रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचाहिए। शुद्ध विषचूर्ण में श्वेतवच, चन्दन तथा लोध का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ चटाने से कुछ ही दिनों में जीर्ण (पुराना) ज्वर नष्ट हो जाता है। शुक्र धातु की उत्पत्ति तथा वृद्धि के लिए वत्सनाभ चूर्ण को शतावरी, विदारीकन्द, द्राक्षा तथा कौंच के बीजों के चूर्ण में मिलाकर शहद के साथ चटाया जाता है। शुद्ध विष चूर्ण में हरिद्रा, गोखरू और द्राक्षा मिलाकर गोखरू कषाय के साथ सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र नष्ट हो जाता है। कुष्ठ रोग में शुद्ध विष को त्रायमाणा, मकोयमूल, खैर तथा अमलतास की फली के कषाय के साथ सेवन करने से आराम आता है। अति भयंकर पथरी को नष्ट करने के लिए वत्सनाभविषचूर्ण में पाषाणभेदचूर्ण, शुद्ध शिलाजीत तथा यवक्षार चूर्ण मिलाकर कुछ काल निरन्तर सेवन कराना चाहिए। शुद्ध वत्सनाभचूर्ण में सोंठ मिर्च तथा पिप्पली- चूर्ण और सज्जीखार चूर्ण मिलाकर सेवन करने से गुल्म रोग नष्ट होता है। भयंकर उदरकृमि रोग में शुद्ध विषचूर्ण को वायविडंगचूर्ण में मिलाकर सेवन कराना चाहिए। शुद्ध वत्सनाभचूर्ण में त्रिक्षार (यवक्षार-सज्जीक्षार और टंकणक्षार) तथा सरसों का चूर्ण और पिप्पलीमूलचूर्ण मिलाकर कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से प्लीहा (तिल्ली) रोग नष्ट हो जाता है ॥१३१-१४०॥ अथास्य बाह्यप्रयोगः बीजपूरद्रवैः पिष्टं विषं समसितायुतम्। अञ्जनान्नाशयत्याशु काचं नातिचिरोत्थितम् ॥१४१॥ निशाद्वयकणायुक्तं विषं कृष्णाञ्जनान्वितम्। अञ्जितं नाशयत्येव काचं नातिचिरोत्थितम् ॥१४२॥ त्रिसप्तवारं त्वमृतं भावितं धात्रिकारसैः। अञ्जितं शुद्धशङ्खाढ्यं तिमिरं हन्ति दारुणम् ॥१४३॥ सुरभीमूत्रयोगेन सप्तधा भावितं विषम्। सकणं त्वञ्जितं यत्नान्मतं काचजिदञ्जनम् ॥१४४॥ सुश्लक्ष्णपिष्टहीराढ्यं विषं गोमूत्रभावितम्। नारीस्तन्येन संघृष्टं मतं काचजिदञ्जनम् ॥१४५॥ करवीरकरञ्जार्कनिम्बपत्रनिशायुतम्। रक्तचन्दनमञ्जिष्ठासप्तपर्णेवचान्वितम् ॥१४६॥ मालतीपत्रसंयुक्तं विषं तालशिलायुतम्।