भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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भाग पारद गन्धक की बनी हुई उत्तम कज्जली त्रिगुण अर्थात् तीन सौ पचह- त्तर रत्ती मिलाकर बकरी के दूध तथा बांझ ककोड़े के स्वरस में पीसकर सुखा लें। फिर इसको एक सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके जङ्गली उपलों के कुक्कुटपुट में फूँक दें। सम्पुट के स्वांगशीत होने पर औषधि को निकाल पुनः बकरी के दूध तथा ककोड़े के स्वरस में घोंटकर कुक्कुटपुट में फूँक दें। इस प्रकार सोलह पुट देवें। अन्त में पीसकर शीशी में रख लें। इस योग को वैद्य लोग हीरक-रसायन कहते हैं। यह रसायन गर्भिणी स्त्रियों के रोग को नष्ट करता है। इसके सेवन से पाचकाग्नि तीव्र होती है और आमदोष का परिपाक होता है। यह बलवर्धक, स्त्री सौभाग्यवर्धक, योनिरोगनाशक, पुरुषों के वन्ध्यत्वदोष- नाशक तथा काकवन्ध्या स्त्री के बांझ दोष का नाशक है ॥ ३७-४२ ॥ अथ माणिक्यस्य नामानि माणिक्यं रङ्गमाणिक्यं पद्मरागसमाह्वयम् । रविरत्नं शोणरत्नं कुरुविन्दं च लोहितम् ॥ ४३ ॥ भा.टी.-माणिक्य, रंगमाणिक्य, पद्मराग, रवि (सूर्य) रत्न, शोणरत्न, कुरु- विन्द तथा लोहित, ये सब नाम माणिक्य मणि अथवा लाल के कहे जाते हैं ॥४३॥ जात्यमाणिक्यस्वरूपम् रक्तोत्पलदलच्छायं रम्यं दीप्तप्रभं परम् । वृत्तायतं, समाङ्गञ्च माणिक्यं जात्यमुच्यते ॥ ४४ ॥ माणिक्यपरिचयः-तत्र ग्राह्यमाणिक्यस्वरूपं रक्तोत्पलदलच्छायमित्यादिना।४४। भा.टी.-माणिक्यमणि वह उत्तम समझी जाती है जो देखने में रक्त- कमलपत्रवत् छायावाली, सुन्दर चमकीली, गोल लम्बे आकार की, एक-सी बनावट की हो ॥ ४४ ॥ त्याज्यमाणिक्यस्वरूपम् विच्छायं लघु धूमाभं विरूपं कर्कशं परम् । मलिनं चिपिटं वक्रं माणिक्यं त्याज्यमुच्यते ॥ ४५ ॥ त्याज्यञ्च विच्छायमिति । आहुश्च "कुशेशयदलच्छायं स्वच्छं स्निग्धं महत् स्फुटम् । वृत्तायतं समं गात्रं माणिक्यं त्वष्टधा शुभम् ॥" तथा-"यद्विच्छायं शर्करिलं कर्कशभ्रूभ्रं स्वरागविकलञ्च विरूपं लघु माणिक्यं तद् दोषावहं त्याज्यम्" इति च ॥४५ ॥ भा.टी.-चमक रहित, लघुभार, धूम्रवर्णा, बेडौल, खुरदरी, मैली तथा चपटी और टेढ़ी माणिक्य उत्तम नहीं होती है ॥ ४५ ॥