भारतकोश
रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

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पृष्ठ 100

स्नानं यस्याः सा लता इव विभाजसि शोभसे त्वं वासवदत्तेति शेषः । वसन्ततिलकं वृत्तम् । ज्ञेया वाच्यप्रतीतिरियमुपमा ॥२०॥ स्पृष्टेति ॥ दयिते प्रिये स्मरपूजाव्यापृतेन हस्तेन त्वया स्पृष्टः एषः अशोकः उद्भिन्नः उद्गतः अपरः अन्यः मृदुतरः कोमलतरः किसलयः पल्लवः यस्य सः इव लक्ष्यते दृश्यते—इति वासवदत्तायाः आरक्तिमाभौ हस्तः अशोकतरोः द्वितीयपल्लवत्वेनोत्प्रेक्ष्यते ॥ आर्याच्छन्दम् । उत्प्रेक्षालङ्कारः ॥२१॥ अनङ्गेति । अनङ्गः हरनेत्राग्निना भस्मीभूतत्वात् कामदेवस्य अशरीरित्वम्, अयम् आत्मनः अनङ्गत्वं निश्चितं निन्दिष्यति यस्मात् अनेन तव पाणिस्पर्शः न लब्धः इति भावः । उत्प्रेक्षालङ्कारः ॥२२॥ Prose. प्रत्यग्रमज्जनविशेषविविक्तकान्तिः (मूर्तिः) कौसुम्भरागरुचिरस्फुरदंशुका या ( त्वम् ) मकरकेतनमर्चयन्ती बालप्रवालविटपिप्रभवा लतेव विभाजसि ॥२०॥ दयिते, स्मरपूजाव्यापृतेन हस्तेन त्वया स्पृष्ट एषः अशोकः उद्भिन्नापरमृदुतरकिसलयः इव लक्ष्यते ॥२१॥ अयम् अनङ्गः अद्य ध्रुवमनङ्गत्वं निन्दिष्यति । यत् अनेन तव पाणिस्पर्शोत्सवः न संप्राप्तः ॥२२॥ Beng. Trans. প্রিয়ে,—তুমি সদ্যঃ স্নানবিশেষের দ্বারা পবিত্রকান্তি ও কুসুম্ভ- রঞ্জিত উজ্জ্বল বসনপরিধান করিয়া মদনপূজায় ব্যাপৃত হওয়ায় (সদ্যঃস্নাত) নবপল্লবশোভিত তরু হইতে সমুদ্ভূতা লতার ন্যায় শোভা পাইতেছ ।২০। পুনশ্চ—প্রিয়ে, কামদেবের পূজায় ব্যাপৃত তোমার হস্তের দ্বারা স্পৃষ্ট এই অশোক বৃক্ষকে দেখিয়া মনে হইতেছে যেন অন্য একটা অতি কোমল পল্লব ইহা হইতে সমূদ্গত হইয়াছে।২১। পুনশ্চ—আজ এই অনঙ্গ নিশ্চয়ই তাহার শরীরহীনতার নিন্দা করিবে, কারণ তোমার পাণিস্পর্শজনিত পরমসুখ আজ সে পাইতে পারিল না।২২। কাঞ্চন—দেবি, ভগবান্ প্রদ্যুম্নের অর্চ্চনা হইয়াছে। এখন মহারাজের যথাযোগ্য পূজা ও অভ্যর্থনা করুন। বাসব—তাহা হইলে কুসুম ও বিলেপন ( চন্দনাদি ) আনয়ন কর। কাঞ্চন—দেবি, এ সকল প্রস্তুত রহিয়াছে। ( বাসবদত্তা রাজাকে পূজার অভিনয় করিলেন )