भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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३४२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

दीर्घजीवी, अंत तक घनी, अच्छी आय, शूर, रोगहीन, घनो (फल०) ।

काले घोड़े और इन्द्रनील मणि, पुणं वस्त्र, बड़े हाथी इनका लाम (जा० भ०) t

सूयं समान फल (घनवान्‌) (qo जा०) ।

सर्व विद्याओं में निपुण, ऊंट, गौ और भेस से पूर्ण राजाओं में पूज्य और पवित्र

(छ० चं०)। दयावान्‌, नेक, भिष्ट भाषी, घनी, सन्तोषी, शत्रु नाशक (खान०) ।

भोगी, राजा से प्राप्त विपुल घनवान्‌ हो (जा० पारि०) ।

चोरों से रिक्‍वत ले, खोटे काम से, झूठ बोलने से, वकीली करने से, बहुत घन य

पदार्थ मिले (प्रा० यो०) ।

हाथी घोड़े होवें, स्थिर सम्पदा, पृथ्वी से लाभ, शूरवीर, कारीगरी से युक्त, सुख

युक्त, बिना लाभ वाला, मुख्य जीविका वाला व सन्तान हीन, शरीर में कष्ट तथा णिला

प्रहार (जा० सं०) ।

<-लाभ में राहु का फल

इन्द्रियजित्‌, श्याम रंग, देखने में सुन्दर, थोड़ा बोलने वाळा, परदेश वासी, शास्त्रों का ज्ञाता, बड़ा चपल, बड़ा निलंज्ज (मान०) 1

उन्नतिशीळ, बहुत सन्तान, दीर्घायु, कमं रोगी (फल०) 1

सब प्रकार के घन का लाभ, अधिक सौख्य, राजाओं से अनेक मान, वस्त्रोदक सुवणं,

चोपार्यो के सोस्य का भागी, सौख्य, विजय और मनोरथ : प्राप्त । ऋणो, बेकार, कलह

प्रिय (खान०) । कणं रहित, रणोत्सुक, धनी, पंडित (जा० पारि०) ।

हाथी घोड़े होवें, म्लेच्छ और पतित आदि जनों से लाभ, नहीं स्थिर रहने बाला

पुत्र हो, यदि पुत्र हो तो जातक के वृद्ध होने तक जीवित रहे, शरीर में कष्ट तथा णिला प्रहार (जा० स०) ।

९-लाभ में केतु का फल

श्रेष्ठ वाणी, श्रेष्ठ विद्या, दर्शनीय स्वरूप, श्रेष्ठ भोगों से युवत, श्रेष्ठ तेज, सुन्दर

वस्त्रा सहित, गुदा में रोग, दुष्ट पुत्र (जा० भ०) ।

भाग्यशाली, अधिक विद्याओं का जानने वाला, दशनीय सुन्दर शरीर, शाल दुशाले

झादि सुन्दर वस्त्रों से परिपूर्ण, बडा प्रतापी, स्वयं डर से व्याकुल, सन्तान भाग्यहीन, सब वस्तुओं का लाभ (मान०) ।

घन संग्रह करे, कई सद्गुण प्राप्त करे, सुभोगी, अच्छे पदार्थ प्राप्त करने के लिये

सब सुविधाएँ प्राप्त (खान०) । राहु के समान फल (खान०) ।

प्रतापी, परप्रिय, अन्यजन से वंदित, सन्तुष्ट चित्त, समर्थ, अल्प भोगी, शुभ क्रिया

तया आचारवान्‌ (जा० परि०) ।

१२-व्यय भाव में ग्रहों का फल १-व्यय में सुयं का फल १

मुखं, अति कामी, परस्त्री विलासी, पक्षियों को मारने वाला, दुष्ट चित्त, कुख्प,