भारतकोश
रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

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318 रत्नावली

( ततः प्रविशति हृष्टो वसन्तकः ) वसन्तकः—ही ही भोः ! अज्ज क्खु पियवयस्सस्स पसादि- दाए तत्तभोदीए बासवदत्ताए बंधणादो मोचिअ सहस्सदिक्वेहिं मोदअलड्डुएहिं¹ उअरं मे सुपूरिदं किदं । अन्नं च, एदं पट्टंसुअजुअलं कण्णाभरणं² अ दिण्णं । ता जाव दाणिं पियवय- स्सस्स पेक्खिस्सं । (क) ( इति परिक्रामति ) सुसङ्गता—( रुदती सहसोपसृत्य ) अज्ज वसंतअ ! चिट्ठ ताव तुमं मुहुत्तअं । (ख) वसन्तकः—( दृष्ट्वा ) कथं³ सुसंगदा ! सुसंगदे ! एत्थ किं णिमित्तं रोदीअदि ? ण क्खु साअरिआए अच्चाहिदं किंपि संवृत्तं ? (ग) सुसङ्गता—एदं ज्जेव