भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 753

७५८ रसतरङ्गिणी जाती है। पुनः वर्षा पड़ने पर मूल फूट पड़ती है और गुञ्जा का वितान बन जाता है। सफेद गुञ्जाबीज में भी एक काला चिह्न होता है। कहीं-कहीं दक्षिण की ओर कृष्ण गुञ्जा भी पायी जाती है। विश्लेषण—इसके बीजों में Abric acid (एक तैल), तथा सर्पविष के तुल्य एक भयानक Abine नामक विष भी होता है। गुञ्जायाः परिचयः मिष्टमूलदला रम्या लता तु शीतपाकिनी। कृष्णचूडफला गुञ्जा सर्वेषां विदिता मता ॥४३६॥ पत्रं पत्ररसो मूलं बीजं चास्याः प्रयुज्यते। बीजमेव भिषग्वर्यैर्मतं तूपविषाह्वयम् ॥४४०॥ गुञ्जापरिचयः—मिष्टमूलदलेति। मिष्टं मूलं दलञ्च यस्याः सा तथा, रम्या सुन्दरदर्शना मनोहरेति यावत्। कृष्णवर्णा चूडा येषां तथाभूतानि फलानि यस्याः सा कृष्णचूडफला। स्पष्टमन्यत् ॥४३६, ४४०॥ भा.टी.—गुञ्जा का मूल मीठा होता है, सुन्दर होता है, सुन्दर लताएँ होती हैं। फल के ऊपर काला-काला दाग होता है। इसके फल, स्वरस, मूल तथा बीज का व्यवहार वैद्यवर्ग करते हैं। इसका केवल फल उपविष को दूर करता है ॥४३६, ४४०॥ गुञ्जाबीजानां शोधनप्रयोजनम् गुञ्जाबीजं वान्तिकरं तीव्ररेचनकृत्तथा। शीलितं त्वतिमात्रं तु गुञ्जाबीजमशोधितम् ॥४४१॥ विषूचीलक्षणकारां करोति हि विषक्रियाम्। अतो दोषनिवृत्त्यर्थं गुञ्जाबीजानि शोधयेत् ॥४४२॥ गुञ्जाबीजानां शोधनप्रयोजनम्—वान्तिकरत्वात् तीव्ररेचकत्वात् विषूचीसदृश- विषक्रियाहेतुत्वाच्च ॥४४१, ४४२॥ भा.टी.—यदि अशुद्ध गुञ्जाबीजों को अधिक मात्रा में खाया जाय तो इससे वमन तथा तीव्र रेचन होने लगते हैं। अर्थात् इसके अधिक मात्रा में खाने पर हैजे जैसे विषैले लक्षण उदय होते हैं, अतः इस दोष को दूर करने के लिए गुञ्जाबीजों को शुद्ध करके प्रयोग करना चाहिए ॥४४१, ४४२॥ गुञ्जाबीजानां प्रथमः शोधनप्रकारः जग्धानि गुञ्जाबीजानि चूर्णीकृत्य प्रयत्नतः। द्विगुणीकृतवस्त्रान्तः पोट्टल्यां रोधयेत्ततः ॥४४३॥

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