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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

६७० रसतरङ्गिणी परं त्वग्दोषशमनं तथा कुष्ठविनाशनम् ॥ १२७ ॥ अपत्यकरमत्यन्तं परमोजोविवर्द्धनम् । धृतिस्मृतिप्रदञ्चैव नानामेहनिषूदनम् ॥ १२८ ॥ यौवनोपवने नित्यं रतिपुष्पचिचीषया । विहरद्भिः कामिभिस्तु सेव्यमेतद्रसायनम् ॥ १२६ ॥ एतद्दिव्यरसायनं घृतसिताक्षौद्रेण संयोजितं । वर्षैकं परिशीलितं ह्यविरतं कामं द्विगुञ्जोन्मितम् । वार्द्धक्यं विनिहन्त्यलं शमयति श्लेष्माणमत्युल्बणं कामं कामकलाविलासचतुरप्रौढाङ्गणारञ्जनम् ॥ १३० ॥ अथामृतरसायनम्—सुरभीमूत्रं गोमूत्रम् , धात्री आमलकी, आमलकीसत्त्व- स्वरसेन शतधा पुटितं कान्तं म्रियत इति पूर्वमुक्तम् । गगनं अभ्रकम् । खादिरः खदिरसारः रतिरेव पुष्पं तस्य चिचीषा चयनेच्छा । कामम् अत्यर्थम् । १२१-१३०। भा.टी.—गोमूत्र से शुद्ध वत्सनाभ, आवंलों के स्वरस से पुट दिया हुआ कान्तलोह, अभ्रकभस्म, स्वर्णमाक्षिकभस्म, स्वर्णसिन्दूर, रजतभस्म और वंगभस्म, प्रत्येक दो-दो तोला, खदिरसार (कत्था) और शुण्ठीचूर्ण पृथक् तीन-तीन तोला लेकर सबको एकत्र खरल में घीकुआर के स्वरस से अच्छी तरह मर्दन करें। गोली बनाने योग्य होने पर इसकी दो रत्ती की गोलियाँ बना लें । इस योग को वैद्य लोग अमृतरसायन कहते हैं। यह अमृतरसायन अनेक विध रोग नाशक और उत्तम रसायन गुणकारक दीपक बृंहण है । इसके सेवन करने से शरीर में बल की वृद्धि होती है, स्त्री सम्भोग-शक्ति बढ़ती है। यह कास तथा श्वास रोग को शान्त करता और क्षयरोग का क्षय (नाश) करता है । इसको कुछ काल सेवन करने से नपुंसकता नष्ट हो जाती है और शुक्र-धातु का पतलापन हट जाता है। यह रसायन पुरातन अतीसार, ग्रहणीरोग तथा अग्निमान्द्य रोगों को नष्ट करता है । रक्तविकृतिजन्य त्वक् रोगों को मिटाता और कुष्ठरोग को नष्ट करता है। इसके सेवन से वीर्य की दुर्बलता और दोष दूर होकर वह सन्तानोत्पादन करने के योग्य हो जाता है और शरीर में ओजः शक्ति बढ़ जाती है । स्वस्थ शरीर से इसका सेवन करने से धारणा तथा स्मरण शक्ति बढ़ जाती है और अनेक- विध प्रमेहरोग नष्ट हो जाते हैं । इस दिव्य रसायन को गोघृत, मिश्री और शहद के साथ मिलाकर दो रत्ती मात्रा में निरन्तर एक वर्ष तक सेवन करने से बुढ़ापा तथा अतिवृद्ध कफप्रकोप शान्त हो जाता है ॥ १२१-१३० ॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६७१ अथ विषस्य प्रयोगः व्योषताम्रसमायुक्तं विषं तु परिशीलितम् । वातशूलं तथा गुल्मं विनिहन्ति सुदारुणम् ॥१३१॥ मधुयष्टीपद्मकन्दलाक्षोशीरयुतं विषम् । शीलितं तण्डुलाम्भोभी रक्तपित्तहरं परम् ॥१३२॥ वचाचन्दनलोध्राढ्यं विषं क्षौद्रेण शीलितम् ! समाख्यातं विशेषेण जीर्णज्वरविनाशनम् ॥१३३॥ वरीविदारिकाद्राक्षाकपिकच्छूममन्वितम् । विषं तु मधुना लीढं शुक्रसञ्जननं परम् ।.१३४॥ रजनीगोक्षुरद्राक्षायुतं युक्तं विषं द्रुतम् । गोक्षुरस्य कषायेण मूत्रकृच्छ्रप्रणाशनम् ॥१३५॥ त्रायन्तीवायसीमूलगायत्रीराजपादपैः । शृतैर्विषं शीलितं तु ख्यातं कुष्ठनिषूदनम् ॥१३६॥ पाषाणभेदाश्मजतुयवक्षारसमन्वितम् । अमृतं शीलितं हन्ति त्वश्मरीमतिदारुणाम् ॥१३७॥ सर्जिकाक्षारसंयुक्तं सव्योषं परिशोलितम् । विषं खलु समाख्यातं परं गुल्मप्रणाशनम् ॥१३८॥ जन्तुघ्नदाडिमशिफाशतपुष्पायुतं विषम् । शोलितं नाशयात्याशु कृमिरोगं सुदारुणम् ॥१३६॥ त्रिक्षारशरपुङ्खाढ्यं कणामूलयुतं विषम् । शोलितं मात्रया नित्यं मतं प्लीहनिषूदनम् ॥१४०॥ अथ विषस्य प्रयोगाः—व्योष त्रिकटु । पद्मकन्दः शालूकं विषं वा । त्रायन्ती त्रायमाणा । वायसीमूलम्—"काकाह्वा चैव वायसी" इति निघण्टुः । गायत्री खदिरः, राजपादपंः आरग्वधः, अश्मजतु शिलाजतु, दडिमशिफा दाडिमीमूलम् ॥१३१–१४०॥ भा.टी.—शुद्ध विष को सोंठ, मिर्च तथा पिप्पलीचूर्ण और ताम्रभस्म के साथ मिलाकर सेवन करने से भयंकर बातिक शूल और गुल्म रोग शान्त हो जाता है । रक्तपित्त को शान्त करने के लिए शुद्ध विषचूर्ण में मुलैठी, कमल- कन्द, लाख तथा खश का चूर्ण मिला चावलों के धोवन के साथ सेवन करना

चाहिए। शुद्ध विषचूर्ण में श्वेतवच, चन्दन तथा लोध का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ चटाने से कुछ ही दिनों में जीर्ण (पुराना) ज्वर नष्ट हो जाता है। शुक्र धातु की उत्पत्ति तथा वृद्धि के लिए वत्सनाभ चूर्ण को शतावरी, विदारीकन्द, द्राक्षा तथा कौंच के बीजों के चूर्ण में मिलाकर शहद के साथ चटाया जाता है। शुद्ध विष चूर्ण में हरिद्रा, गोखरू और द्राक्षा मिलाकर गोखरू कषाय के साथ सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र नष्ट हो जाता है। कुष्ठ रोग में शुद्ध विष को त्रायमाणा, मकोयमूल, खैर तथा अमलतास की फली के कषाय के साथ सेवन करने से आराम आता है। अति भयंकर पथरी को नष्ट करने के लिए वत्सनाभविषचूर्ण में पाषाणभेदचूर्ण, शुद्ध शिलाजीत तथा यवक्षार चूर्ण मिलाकर कुछ काल निरन्तर सेवन कराना चाहिए। शुद्ध वत्सनाभचूर्ण में सोंठ मिर्च तथा पिप्पली- चूर्ण और सज्जीखार चूर्ण मिलाकर सेवन करने से गुल्म रोग नष्ट होता है। भयंकर उदरकृमि रोग में शुद्ध विषचूर्ण को वायविडंगचूर्ण में मिलाकर सेवन कराना चाहिए। शुद्ध वत्सनाभचूर्ण में त्रिक्षार (यवक्षार-सज्जीक्षार और टंकणक्षार) तथा सरसों का चूर्ण और पिप्पलीमूलचूर्ण मिलाकर कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से प्लीहा (तिल्ली) रोग नष्ट हो जाता है ॥१३१-१४०॥ अथास्य बाह्यप्रयोगः बीजपूरद्रवैः पिष्टं विषं समसितायुतम्। अञ्जनान्नाशयत्याशु काचं नातिचिरोत्थितम् ॥१४१॥ निशाद्वयकणायुक्तं विषं कृष्णाञ्जनान्वितम्। अञ्जितं नाशयत्येव काचं नातिचिरोत्थितम् ॥१४२॥ त्रिसप्तवारं त्वमृतं भावितं धात्रिकारसैः। अञ्जितं शुद्धशङ्खाढ्यं तिमिरं हन्ति दारुणम् ॥१४३॥ सुरभीमूत्रयोगेन सप्तधा भावितं विषम्। सकणं त्वञ्जितं यत्नान्मतं काचजिदञ्जनम् ॥१४४॥ सुश्लक्ष्णपिष्टहीराढ्यं विषं गोमूत्रभावितम्। नारीस्तन्येन संघृष्टं मतं काचजिदञ्जनम् ॥१४५॥ करवीरकरञ्जार्कनिम्बपत्रनिशायुतम्। रक्तचन्दनमञ्जिष्ठासप्तपर्णेवचान्वितम् ॥१४६॥ मालतीपत्रसंयुक्तं विषं तालशिलायुतम्।

४३ चतुर्विंशस्तरङ्गः ६७३ प्रलेपेन निहन्तीह व्रणान् कुष्ठसमुद्भवान् ॥ १४७ ॥ घृष्टमार्द्रकतोयेन विषमत्यल्पमात्रया । सद्यःपूरणयोगेन कर्णशूलहरं मतम् ॥ १४८ ॥ कदलीकन्दतोयेन विषं भृङ्गाम्बुभावितम् । पूरणाद्विनिहन्तीह पुष्पं नातिचिरोत्थितम् ॥ १४६ ॥ भृङ्गराजरसेनैव पूरणाच्च निशान्धताम् । विषाञ्जिते च नयने सिञ्चेद्धारा मुहुर्मुहुः ॥ १५० ॥ समं विषतुल्यं यत् सिताखण्डं तद्युतम् । काचः नेत्ररोगविशेषः। तिमिरमेव विकृतं सत् काचतां याति । सकणं पिप्पलीसहितम् । करवीरो हयमारः, निशा हरिद्रा, तालं हरितालम्, शिला मनःशिला । विषाञ्जिते चेत्युपक्रमः विषतीक्ष्ण- तापप्रतिषेधाय सर्वत्र ज्ञेयः ॥ १४१-१५० ॥ भा.टो.—नूतन मोतियाबिन्द में अर्थात् मोतियाबिन्द उतरने के प्रारम्भ में शुद्ध वत्सनाभ को बिजौरा नीम्बू के स्वरस में घोटकर उसमें समभाग (विष के बराबर ) खांड मिलाकर आँखों में अञ्जन करने से मोतियाबिन्द बढ़ने नहीं पाता है । इसी तरह शुद्ध वत्सनाभ, हल्दी, दारुहल्दी, पिप्पलीचूर्ण और शुद्ध काला सुरमा एकत्र बारीक पीसकर अञ्जन बना लें । इस अञ्जन को नेत्रों में लगाने से नया मोतियाबिन्द नष्ट हो जाता है । भयंकर तिमिर (नेत्ररोग) में विष को इक्कीस बार आंवलों के स्वरस में भावना देकर उसमें विष के बराबर भाग शंखचूर्ण मिलाकर आँखों में आंजन किया जाता है । गोमूत्र में सात भावना दिये हुए वत्सनाभचूर्ण में समभाग पिप्पली चूर्ण मिलाकर अञ्जन करने से भी काचरोग नष्ट होता है । गोमूत्र में सात बार भावना दिये हुए वत्सनाभ चूर्ण में समभाग हीरे का चूर्ण मिलाकर स्त्री-दुग्ध में पीसकर नेत्रों में लगाने से भी काच रोग नष्ट हो जाता है। कुष्ठ के व्रणों को नष्ट करने के लिए वत्सनाभ चूर्ण में लालचन्दन, मजीठ, सप्तपर्ण, वच, कनेरपत्र, कञ्चनपत्र, आक के पत्ते, निम्बपत्र, हरिद्राचूर्ण, चमेली के पत्र, हरताल और मैनसिल मिलाकर लेप करने से व्रण शीघ्र अच्छे हो जाते हैं । कर्णशूल को दूर करने के लिए वत्सनाभ को अदरक के स्वरस में घिस कर तत्काल कान में डालने से कान का दर्द बन्द हो जाता है । वत्सनाभ को भृंगराज के स्वरस की भावना देकर कदली कन्द के स्वरस में घिसकर नेत्र में डालने से नया फूला नष्ट हो जाता है । निशान्धता (रतौंधी) रोग में विष को भांगरा स्वरस में घिस कर डालने से वह नष्ट हो जाती है ।

६७४ रसतरङ्गिणी विषयुक्त अञ्जनों को नेत्रों में लगाने के बाद नेत्रों को बार-बार शुद्ध जल से कई बार धोना चाहिए ॥ १४१-१५० ॥ विषप्रभा वर्तिका विषं तु तोलकमितं निशास्वरसपेषितम् । विशोधिता रोगशिला भृङ्गराजद्रवेणं तु ॥१५१॥ श्लक्ष्णचूर्णीकृतं शङ्खं त्वब्धिफेनं च सैन्धवम् । कणाभया लोध्रनिशे बीजमक्षक़रञ्जयोः ॥१५२॥ वृक्षाम्लं मरिचं चैव मञ्जिष्ठा रक्तचन्दनम् । समं समं समादाय त्वजाक्षीरेण पेषयेत् ॥१५३॥ निर्मापयेद्भिषग्वर्यो वर्तिकाः खलु शोभनाः । नामतस्तु समाख्याता भिषग्भिस्तु विषप्रभा ॥१५४॥ सङ्घृष्टा वर्तिका वारि नेत्रयोर्विनियोजिता । शुक्लार्ममांसपिल्लादीन् रोगान् नाशयति द्रुतम् ॥१५५॥ शिरीषदलपुष्पाढ्यं विषं तु परिशीलितम् । समाख्यातं विशेषेण भृशमाखुविषापहम् ॥१५६॥ कदलीकन्दतोयेन विषं साज्यं प्रयोजितम् । अशनाल्लेपनाच्चैव हन्ति सर्पविषं भृशम् ॥१५७॥ गोतक्रेण समायुक्तं विषमल्पमात्रया । निपीतं शमयत्येव विषमाखुकुलोद्भव २ ॥१५८॥ विषं तु तिलतैलेन घृष्टं लेपप्रयोगतः । विनिहन्त्यचिरादेव वृश्चिकार्तिं सुदारुणाम् ॥१५६॥ अर्कक्षीरेण लिप्तं तु विषमल्पमात्रया । सर्वासामेव लूतानां विषं जयति दारुणम् ॥१६०॥ विषगर्भाभिधं तैलं नित्यमभ्यङ्गयोजितम् । मन्यास्तम्भं हनुस्तम्भं पक्षाघातं परिग्रहम् ॥१६१॥ सर्वाङ्गग्रहणं पृष्ठत्रिककम्पादिकं तथा । निहन्ति हि विशेषेण निखिला निलवेदनाः ॥१६२॥ विषप्रभा वर्तिका- अक्षस्य विभीतकस्य बीजम् । बीजस्य मज्जा ग्राह्या तथा करञ्जस्य च बीजमज्जा शिरीषस्य पत्रपुष्पाभ्यां संयुक्तं विषं विशेषतो मूषिकां वषापहम्।

साज्यं संघृतम् लेपनात् दंशदेशे । नतं तगरम् । विषगर्भाभिधं तैलं विषगर्भतैलम्, तद्यथा- “धत्तूरस्य रसस्य पञ्चकुडवं तैलं तथा काञ्जिकं प्रस्थानाञ्च चतुष्टयं गद- वचा त्रिंशत्परं शाणकाः । हृद्धार्वीमरिचात्पृथङ् नव विषात् षट् स्वर्णबीजात्पटोः स्युः सप्ताधिकविंशतिः परिमितं तीव्रानिलध्वंसनम्” ॥१५१-१६२॥ भा.टी.-हरिद्रा स्वरस में पिसा हुआ शुद्ध वत्सनाभ, भांगरे के स्वरससे शुद्ध की हुई मैनसिल, अत्यन्त सूक्ष्म चूर्ण किया हुआ शंख, समुद्रफेन, सैन्धानमक, पिप्पलीचूर्ण, हरीतकीचूर्ण, बहेड़े की मज्जा, करञ्जबीजमज्जा; वृक्षाम्ल (आलु बोखारा) कालीमिर्च चूर्ण, मञ्जिष्ठाचूर्ण, लालचन्दन, सब द्रव्य समभाग में लेकर एकत्र खरल में बकरीके दूध के साथ खूब मर्दन करें। जब बत्तियाँ बनाने के योग्य हो जाय तो उसकी लम्बी-लम्बी बत्तियाँ बनाकर सुखा लें। इन बत्तियों को 'विषप्रभा' नाम से कहा जाता है। इस वर्त्ती को जल में पीस कर आंखों में लगाने से नेत्रशुक्ल (फूला), अर्म, मांस पिल्ल आदि नेत्रोंके रोग नष्ट होते हैं। शुद्ध वत्सनाभ को सिरसके पत्र तथा फूलों के साथ पीसकर उचित मात्रा में सेवन करने से विशेष रूप से चूहे का विष नष्ट होता है। सर्पविष को नष्ट करने के लिए वत्सनाभ को कदली कन्द स्वरस में पीसकर उसमें गोघृत मिलाकर खिलाना और दंशस्थान में लेप करना चाहिये। सब प्रकार के मूषक (चूहा) विष को नष्ट करने के लिए वत्सनाभ को गोतक्र के साथ थोड़ी मात्रा में सेवन कराने से निश्चय ही चूहोंका विष शान्त हो जाता है। वत्सनाभ को शुद्ध तिल तैल में घिस कर लेप करने से शीघ्र ही बिच्छू के काटने की पीड़ा शान्त हो जाती है। सब प्रकार के लूता (मकड़ी) विष को नष्ट करने के लिये थोड़े से वत्सनाभ को आक के दूध में घिस कर लेप करना चाहिये। कूट, इलायची- बीज, बाकुची, जटामांसी, देवदारु तथा तगर के साथ विष मिलाकर जल में पिलाने और दंशस्थान पर लेप कराने से सब प्रकार के विष नष्ट हो जाते हैं। अन्य शास्त्रोक्त “विषगर्भ” नामक तैल की प्रतिदिन शरीरमें अभ्यंग करने से, मन्यास्तम्भ (गरदन की अकड़ाहट), हनुस्तम्भ, पक्षाघात (लकवा), परिग्रह (सब शरीर का टूटना) तथा सर्व शरीर की अकड़ाहट, पृष्ठ, त्रिकस्तब्धता, कग्र तथा और भी सब प्रकार की वातिक वेदना इस तैल की मालिश से शान्त हो जाती है ॥१५१-१६२॥ अथ उपविषाणां नामानि विषतिन्दुकबीजं च त्वाह्विफेनञ्च रेचकम्

धत्तूरबीजं विजया गुञ्जा भल्लातकाह्वयः ॥१६३॥ अर्कक्षीरं स्नुहीक्षीरं लाङ्गली करवीरकम् । समाख्यातो गणोऽयं तु बुधैरुपविषाभिधः ॥१६४॥ अथ क्रमप्राप्तोपविषनिरूपणे प्रथमत उपविषाणां नामतः कीर्तनम्—विष- तिन्दुकबीजमित्यादि । रेचकं जयपालः ॥१६३, १६४॥ भा.टी.—कुचलाबीज, अफीम, जमालघोटाबीज, धतूराबीज भांग की पत्ती, सफेदरत्ती, भिलावा, आक का दूध, थोहर का दूध, कलिहारी, कनेरजड़ की छाल, इन सब को वैद्य लोग उपविष गण कहते हैं ॥१६३, १६४॥ वक्तव्य—यद्यपि कुचला, अफीम, धतूरा, जमालघोटा और भांग विशेष विष हैं और आजकल इन्हीं विषों की घटना देखने को मिलती है, परन्तु ये विष कालकूट, शृंगिक, ब्रह्मपुत्र आदि विषों की अपेक्षा अल्पशक्तिवाले होने से उपविषों में गिने गये हैं । तन्त्रान्तर में कहीं सात उपविष माने गये हैं, जैसे “अर्कक्षीरं स्नुहीक्षीरं लांगली करवीरकः । गुञ्जाऽहिफेनधत्तूराः सप्तोपविषजातयः और कहीं “अर्कस्नुग् लांगली गुञ्जा हयारिविषमुष्टयः । धूर्तोऽहिफेनं जैपालो नवोपविषजातयः ॥” इस प्रकार नौ ही उपविष माने गये हैं । भिलावा और कुचला को उपविष नहीं माना है, परंतु आजकल कुचला महाविषोंमें गिना जाता है । अथ विषतिन्दुकस्य नामानि कुचेलकं कुचेलञ्च कुचिला कुचिलं तथा । विषतिन्दुस्तथा तिन्दुस्तिन्दुकं विषतिन्दुकम् ॥१६५॥ कारस्करो रम्यफलः कुपाको विषमुष्टिका । विषमुष्टिः कालकूटस्तदेव विनिगद्यते ॥१६६॥ भा.टी.—कुचेलक, कुचेल, कुचिला, कुचिल, विषतिन्दु, तिन्दु, तिन्दुक, विषतिन्दुक, कारस्कर, रम्यफल, कुपाक, विषमुष्टिका, विषमुष्टि, कालकूट, ये सब नाम कुचला ( Nuxwomica ) के नाम कहे जाते हैं ॥१६५, १६६॥ विषतिन्दुकस्य परिचयः कारस्करः समाख्यातः शिखिजातीयकस्तरुः । काण्डोऽस्य वक्रः स्थूलश्च काण्डत्वग् भसितप्रभा ॥१६७॥ पत्रं तु वर्तुलं प्रायो मसृणं खल्वखण्डितम् । हरिद्वर्णं स्पष्टशिरं ह्रस्वकं पत्रवृन्तकम् ॥१६८॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६७७ कुसुमं लघुशुक्लञ्च हरिदाभञ्च कोमलम् । नारङ्गरङ्गं मसृणं फलं रम्यं सुवर्तुलम् ॥१६६॥ मज्जा शुभ्रा कोमला च बीजं वृत्तञ्च रोमशम् । बीजमेव चिकित्सायां विबुधैर्विनियुज्यते ॥१७०॥ कोङ्कणे च तथा वङ्गे दक्षिणे च विशेषतः । देशेष्वन्येषु च तथा जायते विषतिन्दुकम् ॥१७१॥ तत्रादौ विषतिन्दुककीर्तनं कुचेलकमित्यादि—भक्षितप्रभा भस्मसदृशप्रभा- युक्ता । स्पष्टाः शिराः यत्र तादृशम् पत्रवृन्तकञ्च ह्रस्वकम् इत्यन्वयः । हरिदाभं ईषद्वरिद्वर्णम् । मज्जा फलमज्जा ॥१६७–१७१॥ भा.टो.-कुचला शिखिजाति का वृक्ष माना जाता है। इसका कांड (तना) टेढ़ा और मोटा होता है । इसके तने की छाल कुछ राख जैसे रंग ( चमक ) की होती है । इसका प्रायः गोल, चिकना और अखण्डित (पूरा) होता है । इसके पत्र का रंग हरा होता है और इसमें शिरायें ( नाडियां ) स्पष्ट दिखाई देती हैं और पत्रवृन्त (डंठल) छोटे-छोटे होते हैं । इसका फूल छोटा सफेद हरे रंग का और कोमल होता है । कुचले का फल नारंगी के रंग का सुन्दर गोल और चिकना होता है । फल के भीतर पायेजानेवाली मज्जा ( गूदा ) कोमल और सफेद होती है । इसी मज्जा में पायाजानेवाला बीज गोल टिकिया जैसा और रोंएदार होता है । इसी बीज को विद्वान् चिकित्सक चिकित्सा कार्य में लाते हैं । कुचले का वृक्ष कोंकण, बंगाल तथा दक्षिणीय प्रदेशों में विशेष रूप से पाया जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य देशों में भी पाया जाता है ॥१६७-१७१॥ वक्तव्य कुचला भारतवर्ष के गरम प्रदेशों में विशेष रूप से पाया जाता है । इसका वृक्ष बड़ा सुन्दर ४० फीट ऊँचा, तना सीधा टेढ़ा, पत्ते चौड़े अंडा- कृति आमने-सामने पूर्णधार, ३ से ६ इञ्च तक लम्बे और ३ से ५ नाड़ियोंवाले, फूल हरे से श्वेत, अनेक छोटे-छोटे शाखाओं के अन्त में पतली पुष्प नालों पर गुच्छों में लगते हैं । फूलों से हरिद्रा जैसी गन्ध आती है । इसका फल भूमएड- लाकार चिकना, नारंगी जितना और नारंगी रंग का होता है । ऊपर के पतले छिलके अन्दर नरम श्वेत कड़वा, लिचलिचा गूदा होता है जिसमें १ से ५ बीज होते हैं । इसका बीज आधा इंच व्यास, चपटी. गोल, एक पृष्ठनतोदर और दूसरा उन्नतोदर, चमकीले रेशमी बालों से युक्त, भूरा विषैला और कड़वा होता

६७८ रसतरङ्गिणी है । यही बीज चिकित्सा में काम आते हैं । इस बीज में आधा % प्रतिशत एक क्षारीय तत्त्व होता है जिसे स्ट्रिकनीन (Strychnine) कहते हैं। एक और भी क्षारीयतत्त्व चौथाई से— १ % होता है जो Brucine कहाता है । ये दो तत्त्व कुचलाबीज-चूर्ण की अपेक्षा अधिक तीव्र और घातक होते हैं। यदि कुचला को बिना शुद्ध किये अथवा अधिक मात्रा में खा लिया जाय तो धनुष्टंकार, आक्षेप, और पेशी मण्डल में वेदना, अधिक तृष्णा, बेचैनी और मुख मण्डल में तीव्र लालिमा (मुख लाल वर्ण) हो जाती है । अतः इसको अवश्य शुद्ध करके और मात्रापूर्वक ही प्रयोग करना चाहिए । विषतिन्दुकस्य प्रथमः शोधनप्रकारः विषतिन्दुकबीजानि विन्यसेद् गृहवारिणि । दिनत्रयं प्रयत्नेन त्वपनीय बहिस्त्वचम् ॥१७२॥ निदाघे चाथ संशोष्य चूर्णयेद्भिषजां वरः । एवं विशुद्धिमायाति सर्वथा विषतिन्दुकम् ॥१७३॥ भा.टी.—परिपक्व कुचलाबीजों को काञ्जी में तीन दिन तक पड़े रहने दें । तीन दिन के बाद बीजों को काञ्जी से निकाल इसकी बाहरी त्वचा को छीलकर निकाल दें । और धूप में सुखाकर लोहे के खरल में खूब कूटकर चूर्णकर लें । इस विधि से कुचला सर्वथा शुद्ध हो जाता है ॥१७२, १७३॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः कारस्करस्य बीजानि त्वतिमन्दाग्नियोगतः । निधाय पिष्टपचने तावदाज्येन भर्जयेत् ॥१७४॥ यावद् बहिस्त्वचा किञ्चिज्जायते कपिशप्रभा । कुचेलमेवं त्वरितं शुद्धिमायात्यनुत्तमम् ॥१७५॥ द्वितीयः प्रकारः—पिष्टपचनं ‘तवा’ इति हिन्दीभाषायाम् । कपिशप्रभा किंचिद्रक्तपीता । उक्तञ्चान्यत्र —“किञ्चिदाज्येन संभृष्टो विषमुष्टिर्विशुद्ध्यति” इति ॥१७४, १७५॥ भा. टी.—कुचले के बीजों को एक तवे में थोड़ा सा घी डालकर मन्द- मन्द अग्नि से तब तक भूनें जब तक कि बीजों की बाहरी त्वचा कपिशवर्ण (कुछ लाल-पीली सी) न हो जाय । उक्त कपिशवर्ण होने पर बाहरी छाल को पृथक् करके भीतरी मज्जा को उसी समय गरम-गरम कूट लें इस विधि से शीघ्र आवश्यकता पड़ने पर कुचले को शुद्ध किया जाता है ॥१७४, १७५॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६७६ तृतीयः शोधनप्रकारः विषतिन्दुकबीजानि पोट्ठल्यां विन्यसेद्भिषक् । स्वेदयेद् गव्यपयसा दालिकायन्त्रमागतः ॥१७६॥ एवं यामैकमात्रेण शुद्धिमायान्त्यनुत्तमाम् । शोधितं तिन्दुकं त्वेवं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥१७७॥ भा.टी.—कुचला बीजों को एक कपड़े में बाँधकर पोटली बना लें । अब इस पोटली को दोलायन्त्र में गाय का दूध डालकर उसमें लटकाकर तीन घण्टे तक पकायें । तीन घण्टे बाद बीजों को निकाल बाहर की त्वचा पृथक् करके उसी समय लोहे के खरल में कूटकर चूर्ण कर लें । इस विधि से भी कुचला बीज उत्तम रूप से शुद्ध हो जाते हैं ॥१७६, १७७॥ विषतिन्दुकस्य गुणाः विषतिन्दुकमाग्नेयं कटुकं दीपनं परम् । उग्रवीर्यं तीक्ष्णसारं कामोद्दीपनमुत्तमम् ॥१७८॥ अम्लपित्तप्रशमनं मूत्रलं क्षुत्प्रदीपनम् । पाचनं श्लेष्महरणं बलसञ्जननं परम् ॥१७९॥ मेदोहरं रुचिकरं सारमेयविषापहम् । ग्रहणीहरमत्यन्तं तथोन्मादविनाशनम् ॥१८०॥ आध्मानापहमत्यन्तं तथाऽजीर्णविनाशनम् । आमाशयोत्थशूलघ्नं हृद्दौर्बल्यहरं परम् ॥१८१॥ श्वासप्रशमनञ्चैव तथा फुप्फुसशोथनुत् । अर्द्धाङ्गादितवातघ्नं नाडीबलविवर्धनम् ॥१८२॥ दुष्टनागाशनाद्भूतं वा मदात्ययसम्भवम् । अर्द्धाङ्गवातं हन्त्याशु भृशमङ्गविशेषगम् ॥१८३॥ मांसपेशीशोषयुते नवे कठिनपेशिके । पक्षाघाते न युञ्जीत स्पर्शानुभववर्जिते ॥१८४॥ मदात्ययात्ययकरं नाडीशूलनिबर्हणम् । अनिद्रापहमत्यन्तं गुदजामयनाशनम् ॥१८५॥ राजयक्ष्मसमुद्भूतदिशास्वेदनिवारणम् । मानसश्रमसम्भूतावसादविनिषूदनम् ॥१८६॥

६८० रसतरङ्गिणी अनिद्राजनिताजीर्णनाशनं दुग्धपाचनम् । अर्द्धावभेदकहरं श्रमकासनिवर्हणम् ॥१८७॥ निम्ननिर्दिष्टरोगाणां तत्तल्लक्षणसम्भवे । कारस्करं प्रयुञ्जीत भृशमत्यल्पमात्रया ॥१८८॥ निर्जनप्रियतां चैव परां क्रोधालुतां तथा । विनिहन्ति हि रुग्णानां तत्तद्धेतुविशेषजाम् ॥१८६॥ अम्लतिक्तरसोन्मिश्रानुद्गारान् नाशयत्यलम् । श्रमोत्थां चित्तदौर्बल्यसमतां मलबद्धताम् ॥१९०॥ अत्यम्लवदनास्वादं नवं वा चिरकालजम् । आध्मानं नाशयत्याशु भोजनोत्तरकालिकम् ॥१९१॥ चित्तावसादसंयुक्तं दारुणाध्मानसङ्गतम् । अम्लपित्तसमुद्भूतमन्त्रशूलं व्यपोहति ॥१९२॥ मलत्यागसमीहाढ्यां मुहुर्वेदनान्विताम् । कष्टप्रवृत्तमल्पमलां नाशयेन्मलबद्धताम् ॥१९३॥ अत्यल्पमूत्रस्रवणं सदाहं वेदनान्वितम् ॥ मूत्रेगोच्छापरिगतं मूत्ररोधं निवारयेत् ॥१९४॥ रक्तातिस्रावसंयुक्तं दीर्घकालानुबन्धनम् । रजःस्रावं निहन्त्याशु समयात्पूर्वकालिकम् ॥१९५॥ सवेदनां तथा पीतदुर्गन्धास्रावसंयुताम् । विनिहन्ति विशेषेण श्वेतप्रदरजां रुजम् १९६॥ रात्रौ निद्रायमाणस्य विवृद्धां पृष्ठदेशजाम् । वेदनां शमयत्याशु तथैव कटिवेदनाम् ॥१९७॥ दिने तु स्रवदास्रावं निशि स्रावविवर्जितम् । व्यपोहति विशेषेण प्रतिश्याये नवोत्थितम् ॥१९८॥ भक्तणोत्तरजं श्वासं हन्ति पित्तसमुत्थितम् । अनारतं जायमानं वर्त्मस्पन्दनकं तथा ॥१९६॥ रात्रिजागरणोद्भूतं तथा बह्वशनोत्थितम् । विवर्द्धमानं प्रत्यूषे सशब्दं तृष्णयान्वितम् ॥२००॥ आलोहितं घनञ्चैव कामं सलिलसन्निभम् । समुल्बणं विशेषेण विनिहन्त्युदरामयम् ॥२०१॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६८१ मुहुर्मुहुर्मलत्यागवाञ्छयाऽतिनिपीडितम् । कष्टप्रवृत्त्याल्पमलं विनिहन्ति गुदामयम् ॥२०२॥ विषतिन्दुकगुणाः—आग्नेयं उष्णवीर्यम्, सारमेयः कुक्कुरः, तस्य विषं हरतीति तथा । दुष्टमशुद्धं यत् नागं सीसकं तस्य अशनात् भक्षणात् उद्भूतं जातं अर्धाङ्गवातमित्यन्वयः । मांसपेशीशोषादिलक्षणयुते पक्षाघातेऽस्य प्रयोगो निषिद्धः । मदात्ययस्य अत्ययो नाशनम् । अर्धावभेदकः शिरोरोगविशेषः । श्रमनिःश्वासरोधाज्जातः कासः श्रमकासः, तस्य निबर्हणम् । अथवा श्रमं कासं च नाशयतीति योज्यम् । निम्ननिर्दिष्टाः अनुपद्मेव वक्ष्यमाणाः । अत्यल्पा मात्रा गुञ्जापादांशादप्यत्यन्तं हीनाः । गोमूत्रशुद्धस्य—षोडशांशश्चतुर्विंशतितमो वांशो योज्यः । तेषु रोगेषु तेषु तेष्वभिहितेषु लक्षणेषु सत्सु प्रयुक्तोऽनया मात्रया सिद्धिकरः कारस्करः । समयात्पूर्वकालिकमिति रजःस्रावसमयात् मासात् पूर्वकाले भवम् । अनारतं निरन्तरम् । उदरामयोऽतीसारः ॥१७८–२०२॥ भा.टी—कुचला बहुत उष्णवीर्य द्रव्य है, इसका बीज रस मै कड़वा और उत्तम दीपन होता है । इसका प्रभाव बहुत तीव्र होता है । इसका सार (Extract अथवा Tincture) अतितीव्र होता है । बीज चूर्ण की अपेक्षा वह कास शक्ति को बढ़ाने में उत्तम गुण रखता है । अम्लपित्त को शान्त करता है और मूत्र अधिक मात्रा में लाता है तथा अधिक भूख लगाता है। इसके सेवन से आम रस का पाक होता है । अंगों के भीतर होनेवाला कफ सञ्चय या प्रकोप शान्त होता है । इसके सेवन से शरीर में बल वृद्धि होती है । शरीर में बढ़े हुए मोटेपन को घटाता है और भोजन में रुचि उत्पन्न करता है । यह पागल कुत्ते के विष को नष्ट करने में उत्तम गुण रखता है । इसके सेवन से ग्रहणी रोग, उन्माद रोग, उदाराध्मान (अफ़ारा) तथा पुरातन अजीर्ण रोग नष्ट होते हैं । आमाशयजन्य शूल और हृदय की दुर्बलता को मिटाता है । इसके सेवन से श्वास (दमा) में आराम आता है और फुप्फुसशोथ (निमोनिया) नष्ट होता है । अर्धाङ्गवात तथा अर्दित वात व्याधि में यह लाभ करता है और नाड़ी के बल को बढ़ाता है । अशुद्ध सीसे के खाने से उत्पन्न अथवा मदात्ययरोग से उत्पन्न हाथ और पैरों तथा मुख में होनेवाले अर्धाङ्ग वात को नष्ट करता है । परन्तु कुचले के चूर्ण या इसके अन्य रस क्रिया आदि योगों को स्पर्शज्ञान रहित, कठिन मांस पेशी शोष युक्त नूतन पक्षाघात में प्रयोग नहीं करना चाहिये ।

६८२ रसतरङ्गिणी

कुचला मदात्यय तथा नाडीशूल को नष्ट करता है। इसके बहुत अल्पमात्रा में सेवन से अनिद्रा रोग तथा बवासीर रोग में आराम आता है। राजयक्ष्म (थाय- सिस) में होनेवाले रात्रि स्वेद को यह सुखा देता है। अधिक पढ़ना-लिखना या विचार करना आदि मानसिक परिश्रम करने से होनेवाली शिथिलता को दूर करता है। यह नींद न आने के कारण होनेवाले अजीर्ण को मिटाता है और दूध को पचाता है। निम्नलिखित रोगी के तत्तत् लक्षणों की उत्पत्ति में कुचला को बहुत ही अल्पमात्रा में प्रयोग करने से शीघ्र लाभ होता है। यदि रोगी बहुत ही एकान्त प्रिय हो या उसका विभिन्न कारणों से तीव्र क्रोध आने का स्वभाव हो गया हो तो उसे न्यूनातिन्यून मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। खट्टी और कड़वी रसवाले डकारों को यह नष्ट करता है। परिश्रम जन्य मलबद्धता (कब्जि यत) मानसिक दुर्बलता के साथ होने पर इसके प्रयोग से लाभ होता है। नूतन या पुरातन भोजनोत्तर होनेवाले और सदा मुख का स्वाद खट्टा रखनेवाले आधमान रोग को यह शीघ्र नष्ट करता है। चिरकालिक अम्लपित्त रोग के कारण होनेवाले अन्त्रशूल में (जिससे मन में बहुत खिन्नता रहती हो पेट में भयंकर अफ़ारा होता हो) यह बहुत लाभ करता है। मलत्याग करने की इच्छा बनी रहने पर पेट में बार-बार पीड़ा होते रहने पर बड़ी कठिनाई के साथ बहुत थोड़ा शौच (टट्टी) होनेवाले कब्ज में कुचला लाभ करता है। इसी तरह मूत्र करने की इच्छा बनी रहने पर और बहुत थोड़ा मूत्र आने पर साथ ही मूत्र करते हुए मूत्रेन्द्रिय में दाह वेदनायुक्त मूत्र की रुकावट में कुचला लाभ करता है। इसी तरह ऐसी पुरानी माहवारी की विकृति में भी यह लाभ करता है जो समय अर्थात् २७, २८, २९ ३० दिन से पूर्व होती हो और उसमें अधिक रक्त निकलता हो। श्वेतप्रदर में जब गर्भाशय से पीला और दुर्गन्धित स्राव वेदना के साथ होता हो तो कुचला ऐसी अवस्था में लाभ करता है। रात्रि में सोने पर कमर और पीठ में होनेवाली तीव्र वेदना को कुचला-प्रयोग शान्त करता है। ऐसे नवीन प्रतिश्याय में जिसमें दिन में नासिका से स्राव होता हो और निकलना बन्द हो जाता हो तो कुचला प्रयोग लाभ करता है। भोजन करने के बाद पित्तप्रकोप से होनेवाले श्वास रोग में तथा हर समय नेत्र पलकों के फड़कते रहने पर कुचला प्रयोग से आराम आता है। रात्रि जागरण करने अथवा अधिक भोजन करने से प्रातःकाल बढ़ जानेवाले अतीसार में जिसमें रोगी को अधिक तृष्णा लगती हो और मल निकलते समय ऐसा शब्द होता हो, मल रक्तवर्ण और गाढ़ा अथवा जल के सदृश बहुत पतला और बड़े वेग के साथ

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६८३

होता हो, कुचले के प्रयोग से आराम आ जाता है। ऐसे बवासीर रोग में भी कुचला प्रयोग से लाभ होता है, जिसमें बार-बार शौच जाने की इच्छा करती हो और बड़ी कठिनाई के साथ थोड़ा-थोड़ा शौच (मल) आता हो ॥१७८-२०२॥ वक्तव्य—कुचला सेवन करने से आमाशय तथा अन्य पाचन अंगों की निर्बलता हटती है, जिससे इन अंगों में बल आ जाता है और ये अपना कार्य अच्छी तरह करने लगते हैं। आँतों की आकुंचक तथा प्रसारक शक्ति बढ़ जाने से मलबन्ध हट जाता है। यह श्वास स्थान को उत्तेजित करता है। श्वास काठिन्य हटता और श्वास गहरा तथा बलवान् हो जाता है। यह मस्तिष्क की शक्ति को भी बढ़ाता है। वातनाड़ियों को उत्तेजित करके मांसपेशियों को दृढ़ तथा उत्तेजित करता है, जिससे हृदय बलवान होता है और श्वास भी बलवान् होकर सारे शरीर के अंग बल अनुभव करते हैं। इसके सेवन से उत्पादक अंग भी बलवान् होते हैं। दृष्टि श्रवण आदि की शक्तियाँ भी बढ़ जाती हैं। निर्बलता के कारण उत्पन्न हुई मन्दाग्नि के लिए यह उत्तम औषधि है। ऐसी अवस्था में भोजन के पीछे कुचला योग जैसे अग्नितुण्डी वटी दे अथवा सायं प्रातःकाल पञ्चतिक्तपानक के साथ कुचला आसव की ५ से १० बूंद मिलाकर देनी चाहिए। निर्बलता से मलबन्ध में कुचला चूर्ण और कुमारी- सार समान मिला गोलियाँ बनाकर दी जाती हैं। आंतों की निर्बलता से उत्पन्न गुदभ्रंश को हटाने के लिए कुछ काल तक इसका प्रयोग करने से अवश्य लाभ होता है। क्लैब्यरोगों के लिए कुचला का अन्तःप्रयोग तथा अनेकविध तैलों में बहिः प्रयोग किया जाता है। सर्पविष में तथा अहिफेनादि नींद लानेवाले विषों की अधिक मात्रा खाये जाने पर कुचला वारुणीसार अथवा स्ट्रकनीन हाइड्रोक्लोराइड (Strychnine Hydrochloride) को ३०वे भाग से १५वे भाग यवकी मात्रा में सूचीवेध द्वारा देना चाहिए। कुचला या स्ट्रकनीन (Strychnine) की अधिक मात्रा खायी जाने पर आधा या घंटे बाद लक्षण उत्पन्न होते हैं। पहिले पृष्ठ बाहु और जंघाओं में शूल होती है, फिर भिन्न-भिन्न मांसपेशियों में स्तम्भ हो जाता है और स्तम्भ (टेटेनिस) रोग के लक्षण होते हैं, परन्तु अति शीघ्रताके साथ होते हैं। स्तम्भरोग में प्रारम्भ में ही हनुस्तम्भ हो जाता है, परन्तु कुचला विष में हनुस्तम्भ प्रारम्भ में न होकर अन्त में होता है। इन विष लक्षणों को शान्त

६८४ रसतरङ्गिणी करने के लिए वमन देना चाहिए और हरीतकी कषाय पिलावें। तीव्र लक्षणों को शान्त करने के लिए अर्थात् स्तम्भ और खिंचावट को दूर करने के लिए शामक औषधि अहिफेन या अहिफेन के योग ( Morphine ) का सूचीवेध दें या क्लोरलहाइड्रेट ( Chloral Hydrate ) ३० से ६० की मात्रा में अथवा ( Brymices ) दो ड्राम से एक औंस की मात्रा में दें। अथवा क्लोरोफार्म ( Chloroform ) और एमलनाइट्रेट ( Amyl Nitrate ) सुंघावें । विषतिन्दुकस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं परम्। मात्राविद्विर्नियुञ्जीत विमलं विषतिन्दुकम् ॥२०३॥ भा.टी.—विषमात्राविज्ञ वैद्य को चौथाई रत्ती से लेकर एक रत्ती तक की मात्रा शुद्ध कुचला चूर्ण का प्रयोग करना चाहिए ॥२०३॥ विषतिन्दुकस्य आमयिकः प्रयोगः नवजीवनरसः कुचेलकं सुविमलं तोलकद्वयसंमितम्। लोहं द्वितोलकमितं रससिन्दूरकं तथा ॥२०४॥ पलार्द्धं त्र्यूषणञ्चैव समादायार्द्रकद्रवैः । विमर्द्य कारयेद्वैद्यो वटिका रक्तिकोन्मिताः ।.२०५॥ रसोऽयं तु समाख्यातो नवजीवनसंज्ञकः । नवजीवनमेतद्धि ददाति नवजीवनम् । २०६॥ दीपनं पाचनञ्चैव बलसञ्जननं परम्। नाडीबलप्रजननं रतिशक्तिविवर्द्धनम् ॥२०७॥ अन्त्रशूलहरं कामं त्वाध्मानविनिवारणम् । मलबन्धहरं चैव तथातीसारनाशनम् ॥२०८॥ अर्द्धावभेदकहरं रक्तसञ्जननं परम्। शूलापहं मानसिकश्रमोद्भूतावसादनुत् ॥२०६॥ नवजीवनरसः-रससिन्दूरकं तथेति लोहसमानं द्वितोलकमित्यर्थः । नाड्यः ज्ञानवहाः चेष्टावहाश्च तासां बलं शक्तिं जनयतीति तथा ॥२०४-२०६॥ भा.टी.-शुद्ध कुचला दो तोला, लोहभस्म दो तोला, रससिन्दूर दो तोला

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६८५ साँठ, कालीमिर्च, तथा पिप्पली चूर्ण आधा पल लेकर सब को एकत्र खरल में अदरक के रस से खूब मर्दन करें जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको नवजीवन-रस नाम से कहा जाता है। यह नवजीवन रस सेवन करने से मनुष्य को नवीन जीवन प्रदान करता है। इसके सेवन से पाचक रस अधिक मात्रा में उत्पन्न होने से यह दीपक और आम रस को पचाने के कारण यह पाचक है। इसके सेवन से स्वस्थ शरीर में बल पैदा होता है। ज्ञानवाही तथा चेष्टावाही नाड़ियों की शक्ति बढ़ती है और स्मरण करने की शक्ति बढ़ती है। आंतों में होनेवाला शूल तथा आध्मान नष्ट होता है। इसके सेवन से मलबन्ध दूर होता है। और पुराने अतिसार में लाभ होता है। आधासीसी के दर्द में यह बहुत लाभ करता है और शरीर में रक्त की वृद्धि करता है और शरीर के किसी भाग में होनेवाले वातिक शूलों को तथा मान- सिक परिश्रम से उत्पन्न शिथिलता को दूर करता है ॥२०४-१०६॥ अग्नितुण्डीरसः अमृतं तोलकमितं जीरकञ्च फलत्रिकम् । रसेश्वरं सुविमलं बलिञ्चैव विडङ्गकम् ॥२१०॥ सौवर्चलं च सामुद्रं सौभाग्यं सैन्धवं तथा । सर्जिक्षारं यवक्षारं चित्रकं त्वजमोदिकाम् ॥२११॥ कुचेलकं सुविमलं सर्वेषां समभागिकम् । समादाय भिषग्वर्यो जम्बीराम्लेन मर्दयेत् ॥२१२॥ निर्मापयेत्ततो यत्नाद्गुटिका रक्तिकोन्मिताः । नामतस्तु समाख्यातास्त्वग्नितुण्डीरसाह्वया ॥२१३॥ अग्नितुण्डीरसो ह्येषः दीपनः पाचनः परम् । अग्निमान्द्यप्रशमनो नाडीबलविवर्द्धनः ॥२१४॥ गुदामयप्रशमनस्तथाऽतीसारनाशनः । कटिपृष्ठसमुद्भूतां नाशयेद्वातवेदनाम् ॥२१५॥ अग्नितुण्डीरसः-अमृतं वत्सनाभः । रसेश्वरं पारदः । बलिर्गन्धकः ॥ भा.टी.-शुद्ध वत्सनाभ, जीरा, हरीतकी, बहेड़ा, आंवलाचूर्ण, शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, वायविडंगचूर्ण, सौवर्चलनमक, समुद्रनमक, सुहागा, सैंधानमक, सज्जिक्षार, यवक्षार, चित्रकमूल चूर्ण, अजमोदा चूर्ण, शुद्ध कुचलाचूर्ण; प्रत्येक सम

भाग में लेकर खरल में एकत्र डालकर जम्बीरी निम्बू के रस से मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको अग्निस्तुण्डीरस के नाम से कहा जाता है। यह अग्निस्तुण्डी रस उत्तम दीपक और पाचक है। अग्निमान्द्य को नष्ट करता है। नाड़ियों की कार्यशक्ति को बढ़ाता है। अर्शरोग को शान्त करता और अतीसार को नष्ट करता है। कमर तथा पीठ में होनेवाली वेदनाओं को शान्त करता है ॥२१०-२१५॥ लक्ष्मीविलासो रसः कुचेलकं सुविमलं रसस्तोलकसम्मितम् । सुपुष्पितं च सौभाग्यं मरिचं चैव तन्मितम् ॥२१६॥ लोहं द्विकर्षप्रमितं गन्धेशौ द्वयेकभागिकौ । सर्वं सम्मेल्य यत्नेन भावयेदार्द्रकद्रवैः ॥२१७॥ वरीभूधात्रिकाभृङ्गेश्वरसेन च भावयेत् । निर्मापयेत्प्रयत्नेन वटिका रक्तिकोन्मिता ॥२१८॥ समाख्यातो रसो लक्ष्मीविलास इति नामतः । तारुण्यलक्ष्मीमतुलां प्रददाति रसो ह्ययम् ॥२१९॥ रोगदुर्बलदेहानां कृशानां क्षीणरेतसाम् । देहपुष्टिकरः कामं तथा वीर्यविवर्द्धनः ॥२२०॥ बलवर्णकरो वृष्यो वह्निमान्द्यविनाशनः । रक्तसञ्जननश्चैव तथा लावण्यवर्द्धनः ॥२२१॥ लक्ष्मीविलासः—रसस्तोलकं षट् तोलकम्, लोहं ४ तो०, गन्धकः २ तो०, पारदः १ तो० । भूधात्रिका तामलकी ॥२१६-२२१॥ भा.टी.—शुद्ध कुचलाचूर्ण छः तोला, सुहागाखील छः तोला, कालीमिर्च चूर्ण छः तोला, लोहभस्म चार तोला, शुद्ध गन्धक दो तोला, शुद्ध पारद एक तोला लेकर पहिले पारे और गन्धक की कज्जली कर लें। फिर इसमें अन्य औषधियाँ खरल में अदरक के रस से मर्दन करें, फिर इसको शतावर मुंडी, आंवला और भांगरे के स्वरस की तीन-तीन भावना देकर एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको “लक्ष्मी विलास” नाम से कहा जाता है। इस रस के सेवन से शरीर में अत्यधिक तरुणावस्था की शोभा बढ़ जाती है। रोग से दुर्बल हुए शरीरवालों, कृश, तथा नष्ट वीर्य मनुष्यों के लिये यह शारीरिक पुष्टि को उत्पन्न

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६८७ करता और वीर्य की वृद्धि करता है। इसके सेवन से शरीर में बल और वर्ण की वृद्धि होती है। अग्निमान्द्य के विकार नष्ट हो जाते और शरीर में रक्त की वृद्धि होती है और सुन्दरता बढ़ती है ॥२१६-२२१॥ शूलनिर्मूलनरसः त्र्यूषणं गन्धपाषाणं मरिचं शङ्खभस्मकम् । सैन्धवं रससिन्दूरं जीरकं चाम्लवेतसम् ॥२२२॥ सर्वार्द्धभागिकञ्चैव विमलं विषतिन्दुकम् । आदाय भिषजां वर्यः शृङ्गवेरस्य वारिणा ॥२२३॥ विभाव्य कारयेद्यत्नाद्गुटिका रक्तिकोन्मिता । रसोऽयं तु समाख्यातः शूलनिर्मूलनाभिधः ॥२२४॥ दीपनः पाचनश्चायं वह्निमान्द्यप्रणाशनः । अतीसारग्रह णिकाविषूचीविनिवारणः ॥२२५॥ बलवर्णाकरो वृष्यो गुल्मामयनिषूदनः । रसोऽयं शूलदलने बहुशो दृष्टप्रत्ययः ॥२२६॥ शूलनिर्मूलनरसे—गन्धपाषाणं गन्धकम्। दृष्टप्रत्ययः निश्चितमनुभूत इत्यर्थः ॥२२६॥ भ.टी.—सोंठ, पिप्पलीचूर्ण, शुद्ध गन्धक, कालीमिर्च चूर्ण, शंखभस्म, सेन्धानमक, रससिन्दूर, जीरा चूर्ण, अमलवेत चूर्ण, प्रत्येक समभाग में लें। और सबसे आधा भाग शुद्ध कुचलाचूर्ण लेकर सबको एकत्र खरल में अदरक में सहिजने के रस के साथ मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी एक रत्ती की गोली बना लें। इसको "शूलनिर्मूलनरस" नाम से कहा जाता हैं। रस दीपन और पाचन होने से अग्निमान्द्य रोग को नष्ट करता है। इसके अतिरिक्त इसके सेवन से अतीसार ग्रहणी तथा विसूचिका रोग भी नष्ट होते हैं। पाचक शक्ति का वर्धक होने से इसके द्वारा शरीर में बल और वर्ण की वृद्धि होती हैं और उत्पादक अंगों की शक्ति बढ़ जाती है। इसके कुछ दिन प्रयोगसे गुल्म रोग नष्ट हो जाता है। परन्तु वातिक शूल, विशेषतः उदरशूल को नष्ट करने में निश्चित अनुभूत औषधि है। ॥२२२–२२६॥ सुप्तिवातारिरसः कर्षैकप्रमितं शुद्धं विषतिन्दुकबीजकम् । समा कज्जलिका चैव समगन्धेशसाधिता ॥२२७॥

६८८ रसतरङ्गिणी त्र्यूषणं च पलाद्धं स्यान्निर्गुण्डीद्रवयोगतः। ब्रह्मबीजद्रवेणापि भावयेत्सप्तवारकम् ॥२२८॥ निर्मापयेत्प्रयत्नेन वटी गुञ्जाद्वयोन्मिता। रसोऽयं सुप्तिवातारेः सुप्तिवातनिषूदनः ॥२२६॥ सुप्तिवातारेः—समगन्धकपारदाभ्यां साधिता कज्जली च विषतिन्दुकबीजात् समाना ग्राह्या। ब्रह्मबीजद्रवेण पलाशत्रीजकषायेण। सुप्तिवातः वातकृतः स्वाप इवाङ्गानाम् ॥२२७-२२६॥ भा.टी.—शुद्ध कुचला चूर्ण दो तोला, समभाग पारद गन्धक की कज्जली दो तोला, सोंठ मिर्च तथा पिप्पलीचूर्ण आधा पल अर्थात् चार तोला लेकर एकत्र खरल में डाल इसको सात भावना निर्गुण्डी स्वरस की और सात भावना पलाश (ढाक) बीज कषाय की देकर दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको सुप्तिवा- तारिरस कहते हैं। यह सुप्तवात (सुन्नवाय) को नष्ट करता है ॥२२७-२२६॥ सारमेयविषापहो योगः विषतिन्दुकबीजं तु प्रत्यहं परिशीलितम्। निहन्ति कुक्कुरविषं खलु मासैकमात्रतः ॥२३०॥ भा.टी—शुद्ध कुचला चूर्ण को प्रतिदिन एक मास तक निरन्तर सेवन करने से पागल कुत्ते के काटने का विष नष्ट हो जाता है ॥२३०॥ वक्तव्य—अन्यत्र पागल कुत्ते के विष प्रभाव को नष्ट करने के लिए प्रतिदिन एक-एक कुचला बीज बढ़ाते हुए एक मास तक सेवन करने को लिखा है, परन्तु यह अधिक मात्रा है। विषतिन्दुकस्य बाह्यप्रयोगः विषतिन्दुकतैलम् विषतिन्दुकबीजं तु तौलकैकमितं शुभम्। तिलतैले तु विमले तोलकाष्टकसंमिते ॥२३१॥ मन्दाग्निना पचेत्तावद्यावदायाति रक्तताम्। एतत्संज्ञायते रम्यं विषतिन्दुकतैलकम् ॥२३२॥ विषतिन्दुकतैलन्तु भृशमभ्यङ्गयोजितम्। पक्षाघातादिकान् रोगान् विनिहन्त्यविकल्पतः ॥२३३॥ सारमेयविषापहो योगः—मासमात्रं नियमेन सेवितं कुचेलकं कुक्कुरविषं

४४ चतुर्विंशस्तरङ्गः ६८६ नाशयति । तन्त्रान्तरदर्शनात् क्रमवृद्धमात्रया सेवनीयम् । उक्तं हि—"कारस्क- रफलं सेव्यं क्रमवृद्धं दिने-दिने । सारमेयविषं हन्ति मासेन नहि संशयः ॥" इति । भा.टी.—कुचला बीज एक तोला लेकर आठ तोले शुद्ध तिल तैल में डाल- कर इस तेल को मन्द-मन्द अग्नि से तब तक पकायें जब तक कि कुचला बीज पककर लाल रंग का न हो जाय । बीज के लाल रंग का होने पर तैल को नीचे उतार लें । इस प्रकार यह कुचला तैल तैयार हो जाता है । इस तेल को शरीर में मालिश करने से पक्षाघात आदि वात रोग निश्चित दूर हो जाते हैं ॥२३४॥ वक्तव्य—शुद्ध कुचलाचूर्ण, लौंगचूर्ण, कर्पूर, सोंठ, दालचीनी, पीपला- मूल, प्रत्येक सम भाग में लेकर गोमूत्र के साथ एकत्र पीसकर लेप तैयार कर लें । इस लेप को माथे पर लगाने से आधा-सीसी की वेदना शान्त हो जाती है । अथ अहिफेनस्य नामानि आहिफेनमफेनञ्च निफेनमहिफेनकम् । अफूकं फणिफेनञ्च नागफेनञ्च तन्मतम् ॥२३५॥ भा.टी.—अहिफेन, अफेन, निफेन, अहिफेनक, आफूक, फणिफेन और नागफेन, ये सब नाम अफीम के कहे जाते हैं ॥२३५॥ अहिफेनस्य परिचयः खस्तिलस्य फलानां तु चीरणात्खलु दुग्धवत् । निर्यासो योऽभिनिर्याति अहिफेनः स एव हि ॥२३६॥ अहिफेनपरिचयः—खस्तिलस्येत्यादिना । यद्यपि केचित्—"समुद्रे चैव जाय- न्ते विषमत्स्याश्चतुर्विधाः। तेभ्यः फेनं समुत्पन्नमहिफेनं चतुर्विधम् ॥" "केचिद्वदन्ति सर्पाणां फेनं स्यादहिफेनकम् । धारणं श्वेतवर्णञ्च रक्तवर्णञ्च जारकम् ॥ सारणं पीतवर्णञ्च कृष्णवर्णञ्च मारणम् । विषवद्धयुत्तमं फेनं युज्यते रसकर्मणि" इत्याहुः। तत्त्वनर्गलंवचनमेव, तादृशपदार्थानुपलम्भात् । निघण्टुवर्णितगुणायोगाच्च खाख- सजातो निर्यास एव अहिफेनं सर्वसम्मतमिति निर्विवादम् । तदेतदाह—खस्तिलस्य तदाख्यक्षुपविशेषस्य, फलानां क्षुपलग्नानां हरितानामेव चरणात् लेखनादिति यावत्, "चीरं रेखाभेदो लेखनभेद" इति मेदिनी । चीरणं च लेखनयन्त्रविशेषेण सम्पाद्यते । लेखनयन्त्रं हि पञ्चषैस्तीक्ष्णाग्रैर्लोहफलकैरकत्र ईषदन्तरेण संयोजितैः सम्पन्नं भवति । सायं खस्तिलफलानि लिख्यन्ते, प्रातश्च निर्यासः शुष्कः विलि- ख्यैकत्रीक्रियते । दुग्धवत् दुग्धसदृशो यो निर्यासः अभिनिर्याति बहिः स्रवति तस्यैव नाम अहिफेनमिति ॥२३६॥