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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

३४२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

दीर्घजीवी, अंत तक घनी, अच्छी आय, शूर, रोगहीन, घनो (फल०) ।

काले घोड़े और इन्द्रनील मणि, पुणं वस्त्र, बड़े हाथी इनका लाम (जा० भ०) t

सूयं समान फल (घनवान्‌) (qo जा०) ।

सर्व विद्याओं में निपुण, ऊंट, गौ और भेस से पूर्ण राजाओं में पूज्य और पवित्र

(छ० चं०)। दयावान्‌, नेक, भिष्ट भाषी, घनी, सन्तोषी, शत्रु नाशक (खान०) ।

भोगी, राजा से प्राप्त विपुल घनवान्‌ हो (जा० पारि०) ।

चोरों से रिक्‍वत ले, खोटे काम से, झूठ बोलने से, वकीली करने से, बहुत घन य

पदार्थ मिले (प्रा० यो०) ।

हाथी घोड़े होवें, स्थिर सम्पदा, पृथ्वी से लाभ, शूरवीर, कारीगरी से युक्त, सुख

युक्त, बिना लाभ वाला, मुख्य जीविका वाला व सन्तान हीन, शरीर में कष्ट तथा णिला

प्रहार (जा० सं०) ।

<-लाभ में राहु का फल

इन्द्रियजित्‌, श्याम रंग, देखने में सुन्दर, थोड़ा बोलने वाळा, परदेश वासी, शास्त्रों का ज्ञाता, बड़ा चपल, बड़ा निलंज्ज (मान०) 1

उन्नतिशीळ, बहुत सन्तान, दीर्घायु, कमं रोगी (फल०) 1

सब प्रकार के घन का लाभ, अधिक सौख्य, राजाओं से अनेक मान, वस्त्रोदक सुवणं,

चोपार्यो के सोस्य का भागी, सौख्य, विजय और मनोरथ : प्राप्त । ऋणो, बेकार, कलह

प्रिय (खान०) । कणं रहित, रणोत्सुक, धनी, पंडित (जा० पारि०) ।

हाथी घोड़े होवें, म्लेच्छ और पतित आदि जनों से लाभ, नहीं स्थिर रहने बाला

पुत्र हो, यदि पुत्र हो तो जातक के वृद्ध होने तक जीवित रहे, शरीर में कष्ट तथा णिला प्रहार (जा० स०) ।

९-लाभ में केतु का फल

श्रेष्ठ वाणी, श्रेष्ठ विद्या, दर्शनीय स्वरूप, श्रेष्ठ भोगों से युवत, श्रेष्ठ तेज, सुन्दर

वस्त्रा सहित, गुदा में रोग, दुष्ट पुत्र (जा० भ०) ।

भाग्यशाली, अधिक विद्याओं का जानने वाला, दशनीय सुन्दर शरीर, शाल दुशाले

झादि सुन्दर वस्त्रों से परिपूर्ण, बडा प्रतापी, स्वयं डर से व्याकुल, सन्तान भाग्यहीन, सब वस्तुओं का लाभ (मान०) ।

घन संग्रह करे, कई सद्गुण प्राप्त करे, सुभोगी, अच्छे पदार्थ प्राप्त करने के लिये

सब सुविधाएँ प्राप्त (खान०) । राहु के समान फल (खान०) ।

प्रतापी, परप्रिय, अन्यजन से वंदित, सन्तुष्ट चित्त, समर्थ, अल्प भोगी, शुभ क्रिया

तया आचारवान्‌ (जा० परि०) ।

१२-व्यय भाव में ग्रहों का फल १-व्यय में सुयं का फल १

मुखं, अति कामी, परस्त्री विलासी, पक्षियों को मारने वाला, दुष्ट चित्त, कुख्प,

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भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३४२

राजा से प्राप्त घन, कथा वाचकों का विरोधी, कंधे में रोग, अति दुबंल अंग (मा०) ।

पिता का द्वेषी, नेत्र रोगी, पुत्र भौर घन रहित (फल०) ।

वाम नेत्र पीडा, बड़ा खर्चीछा, रोगी, शरारती (खान०) ।

नेत्र के तेज से रहित, पिता से वेर, सबसे विरुद्ध (जा० भ०) ।

रोगी, सत्त्व हीन, वृथा चलने वाळा, असत्य काम में खचं करमे वाला, पुत्र स्त्री

गौर भक्ति हीन (ल० चं०) 1 अपने कर्म से भ्रष्ट (qo जा०) 1

पुत्रवान्‌, व्यंग, सुन्दर, धीर, पतित, और घूमने वाला (जा० पारि० )!

खर्चीला, परस्त्री गामी, व्यसनी, बहुत खर्चीला, राजा से उसका घन हरण

(जा० सं०) ।

२-व्यय में चन्द्र का फल र

दुबेलांग, निरन्तर कफ रोग, क्रोधी, घन रहित 1 स्वक्षेत्री या गुरु क्षेत्री--इन्द्रियों

का दमन कर्ता, बडे दाँत वाला, त्यागी, दुर्बलांग, सुख भोगी, नोच का संग (मान०) ।

दोषी, दुःखी, अपमानित, अति अकमंशील (फल०) । ०)

नेत्र विकार, विरोधी, दुष्ट स्वभाव, दुष्क्रीति; अधिक खर्च (खान०) ।

श्रेष्ठ शील और मित्र रहित, आँखों में विफलता, क्रोधी, शत्रु वृद्धि (जा० पारि०)॥

पाप बुद्धि, बहु भक्षी, हरने वाला, कुल.में अवम, मद्य पोने वाला, विकारी (ल०

चं०) । क्षुद्र ओर अंग हीन (qo जा०) 1

विदेश वासी (जा० पारि०) ।

कृपणता और पद-पद में अविएवास, कृष्ण पक्ष में जन्म हो तो कृपणता -बढ्ती है 1

क्षीण चन्द्र हो--राजा उसका घन हरे । पूर्ण चन्द्र हो शुम दृष्ट हो- घन को वृद्धि

(जा० सं०) ।

३-व्यय में मंगल का फल

पर घन लेने का इच्छुक, चंचल नेत्र, चपल बुद्धि, विहार करने वाला, हास्य करने

वाला, बड़ा प्रचण्ड, सुखी, परस्त्री गामी, गवाही देने वाला, कर्मों से परिपूर्ण (मान०) ।

दोष युक्त नेत्र, क्रूर, स्त्री रहित, चुगल खोर, अघम (फल०) ।

कठोर व कटु यचन भाषी, जालिम, क्रोघी, सदा परेशान (खान०) ।

मित्रों से वर करने वाला, नेन्न रोगी, क्रोधो, शरीर में विफलता, घन का नाशक,

बन्धन का भागी, थोड़ा तेज वाळा (जा० wo) ।

असत्‌ में खर्च करने वाला, नास्तिक, निष्ठुर, मूखं, बहुत वाद वाला, परदेश #

सदा ही जाने वाला (छ० चं०) 1 पतित (qo जा०) 1

विरोधी, घन स्त्री से हीन (जा० पारि०)।

क्रोषी, कामी, अङ्ग हीन, घमं में दूषण कर्ता, प्रिय बन्धुजनो से वैर (जा० सं०) 1

वाम कर्ण में रोग, वाम नेत्र में रोग, स्त्री को अधिक गंगता, कमर में घाव, कषत्रिय |

बगं से घन का खर्च, खोटे कर्म में wq आदि का भय (are सं०) । इन

३४४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

४ व्यय में बुध का फल

विकर शरीर (लूला लंगडा), दरिद्री, दूसरे के धन ओर स्त्री में बहुत मन, व्यसनों से अलग, सदा उपकारी (मान०) ।

दुःखो, विद्या रहित, अपमानित, क्रूर, अकर्मी (फल०) ।

अशुद्ध गुणवान्‌, नुकसान वाली बातें करे, किसी को बातों को न सहे; दया हीन, दुःखी, बेहूदा, घूमने वाला (खान०) ।

दयाहीन, स्वजन रहित, अपने काम में चतुर, अपने पक्ष को जीतने वाळा, निरंतर

घूर्त, मलिन (जा० भ०) ।

खर्चे करने वाला, रोगी, भाई से युक्त, पाप में रत, पराधीन, शत्रु का पक्ष करने

बाला (छ चं०) । सूर्यवत्‌, फल, पतित (बृ० जा०) ।

बन्धुओं से वर, घनी, बुद्धि रहित (जा० पारि०) ।

राज पीड़ा से संतप्त, निद्रा से मुक्त, m< (जा० सं०)

५-व्यय में गुरु का फल

बाल्यावस्था में हृदय रोग, उचित दान करने में बहिमुंख, कुल और घन ते युक्त ।

पापस्थानी हो तो--बड़ा दंभी, पाखण्डी (मान०) ।

दुसरे से घुणा करे, दुमुंखो, सन्तान हीन, पाप युक्त, आलसी, नीच (फळ० )! दरिद्री, कम बोलने वाला, मूर्ख, निर्लज्ज, बुरे वचन बोलने वाला, आलसी, बुरे कर्मों में खर्च (खान०) ।

अनेक प्रकार के चित्त के उद्योगों से क्रोध सहित, पापी, आलसी, लज्जाहीन, बुढि” हीन, मान रहित (जा० भ०) | 2 रोगी, परिश्रमी, पराये कर्म को करने वाला, बंधु बैरी, नोचों की सेवा, गुरु वैर (8० चं०) । दुर्जन (qe जा०) । चार्वाक मत, चञ्चल, घूमने वाला, खळ बुद्धि (जा० पारि”) 1 ऊँचा खर्चे करने वाला, सेवा करने में पण्डित, बड़ा क्रोधी, आरधी, लोक में विग्रह करने वाला (जा० सं०) ।

६- व्यय में शुक्र का फल

प्रथम रोग से मुक्त, पीछे कपट में तत्पर चित्त, हीन बल, सदा मलीन (मान०) । योगी, घनी और द्युतियुक्त (फल०) । बड़ा खर्चीला, वदकार, दुष्ट बुद्धि, क्रोधी (खान०) । श्रेष्ठ क्रमं के मार्ग को त्यागने वाळा, कामदेव में चित्त, दया और सत्य रहित (जा० qo) व्यय से युक्त, मित्र और गुरु का विरोघो, भाइयों में झूठ बोलने वाला, गुण होन (छ० चं०) । दुर्जन (qo जा०) । बंधु नाशक, व्यभिचार बुद्धि, दरिद्र (जा० पारि०) । अढाहीन, दयाहीन, रोगा, स्थूल देह (जा० सं०) 1

भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३४५

७-व्यय में शनि का फल

पंचायत का प्रधान, रोगी, हीनांग, अति दुःखी, जांघ में घाव, बड़ा क्रूर बुद्धि दुबंल अंग, पक्षियों को नित्य मारने बाला (मान०) ।

निर्लज्ज) दरिद्र, सन्तानहीन, अंग में दोष, मूख, शत्रुओं द्वारा भगाया हुआ (फल०) । दयाहीन, घनहीन, खच से दुःखी, सदा आलसो, नीच का संग, अंग-मंग से सौख्य (जा० भ०) ।

असत्‌ म खर्च, कृतघ्न, द्रव्यहीन, भाइयों से वेर, कुवेष, चंचल (go चं०) सूरय

समान फल, पतित (go जा०) ।

तंगदस्त, बुरे आचरण, निर्घन, आलसी (खान०) ।

विकल बुद्धि, मूख, घनवान्‌, ठग (जा० पारि०)।

नीच कमं में मन, पापी, अंगहीन, भोग विलास की लालसा, दुष्टों से प्रीति

(जा० सं०) ।

<-व्यय में राहु का फल

धर्म अर्थ से रहित, अनेक दुःखों को भोगने वाला, स्त्रो होन, परदेशवासी, सुखहीन,

सुरे नख, बुरे वेष में रहना (मान०) 1

गुप्त पाप करने वाला, अधिक खर्च, पानी के रोग से पीड़ित (फल०) ।

नेत्रों का रोगी, पैरों में घाव, प्रपंच करने वाला, प्रीतियुक्त, दुष्ट जनों से प्रीति,

'अध्यम पुरुष की सेवा करता है (जा० भ०) ।

कलह प्रिय, बेकार, कर्जीला, गरीब, दुःखो (खान०) ।

शील रहित, सम्पत्तिवान्‌, विकल देह, साधु, पूर्व स्थित घन का नाशक (जा०

“पारि०) । नीच कर्म, अनर्थ में खच, पाप बुद्धि, कपट युक्त, कुछ का दोष देने वाला

(जा० सं०) ।

९-व्यय में केतु का फल

गुप्त रूप से पाप करे, बुरी वातों में घन खर्च, घन का नाशक, विरुद्ध गीत, नेत्र

“रोगी (फल०) ।

पेंडू लिंग गुदा चरण में पीडा, रोग से शरीर पीड़ित, मामा से किसी वस्तु को

श्राप्ति नहीं होती, राजा के समान भाग्यशालो, अच्छे कर्मो में व्यय करे, युद्ध में शत्रुओं

का नाशक (मान०) ।

पैर और नेत्रो में पीड़ा, राजा के तुल्य वेमव में खर्च करने वाला, शत्रु नाशक,

मन में सुखी नहीं, वस्ति और गुदा के रोग से पोड़ित (जा० भ०) ।

चञ्चल और शीळ रहित (जा० पारि०) ।

३४६ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड

अध्याय १६

फलित में ग्रहों के फल का विचार

फलित में ग्रहों के फळ का विचार १२ भाव का ३ प्रकार से होता है ।

(१) लग्न से भाव फल विचार (२) चन्द्र से भाव फल विचार और (३) सूर्य से

भाव फल विचार । यहाँ तीनों प्रकार का भाव फल विचारना दिया ë 1

भाव के साधारण नियम

भाव फल आदि विचारने को आरम्भ में ही संक्षिप्त स्थुल विचार किए हैं । उनको

मनन कर फल विचारना । यहाँ और भी संक्षिप्त में विचार देते हैं ।

१-माव, भावेश और भाव का कारक बलवान्‌ होने से उस भाव सम्बन्धी अच्छा

फल होता है 1 यदि वह भाव या भावेश या उसका कारक निबॅल हों तो उस भाव

सम्बन्धी फल कम हो जाता है 1

२-यदि भाव बलवान्‌ हो, उसका भावेश और कारक एक दूसरे के साथ हों या

एक दूसरे पर दृष्टि हो तो अच्छा फल द्रोता हैं ।

३-भावेश के साथ शुभ ग्रह उसके बल को बढ़ावेगा जैसे धनेश से साथ शुम ग्रह

गुरु हो तो घन देगा और घन बढ़ावेगा ।

सप्तमेश के साथ शुभ ग्रह शुक्र हो, जो विवाह का कारक भी है, तो वह विवाह की

संख्या या स्त्रियां बढ़ावेगा ।

४-किसी भाव में मंगल और शनि दोनों हों तो उस भाव का नाश करता है ।

५-चन्द्र सूयं के साथ हो । द्वितीय भाव में भोम, चतुथं में बुघ, पंचम में गुरु, षष्ठ

में शुक्र, सप्तम में शनि ये दोष युक्त होते हैं प्रायः निष्फ होते हुँ । यदि घन कारक

होने की स्थिति में हों तो तब भी निष्फळ होते हँ । घन लाभ नहीं होगा । इन भावों में

उपरोक्त ग्रहों के साथ चन्द्र भी हो तो चन्द्र भी निष्फळ होता है।

६-पाप ग्रह लग्न या किसी भाव के त्रिक (६-८-१२ भाव) में हो तो उस भाव

के फल को तीक्ष्ण करता है ।

७-्रिकेश किसी भाव से केन्द्र कोण में हों तो भी उस भावका अच्छा फल नहीं

देते । त्रिकेश उस भाव से त्रिक में हो तो अच्छा फल देते ë ।

८-जिस राशि में कोई ग्रह हो वह राशि व उसका स्वामी बली हो और वह

राशिस्थ ग्रह भो बली हो तो उस राशि या भाव का पूर्ण फल होता है यदि इनमें से २

बली हों तो मध्यम फल, केवळ एक बली हो तो हीन फल होता Š 1

९-कोई भावेश पाप युक्त उस भाव से त्रिकमें हो तो उस भाव सम्बन्धो सुख

नहीं देता ।

१०-कारक ग्रह या भावेश बहुत पाप ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो या नोच आदि:

बुरे स्थानों में हो तो अच्छा फल नहीं देता ।

फलित में ग्रहों के फल का विचार : ३४७

इत्यादि बातों का पहिले बता चुकी बातों का और आगे बताई जाने वाली बातों का

पुर्ण विचार =< भाव के फल का अनुमान करना चाहिये ।

११-जब किसी भाव का स्वामी ६-८-१२ घर की राशि या नवांश में हो तो

शनि जब वहाँ गोचर में पहुँचता है तो उस भाव के फल का बिलकुल नाश हो जाता

है । यदि शनि इन दोनों राशियों के त्रिकोण में जो राशि है वहाँ जाता है तब भी भाव

फल का नाश हो जाता है ।

(१) लग्न कुण्डली से भाव फल विचार

१-लग्न में--शुभ ग्रह हो तो वह नम्र होता है । पाप ग्रह हो तो दरिद्र, शोक व

भय से युक्त व अभक्ष्य भक्षी होता है ।

२-लगन में--शुभ राशि हो तो दोर्घायु राजपूजित और सुखी होता ë 1

३-लरन में--पाप राशि या पापग्रह हो, पापग्रह की दृष्टि हो तो sf से

दग्ध हो ।

४-हलरन मॅ--उपरोक्त प्रकार से चन्द्र हो तो जरू का भय हो ।

५-लग्न में--शुभ गुरु को योग दृष्टि हो तो देह सुख होता है ।

लुग्न में-पापग्रह की योग दृष्टि लग्न या चन्द्र पर हो और शुभग्रह की दृष्टि न

हो तो देह सुख नहीं होता ।

६-लग्न में शुभ ग्रह हो तो जातक सुरूप, पापग्रह हो तो कुरूप हो ।

७-लग्न को देखते बाले या लग्न में रहने वाले अधिक ग्रह हों तो उसमें बली ग्रह

से ही फल विचारना ।

८-हूग्न में शुभ बलवान्‌ हो तो मनुष्य स्थूल होता है । पाप ग्रह तथा निबंल ग्रह से

दुर्वल होता है ।

२-लग्न में पाप युक्त चन्द्र हो--वो शीत रोग से युक्त रहे ।

१०-लग्न में ३ शुम ग्रह हाँ--विनय युक्त राजा ही । पाप ग्रह हों तो अनेक दुःख

दरिद्र शोक से युक्त, बहुत भोजन करने वाला हो 1

११-छग्न में चन्द्र बुध या राहु, केतु, शनि हो--स्वभाव चंचळ होता है

लग्न में सूर्य मंगळ गुरु शुक्र हो तो--स्थिर भाव को देते हैं ।

१२-लग्न या त्रिकोण में शुभ ग्रह हो तो रोग नष्ट हो 1

१३-लग्न को लग्नेश देखे तो घनी, तीक्षण बुद्धि हो, कुल की कीति बढावे ।

१४-लरन में चन्द्र के. साथ यदि बुध गुरु व शुक्र हो या लग्न से केन्द्र में हो तो

राज्य सम्बन्ध से लाभ कारक होता है !

१५-ऊनन में तथा लग्न के होरा में पाप ग्रह हो तो शिर में पीडा हो वह होरा

qd दल में हो तो सिर के बाम भाग में, यदि उत्तर दल में हो तो सिर के दाहिने भाग में

पीड़ा हो ।

३४८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१९ छन द्रेष्काण के विभाग में सिर स्थान में काष्ठ अग्नि व शस्त्र से चोट लगने का भय हो ।

१७-छन से प्रथम ओर नवम स्थान भो धन संज्ञक हैं । १८-यदि लान में कोई ग्रह न हो तो उसके द्रेष्काण पर से भी फल विचारना । (२) धन भाव का विचार

१-दवितीय स्थान वाक्‌ स्थान भी है वाक्‌ सम्बन्धी विचार भी इससे करना । २-छरन से प्रथम और नवम स्थान से भी धन का विचार होता है । रै-धन भाव में शुभग्रह घन प्रद है और पाप ग्रह धन नाशक है । ४-सब पाप ग्रह दूसरे घर में हों तो यह मुख होता है पर धनी भी होता है । (पर्खन भाव में लग्नेश सहित सब ग्रह बलवान्‌ हों तो शुभफल होता है । ६-धन भाव में शुभग्रह द्वितीयेश और लग्नेश से युक्त हों तो घन आदि सस्बन्वी अच्छा फल देते हैं ।

७-घन भाव में शुभग्रह हो तो मधुर भाषी प्रिय भोजन करने वाला होता है यदि पाप ग्रह हो तो कटु भाषी ओर बुरे अन्न का भोजी होता ë! ८-अनभाव में घन कारक ग्रह (बुध, चंद्र, मंगळ) व्यय स्थान में पढे तो व्यय की वृद्धि होने से घन की हानि होती है । ` *-धन भाव में शनि सुर्य मंगल हों या इनको दृष्टि हो तो घन नाश हो, यदि क्षीष चंद्र को दृष्टि हो तो विशेष कर घन क्षीण ( नाश ) हो । १०-घन भाव में मंगल चन्द्र दोनों हों तो त्वचा रोग और दरिद्रता हो । ११-वन भाव में सूर्य और बुध हों तो सेवा में तत्पर रहे । घन स्थिर न रहे । १२-राज योग होने से घन आदिका मुख होता है यंदि दरिद्र योग न हो! दरिद्र योग, रेफा योग आदि में घन सुख आदि सम्बन्धी कष्ट होता है । १३-द्ितीयेश केन्द्र में, उच्च में, मित्र गृही या अपने वर्ग में हो या हितीयेश जिस घर में हो उसका स्वामी गोपुरांश में हो तो बहुत धन होता है । š १४-द्वितीय में गुरु शुक्र हो तो बाक्पटुता आती है । चन्द्र हो तो--कुटुम्ब सौरुय, बुध हो तो घन समृद्धि प्राप्त होती है । १५-घन का विचार करने को, द्वितीय भाव से--धन का सुख । लग्नेश से सौभाग्य । चतुथं से-सुख और पैतृक घन । पंचम से-राज्य द्वारा लाभ, अकल्पित धन सट्टा लाटरी आदि द्वारा । सप्तम से-वाणिज्य द्वारा । नवम से-भाग्योदय द्वारा । दशम से-च्योपार द्वारा लाभ । एकादश से-छाभ और धन संग्रह प्रगट होता ë गुरु ग्रह सेव्य संचय । शुक्र से-सांसारिक घन विषयक सुख। इन सभी योगों की या इनमें से अधिक योगों की शुभता से धन का सुख होता है अन्यथा कष्ट होता है ।

और

१६-दूसरे भाव का विचार करने को उसका स्वामी कहाँ है यह देखो । बली ë सब वर्ग में उसकी स्थिति अच्छी है या नहों है । ग्रहों का योग दृष्टि आदि सब बातों

फलित में ग्रहों के फल का विचार : ३४९,

का विचार कर फल कहना इसमें कारक का भी विचार करना होगा ।

दुसरा घर आँख मुख घन वाणी कुटुम्ब आदि बताता है । दूसरा घर दाहिना नेत्र है परन्तु इनका प्रथम विचार करने को इनके कारक पर विचार करना होगा । इनके कारक भी भिन्न-भिन्न हैं जैसे वाणी का कारक गुरु है । वाणी सम्बन्धी विचार करने को गुरु की स्थिति पर ओर द्वितीय भावस्थ ग्रह एवं भावेश पर विचार कर फल निर्णय करना होगा । इसी प्रकार नेत्र का कारक शानि है । कुटुम्ब का कारक शुक्र है । इनके बल आदि पर और कारक की स्थिति आदि पर भी विचार कर किसी विदोष बात के सम्बन्ध में फल का अनुमान कर सकते हो ।

१७-एकादश भाव प्रबल हो और घन भाव निर्बल हो तो घन लाभ में सुगमता तो होगी परन्तु घन का संग्रह न हो सकेगा ।

१८-लाभेश दुर्बल या निक या किसी अशुभ योग में हो तो घन प्रभाव प्रबल: शग पर भी लाभ कष्ट साध्य होता है जिसमें घन संग्रह तो होगा परन्तु अनेक कष्ट साथ ।

१९-लग्नेश, लाभेश परस्पर एक दूसरे के स्थान में होंया लाभेदा लाभमें या

घनेश, लाभेश केन्द्र या त्रिकोण में हो तो घनवान्‌ और प्रसिद्ध हो ।

२०-यह पहिले बता चुके ë कि द्वितीय भाव में मंगल अशुभ अर्थात्‌ प्रायः निष्फळ

होता है । चन्द्र भी द्वितीय माव में मंगल के साथ निष्फल होता है ।

२१-दूसरा स्थान कारक स्थान है इसका स्वामी मारकेश कहलाता है इसका

वर्णन प्रथम दिया है 1 ( घन सम्बन्धी योग प्रथम दिये हैं ) ।

(२) तृतीय भाव का फल विचार

१-तृतीय भाव-शुभग्रह युक्त या दृष्ट हो, तो सहोदर युक्त ओर पराक्रमो हो ।

२-तृतीय भाव-में शुभ राशि हो शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो उस भाव सम्बन्धी

सभी बातों में शुभ फल होता है ।

३-भ्रातु भाव स्थित राशि व ग्रह, भ्रातृ स्थानेश और अआतृकारक ग्रह इन चारों

में शुभ ग्रहों का योग या दृष्टि हो तो भ्राता होंगे, शुभ ग्रहों का योग दृष्टि न हो तो सहो-

दर की हानि होगी । इसमें भी इन चारों में या इनमें से एक में गुभता हो तो उस

प्रमाण से सहोदर होंगे । पाप ग्रहों के योग या दृष्टि से हानि होगी ।

४-शुभग्रह भी स्वभाव से अशुम स्थान के स्वामी हो जायें तो अशुभ फल देंगे ।

जैसे मेष लग्न से तीसरे और छठे स्थान का स्वामी बुघ है दोनों अशुभ स्थान का यहाँ

स्वामी हो जाने से बुघ अणुम हो गया या तुला लग्न हो तब तीसरे ओर छठे स्थान का

स्वामी गुरु हो जाने से दो अशुभ स्थानों का स्वामी हो गया इससे गुरु मो यहाँ अशुभ

गया ।

; ५-प्रह ३-६-८ स्थान के स्वामी होने से पाप फछ देते हैं जैसे वृश्चिक लग्न में मंगल छग्नेश और षष्ठेश भी है । वृष लस्तमें शुक्र लग्नेश भी है ओर षष्ठे भी है।'

३५० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

त्रिकेश होने में इनमें अशुभता आ जाती है । इस प्रकार कन्या लग्न में शनि षष्ठश हो

जाता है । इस प्रकार ३-६-८ के स्वामी अशुभ हो जाते Š ।

६-तृतीय में--स्त्रीग्रह हो या तृतीयेश स्त्रीग्रह हो तो अधिक बहन होंगी, यदि

ये पुरुषग्रह हों तो अधिक भाई का सुख हो । स्त्री पुरुष दोनों हो तो भाई बहिन दोनों

का सुख हो! |

७-तृतीय से, भाई साहस यात्रा आदि जाना जाता है परन्तु इनके कारक भिन्न-

“भिन्न हैं जिनसे भिन्न-भिन्न विषय का फल जानना ।

८-तृतोयेश का सम्बन्ध शुभ ग्रहों से हो तो उसके भाई हों। भाइयों के कारक

मंगळ का सम्बन्ध शुभ ग्रहों से हो तो उसके भाई अवदय हों । तृतीयेश और मंगल

साथ-साथ हों तो भाई अवश्य हों । तृतोयेश लग्न में हो लग्नेश तृतीय में हो तो भाई हो ।

` ९-तृतीयेश और मंगल ये पाप ग्रहों के साथ हों ६-८-१२ में हों तो कोई भाई न

हों, होवें तो मर जावेंगे । |

१०-तृतीय भाव में सूर्य हो तो बहुत साहसी हो आगे बढे ।

११-तृतीयेश अष्टम में हो तो यात्रा में मृत्यु हो या आकस्मिक भयानक घटना हो ।

१२-तृतीय में बुध हो और तृतीयेश चन्द्रमा से युक्त हो या भ्रातृ कारक ग्रह शनि

से युक्त हो तो पहिले एक बहिन और पीछे एक भाई हो और तोसरा उत्पन्न होकर

सर जावे ।

१३-यदि मंगल द्वादशेश या गुरु से युक्त और तृतीय भाव में चंद्रहो तो ७

सहोदर हों । न

१४-यदि तीसरे भाव में चन्द्र हो उस पर केवल पुरुष ग्रह ( रवि गुरु मंगल ) की

दृष्टि हो तो बड़े भाई का, शनि हो तो छोटे भाई का, मंगल हो तो अपने से बड़े और छोटे दोनों भाई का नाशक होता है !

इन उपरोक्त योगों में बलाबल देख कर भाई बहिन का शुभाशुभ फल विचारना ।

( भाइयों सम्बन्धी योग पृथक्‌ दिये हैं । )

चतुथ भाव विचार

१-चतुर्थ से घर स्थान सम्पत्ति, माता, वाहन, आनन्द, अपनी उन्नति, शैया सुख, शिक्षा, जल, हृदय, कंधा, गर्दन, कूल्हे आदि का विचार होता है--

इससे स्थावर सम्पत्ति, उपभाग की वस्तुयें, सामान फरनीचर आदि, कई प्रकार के

बाहन, आचरण और स्त्री भोग, भिन्न प्रकार का जल जिसे उपयोग करना पड़ता है, हृदय का बल ओर निबंलता, गर्दन और == की शक्ति इत्यादि बातें प्रगट होती है । यद्यपि इस भाव से भिन्न-भिन्न बातें प्रगट होतो हैं और उस भाव का स्वामी एक होता है परन्तु प्रत्येक बातों के कारक भिन्न ë—

जैसे माता कारक चन्द्र है ( किसी के मत में दिन के जन्म में शुक्र रात के जन्म में चन्द्र माता का अतिरिवत कारक Š । इस कारण माता का सुख, स्वास्थ्य, दोघं जीवन,

फलित में ग्रहो के फल का गिचार : ३५१

आचरण मातू प्रेम का विचार केवल चोथे भाव से ही नहीं होता परन्तु चन्द्र शुक्र या शनि

से भी होता ë 1 ) ( माता के २ कारक हैं ) जैसी स्थिति हो विचारना ।

इसी प्रकार शिक्षा का कारक गुरु, वाहन ( घोड़ा, मोटर आदि सवारी ) का कारक

शुक्र है । इसी प्रकार .जतुर्थेश और कारक ग्रह की बलवान्‌ स्थिति आदि पर विचार कर

फल कहना ।

२-जब शुक्र अच्छी स्थिति में हो और चतुर्थेश बलवान्‌ हो तो उसे चतुर्थ भाव

की सब चीजों में शुभता प्राप्त होगी । यदि ये बुरे हों या बलहीन हों तो उपरोक्त चीजें

नहीं प्राप्त होंगी ।

३-शुभ ग्रह चतुर्थ में हो या चतुर्थ को देखता हो तो वे सब शुभ ग्रह अपने अधि-

कार प्रमाण से शुम फल देंगे। परन्तु पाप ग्रह उन स्थानों में हों या पाप ग्रह की दृष्टि

हो तो बुरा फल होकर दुःख व चिता उत्पन्न करायेगा ।

४-चतुथे भाव शुभ ग्रह युक्‍त या दृष्ट हो तो उस भाव की वृद्धि होगी ।

५-चतुर्थ भाव सम्बन्ध से पूर्ण बली ग्रह का पुणे फल होगा । मध्यम वली का

आधा । होन बली या अस्त आदि का बहुत अल्प फल होगा ।

६-चतुथं में सूयं घ शनि हो तो अन्तःकरण सदा उद्विग्न रहे, दुःखी हो ।

चतुर्थं में बुघ शुक्र हो--वहुत करके वह सुखो हो 1 चतुथं में बुध--पंडित हो ।

७-चतुथं में शुभ ग्रह हों या शुभ ग्रह को दृष्टि हो तो उसके पास वाहन रहे !

८-चतुर्थ में शुभ ग्रह हों या उनको दृष्टि हो तो उसकी माता, दीघंजीवी हो ।

९-चतुर्थं में शुभ ग्रह हो तथा चतुर्थेश अपने उच्चादि शुम स्थान में हो, मातृ

कारक ग्रह भी बली हो तो माता से पूर्ण सुख हो 1 घर पशु आदि सम्बन्धी. योग पृथक्‌

दिये हैं ।

१०-इसी प्रकार चतुर्थेश बी होकर चतुथं में हो तो चतुर्थ भाव सम्बन्धी सब

फल शुभ होता है |

११-यदि चतुर्थेश अस्त नीच गत आदि हो तो उक्त फल विपरीत होता है, अर्थात्‌

'फल अशुभ होता है।

१२-शुक्र की चन्द्र पर दृष्टि हो या चन्द्र से तीसरे घर में शुक्र हो या शुक्र से

तीसरे घर में चन्द्र हो तो उसके पास कुछ वाहन हो और बहुत सुख प्राप्त करे 1.

१३-स्थावर सम्पत्ति मिलने के योग ।

(१) मंगल चतुर्थ हो या मंगल की दृष्टि चतुर्थ पर हो या चतुर्थेश मंगल के घर में

'हो तो स्थावर सम्पत्ति मिले ।

(२) चतुर्थेश लग्न में हो लग्नेश चतुर्थ में हो । (३) यदि चतुर्थेश का सम्बन्ध किसी प्रकार मंगल से ( मंगल भूमि का कारक है )

हो जावे ।

(४) चतुर्थश घन भाव में हो।

३५२ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड

(५) चतुर्थेश छाभ में हो तो मित्रों द्वारा स्थावर सम्पत्ति मिळे ।

१४-चतुर्थ भाव में चतुर्थेश हो शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो गृह सम्बन्धी सुख

पूर्ण हो ।

१५-लग्नेश शुम ग्रह हो तथा चतुर्थश नीच में हो, चतुर्थ भाव का कारक व्यय

भाव में हो, चतुथे लाभ स्थान में हो तो १२ वषं में वाहनों का सुख हो ।

१६-चतुथे में सूयं शनि, नवम भाव में चन्द्र, तथा लाभ भाव में मंगल हो तो गाय

भैंस आदि पशुओं का लाम हो ।

(५) पंचम भाव का फल विचार

१-पंचम स्थान से--सन्तान, बुद्धि, अकल्पित घन ( सट्टा लाटरी आदि से ) स्मरण

शक्ति, देवता, विद्या, ज्ञान, वाणी, मंत्रणा शक्ति, सलाह देने की शक्ति, यांत्रिक शक्ति,

बुद्धि. हषं, मानसिक प्रगल्भता, राज्य द्वारा लाभ आदि का विचार होता है परन्तु इनके

कारक भिन्न-भिन्न हैं ।

२-बुद्धि का कारक बुधग्रह है ओर मन का द्योतक चन्द्र है इससे किसी का ज्ञान

निश्‍चय करने में इनका विचार होता है । किसी ने विद्या ऊंची पढ़ी पर ज्ञान कम होता

है इससे विद्या ओर ज्ञान में अन्तर है ।

३-चन्द्र पंचम भाव में हो उसे शुक्र देखता हो तो उसे अचानक द्रव्य प्राप्त हो

लाटरी आदि किसी प्रकार से प्राप्त हो सकता है |

४-पंचमेश शुभग्रह युक्त हो या शुमग्नह के घर में हो तो वह बुद्धिमान्‌ और शु

आचरण वाला होता ë ।

५-पंचमेश जिस भाव में हो उस राशि का स्वामी शुभग्रहों से दुष्ट हो या दोनों

बाजू शुभग्रह हों तो तेज बुद्धि हो ।

६-पचम में शनि और राहु हो और पंचम पर शुभग्रह की दृष्टि न हो पंचमेश

पर पापग्रहों को दृष्टि हो तो उसकी स्मरण शक्ति बहुत कम हो।

७-पंचम का सम्बन्ध स्त्रीग्रह से हो तो स्त्री देवता जैसे सरस्वती दुर्गा आदि का

पूजन करे यदि पुरुष ग्रह से सम्बन्ध हो तो पुरुष देवता राम कृष्ण शिव आदि की पूजा करे ।

८-पंचमेश सप्तम में हो तो चोरों द्वारा धन की हानि हो 1

९-पंचम में गुरु शुक्र बुध हो ओर योग या दृष्टि द्वारा कोई शुभग्रह गुरु शुक्र या

बुघ से हो तो सन्तान होगी ।

१०-पंचमेश पंचम में हो तो कई सन्तान हों ।

११-पंचम ओर पंचमेश का कोई सम्बन्ध शुभग्रह से हो तो उसकी सन्तान की संख्या में वृद्धि हो ।

१२-पंचम ओर पंचमेश का सम्बन्ध पापग्रह से हो तो सन्तान की हानि हो । १३-पंचम में २-३ पापग्रह हों और पञ्चम पर छत्रु ग्रह की दृष्टि हो तो कोई सन्तान न हों यदि होवें तो जीवित न रहें ।

फलित में ग्रहों के फल का विचार : ३५३

१४--पंचमेश अष्टम में हो तो सन्तान की हानि हो । १५--पुत्र या कन्या-पंचम या पंचमेश का सः म्बन्ध स्त्री ग्रह से हो तो पुरुष ग्रह से हो तो पुत्र हो । SN NN १६ संतान को कोति ओर मान-पंचमेश् दशम में हो तो उस के संतान को कोति और सान मिले ।

१७--पुत्र विचार-पंचम से, पुत्र कारक ग्रह और गुरु को स्थिति पर विचार कर संतान होना निर्णय कर । भावेश पुरुष या स्त्री ग्रह जैसा हो उससे पुत्र-पुत्रो का विचार करना ।

१८ दत्तक या कृत्रिम पुत्र-पंचम में ३, ६, १० या ११ राशि हो उसमें शनि, मांदि, गुलिक हो तो दत्तक या कृत्रिम आदि पुत्र होता है । १९--एक पुत्र हो-शनि से पंचम में गुरु या गुरु से पंचम में शनि तथा पंचम भाव पाप युक्त हो तो १ पुत्र होगा । š

२०--७ पुत्र-पंचम से पंचम में शनि हो । पंचमेश पंचम में हो तो ७ पुत्र हों दो sf दो दो पुत्र होते हुँ ।

२१--८ पुत्र-गुरु ५ या ९ भाव में हो, पंचमेश बलो हो, ढितोयेश दशम में हो तो ८ पृत्र होंगे ।

२२--९ पृत्र-गुरु “अच्छे स्थान में हो, द्वितीयेश राहु युक्त हो । भाग्येश भाग्य स्थान में हो तो ९ पुत्र हो ।

२३--दुसरी या तीसरी स्त्री से पुत्र-पंचम में पाप ग्रह हो या गुरु से पंचम में शनि हो तो पुरुष की प्रथम स्त्री से पुत्र नहीं होता, दूसरी या तीसरी स्त्रीरे पुत्र होता है । २४--४० वर्ष में पुत्र-लग्न से नवम में गुरु हो गुरु से नवम में शुक्र हो या लरनेश शुक्र हो तो ४० वर्ष में पुत्र हो ।

२५-- एक पुत्र होकर मरे-पंचम माव पापयुक्त हो । गुरु से पंचम शनि हो ।

लग्नेश द्वितीय भाव में हो और पंचमेश पाप युक्त हो तो एक पुत्र होकर नष्ट हो

जाता ë ।

२६---३३-३६ वर्ष में पुत्र मरण-पंचम से ओर लग्न से. पंचम भाव में पाप ग्रह

` हो तो ३३ या ३६ वर्ष में पुत्र का मरण हो ।

२७--५६ वर्ष में पुत्र शोक-छरन में गुलिक हो ओर लग्नेश अपने नीच में हो तो,

५६ वर्ष में पुत्र मरण 1

२८--पेट में पीड़ा-पंचम में शनि पाप दृष्ट हो तो पेट में पीड़ा हो लोह या अग्नि

से पोड़ा हो ।

(पुत्र सम्बन्धी योग पृथक्‌ दिये हैं। )

भाव का फल

जे भाव से रोग, शत्रु, ऋण, माया, चोट, नौकर आदि का विचार होता ë ।

२३

३५४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२- शत्रु या ऋण हानि-छठे घर में पाप ग्रह हो तो शत्रु की हानि हो और कोई

ऋण न रहे ।

३-- म बल-षष्ठेश पष्ठ भाव में हो वीर्यवान्‌ होया शुभ होतो षष्ठ भाव

सम्बन्धी सब फल शुभ होगा । या छठे भाव में शुभ ग्रह की राशि हो शुभ युक्त हो, शुभ

ग्रहों से दुष्ट हो तो उस भाव का फल शुभ होगा । पष्ठ में गुरु बलवान्‌ हो तो शुभ होगा।

जन्म में या प्रश्‍न में भी इस योग पर विचारना ।

४--अशुभ फल-यदि पापयुवत पापदृष्ट भाव राशि हो तो शुभ नहीं होगा।

५-—-सिद्वि-ष्ठ में स्वक्षेत्री शुक्र हो तो सदा अति सिद्ध हो ।

६--अच्छे नौकर-षष्ठेश छठे भाव में हो तो अच्छे नौकर हों ।

७--पूर्वज की जायदाद की हानि-षष्ठेश चतुर्थ में हो तो अपने पूर्वजों की जायदाद

की हानि हो उनकी कोई जायदाद न मिले ।

८--ऐक्सीडेन्ट या आपरेशन-छठे घर का सम्बन्ध मंगळ से हो तो अचानक अप

घात ( ऐक्सीडेन्ट ) या शस्त्र क्रिया द्वारा चिकित्सा अर्थात्‌ आपरेशन हो ।

९--बीमारो से आराम-छठे भाव का सम्बन्ध गुरु से हो तो बीमारी हो उससे शीक्रष

झाराम पावे ।

१०--कुविचार से रोग-छठे भाव का सम्बन्ध शुक्र से हो तो उसे भोजन या रहन- सहन के सम्बन्ध में कुविचार से रोग हो।

११- पेट दर्द-छठे भाव का सम्बन्ध शनि से हो तो पेट दर्द या अपच का रोग रहे ।

१२- बीमारी या नोकरों द्वारा घन हानि-पष्ठेश धन आव में हो तो रोध हारा

या नोकरों द्वारा धन की हानि हो ।

१३--सूजन और क्षय रोग-षष्ठ में सूर्य युक्त चंद्र हो तो शरीर में सूजन हो और

क्षय रोग हो ।

१४-सदा रोगी-छठे में शुभ ग्रह हों तो सदा रोग हो ।

१५-मृत्यु-छःे में चन्द्रमा हो तो मृत्यु दायक है।

१६--दोष कारक ग्रह-षष्ठ में सूयं हो--दश दोष देता है, षष्ठ में चन्द्र हो--हजार

दोष देता हैं, षष्ठ में मंगल, शनि--कुछ दोष नहीं देते, षष्ठ में शेष ग्र ह--चन्द्र के

समान हजार दोष देते हूँ ।

७--सप्तम भाव का फल

१-सप्तम से स्त्री का सब प्रकार का विचार होता है । स्त्री की सुन्दरता, स्वभाव,

विवाह, घन आदि । वाणिज्य द्वारा लाम का भी विचार होता है ।

२---सप्तम माव, सप्तमेश और इसका कारक ग्रह शुक्र ओर सप्तमस्थग्रह से भाव

फल विचारना ।

३- खूप गुण आदि का विचार--सप्तम स्थित ग्रहों के शीळ, भावादि राशि शीळ

'लग्नादि के अनुसार सब विचार कर अर्थात्‌ उपरोक्त सब ग्रहों ओर राशि के गुण घमं

फलित में ग्रहो के फल का विचार : ३५५

ओर कुडलो में ग्रह स्थिति विचार कर स्त्री के गुण रूप स्वभाव आदि जाने ।

whe ४-सुन्दर स्त्रो-पप्तमेश पडचल सहित शुभमाव हित शुभमाव युक्त यदि शुभग्रह से युक्त दुष्ट हो

५-सप्तम भाव का फल-सप्तमेश दुष्ट स्थान में हो पापदृष्ट हो या पापयुक्त हो तो

सप्तम भाव का फल मध्यम होता है । ऐसा न हो तो शुभ फल होता ë ।

६-अच्छा फल-यदि छर्न से या चंद्र से ५ वाँ या ७ वाँ घर ९ वें घर के स्वामी से

युक्त या दृष्ट हो तो दोनों भाव के लिये शुभ है अन्यथा नहीं 1

सप्तम में शुभ राशि शुभग्रह से दुष्ट युक्त होने से भावफल शुभ होता हे । पाप

राशि पाप दृष्टि योग से अशुभ फल होता ë ।

७-माग्यवान्‌ स्त्री-मप्तम का कोई सम्बन्ध सूर्य से हो तो भाग्यवती स्त्री मिले वह

अच्छे आचरण को होगो । विवाह के बाद जातक की उन्नति होगी ।

८-उद्योगो ईमानदार स्त्री, विवाह में देर-सप्तम का कोई सम्बन्ध शनि से हो तो

बिवाह देर से हो, परन्तु उसको स्त्री ईमानदार और उद्योगो होगी । कमी-कमी कड़े

स्वभाव की होगी ।

९-बुद्धिमान्‌ तेज स्त्री-सप्तम का कोई सम्बन्ध बुध से हो तो स्त्री तेज होगी ओर

बुद्धिमान्‌ होगी ।

१०-स्त्री द्वारा सुख-विवाह के बाद उन्नति-सप्तम का कोई सम्बन्ध गुर सेहोतो

स्त्री द्वारा सुख मिले ओर विवाह फे पश्चात्‌ उन्नति हो 1 या विवाह कारक शुक्र सिह

š हो तो विवाह के पश्चात्‌ जीवन में उन्नति हो 1

११-स्त्री के कारण सुख व घन-सप्तम का कोई सम्बन्ध शुक्र से हो तो स्त्री द्वारा

सुन्न हो और कुछ घन छाम भी हो । š

१२-२-३ अवसर चूकने पर विवाह-सप्तम का कोई सम्बन्ध चन्द्र से हो तो २-३

अवसर चुकले के पश्चात्‌ विवाह हो सकेगा ।

१३-स्त्री स्वेच्छाचारी-सप्तम का कोई सम्बन्ध मंगळ से हो तो स्त्री के कारण

विपत्ति आवे । स्त्रो क्रोधी हो पति को इच्छानुसार न चले ।

१४-स्त्री के कारण दुःख व झगड़ा-सप्तम या सप्तमेंश का कोई सम्बन्ध मंगल से

हो तो स्त्री से झगड़ा हो । कभी-कभो स्त्रो के द्वारा दुःख मी हो ।

१५--विलम्ब मे विवाह-शनि के घर में शुक्र हो और सप्तम या सप्तमेश से शनि

या सूर्य का कोई सम्बन्ध हो तो जीवन में बहुत विलम्ब से विवाह ह्रो।

१६--एक से अधिक विवाह-यदि २-७-९ भाव के स्वाभियों में से किसो का ओर

शुक्र का कोई सम्बन्ध पाप ग्रह या शुभ ग्रह से हो तो एक से अधिक विवाह होगा ।

१७--स्त्रो आचरण होन-सप्तमेश पाप ग्रह के साथ हो या पाप ग्रह को दृष्टि हो

तो स्त्रा वदचलन हागी ।

१८--स्त्रो कामी,एक या अधिक से प्रेम-शुक्र ग्रह मंगल के घर में हो और मंगळ

३५६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

शुक्र के घर में हो या मंगल या शुक्र साथ-साथ किसी घर में हों तो स्त्रो एक या अधिक से प्रेम करे 1

१९--स्त्रो गर्व युक्त-सप्तम में नीच राशि का शुक्रहो । या चंद्र गुरु शुक्त इनकी

राशि सप्तम में हो और शुक्र और मंगल की दृष्टि हो तो स्त्री गव युक्त होगो ।

२०--स्त्री नपु सक-सप्तम में नपु सक ग्रह हो तो स्त्री में नपुंसकता रहे!

२१--स्ती फल विचार-जन्म में जिस प्रकार पुरुष का फल कहा है वह फछ स्त्रियों को भी लागु हाता है । स्त्री के सप्तम से उसके पति का विचार होता है । दूसरे भाव फळ में पुरुष के स्थान में स्त्री समझना स्त्रियों की जन्म कुण्डली से विशेष अन्तर स्त्री

जातक में दिया रहता है वह भी आगे दिया गया है 1

(स्त्री सम्बन्धी योग पृथक दिये हैं 1)

अष्टम भाव का फल

१--यह आयु या मृत्यु स्थान है। इससे मृत्यु का निदान, मृत्यु सम्बन्धी सव प्रकार का विचार, दहेज अर्थात्‌ स्त्री द्वारा घन प्राप्ति व अकल्पित लाभ (सट्टा छाटरी आदि द्वारा) का विचार होता है ।

२--कौन विकार से मरण-इस स्थान पर कोई ग्रह न हो तो जिन ग्रहों की दुष्ट हो उनमें जो बलवान्‌ हो उसके अनुसार वात पित्त कफ आदि व्याधि से भरण होगा 1 जसे रवि से पित्त, चन्द्र से इटेष्म, भोम से पित्त इत्यादि ।

३--किस अंग में होपा-काळ पुरुष का जो अंग अष्टम राशि में है उस अंग मे उपरोक्त व्याधि होकर मृत्यु हो।

'४--माव फळ शुभ-अष्टम भाव में शुभ ग्रह की राशि शुभ फळ देती है! ५--धन भाव के सद्दा इसका भी विचार-जैसा घन भाव गत ग्रहों के फूल कहें हुँ वैसा अष्टम भावगत ग्रहों का भी विचारना । जैसे क्रूर ग्रह अष्टम में हो तो मनुष्य रोग युक्त रहे, युद्ध में मरे, बहुत काल तक कलह रहे 1 किला एका-एकी न टूटे 1 बन्धन घें पड़ा शीघ्र छूटे। भार से छदी नाव सुख पुर्वक पार लगे । ऐसा ही फल द्वितीय भाव में कूर ग्रह का है ।

६--अष्टमेश का अशुभत्व-अष्टम भावेश जिस घर में हो उस भाव के फल को नष्ट करता है । . जंसे अष्टमेश घन भाव में हो तो घन को हानि, पंचम में हो तो संतान नाश, सप्तम में हो तो स्त्रो की हानि इत्यादि । ७--घन विचार-शुभ ग्रह अष्टम में हो तो सदा घन रहित रहता ë यदि वहाँ क्रूर ग्रह हो तो घन की हानि करता है ।

८_ पर्वत से गिरकर मृत्यु-सुय और मंगल क्रम से १० और ४ स्थानों में हों तो पर्वत से गिरकर मृत्यु हो ।

९ कप में गिरकर मृत्यु-शनि चढ्न और मंगळ क्रम से ४-७-१० स्थान में होतो ` कूप में गिरकर मृत्यु हो ।

फलित में ग्रहो के फल का विचार : ३५७

१०--अपने जन से मृत्यु-सुर्य चंद्र यदि कन्यागत क्रूर ग्रहों से दृष्ट हों तो अपने जन से मृत्यु हो 1

११--जल में डूबकर मृत्यु-द्विस्वमाव राशि में सूर्य चंद्र स्थित हों तो जल में डूबकर मृत्यु हो । (मृत्यु सम्बन्धी विषय पृथक्‌ दिया है 1)

६-नवम भाव का फल

६--नवम भाव से घमं, श्रद्धा, तप, तीर्थयात्रा, भाग्योदय, दूर की यात्रा, जल की यात्रा, ग्रन्य कर्तंव्यता, बुद्धिमत्ता आदि का विचार होता है 1

२--नवम भाव अपने स्वामी से युक्त एवं शुभ ग्रह युक्त दृष्ट हो तो उस भाव का

फ़ळ अच्छा होता है अन्य प्रकार से अशुम फल होता है ।

३--इस भाव से सम्पूर्ण भाग्य का फल विचारना । नवमेश, नवम भाव, नवम

स्थित ग्रह इनवा नवां वर्ग जैसा सबल या निबंल, शुभ या अशुभ हो उसके अनुसार

फल विचारना 1 नवमेश जैसा बली या निबँल होकर शुभ या अणुभ स्थान में हो वैसा

शुभ या मध्यम वा हीन भाग्य कहना । सबसे पहिले भाग्य का ही विचार करना क्योंकि

भाग्य बिना कुछ न होगा ।

४--लरन से ओर चंद्र से दोनों प्रकार के नवम स्थान से फल विचारना । दोनों

में अच्छा हो तो श्रेष्ठ फल होगा यदि एक प्रकार से अच्छा हो तो आघा फल समझना ।

५--लग्न से प्रथम और नवम भाव भी धन संज्ञक हैं इससे भी घन का विचार

करना ।

६--पिता आदि की मृत्यु का विचार-पंचम या नवम में पाप ग्रह की राशि में

यदि-सूर्य हो तो-पिता की मृत्यु हो, मंगल हो तो-भाई की मृत्यु, बुघ हो तो-

आमा की मृत्यु हो, गुरु हो तो--नानी को मृत्यु हो, शुक्र हो तो--नाना की मृत्यु हो,

शनि हो तो--स्वयं जातक को कष्ट या मृत्यु ।

७--राजा हो-नवम में चन्द्र हो बुध या मंगल से दृष्ट हो तो राजा हो या नवम

में चन्द्र उच्च का हो शुभ ग्रह से दुष्ट हो तो राजा हो ।

८- सूर्यं से दुष्ट--राजा, मंगल से दृष्ट--मंत्री, बुध से दृष्ट--घनवान्‌, शुक्र से

दृष्ट--अद्वपति, सूर्य चन्द्र से दृष्ट--विद्वान्‌, पशु पालक, सूय मंगल से दृष्ट- सेनापति,

रत्न व्यापारी, सूर्यं बुध से दृष्ट--घनी, विनोदी, सूर्य शुक्र से दृष्ट--नम्नता युक्त, सूर्य

शनि से दृष्ट--गुणवान्‌ राजा ।

९--चन्द्र सूर्य दोनों से दृष्ट-विख्यात, राज तुल्य पाडत, बहुत स्त्री युक्त, दीर्घायु ।

चन्द्र मंगल दोनों से--सौख्य ऐश्वयं युक्त सेना का अधिकारी या मन्त्री । चन्द्र दुब

दोनों से--गृह शयन अन्न आदि भोगी, तेजस्वी, क्षमाशील, बुद्धिमान्‌ । चन्द्र शुक्र दोनों

से- शुमाकार, कमं युक्त, शुरवीर, सम्पन्न, परिवार युक्त । चन्द्र शनि दोनों से-गुण

वाळा और राजलुल्य, विदेश में पंडित ।

३५८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

मंगल बुघ दोनों से--तेजस्वी, सत्य युक्त, सेवा कार्य में तत्पर, चतुर बुद्धि ।

मंगल शुक्र की दृष्टि-'घनवान्‌, चतुर, बुद्धिमान्‌, विद्वान्‌, सत्यभाषी, विदेशगामी ॥

मंगल शनि की दृष्टि--नीच, विदेश गामी, चाकरी वाळा, निंदक, चुगल, ठग ।

बुघ गुरु की दृष्टि--कछा जानने वाला, सुन्दर भाग्य, विद्वान्‌, अच्छे भेष का

घारक, शीलवान्‌, आज्ञा पालक ।

बुघ शनि की दृष्टि--सुन्दर ऐक्वयंवान्‌, मनोहर,- विद्वान्‌, वक्ता, शूरवीर, सुखी,

विनयी ।

शुक्र शनि की दृष्टि--देशपति और घनी ।

द्वादशेश से दृष्ट--विवाद कर्ता, प्रिय बोलने वाला ।

यदि नवम में गुरु हो और अन्य ग्रहों से दृष्ट हो.तो ऐसा फल नहीं होता

यदि नवम में गुरु हो और समस्त ग्रहों से दृष्ट हो तो-- समृद्ध ओर पृथ्वीपति, तेज रूप

गुण युक्‍त होता ë 1

९--नवम भाव में २ ग्रह योग फल

सुर्य चन्द्र- नेत्र रोग, घनी, सूर्य मंगल--दुःखी, राज प्रिय । सूर्य बुध--सदा

शत्रु वृद्धि । सूयं गुरु--पिता प्रिय, धनवान्‌ । सूयं शुक्र--रोगी, सूर्यं शनि--रोगी, पित

को कुक्षि रोग ।

चन्द्र मंगल-- दानी) माता विरोधो, चन्द्र बुघ--वक्ता, शास्त्रज्ञ, चन्द्र गुर

गंभीर बुद्धि, धनी, चन्द्र शुक्र--कुलटा पति, चन्द्र शनि--निगु'णी, धमं हीन ।

मंगल बुघ- शास्त्री, मोगी, मंगल गुरु--घनी पूज्य, मंगल शुक्र-द्विभार्या वादी,

"बिदेश वासी, मंगल रानि--धमं हीन ।

बुध गुरु--चतुर विद्वान्‌ घनी, बुघ शुक्र--रीति प्रिय, गायक, पंडित, बुध शनि--

रोगी, घनी, प्रिय वक्ता ।

गुरु सुक्र- दीर्घायु, धनी, गुरु शनि--रत्न का व्यापारी, शुक्र शनि--राज￾सम्मान सुखी ।

१०--नवम भाव मे ग्रह उच्च में या अपने qq में हो तो निम्न फल होता है:

सूयं-राज चिल्लो के क्रय-विक्रय से, कृषि, नौकरी, दुजंन कमं, लिखने पढ़ने का काम, डाक्टरी, वैद्यक, रुपया बांटने का काम, घूम-घूम कर क्रय विक्रय से, विवाद

सम्बन्ध से, प्रेत कायं, भ्रातृ कलह सम्बन्धी आदि कायं से लाभ हो ।

चन्द्र शंख के क्रय-विक्रय, अन्य स्त्रो-संसगं से, राजा की मित्रता से, कृषि, वस्त्र, विप्र विरोध आदि कायं से छाम हो ।

मंगल- स्वर्ण सम्बन्धी, विजय सम्बन्धी, मित्र, बन्धु विवाद, शत्रु कमं, बल कार्य से लाभ ।

मूल त्रिकोण में हो तो--कृषि या राजा से लाभ, एक गृही में हो तो--स्वणं वस्त्र से लाम, मित्रगृही में हो तो-अन्न लाभ, शभु गुही में हो तो--अग्नि द्वारा, गुल्म

फलित में ग्रहों के फल का विचार : ३५९

संग्रहणी कुष्ठ आदि रोग से घन नाश, क्र्र वृत्ति करता ë ।

शानि--मंगल के अनुसार ।

बुघ उच्च का--अध्यापक के कार्य से लाभ ।

बुध शत्रुगृही--मुकदमा द्वारा, किसी से लाम ।

बुघ मित्रगृही--लेखक कायं, शिल्प कायं, वस्त्र, स्वर्ण, घनी स्त्री से लाम ।

बुघ अति शत्रू, राशि--विद्या हीन, व्यापार हानि, कुष्ट तया पथरी रोग ।

स्वषोड़शांश में--बन्धु विवाद से, नौकरी से कुशलता तथा घन धान्य आदिका

लाभ ।

गुरु उच्च का या स्ववगं में--प्रतापी, गुणी, घनी, किसी संस्था का प्रधान ।

गुरु उच्च का शत्रुराशि में--द्रव्य नाश, पराजय ।

गुरु मित्रगृही राशि में--अध्यापक ।

गुरु भतिमित्रगृही--पुत्र स्त्री मित्रादि एवं विवाह सम्वन्धी कार्य से छाम ।

शुक्र उच्च का स्ववर्ग का--राज कार्य, सेनाध्यक्ष, मंत्री, शिक्षा सम्बन्धी कार्य, यज्ञ

कार्य से लाभ ।

स्वगृही हो -नोकरो से, सेनाधिकारी, कृषि और विद्या से, जलाशय से लाम ।

१०-दशम भाव का फल

१--यह कमं स्थान है अच्छा बुरा कर्म, घंघा, नौकरी, अधिकार, सन्मान, मान्यता,

हाथ का किया कमं, कीर्ति, पितृ सुख, यज्ञ आदि का इससे विचार होता है।

२--चतुर्थ और दशम भाव भी सुख संज्ञक ë!

३--सत्कर्मी प्रसिद्ध दीघंजीवी आदि-दशम में शुभ ग्रह हों और दशमेश पूर्ण बली

होकर केन्द्र या कोण में हो और अपने स्वस्थान या उच्च में हो या लग्नेश दशम में हो

तो उसका सब मान करे, अति प्रसिद्ध हो सदा सत्कर्म करने की ओर झुकाव रहे, राजा

सदृश भाग्य हो और दीर्घजीवी हो ।

४--शुभ कर्मी क्रूर कर्मी-दक्षम में qa ग्रह हो तो वह भलाई युक्त कुछ शुभ कार्य

करेगा । यदि शनि राहु या केतु हो तो वह पाप युक्त और क्रूर कर्म करेगा ।

५--दरिद्र-दशम में कोई qg न हो तो दरिद्र दोष होता है ।

६- प्रतापी बैयंवान्‌-यदि दशमेश सुस्थित हो तो वह अपने प्रताप और बाहुबल से

धमं युक्त कायं पूरा करने में समर्थ होगा 1

७--लोक प्रिय महत्वशील-दशम में सूर्य या मंगल हो तो वह बडा ओर महत्त्व का

पुरुष होता है जो संबको प्रिय हो ।

८--इस प्रकार दशमस्य राशि ग्रह व दशमेश और ग्रहों की दृष्टि स्वभाव बल

आदि पर विचार कर दशम भाव सम्बन्धी समस्त बातों को उनके कारक पर से

बिचारना ।

३६० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

११--लाभ स्थान का फल

१--इससे अनेक प्रकार के लाभ, द्रव्य लाभ, आशा, इच्छा, हाथी घोड़े आदि वाहन का ऐदवयं, मित्र व मित्र सुख का विचार होता है। विशेष कर इससे लाथ और घन संग्रह का विचार होता है 1

२--अत्यन्त छाभ-ऊ़म्नेश्ञ यदि स्वोच्च, स्वक्षेत्री, मित्र गृही, मूल जरिकोणगत, राज्य कारक, भाग्य कारक ग्रहों से दृष्ट हो तो अत्यन्त लाम हो । वैना q वृद्धि-बलवान्‌ लग्नेश शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो आताओं की वृद्धि होती है । नोच, अस्तगत, दुःस्थान स्थित होकर क्रूर ग्रहों से संयुक्त हो तो भ्रातू फा अभाव जानना। इससे भाव फल को हानि होती ë! ४--३-६-११ भाव में पाप ग्रह ( सूर्य मंगल शनि राहु केतु या पाप युक्त वुध और क्षोण चंद्र ) हो तो अच्छे होते हैं और अच्छा फल देते हँ । इससे ११ भाव का अच्छा फळ कहा है । यदि लग्नेश पाप युक्त या बुरे वर्ग में हो तो उसको मलाई करने की शक्ति कम हो जातो है परन्तु पाप ग्रह और शुभ ग्रह भी लाभ भाव में बलवान्‌ होते हैं । ५--उचित या अनुचित रोति से घनोपार्जन-छाभ भाव में पाप ग्रह हो तो अनुचित रीति से यदि शुम ग्रह हो तो उचित और ईमानदारी से घन उपाज॑न करेगा । ६--शुभ फल-लग्नेश शुभग्रह हो वढी ग्रह हो या लाभ में शुभ ग्रह या बलो ग्रह हो तो भावोक्त फल शुभ होते ë!

नीच राशि, शत्रु राशि, नीच नवांश, शत्रु नवांश में स्थित ग्रह अच्छा फल नहीं देता । अपने अपने षडवर्ग बल से युक्त ग्रह लाम में हों या शुभ ग्रहों के षड़वग में हों या शुभ ग्रह से युक्त दुष्ट हों तो अति लाम होता है 1 ७--राजा हो-एक भी ग्रह षडवगं युद्ध होकर समस्त ग्रहों से दृष्ट हो तो राजा हो।

८-किस प्रकार लाम होगा-छाम भाव में जैसे वर्ण वाला ग्रह हो उस वर्ण के समान वस्तु का उस वर्ण के समान मित्रो आदि द्वारा लाभ, घन तथा सुख होगा । ९--संतान का विचार-पंचम भाव के अनुसार ळाम भाव से भी निश्‍चय पूर्वक कन्या सन्तान, मृत सन्तान, निःसन्तान या पुत्र नाश इन सब बातों का विचार होता है । अर्थात्‌ पंचम भाव में जो फळ का विचार होता है इससे मी वही विचारना । १०--चाहन युक्त राज्य लाम-लाम भाव में बैठे सब ग्रह राज्य लाम का भी फल देते हैं । यदि लाभ में शुभ ग्रह हो तो उसके यहाँ हाथो घोड़ों आदि को कतार लगी रहे सदा अच्छे काम करने को इच्छा रहे । ११-छाम भाव में ये ग्रह हों या इनको दृष्टि हो या इनका षडवगे हो तो फल-- सूर्य--राजा से या चोरों के कुल से या मुकदमा में किसो को डिगरो आदि फराने से या चोपाये पशुओं द्वारा बहुत प्रकार घन प्राप्ति gt

फलित मैं ग्रहो के फल का विचार : ३६१

चन्द्र--जलाशय, स्त्री, हाथ, घोडे की वृद्धि युक्त हो पूर्ण चंद्र में यह फल हो।

क्षीण चंद्र हो तो विपरीत फल हो, घन आदि का इनके द्वारा नाश हो, पूर्ण चन्द्र में इनके

दवारा घन लाभ हो ।

मंगल--उत्तमोत्तम आभूषण, मणि सुवणं प्राप्ति, विचित्र यात्रा करने वाला, बडा

साहसी, नाना कलाओं से युक्त, कोमल बुद्धि या अग्नि शस्त्र आदि सम्बन्ध से घन लाम

हो परन्तु कुछ कष्ट से लाभ हो ।

बुघ--अनेक कविता करने से, बहुत कलाओं के जानने से, कारोगरो के कामों से,

लिखने के काम से, उत्तम साहस से, अनेक उद्यमो से, वणिकजनों की मित्रता द्वारा और

कवि मनुष्यों से घन प्राप्त हो या घोड़ों के व्यापार से घन लाभ हो ।

गुरु--यज्ञ क्रिया करने वाळा, साघुजनों का संग करने वाला, राजा का कृपापात्र

होने से उसके आश्रय में रहने वाला, सुवर्ण प्रधान घन से युक्त ।

शुक्र--वेश्या जनों के द्वारा या परदेश आने-जाने से सोना, चाँदी, मोती आदि

की खुब प्राप्ति होती है 1

शनि--नीले रंग की वस्तु, लौह भैंस, हाथी आदि द्वारा लाम हो ओर ग्राम नगर

के मनुष्यों के बोच पुणं बड़प्पन पाता है । शुम ग्रह से-सब प्रकार का लाम होता हे ।

१२--नवम भाव के ग्रह के अनुसार भी छाम का विचार होता है यह विचार

नवम आव में दे चुके हूँ ।

१२-—द्वादश व्यय भाव का फल

१--इससे सब प्रकार का खर्च, कैद, गुप्त शत्रु, गुप्त विद्या, अध्यात्म विद्या ओर

सोक्ष आदि का फल जाना जाता ë ।

२--किसमें खर्च-च्ययेश आर व्ययस्थ ग्रहों में जो बली हो और भाव कारक हो

इन सबका विचार करने से प्रगट होगा कि किस भाव में या किस ब्यापार में घन व्यय

होगा ।

व्यय भावेश के साथ जिस प्रकार शुभ या अशुभ ग्रह हो या वह जैसे स्थान का स्वामी

हो उसके अनुसार शुभ या अशुभ मागे से व्यय होगा । इसमें स्वगृही उच्च मित्रक्षेत्री

आदि ग्रह का फल पुष्ट होगा नोच, अस्त शत्रु गृ हो आदि ग्रह हो तो तुच्छ फल होगा ।

३--दुष्ट कार्य में खर्चे-व्ययेशा नीचगृहो, क्रर या शत्र ग्रहों से युक्त हो या स्वयं

क्र ग्रह हो तो जातक दुष्ट स्थान में दुष्ट कार्य में व्यय करता है । वह तिदित दरिद्र

ओर दुःखी भी होता है ।

मिउव्ययी सुखो- व्ययेश शुभ ग्रह हो, शुम स्थान गत हो, व्यय में शुभ ग्रह हो

ओर नवम दशम स्थान से भी सम्बन्ध हो तो जातक मितव्यय करता है और सुखी

रहता है । 4

कृषकघर्मी नेत्र रोगी-व्यय में शुभग्रह हो तो त्यागी, कृषक और धर्मात्मा हो । व्यय

में पापग्रह हो तो विवादो, बात व्याधि के कारण नेत्र रोगों चपल ओर घूमने वाला हो।