रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ६६६ विषरसायनम्—गोमूत्रविमलीकृतमिति विशेषः। तारं रजतम्। रसगन्धक- जारितमिति ताम्रविशेषणं प्रकारान्तरमृतिनिषेधाय। युक्त्यासावधानतया जीवन- साफल्यमिति वृष्यत्वादस्य योगस्य ॥ ११४-१२० ॥ भा.टी.—गोमूत्र में शुद्ध किया हुआ अमृत (विष) एक तोला, रस- सिन्दूर एक तोला, शुद्ध हिंगुल एक तोला, रजतभस्म, पारद-गन्धक योग से बनी हुई ताम्रभस्म; प्रत्येक एक तोला, शुण्ठीचूर्ण, मिरचचूर्ण, पिप्पलीचूर्ण, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, नागकेशर तथा चित्रकमूलचूर्ण; प्रत्येक आधा पल लेकर एकत्र खरल में जल के साथ पीसकर अच्छी तरह दो-दो रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखा लें। इस योग को वैद्य लोग "विषरसायन" नाम से कहते हैं। यह रसायन सेवन करने पर बल्य, वृष्य, वर्ण्य तथा अनेक विध रोगों को नष्ट करनेवाला है। इस रसायन का निरन्तर दो मास तक सेवन करने से मनुष्य शीघ्र ही दिव्यदृष्टि तथा दीर्घकाय हो जाता है। इसके सेवन से अग्नि की वृद्धि होती है और यकृत् तथा प्लीहा रोग नष्ट हो जाते हैं। पेट में शूल, अफारा और अजीर्ण होने पर सब रोग शान्त हो जाते हैं। युवावस्था का आनन्द लेनेवाले और अधिक स्त्रियों से रमण की इच्छावाले मनुष्य को इसका सेवन अवश्य करना चाहिये ॥ ११४-१२० ॥ अमृतरसायनम् विषं द्वितोलकमितं सुरभीमूत्रभावितम् । धात्रीहृतं कान्तलोहं गगनं स्वर्णमाक्षिकम् ॥ १२१ ॥ स्वर्णसिन्दूरकञ्चैव तारं वङ्गञ्च तन्मितम् । खादिरं नागरं चैव त्रितोलकमितं पृथक् ॥ १२२ ॥ समादाय भिषग्वर्यः कन्यानीरेण मर्दयेत् । निर्मापयेत्तु वटिका रक्तिद्वितयसंमिताः ॥ १२३ ॥ समाख्यातं भिषग्वर्यैर्नाम्नाऽमृतरसायनम् । नानातङ्कप्रशमनं रसायनमनुत्तमम् ॥ १२४ ॥ रसायनमिदं रम्यं दीपनं बृंहणं परम् । बलसञ्जननञ्चैव रतिशक्तिविवर्द्धनम् ॥ १२५ ॥ कासश्वासप्रशमनं क्षयक्षयकरं परम् । क्लैब्यापहं विशेषेण शुक्रतारल्यनाशनम् ॥ १२६ ॥ अतीसारग्रहणिकावह्निमान्द्यनिषूदनम् ।