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रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 520 में से

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पृष्ठ 49

4 रत्नावली

औत्सुक्येन हेतुना कृतत्वरा कृतसम्भ्रमा सहभुवा सहजया ह्रिया लज्जया व्यावर्तमाना परावृत्ता। व्यावर्तमाना इति पाठे विपूर्व्यकात् वृत्तधातोः णिजन्तात् कर्म्मणि शानच्। ह्रिया इत्यत्र अनुक्ते कर्त्तरि तृतीया। बन्धुवधूजनस्य बन्धवः एव वध्वः तासां जनः सखीजनः इत्यर्थः। तस्य; यद्वा बन्धूनां वधूजनस्य तैः तैः समग्रैः वचनैः अनुरोधवाक्यैः गौर्य्याः पतिसमीपगमनप्रवृत्तिजननार्थमित्यर्थः। पुनः आभिमुख्यं साम्मुख्यं नीता प्रापिता; गौर्य्याः विशेषणमेतत्। वरं पतिम् अग्रे दृष्ट्वा। परम् इति पाठे भृशमित्यर्थः। आत्तसाध्वसरसा साध्वसं भयं च नवपरिणीतत्वात्, रसः अनुरागः च उद्गतयौवनत्वात्। आत्तौ गृहीतौ प्राप्तौ साध्वसरसौ यया सा (गौरी) नवे सङ्गमे संसर्गे हसता हरेण शिवेन श्लिष्टा आलिङ्गिता (अत एव) संरोढत्पुलका उद्गतरोमाञ्चा गौरी वः युष्माकं सामाजिकानां शिवाय मङ्गलाय अस्तु भवतु। शार्दूलविक्रीड़ितं वृत्तम्। अत्र नवोढ़ाया गौर्य्याः यथावद् वर्ण्यमानत्वात् स्वभावोक्तिः, संरोढत्पुलका इत्येतत् प्रति नवसङ्गमादिकस्य हेतुभूतत्वात् काव्यलिङ्गमलङ्कारः ॥२॥

Prose. औत्सुक्येन कृतत्वरा सहभुवा ह्रिया व्यावर्तमाना पुनः बन्धुवधूजनस्य तैः तैः वचनैः आभिमुख्यं नीता अग्रे वरम् दृष्ट्वा आत्तसाध्वसरसा नवे सङ्गमे हसता हरेण श्लिष्टा संरोढत्पुलका गौरी वः शिवाय अस्तु ॥२॥

Beng. Trans. যে গৌরী (পতির সহিত নূতন মিলন হইবে বলিয়া) ঔৎসুক্যবশতঃ সত্বর গমনপূর্ব্বক স্বভাবসিদ্ধ লজ্জাশীলতাহেতু প্রত্যাবৃত্ত হইয়া আসিতেছিলেন এবং যিনি সখীদিগের নানা অনুরোধে (পতির) সম্মুখে উপনীত হইয়া তৎপ্রতি দৃষ্টিপাত করিলে পর সেই অভিনব সম্মিলনে ভয়মিশ্রিত অনুরাগে যাঁহার রোমাঞ্চের আবির্ভাব হইয়াছিল, সহাস্যবদন হরকর্তৃক আলিঙ্গিতা সেই গৌরী তোমাদের মঙ্গল বিধান করুন।২।

Eng. Trans. And also—May Gauri be propitious to you —Gauri who having hastened through eagerness turned back owing to her inborn bashfulness and who then being impelled by various requests of her female friends was taken to (his) presence but was caught with fear mingled with love (or fear and feeling of love) as she looked upon (her) husband and who with her hairs standing or their ends in her new union was embraced by smiling Hara. 2.