भारतकोश
रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

268 रत्नावलो सागरिका—( उपसृत्य ) ता जाब इमाए माहबौलदाए पासं बिरइअ असोअपादवे अप्पाणअं उब्ब'धिअ बावादेमि । ( इति लतापाशं रचयन्ती ) हा ताद ! हा अम्ब ! एसा दाणिं अहं अणाहा असरणा विवज्जामि मंदभाइणी ! (क) ( इति कण्ठे लतापाशम् अर्पयन्ती ) विदूषकः—( विलोक्य ) का उण एसा ! कहं उण देवी बासबदत्ता । ( ससम्भ्रमोपेतः ) भो वयस्स ! परित्ताहि परित्ताहि । एसा क्खु देवी बासवदत्ता अप्पाणं उब्ब'धिअ बावादेति । (ख) राजा—( ससम्भ्रममुपसृत्य ) क्वासौ क्वासौ ? विदूषकः—णं एसा । (ग) राजा—(¹कण्ठात् पाशमपनयन्) अयि साहसकारिणि ! किमिट- मकार्य्यं क्रियते ?— मम कण्ठग