रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७० रसतरङ्गिणी परं त्वग्दोषशमनं तथा कुष्ठविनाशनम् ॥ १२७ ॥ अपत्यकरमत्यन्तं परमोजोविवर्द्धनम् । धृतिस्मृतिप्रदञ्चैव नानामेहनिषूदनम् ॥ १२८ ॥ यौवनोपवने नित्यं रतिपुष्पचिचीषया । विहरद्भिः कामिभिस्तु सेव्यमेतद्रसायनम् ॥ १२६ ॥ एतद्दिव्यरसायनं घृतसिताक्षौद्रेण संयोजितं । वर्षैकं परिशीलितं ह्यविरतं कामं द्विगुञ्जोन्मितम् । वार्द्धक्यं विनिहन्त्यलं शमयति श्लेष्माणमत्युल्बणं कामं कामकलाविलासचतुरप्रौढाङ्गणारञ्जनम् ॥ १३० ॥ अथामृतरसायनम्—सुरभीमूत्रं गोमूत्रम् , धात्री आमलकी, आमलकीसत्त्व- स्वरसेन शतधा पुटितं कान्तं म्रियत इति पूर्वमुक्तम् । गगनं अभ्रकम् । खादिरः खदिरसारः रतिरेव पुष्पं तस्य चिचीषा चयनेच्छा । कामम् अत्यर्थम् । १२१-१३०। भा.टी.—गोमूत्र से शुद्ध वत्सनाभ, आवंलों के स्वरस से पुट दिया हुआ कान्तलोह, अभ्रकभस्म, स्वर्णमाक्षिकभस्म, स्वर्णसिन्दूर, रजतभस्म और वंगभस्म, प्रत्येक दो-दो तोला, खदिरसार (कत्था) और शुण्ठीचूर्ण पृथक् तीन-तीन तोला लेकर सबको एकत्र खरल में घीकुआर के स्वरस से अच्छी तरह मर्दन करें। गोली बनाने योग्य होने पर इसकी दो रत्ती की गोलियाँ बना लें । इस योग को वैद्य लोग अमृतरसायन कहते हैं। यह अमृतरसायन अनेक विध रोग नाशक और उत्तम रसायन गुणकारक दीपक बृंहण है । इसके सेवन करने से शरीर में बल की वृद्धि होती है, स्त्री सम्भोग-शक्ति बढ़ती है। यह कास तथा श्वास रोग को शान्त करता और क्षयरोग का क्षय (नाश) करता है । इसको कुछ काल सेवन करने से नपुंसकता नष्ट हो जाती है और शुक्र-धातु का पतलापन हट जाता है। यह रसायन पुरातन अतीसार, ग्रहणीरोग तथा अग्निमान्द्य रोगों को नष्ट करता है । रक्तविकृतिजन्य त्वक् रोगों को मिटाता और कुष्ठरोग को नष्ट करता है। इसके सेवन से वीर्य की दुर्बलता और दोष दूर होकर वह सन्तानोत्पादन करने के योग्य हो जाता है और शरीर में ओजः शक्ति बढ़ जाती है । स्वस्थ शरीर से इसका सेवन करने से धारणा तथा स्मरण शक्ति बढ़ जाती है और अनेक- विध प्रमेहरोग नष्ट हो जाते हैं । इस दिव्य रसायन को गोघृत, मिश्री और शहद के साथ मिलाकर दो रत्ती मात्रा में निरन्तर एक वर्ष तक सेवन करने से बुढ़ापा तथा अतिवृद्ध कफप्रकोप शान्त हो जाता है ॥ १२१-१३० ॥