यात्कूपिकागतम् । रसायनमिदं ख्यातं मुक्तापञ्चामृताह्वयम् ॥८४॥ अनारतं द्विगुञ्जन्तु गव्यदुग्धेन शीलितम् । मासद्वयप्रयोगेण रसायनफलप्रदम् ॥८५॥ जीर्णज्वरं महाघोरं राजयक्ष्माणमुल्बणम् । निहन्ति सर्वरोगांश्च तत्तद्रोगानुपानतः ॥८६॥ मुक्तापञ्चामृतरसायनम्—मुक्तागृहं मुक्ताशुक्तिः । मौक्तिकं अष्टभागम् , विद्रुमं चतुर्भागम्, वङ्गं द्विभागम्, शङ्खमेकभागम्, मुक्ताशुक्तिमप्येकभागम् । वरी शतावरी, कन्या घृतकुमारी । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ८२–८६ ॥ भा.टी.—मुक्ताभस्म आठ भाग, प्रवालभस्म चार भाग, वङ्गभस्म दो भाग शङ्खभस्म एक भाग, शुक्तिभस्म एक भाग, लेकर सबको एकत्र खरल में डाल- कर इसको अलग-अलग शतावरीस्वरस, विदारीकन्दस्वरस, घीकुंआरस्वरस, गन्ने का रस, दूध तथा हंसपदी के स्वरस में घोट सुखाकर पाँच लघुपुट देवें। अन्तमें इसको सम्पुट में से निकाल एक काँच की शीशी में भरकर डाट लगाकर रखलें।

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६१७ इसको मुक्तापञ्चामृत रसायन कहते हैं । इसमें से प्रतिदिन निरन्तर दो मास तक गोदुग्ध के साथ सेवन करने से जरा व्याधि का नाश होता है । इसके सेवन से भयंकर जीर्णज्वर तथा तीव्र अवस्था का राजयक्ष्मा रोग नष्ट हो जाता है । इस तरह तत्तत् रोगहर द्रव्यों के अनुपान से यह रसायन सब रोगों में लाभ पहुँचाता है ॥ ८२–८६ ॥ अथ पुष्परागस्य नामानि पुष्पराजः पुष्परागः पीतरक्ताह्वयस्तथा । गुरुरत्नं पीतमणिः स एव गुरुवल्लभः ॥ ८७ ॥ भा.टी.—पुष्पराज, पुष्पराग, पीतरक्त, गुरु ( बृहस्पति ) रत्न, पीतमणि तथा गुरुवल्लभ, ये सब नाम पुखराजमणि के कहे जाते हैं ॥ ८७ ॥ जात्यपुष्पराजस्य लक्षणम् स्निग्धं समं सुमस्सृणं तु सुवर्णवर्णं स्वच्छं परं सुविमलं तु सुवृत्तगात्रम् । यत्कर्णिकारकुसुमप्रभमुज्ज्वलञ्च जात्यं तदेव गदितं खलु पुष्पराजम् ॥ ८८ ॥ निकषोपलसंघृष्टं वर्णं पुष्णाति यन्निजम् । पुष्पराजन्तु तज्जात्यं मतं रत्नपरीक्षकैः ॥ ८९ ॥ अथ पुष्परागपरिचयः—स्निग्धं समं सुमस्सृणमिति ग्राह्यपुष्परागरूपम् । उक्तं हि—"पुष्परागं गुरु स्निग्धं स्वच्छं स्थूलं समं मृदु । कर्णिकारप्रसूनाभं मसृणं शुभमष्टधा" इति । तथा च "घृष्टो निकषपदे यत् पुष्यति यो रागमधिकमात्मी- यम् । एष खलु पुष्परागो जात्यस्तथाऽयं परीक्षकैरुक्तः" इति । श्यामलादिरूपं च तत् त्याज्यम् । "कृष्णबिन्द्वङ्कितं द्वयक्षं धवलं मलिनं लघु । विच्छायं शर्करां- गाभं पुष्परागं सदोषकम्" इति स्मरणात् ॥ ८८, ८९ ॥ भा.टी.—उत्तम पुखराजमणि स्पर्श में चिकनी, समगात्र, चमकीली, स्वर्ण वर्ण की स्वच्छ, गोलाकर और देखने में अमलतास के फूल की सी आभावाली होती है । यदि इसको कसौटी पर घिसा जाय तो इसका वर्ण और भी साफ दिखाई देने लगता है । इस परीक्षा में ठीक उतरनेवाली पुखराजमणि को ही रत्नपरीक्षकों ने उत्तम माना है ॥ ८८, ८९ ॥ हेयपुष्पराजस्य लक्षणम् श्यामलं निष्प्रभं कर्कशं द्वयक्षकं कृष्णबिन्द्वङ्कितं शर्कराङ्गप्रभम् । उन्नतं त्वानतं यच्च रूक्षंपरं पुष्पराजं मतं तत्तु हेयं बुधैः ॥ ९० ॥

६१८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—जो पुखराज श्यामलवर्ण, प्रभारहित, स्पर्शरहित, स्पर्श में कठोर, दो नेत्रों के से चिह्नोंवाला अथवा छोटे-छोटे काले बिन्दुओं से युक्त, बालू के पिण्ड जैसा, कहीं ऊँचा, कहीं पर गहरा और रूक्ष ( खुश्क ) हो, उसे त्याज्य समझना चाहिएं ॥ ६० ॥ पुष्पराजस्य शोधनम् कुलत्थक्वथितोपेतेः काञ्जिकैः स्वेदितं समम् । दोलायन्त्रे पुष्पराजं यामैकेन विशुद्ध्यति ॥ ६१ ॥ शोधनम्—कुलत्थकथितजलेन काञ्जिकेन च स्वेदनादस्य शुद्धिः—“पुष्प- रागञ्च संधानैः कुलत्थक्वाथसंयुक्तैः” इति वचनात् ॥ ६१ ॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में समभाग कुलत्थक्वाथ और काञ्जी डालकर उसमें तीन घण्टे तक पुखराज को स्वेदन करने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ ६१ ॥ पुष्पराजस्य मारणम् माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतिर्यत्नतः । मारयेत्पुष्पराजन्तु रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ६२ ॥ भा.टी.—पूर्व कथित माणिक्यमणि का दो प्रकार की मारण विधियों से पुखराज की भस्म हो जाती है । अर्थात् पुखराज की भस्म विधि भी माणि- क्यमणि के सदृश ही समझनी चाहिए ॥ ६२ ॥ पुष्पराजस्य गुणाः पुष्पराजन्तु शिशिरं दीपनं पाचनं परम् । कफवातप्रशमनं कुष्ठच्छर्दिनिबर्हणम् ॥ ६३ ॥ विषघ्नं दाहशमनं गुदजामयनाशनम् । मेध्यं बृंहणमायुष्यं रसज्ञैः परिकीर्तितम् ॥ ६४ ॥ भा.टी.—पुखराज शीत गुण द्रव्य है । इसके भस्म के सेवन से दीपन और पाचन क्रियायें बढ़ने लगती हैं । इसके प्रयोग से कफ वात का प्रकोप शान्त हो जाता है । यह कुष्ठ तथा वमन को नष्ट करती है, शरीरगत विष- प्रभाव को नष्ट करती है, दाह को शान्त करती तथा बवासीर में लाभ पहुँचाती है । स्वस्थ शरीर में इसका प्रयोग करने से इसके द्वारा मेधा वृद्धि, शरीर में मांस वृद्धि तथा आयु वृद्धि होती है ॥ ६३, ६४ ॥ पुष्पराजस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं परम् ।

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६१६ सुमृतं पुष्पराजन्तु प्रयुञ्जीत भिषग्वरः ॥ ६५ ॥ भा.टी.-पुखराजभस्म की मात्रा चौथाई रत्ती से लेकर एक रत्ती तक पूर्ण मात्रा में सेवन की जा सकती है ॥ ६५ ॥ अथ नीलस्य नामानि नीलो नीलोपलो नीलं नीलरत्नं सुनीलकम् । महानीलञ्च नीलाश्मशनिरत्नञ्च कीर्तितम् ॥ ६६ ॥ अथ नीलस्य परिचयः—ग्राह्यनीलस्वरूपं सरलात्तरम् । वचनं हि—"एक च्छायं गुरु स्निग्धं स्वच्छं पिण्डितविग्रहम् । मृदु मध्ये लसज्ज्योतिः सप्तधा नील- मुत्तमम्” इति ॥ ६६ ॥ भा.टी.--नील, नीलोपल, नीलरत्न, सुनीलक, महानील, नीलाश्म तथा शनिरत्न ये सब नाम नीलम के कहे जाते हैं ॥ ६६ ॥ जात्यनीलस्य लक्षणम् स्वच्छं सच्छायममलं मसृणं तु महोज्ज्वलम् । स्निग्धं गुरु लसज्ज्योतिर्जात्यं नीलं मतं बुधैः ॥ ६७ ॥ भा.टी.—उत्तम नीलम मणि, स्वच्छ तथा सुन्दर कान्तियुक्त, कुछ-कुछ पारदर्शक, चिकनी और पर्याप्त चमकीली, गुरुभार तथा ज्योतियुक्त नील वर्ण की होती है ॥ ६७ ॥ हेयनीलस्य लक्षणम् रक्ताद्धं विगतच्छायं रूक्षं लघु च कोमलम् । परिहेयं शौरिरत्नं मतं रत्नपरीक्षकैः ॥ ६८ ॥ भा.टी.—आधे भाग में रक्तवर्ण और आधे भाग में नीलवर्ण की अपार- दर्शक, रूक्ष, लघुभार, कोमल (दबाव डालने पर मुड़नेवाली अथवा शीघ्र टूटनेवाली) नीलम त्याज्य समझनी चाहिए ॥ ६८ ॥ अथ नीलस्य शोधनम् नीलीस्वरससंयुक्तं दोलायन्त्रे विधानतः । यामैकं परिपक्तन्तु नीलं शुद्ध्यति निश्चितम् ॥ ६९ ॥ भा.टी.—नीलमणि को दोलायंत्र में नील का स्वरस डालकर उसमें एक पहर तक स्वेदन करके शुद्ध कर लेना चाहिए ॥ ६९ ॥ अथ नीलस्य मारणम् माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतियत्नतः ।

६२० रसतरङ्गिणी मारयेच्छनिरत्नं तु रसागमविशारदः ॥ १०० ॥ नीलीस्वरसेन स्वेदनादस्य शुद्धिः—“नीलं नीलीरसेन च” इति स्मरणात्। माणिक्यवच्चास्य मारणमिति ॥ १०० ॥ भा.टी.—नीलम मणि की भस्म पूर्वोक्त माणिक्य मणि की भस्म विधि के अनुसार ही की जाती है ॥ १०० ॥ मृतनीलस्य गुणाः नीलं तु सुमृतं वृष्यं बल्यं दीपनमुत्तमम् । त्रिदोषशमनं वर्ण्यं गुदजामयनाशनम् ॥ १०१ ॥ त्वच्यं कुष्ठादिदोषघ्नं श्वासकासनिषूदनम् । कफपित्तानिलहरं बिषमज्वरनाशनम् ॥ १०२ ॥ मृतनीलगुणाः—सुगमः । निगदन्ति हि—“श्वासकासहरं वृष्यं त्रिदोषघ्नं सुदीपनम् । विषमज्वरनियमनं पापघ्नं नीलमीरितम्” इति ॥ १०१, १०२ ॥ भा.टी.—उत्तम नीलभस्म वृष्य, बलवर्धक, दीपन, त्रिदोष प्रकोप शामक, त्वचा के लिए वर्ण्य तथा बवासीर रोग नाशक होती है । इसके सेवन से कुष्ठ आदि विकृतियाँ दूर होकर त्वचा का सुन्दर वर्ण निखर आता है । इसके सेवन से श्वासकास रोग में लाभ पहुँचता है । यह भस्म कफ, पित्त तथा वातहर और विष नाशक है ॥ १०१, १०२ ॥ मृतनीलस्य मात्रा गुञ्जाष्टमांशप्रमितात् गुञ्जार्द्धप्रमितं परम् । सुमृतं नीलरत्नं तु प्राणाचार्यः प्रयोजयेत् ॥ १०३ ॥ भा.टी.—नील भस्म को आवश्यकतानुसार ⅛ रत्ती (दो चावल भर) से लेकर ½ रत्ती (चार चावल भर) तक की मात्रा में प्रयोग किया जाता है ॥ १०३ ॥ अथ मरकतस्य नामानि गारुत्मत मरकतं तार्क्ष्यं गारुडसंज्ञकम् । बुधरत्नं रौहिणेयं हरिद्रत्नञ्च तन्मतम् ॥ १०४ ॥ भा.टी.—गारुत्मत, मरकत, तार्क्ष्य, गारुडमणि, बुधरत्न, रौहिणेय, हरि- द्रत्न, ये सब नाम मरकत (पन्ना) के कहे जाते हैं ॥ १०४ ॥ जात्यमरकतस्य स्वरूपम् सच्छायं मसृणं स्वच्छं गुरु स्निग्धञ्च कोमलम् । अष्टाश्रञ्च हरिद्वर्णं जात्यं मरकतं मतम् ॥ १०५ ॥

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६२१ मरकतस्य परिचयः—जात्यमरकतरूपं सच्छायमित्यादिना अव्यंगांमेति अविकृतांगम्। उक्तञ्च—“हरिद्वर्णं गुरु स्निग्धं स्फुरद्रश्मिचयं शुभम्। मसृणं भासुरं तार्क्ष्यं गात्रं सप्तगुणं मतम्” इति ॥ १०५ ॥ भा.टी.—उत्तम कान्तियुक्त, चमकीला, स्वच्छ, गुरुभार, चिकना, कोमल- स्पर्श, सम और सुन्दर आकार तथा हरे रंग की मरकत मणि उत्तम मानी जाती है ॥ १०५ ॥ हेयमरकतस्य स्वरूपम् रूक्षन्तु विगतच्छायं विकृताङ्गं खरं लघु । सत्रासं चातिमलिनं हेयं मरकतं मतम् ॥ १०६ ॥ त्याज्यन्तु रूक्षमित्यादिना स्फुटम् ॥ १०६ ॥ भा.टी.—रूक्ष, तथा कान्ति रहित, विकृत आकार (शरीर), खुरदरा, लघुभार, देखने में कुछ भयावना सा, अपारदर्शक मलिन मरकतमणि त्याज्य मानी जाती है ॥ १०६ ॥ अथ मरकतस्य शोधनम् सुरभीपयसा यामं दोलायन्त्रे विधानतः । विपाचितं मरकतं विशुद्ध्यति सुनिश्चितम् ॥ १०७ ॥ एतस्य शोधनञ्च गोदुग्धेन स्वेदनात् सिद्ध्यति, “तार्क्ष्यं गोदुग्धकैस्तथा” इति स्मरणात् ॥ १०७ ॥ भा.टी.—मरकत मणि को दोलायन्त्र में गोदुग्ध डालकर उसमें तीन घंटे पका लेने से वह अच्छी तरह शुद्ध हो जाती है ॥ १०७ ॥ अथ मरकतस्य मारणम् माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतियत्नतः । अष्टधा पुटितं तार्थ्यं म्रियतेऽत्र न संशयः ॥ १०८ ॥ मरकतमारणञ्च माणिक्यवत् ॥ १०८ ॥ भा.टी.—पूर्वोक्त माणिक्यमणि की मारण (भस्म) विधियों में से किसी के द्वारा आठ बार पुट देने से मरकतमणि की उत्तम भस्म हो जाती है ॥१०८॥ मरकतस्य गुणाः मृतं मरकतं बल्यं विषघ्नं वह्निदीपनम् । ओजोविवर्द्धनं वृष्यं पाण्डुशोफनिषूदनम् ॥ १०६ ॥ श्वासच्छर्दिप्रशमनं गुदजामयनाशनम् । समाख्यातं विशेषेण सन्निपातनिबर्हणम् ॥ ११० ॥

६२२ रसततरङ्गिणी मरकतगुणाः बल्यविषघ्नत्वादयः । आहुश्च प्राज्ञाः - "ज्वरच्छर्दिविषश्वास- संन्निपाताग्निमान्द्यनुत् । दुर्नामपाण्डुशोफघ्नं तार्क्ष्यमोजोविवर्धनम्" इति। १०६,११० भा.टी.- मरकत मणि की भस्म, बलवर्धक, शरीरगत विष नाशक, अग्नि (पाचकाग्नि) दीपक, ओज वर्धक, उत्पादक अंगों के लिए बल्य, पाण्डुरोग तथा शोथरोग नाशक होती है । इसके सेवन से श्वास रोग, वमन तथा बवासीर रोग में लाभ होता है । तीव्र सन्निपात ज्वर की अवस्था में जब हृदय दुर्बल हो गया हो, ज्ञान शक्ति क्षीण हो गयी हो और रोगी मृत्यु-मुख में जाने लगा हो तो मरकत मणि की भस्म रोगी को जीवन प्रदान करती है ॥ १०६, ११० ॥ अथ मरकतस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं परम् । मृतं मरकतं युञ्ज्यात् बलकालाद्यपेक्षया ॥ १११ ॥ भा.टी.- रोग तथा रोगी का बल काल देश अवस्था आदि का विचार करके चौथाई रत्ती से एक रत्ती तक की मात्रा में मरकतमणि भस्म का प्रयोग किया जा सकता है ॥ १११ ॥ अथ वैदूर्यस्य नामानि विदूररत्नं वैदूर्यं केतुरत्नं विद्रूरजम् । बिडालाख्यं विडालाक्षं वायजञ्च प्रकीर्तितम् ॥ ११२ ॥ भा.टी.-विदूररत्न, वैदूर्य, केतुरत्न, विद्रूरज, बिडालाख्य, बिडालाक्ष, वायज ये सब नाम वैदूर्य ( लसुनिया Cats Eye ) के कहे जाते हैं ॥ ११२ ॥ जात्यवैदूर्यस्य स्वरूपम् वैदूर्यं गुरु सुस्निग्धं बिडालेक्षणसप्रभम् । भ्रमच्छुभ्रोत्तरीयाढ्यं वैदूर्यं जात्यमुच्यते ॥ ११३ ॥ अथ वैदूर्यपरिचयः-गुरुसुस्निग्धमिति उत्कृष्टं वैदूर्यरूपम् । उक्तं हि- "वैदूर्य श्यामशुभ्रामं समं स्वच्छं गुरु स्फुटम् । भ्रमच्छुभ्रोत्तरीयेण गर्भितं शुभ- मीरितम्" इति ॥ ११३ ॥ भा.टी.- उत्तम वैदूर्यमणि गुरुभार, अत्यन्त चिकना स्पर्श, बिल्ली के नेत्र के समान चमकीला होता है । इस पर शुभ्रवर्ण का एक घेरा या यज्ञोपवीत जैसा चिह्न पड़ा हुआ होता है ॥ ११३ ॥ हेयवैदूर्यस्य स्वरूपम् विच्छायं लघु रूक्षञ्च सत्रासं चिपिटं खरम् । कृष्णां तथा मृच्छिलाढ्यं वैदूर्यं हेयमीरितम् ॥ ११४ ॥

त्रयोविंशस्तरङ्गः ५२३ भा.टी.—कान्ति रहित, लघुभार, रूक्ष ( खुश्क ),देखने में भयावह (डरा- वना-सा),चपटा आकार, खुरदरा, कृष्णवर्ण तथा मिट्टी और पत्थर के छोटे-छोटे खण्डों से युक्त, वैदूर्य अग्राह्य समझना चाहिए ॥ १२४ ॥ वैदूर्यस्य शोधनम् त्रिफलाक्वथितोपेतं वैदूर्यं याममात्रकम् । दोलायन्त्रे परिस्विन्नं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ११५ ॥ वैदूर्य्यशोधनं त्रिफलाक्वाथेन साध्यम् । स्मरन्ति हि—"वैदूर्यं त्रिफलाजलैः" इति ॥ ११५ ॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में त्रिफला क्वाथ भरकर उसमें वैदूर्यमणि को तीन घण्टे तक पकाने से वह अच्छी तरह शुद्ध हो जाती है ॥ ११५ ॥ वैदूर्यस्य मारणम् माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतियत्नतः । विदूररत्नं पुटितं त्वष्टधा मृतिमाप्नुयात् ॥ ११६ ॥ भा.टी.—माणिक्य मणि की पूर्वोक्त मारण विधियों से ही आठ बार वैदूर्य मणि को पुट दी जाय तो उसकी उत्तम भस्म हो जाती है ॥ ११६ ॥ मृतवैदूर्यस्य गुणाः सुमृतं खलु वैदूर्यं मधुरं शिशिरं परम् । दीपनं मेध्यमायुष्यं बल्यं च मलभेदनम् ॥ ११७ ॥ रक्तपित्तप्रशमनं चक्षुष्यं बृंहणं परम् ॥ पित्तामयप्रशमनं समाख्यातं विशेषतः ॥ ११८ ॥ वैदूर्य्यगुणाः—मधुरं शिशिरं परमित्यादिना । वदन्ति हि—वैदूर्यं रक्तपित्त- घ्नं प्रजायुर्बलवर्धनम् । पित्तप्रधानरोगघ्नं दीपनं वृष्यमेव च" इति ॥११७,११८॥ भा.टी.—उत्तम वैदूर्य भस्म, मधुररस और अत्यन्त शीत गुणयुक्त होती है । यह पाचक अग्नि को उत्तेजित करती और धारणा शक्ति को बढ़ाती है । स्वस्थशरीर में इसके सेवन से आयु की वृद्धि होती है और शरीर में बल बढ़ता है । इसके सेवन से मल पतला होकर निकलता है। यह भस्म रक्तपित्त शामक, नेत्रों के लिए लाभदायक और शरीर को मोटा करनेवाली होती है क्योंकि यह शीत वीर्य और मधुररस द्रव्य है, अतः विशेष रूप से पित्तरोग शामक मानी जाती है ॥ ११७, ११८ ॥

६२४ रसतरङ्गिणी वैदूर्यस्य मात्रा वस्र्वंशतो रक्तिकाया वैदूर्य गुञ्जसंमितम् । प्राणाचार्यः प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ११६ ॥ भा.टी.-रोग तथा रोगी, बल, अवस्था, देश, काल आदिका पूर्ण विचार करके वैदूर्यमणि भस्म को ⅛ रत्ती से लेकर एक रत्ती की मात्रा में प्रयोग कर सकते हैं ॥ ११६ ॥ अथ गोमेदकस्य नामानि गोमेदकश्च गोमेदः पिङ्गास्फटिक इत्यपि । गोमेदो राहुरत्नञ्च कीर्तितश्च तमोमणिः ॥ १२० ॥ भा.टी.-गोमेदक, गोमेद, पिङ्गास्फटिक, राहुरत्न तथा तमोमणि, ये सब नाम गोमेदमणि ( Sunstone ) के कहे जाते हैं ॥ १२० ॥ जात्यगोमेदस्य स्वरूपम् गोमूत्राभं स्निग्धममन्दं समगात्रं हेमारक्तं निर्दल मच्छं गुरुभारम् । दीप्तच्छायं मञ्जुलरूपं मसृणं यद् गोमेदाख्यं रत्नमिह स्यात्तज्जात्यम् ॥ १२१ ॥ गोमेदकपरिचयः-गोमूत्राभमिति तद्ग्राह्यरूपम् । हेमारक्तं स्वर्णवदीषदू रक्तम् । उक्तम्-''सुस्वच्छगोजलच्छायं स्निग्धं स्वच्छं समं गुरु । निर्दलं मसृणं दीप्तं गोमेदं शुभमष्टधा'' इति ॥ १२१ ॥ भा.टी.-उत्तम गोमेदमणि गोमूत्र की सी आभावाली, चिकना स्पर्श, समभागयुक्त शरीर-अर्थात् दाग, गढ़ा, कहीं चपटा, मोटापन रहित, स्वर्ण के समान कुछ रक्तवर्णयुक्त, चमकीली, सुन्दराकार, पालिश की हुई सी चमक- वाली होती है ॥ १२१ ॥ हेयगोमेदस्य स्वरूपम् सत्रासं विगतच्छायं चिपिटं मलिनप्रभम् । सदलं लघु रूक्षं च गोमेदं हेयमीरितम् ॥ १२२ ॥ सत्रासमिति त्याज्यगोमेदरूपम् । तथाहि-''विच्छायं लघु रूक्षांगं चिपिटं पटलाचितम् । निष्प्रभं पीतकाचाभं गोमेदं न शुभावहम्'' ॥ १२२ ॥ भा.टी.-अग्राह्य गोमेद त्रास युक्त (असुन्दर अनाकर्षक होने से कुछ भय सा उत्पन्न करनेवाला ) कान्ति रहित, चिपटे आकार का, मैली चमक से युक्त,