रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)
Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
पृष्ठ 314, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽङ्कः 269 यथासमीहितं यथेप्सितम्। उद्वध्ना उद्वन्धनेन इत्यर्थः। व्यापादयामि हनिष्यामि। ममेति। तव कण्ठस्थिते पाशे रज्जवाम् मम प्राणाः कण्ठगताः अहं मृतप्राय एव। अतः अस्मात् कारणाद् अयं स्वार्थप्रयत्नः स्वार्थात् स्वार्थहेतोः निजप्राणरक्षार्थम् इत्यर्थः, अयं प्रयत्नः चेष्टा त्वत्प्राणनाशनिवारणरूपा इत्यर्थः। त्वयि जीविते सति अहमपि जीवामि। अतो ममैव प्राणरक्षार्थं तव पाशमुन्मोचयितुमुत्सहे इत्यवधारय इत्यर्थः। साहसं सहसाकृतं यत् कार्यं हठकारितया तदेव साहसम्। अत्र असङ्गत्यलङ्कारः कार्य्य- कारणयोर्भिन्नदेशस्थितत्वात्। पाशस्य कारणत्वं, प्राणानां च कण्ठगतत्वात् कार्य्यत्वम्॥ १६॥ अत्र प्राप्त्याशा नाम कार्य्यस्य तृतीया अवस्था। [ साहित्यदर्पणं द्रष्टव्यम् ] Prose order—प्रिये! पाशे तव कण्ठगते मम प्राणाः कण्ठगताः। अतः अयं स्वार्थप्रयत्नः ( पाठान्तरे—स्वार्थः प्रयत्नः ); साहसं त्यज्यताम्॥१६॥ Beng. Trans. বসন্তক—হে বয়স্য, দেবী অত্যন্ত ক্রুদ্ধা হইয়াছেন। জানি না, তিনি কি করিবেন; কিন্তু সাগরিকার জীবন অত্যন্ত দুষ্কর হইয়া উঠিল বলিয়া অনুমান করিতেছি। রাজা—বয়স্য, আমিও ঐরূপ ভাবিতেছি। হা প্রিয়ে সাগরিকে! ( বাসবদত্তার বেশধারিণী সাগরিকার প্রবেশ ) সাগরিকা—( সোদ্বেগে ) এই দেবীবেশ পরিধান করিয়া এই সঙ্গীতশালা হইতে নির্গত হইয়া আসিবার সময় ভাগ্যে আমাকে কেহ দেখিতে পায় নাই! তাহা হইলে এখন এখানে কি করি? ( সাস্রনেত্রে চিন্তা করিতে লাগিলেন ) বিদূষক—ভো! আপনি বোকার মত বসিয়া আছেন কেন? এ বিষয়ে প্রতীকার চিন্তা করুন। রাজা—বয়স্য, আমিও উহাই চিন্তা করিতেছি। দেবীর অনুগ্রহ ছাড়া অন্য কোন উপায় দেখিতেছি না। তাহা হইলে এস, সেখানেই যাই। ( উভয়ের পরিক্রমণ ) সাগরিকা—( সাস্রনেত্রে চিন্তা করিয়া ) বরং এখন নিজেই উদ্বন্ধনের দ্বারা প্রাণত্যাগ করিব; তাহা হইলে সঙ্কেতের বৃত্তান্ত জানিতে পারিয়া দেবী সুসঙ্গতাকে যেরূপ