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रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 412, कुल 520 में से

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पृष्ठ 412

विपत्तिः येन तस्य। आहुतीकर्त्तुम् अग्नसात् कर्त्तुम्। संशयतूलाम् जीवितसंशय- तुल्यताम् संशयतूलादण्डम् वा। दुःखावसानम् मृत्युना इत्यर्थः। Prose order. वह्ने, विरम विरम, धूमानुबन्धं मुञ्च। उर्द्ध्वः अर्च्चिषां चक्रवालं किं प्रकटयसि? यः अहं प्रियायाः विरहहुतभुजा न दग्धः, प्रलयदहनभासा तस्य त्वं किं करिषि ॥१६॥ Beng. Trans. बासवदत्ता—आर्य्यपुत्र! आमि निजेर जन्य बलि नाइ। कि आर बलिब, निष्ठुर आमि सागरिकाके शृङ्खले बाँधिया राखियाछि; सुतरां आर्य्यपुत्र ताहाके रक्षा करुन। राजा—कि (बलिलेन) देबि! (ताहाहइले) सागरिका विपन्न हइयाछे! आमि एखनइ याइतेछि। वसुभूति—महाराज, अकारण शलभवृत्ति अवलम्बन करितेछेन केन? बासबा—महाराज, वसुभूति ठिकइ बलियाछेन। विदूषक—(राजार उत्तरीय धरिया) देखुन, सहसा कोन दुःसाहसिक कार्य्य करिबेन ना। राजा—(उत्तरीय आकर्षण करिया) धिक् मूर्ख, सागरिका यखन मरिते बसियाछे, तखन आर कि प्राण रक्षा करा याय? (अग्निते प्रवेशपूर्व्वक धूमाकुल भावेर अभिनय करिते करिते) हे वह्नि, तुमि शान्त हओ, तोमार धूमजाल परित्याग कर। तोमार एइ उर्द्ध्वोत्थित शिखामण्डल प्रकाश करिया आर लाभ कि? ये आमि प्रियार विरहाग्निते दग्धीभूत हइ नाइ, प्रलयकालीन अग्निर शिखा प्रकाश करिया तुमि ताहार कि करिबे? १६। बासवदत्ता—ए कि! मन्दभागिनी आमार कथाय आर्य्यपुत्र एइरूप करिते प्रवृत्त हइलेन! ताहा हइले आमिओ ताँहार अनुगमन करि। विदूषक—(परिक्रमणपूर्व्वक अग्रसर करिया) आर्य्ये, आमि आपनार पथप्रदर्शक हइब। वसुभूति—ताहा हइले कि वत्सराज सत्यइ अग्निते प्रवेश करिलेन! आमिओ त राजपुत्रीर विनाश देखियाछि; ताहा हइले आमारओ एइ अग्नितेइ शरीरटिके आहुति दान करा कर्त्तव्य।