भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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४३ चतुर्विंशस्तरङ्गः ६७३ प्रलेपेन निहन्तीह व्रणान् कुष्ठसमुद्भवान् ॥ १४७ ॥ घृष्टमार्द्रकतोयेन विषमत्यल्पमात्रया । सद्यःपूरणयोगेन कर्णशूलहरं मतम् ॥ १४८ ॥ कदलीकन्दतोयेन विषं भृङ्गाम्बुभावितम् । पूरणाद्विनिहन्तीह पुष्पं नातिचिरोत्थितम् ॥ १४६ ॥ भृङ्गराजरसेनैव पूरणाच्च निशान्धताम् । विषाञ्जिते च नयने सिञ्चेद्धारा मुहुर्मुहुः ॥ १५० ॥ समं विषतुल्यं यत् सिताखण्डं तद्युतम् । काचः नेत्ररोगविशेषः। तिमिरमेव विकृतं सत् काचतां याति । सकणं पिप्पलीसहितम् । करवीरो हयमारः, निशा हरिद्रा, तालं हरितालम्, शिला मनःशिला । विषाञ्जिते चेत्युपक्रमः विषतीक्ष्ण- तापप्रतिषेधाय सर्वत्र ज्ञेयः ॥ १४१-१५० ॥ भा.टो.—नूतन मोतियाबिन्द में अर्थात् मोतियाबिन्द उतरने के प्रारम्भ में शुद्ध वत्सनाभ को बिजौरा नीम्बू के स्वरस में घोटकर उसमें समभाग (विष के बराबर ) खांड मिलाकर आँखों में अञ्जन करने से मोतियाबिन्द बढ़ने नहीं पाता है । इसी तरह शुद्ध वत्सनाभ, हल्दी, दारुहल्दी, पिप्पलीचूर्ण और शुद्ध काला सुरमा एकत्र बारीक पीसकर अञ्जन बना लें । इस अञ्जन को नेत्रों में लगाने से नया मोतियाबिन्द नष्ट हो जाता है । भयंकर तिमिर (नेत्ररोग) में विष को इक्कीस बार आंवलों के स्वरस में भावना देकर उसमें विष के बराबर भाग शंखचूर्ण मिलाकर आँखों में आंजन किया जाता है । गोमूत्र में सात भावना दिये हुए वत्सनाभचूर्ण में समभाग पिप्पली चूर्ण मिलाकर अञ्जन करने से भी काचरोग नष्ट होता है । गोमूत्र में सात बार भावना दिये हुए वत्सनाभ चूर्ण में समभाग हीरे का चूर्ण मिलाकर स्त्री-दुग्ध में पीसकर नेत्रों में लगाने से भी काच रोग नष्ट हो जाता है। कुष्ठ के व्रणों को नष्ट करने के लिए वत्सनाभ चूर्ण में लालचन्दन, मजीठ, सप्तपर्ण, वच, कनेरपत्र, कञ्चनपत्र, आक के पत्ते, निम्बपत्र, हरिद्राचूर्ण, चमेली के पत्र, हरताल और मैनसिल मिलाकर लेप करने से व्रण शीघ्र अच्छे हो जाते हैं । कर्णशूल को दूर करने के लिए वत्सनाभ को अदरक के स्वरस में घिस कर तत्काल कान में डालने से कान का दर्द बन्द हो जाता है । वत्सनाभ को भृंगराज के स्वरस की भावना देकर कदली कन्द के स्वरस में घिसकर नेत्र में डालने से नया फूला नष्ट हो जाता है । निशान्धता (रतौंधी) रोग में विष को भांगरा स्वरस में घिस कर डालने से वह नष्ट हो जाती है ।