भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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३५८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

मंगल बुघ दोनों से--तेजस्वी, सत्य युक्त, सेवा कार्य में तत्पर, चतुर बुद्धि ।

मंगल शुक्र की दृष्टि-'घनवान्‌, चतुर, बुद्धिमान्‌, विद्वान्‌, सत्यभाषी, विदेशगामी ॥

मंगल शनि की दृष्टि--नीच, विदेश गामी, चाकरी वाळा, निंदक, चुगल, ठग ।

बुघ गुरु की दृष्टि--कछा जानने वाला, सुन्दर भाग्य, विद्वान्‌, अच्छे भेष का

घारक, शीलवान्‌, आज्ञा पालक ।

बुघ शनि की दृष्टि--सुन्दर ऐक्वयंवान्‌, मनोहर,- विद्वान्‌, वक्ता, शूरवीर, सुखी,

विनयी ।

शुक्र शनि की दृष्टि--देशपति और घनी ।

द्वादशेश से दृष्ट--विवाद कर्ता, प्रिय बोलने वाला ।

यदि नवम में गुरु हो और अन्य ग्रहों से दृष्ट हो.तो ऐसा फल नहीं होता

यदि नवम में गुरु हो और समस्त ग्रहों से दृष्ट हो तो-- समृद्ध ओर पृथ्वीपति, तेज रूप

गुण युक्‍त होता ë 1

९--नवम भाव में २ ग्रह योग फल

सुर्य चन्द्र- नेत्र रोग, घनी, सूर्य मंगल--दुःखी, राज प्रिय । सूर्य बुध--सदा

शत्रु वृद्धि । सूयं गुरु--पिता प्रिय, धनवान्‌ । सूयं शुक्र--रोगी, सूर्यं शनि--रोगी, पित

को कुक्षि रोग ।

चन्द्र मंगल-- दानी) माता विरोधो, चन्द्र बुघ--वक्ता, शास्त्रज्ञ, चन्द्र गुर

गंभीर बुद्धि, धनी, चन्द्र शुक्र--कुलटा पति, चन्द्र शनि--निगु'णी, धमं हीन ।

मंगल बुघ- शास्त्री, मोगी, मंगल गुरु--घनी पूज्य, मंगल शुक्र-द्विभार्या वादी,

"बिदेश वासी, मंगल रानि--धमं हीन ।

बुध गुरु--चतुर विद्वान्‌ घनी, बुघ शुक्र--रीति प्रिय, गायक, पंडित, बुध शनि--

रोगी, घनी, प्रिय वक्ता ।

गुरु सुक्र- दीर्घायु, धनी, गुरु शनि--रत्न का व्यापारी, शुक्र शनि--राज￾सम्मान सुखी ।

१०--नवम भाव मे ग्रह उच्च में या अपने qq में हो तो निम्न फल होता है:

सूयं-राज चिल्लो के क्रय-विक्रय से, कृषि, नौकरी, दुजंन कमं, लिखने पढ़ने का काम, डाक्टरी, वैद्यक, रुपया बांटने का काम, घूम-घूम कर क्रय विक्रय से, विवाद

सम्बन्ध से, प्रेत कायं, भ्रातृ कलह सम्बन्धी आदि कायं से लाभ हो ।

चन्द्र शंख के क्रय-विक्रय, अन्य स्त्रो-संसगं से, राजा की मित्रता से, कृषि, वस्त्र, विप्र विरोध आदि कायं से छाम हो ।

मंगल- स्वर्ण सम्बन्धी, विजय सम्बन्धी, मित्र, बन्धु विवाद, शत्रु कमं, बल कार्य से लाभ ।

मूल त्रिकोण में हो तो--कृषि या राजा से लाभ, एक गृही में हो तो--स्वणं वस्त्र से लाम, मित्रगृही में हो तो-अन्न लाभ, शभु गुही में हो तो--अग्नि द्वारा, गुल्म