रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)
Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished520 पृष्ठ
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366 रत्नावली बाभ्रव्यः—( सास्त्रम् ) हा महाराज¹ ! किमिदमकारणमेव भरतकुलं संशयतुलामारोपितम् ? अथवा किं प्रलापेन ? अहमपि भक्तिसदृशमाचरामि । ( इति सर्वेऽग्निप्रवेशं नाटयन्ति ) राजा—( दक्षिणबाहुस्पन्दं निरूप्य ) एतदवस्थस्य मम कुत एतत् फलम्² ? ( अग्रतोऽवलोक्य सहर्षोद्वेगम् ) कथमासन्नहुतवहा वर्त्तते सागरिका ! तत्त्वरितमेनां सम्भावयामि³ । ( ततः प्रविशति निगडसंयता सागरिका ) सागरिका—( समन्तादवलोक्य ) हद्धी हद्धी ! आसमंतदो पज्ज- लिदो हुदवहो ! अज्ज हुदवहो ! दिट्ठिआ करिस्सदि मे दुक्खा- वसाणं । (क) राजा — ( त्वरितमुपसृत्य ) अयि प्रिये ! किमद्यापि मध्यस्थतया वर्त्तसे ? (क)