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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

३५८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

मंगल बुघ दोनों से--तेजस्वी, सत्य युक्त, सेवा कार्य में तत्पर, चतुर बुद्धि ।

मंगल शुक्र की दृष्टि-'घनवान्‌, चतुर, बुद्धिमान्‌, विद्वान्‌, सत्यभाषी, विदेशगामी ॥

मंगल शनि की दृष्टि--नीच, विदेश गामी, चाकरी वाळा, निंदक, चुगल, ठग ।

बुघ गुरु की दृष्टि--कछा जानने वाला, सुन्दर भाग्य, विद्वान्‌, अच्छे भेष का

घारक, शीलवान्‌, आज्ञा पालक ।

बुघ शनि की दृष्टि--सुन्दर ऐक्वयंवान्‌, मनोहर,- विद्वान्‌, वक्ता, शूरवीर, सुखी,

विनयी ।

शुक्र शनि की दृष्टि--देशपति और घनी ।

द्वादशेश से दृष्ट--विवाद कर्ता, प्रिय बोलने वाला ।

यदि नवम में गुरु हो और अन्य ग्रहों से दृष्ट हो.तो ऐसा फल नहीं होता

यदि नवम में गुरु हो और समस्त ग्रहों से दृष्ट हो तो-- समृद्ध ओर पृथ्वीपति, तेज रूप

गुण युक्‍त होता ë 1

९--नवम भाव में २ ग्रह योग फल

सुर्य चन्द्र- नेत्र रोग, घनी, सूर्य मंगल--दुःखी, राज प्रिय । सूर्य बुध--सदा

शत्रु वृद्धि । सूयं गुरु--पिता प्रिय, धनवान्‌ । सूयं शुक्र--रोगी, सूर्यं शनि--रोगी, पित

को कुक्षि रोग ।

चन्द्र मंगल-- दानी) माता विरोधो, चन्द्र बुघ--वक्ता, शास्त्रज्ञ, चन्द्र गुर

गंभीर बुद्धि, धनी, चन्द्र शुक्र--कुलटा पति, चन्द्र शनि--निगु'णी, धमं हीन ।

मंगल बुघ- शास्त्री, मोगी, मंगल गुरु--घनी पूज्य, मंगल शुक्र-द्विभार्या वादी,

"बिदेश वासी, मंगल रानि--धमं हीन ।

बुध गुरु--चतुर विद्वान्‌ घनी, बुघ शुक्र--रीति प्रिय, गायक, पंडित, बुध शनि--

रोगी, घनी, प्रिय वक्ता ।

गुरु सुक्र- दीर्घायु, धनी, गुरु शनि--रत्न का व्यापारी, शुक्र शनि--राज￾सम्मान सुखी ।

१०--नवम भाव मे ग्रह उच्च में या अपने qq में हो तो निम्न फल होता है:

सूयं-राज चिल्लो के क्रय-विक्रय से, कृषि, नौकरी, दुजंन कमं, लिखने पढ़ने का काम, डाक्टरी, वैद्यक, रुपया बांटने का काम, घूम-घूम कर क्रय विक्रय से, विवाद

सम्बन्ध से, प्रेत कायं, भ्रातृ कलह सम्बन्धी आदि कायं से लाभ हो ।

चन्द्र शंख के क्रय-विक्रय, अन्य स्त्रो-संसगं से, राजा की मित्रता से, कृषि, वस्त्र, विप्र विरोध आदि कायं से छाम हो ।

मंगल- स्वर्ण सम्बन्धी, विजय सम्बन्धी, मित्र, बन्धु विवाद, शत्रु कमं, बल कार्य से लाभ ।

मूल त्रिकोण में हो तो--कृषि या राजा से लाभ, एक गृही में हो तो--स्वणं वस्त्र से लाम, मित्रगृही में हो तो-अन्न लाभ, शभु गुही में हो तो--अग्नि द्वारा, गुल्म

फलित में ग्रहों के फल का विचार : ३५९

संग्रहणी कुष्ठ आदि रोग से घन नाश, क्र्र वृत्ति करता ë ।

शानि--मंगल के अनुसार ।

बुघ उच्च का--अध्यापक के कार्य से लाभ ।

बुध शत्रुगृही--मुकदमा द्वारा, किसी से लाम ।

बुघ मित्रगृही--लेखक कायं, शिल्प कायं, वस्त्र, स्वर्ण, घनी स्त्री से लाम ।

बुघ अति शत्रू, राशि--विद्या हीन, व्यापार हानि, कुष्ट तया पथरी रोग ।

स्वषोड़शांश में--बन्धु विवाद से, नौकरी से कुशलता तथा घन धान्य आदिका

लाभ ।

गुरु उच्च का या स्ववगं में--प्रतापी, गुणी, घनी, किसी संस्था का प्रधान ।

गुरु उच्च का शत्रुराशि में--द्रव्य नाश, पराजय ।

गुरु मित्रगृही राशि में--अध्यापक ।

गुरु भतिमित्रगृही--पुत्र स्त्री मित्रादि एवं विवाह सम्वन्धी कार्य से छाम ।

शुक्र उच्च का स्ववर्ग का--राज कार्य, सेनाध्यक्ष, मंत्री, शिक्षा सम्बन्धी कार्य, यज्ञ

कार्य से लाभ ।

स्वगृही हो -नोकरो से, सेनाधिकारी, कृषि और विद्या से, जलाशय से लाम ।

१०-दशम भाव का फल

१--यह कमं स्थान है अच्छा बुरा कर्म, घंघा, नौकरी, अधिकार, सन्मान, मान्यता,

हाथ का किया कमं, कीर्ति, पितृ सुख, यज्ञ आदि का इससे विचार होता है।

२--चतुर्थ और दशम भाव भी सुख संज्ञक ë!

३--सत्कर्मी प्रसिद्ध दीघंजीवी आदि-दशम में शुभ ग्रह हों और दशमेश पूर्ण बली

होकर केन्द्र या कोण में हो और अपने स्वस्थान या उच्च में हो या लग्नेश दशम में हो

तो उसका सब मान करे, अति प्रसिद्ध हो सदा सत्कर्म करने की ओर झुकाव रहे, राजा

सदृश भाग्य हो और दीर्घजीवी हो ।

४--शुभ कर्मी क्रूर कर्मी-दक्षम में qa ग्रह हो तो वह भलाई युक्त कुछ शुभ कार्य

करेगा । यदि शनि राहु या केतु हो तो वह पाप युक्त और क्रूर कर्म करेगा ।

५--दरिद्र-दशम में कोई qg न हो तो दरिद्र दोष होता है ।

६- प्रतापी बैयंवान्‌-यदि दशमेश सुस्थित हो तो वह अपने प्रताप और बाहुबल से

धमं युक्त कायं पूरा करने में समर्थ होगा 1

७--लोक प्रिय महत्वशील-दशम में सूर्य या मंगल हो तो वह बडा ओर महत्त्व का

पुरुष होता है जो संबको प्रिय हो ।

८--इस प्रकार दशमस्य राशि ग्रह व दशमेश और ग्रहों की दृष्टि स्वभाव बल

आदि पर विचार कर दशम भाव सम्बन्धी समस्त बातों को उनके कारक पर से

बिचारना ।

३६० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

११--लाभ स्थान का फल

१--इससे अनेक प्रकार के लाभ, द्रव्य लाभ, आशा, इच्छा, हाथी घोड़े आदि वाहन का ऐदवयं, मित्र व मित्र सुख का विचार होता है। विशेष कर इससे लाथ और घन संग्रह का विचार होता है 1

२--अत्यन्त छाभ-ऊ़म्नेश्ञ यदि स्वोच्च, स्वक्षेत्री, मित्र गृही, मूल जरिकोणगत, राज्य कारक, भाग्य कारक ग्रहों से दृष्ट हो तो अत्यन्त लाम हो । वैना q वृद्धि-बलवान्‌ लग्नेश शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो आताओं की वृद्धि होती है । नोच, अस्तगत, दुःस्थान स्थित होकर क्रूर ग्रहों से संयुक्त हो तो भ्रातू फा अभाव जानना। इससे भाव फल को हानि होती ë! ४--३-६-११ भाव में पाप ग्रह ( सूर्य मंगल शनि राहु केतु या पाप युक्त वुध और क्षोण चंद्र ) हो तो अच्छे होते हैं और अच्छा फल देते हँ । इससे ११ भाव का अच्छा फळ कहा है । यदि लग्नेश पाप युक्त या बुरे वर्ग में हो तो उसको मलाई करने की शक्ति कम हो जातो है परन्तु पाप ग्रह और शुभ ग्रह भी लाभ भाव में बलवान्‌ होते हैं । ५--उचित या अनुचित रोति से घनोपार्जन-छाभ भाव में पाप ग्रह हो तो अनुचित रीति से यदि शुम ग्रह हो तो उचित और ईमानदारी से घन उपाज॑न करेगा । ६--शुभ फल-लग्नेश शुभग्रह हो वढी ग्रह हो या लाभ में शुभ ग्रह या बलो ग्रह हो तो भावोक्त फल शुभ होते ë!

नीच राशि, शत्रु राशि, नीच नवांश, शत्रु नवांश में स्थित ग्रह अच्छा फल नहीं देता । अपने अपने षडवर्ग बल से युक्त ग्रह लाम में हों या शुभ ग्रहों के षड़वग में हों या शुभ ग्रह से युक्त दुष्ट हों तो अति लाम होता है 1 ७--राजा हो-एक भी ग्रह षडवगं युद्ध होकर समस्त ग्रहों से दृष्ट हो तो राजा हो।

८-किस प्रकार लाम होगा-छाम भाव में जैसे वर्ण वाला ग्रह हो उस वर्ण के समान वस्तु का उस वर्ण के समान मित्रो आदि द्वारा लाभ, घन तथा सुख होगा । ९--संतान का विचार-पंचम भाव के अनुसार ळाम भाव से भी निश्‍चय पूर्वक कन्या सन्तान, मृत सन्तान, निःसन्तान या पुत्र नाश इन सब बातों का विचार होता है । अर्थात्‌ पंचम भाव में जो फळ का विचार होता है इससे मी वही विचारना । १०--चाहन युक्त राज्य लाम-लाम भाव में बैठे सब ग्रह राज्य लाम का भी फल देते हैं । यदि लाभ में शुभ ग्रह हो तो उसके यहाँ हाथो घोड़ों आदि को कतार लगी रहे सदा अच्छे काम करने को इच्छा रहे । ११-छाम भाव में ये ग्रह हों या इनको दृष्टि हो या इनका षडवगे हो तो फल-- सूर्य--राजा से या चोरों के कुल से या मुकदमा में किसो को डिगरो आदि फराने से या चोपाये पशुओं द्वारा बहुत प्रकार घन प्राप्ति gt

फलित मैं ग्रहो के फल का विचार : ३६१

चन्द्र--जलाशय, स्त्री, हाथ, घोडे की वृद्धि युक्त हो पूर्ण चंद्र में यह फल हो।

क्षीण चंद्र हो तो विपरीत फल हो, घन आदि का इनके द्वारा नाश हो, पूर्ण चन्द्र में इनके

दवारा घन लाभ हो ।

मंगल--उत्तमोत्तम आभूषण, मणि सुवणं प्राप्ति, विचित्र यात्रा करने वाला, बडा

साहसी, नाना कलाओं से युक्त, कोमल बुद्धि या अग्नि शस्त्र आदि सम्बन्ध से घन लाम

हो परन्तु कुछ कष्ट से लाभ हो ।

बुघ--अनेक कविता करने से, बहुत कलाओं के जानने से, कारोगरो के कामों से,

लिखने के काम से, उत्तम साहस से, अनेक उद्यमो से, वणिकजनों की मित्रता द्वारा और

कवि मनुष्यों से घन प्राप्त हो या घोड़ों के व्यापार से घन लाभ हो ।

गुरु--यज्ञ क्रिया करने वाळा, साघुजनों का संग करने वाला, राजा का कृपापात्र

होने से उसके आश्रय में रहने वाला, सुवर्ण प्रधान घन से युक्त ।

शुक्र--वेश्या जनों के द्वारा या परदेश आने-जाने से सोना, चाँदी, मोती आदि

की खुब प्राप्ति होती है 1

शनि--नीले रंग की वस्तु, लौह भैंस, हाथी आदि द्वारा लाम हो ओर ग्राम नगर

के मनुष्यों के बोच पुणं बड़प्पन पाता है । शुम ग्रह से-सब प्रकार का लाम होता हे ।

१२--नवम भाव के ग्रह के अनुसार भी छाम का विचार होता है यह विचार

नवम आव में दे चुके हूँ ।

१२-—द्वादश व्यय भाव का फल

१--इससे सब प्रकार का खर्च, कैद, गुप्त शत्रु, गुप्त विद्या, अध्यात्म विद्या ओर

सोक्ष आदि का फल जाना जाता ë ।

२--किसमें खर्च-च्ययेश आर व्ययस्थ ग्रहों में जो बली हो और भाव कारक हो

इन सबका विचार करने से प्रगट होगा कि किस भाव में या किस ब्यापार में घन व्यय

होगा ।

व्यय भावेश के साथ जिस प्रकार शुभ या अशुभ ग्रह हो या वह जैसे स्थान का स्वामी

हो उसके अनुसार शुभ या अशुभ मागे से व्यय होगा । इसमें स्वगृही उच्च मित्रक्षेत्री

आदि ग्रह का फल पुष्ट होगा नोच, अस्त शत्रु गृ हो आदि ग्रह हो तो तुच्छ फल होगा ।

३--दुष्ट कार्य में खर्चे-व्ययेशा नीचगृहो, क्रर या शत्र ग्रहों से युक्त हो या स्वयं

क्र ग्रह हो तो जातक दुष्ट स्थान में दुष्ट कार्य में व्यय करता है । वह तिदित दरिद्र

ओर दुःखी भी होता है ।

मिउव्ययी सुखो- व्ययेश शुभ ग्रह हो, शुम स्थान गत हो, व्यय में शुभ ग्रह हो

ओर नवम दशम स्थान से भी सम्बन्ध हो तो जातक मितव्यय करता है और सुखी

रहता है । 4

कृषकघर्मी नेत्र रोगी-व्यय में शुभग्रह हो तो त्यागी, कृषक और धर्मात्मा हो । व्यय

में पापग्रह हो तो विवादो, बात व्याधि के कारण नेत्र रोगों चपल ओर घूमने वाला हो।

३६२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

पुरुष या स्त्री सम्बन्धी खचं--व्यय में पुरुष ग्रह हो तो पुरुष सम्बन्धी कार्य में, यदि

स्त्री ग्रह हो तो स्त्री सम्वन्धी कार्य में खच होगा ।

शुभ या अशुभ कार्य में ख्च--व्यय में शुभग्रह हो, व्ययेश शुभ युक्त या शुभ दृष्ट

हो तो शुभ काम में खर्च, यदि पापयुक्त पापदृष्ट हो तो अशुभ काम में खर्च होगा ।

किस सम्बन्ध में खचं--व्ययेश जिस भाव में हो तथा जिस-जिस भाव पर दृष्टि

डालता हो उसी भाव सम्बन्धी खचं होगा ।

कंजुस--व्ययेश लाभ में हो तो कृपण हो ।

मुक्ति या अन्धकार--व्यय में शुभग्रह हो या शुभ की दृष्टि हो तो मुक्ति प्राप्त फरे

या पापयुक्त या पापदृष्टि हो मृत्यु के बाद अन्धकार में प्रवेश करे ।

मृत्यु सम्बन्धी खर्च--अष्टमेश व्ययेश के योग से मृत्यु सम्बन्धी खच होगा ।

तीथं में खचं--नवम में शुभग्रह हो व्ययेश की दृष्टि और लग्नेश की दृष्टि या युति

हो तो तीथंयात्रा विषयक खचं होगा ।

घन संग्रह--व्यय में पूर्ण बली चन्द्र बुध गुरु और शुक्र में से कोई हो तो घन संचय

की व्यवस्था करते हैँ ।

घननाश--व्यय में शनि हो मंगल से युत या दृष्ट हो तो घन नष्ट हो ।

राजा का धन हो--व्यय में सूयं या क्षीण ga दोनों हों, या मंगल से दृष्ट हो

तो उसका घन राजा छुड़ा लेवे ।

शत्रु या रोग में खचं--पष्ठेश और व्ययेश का पुत्र माता पिता भाई आदि के

कारक ग्रहों या भावों से सम्बन्ध हो ठो शत्रु या रोग द्वारा खचे हो ।

पुत्र कार्य विद्या आदि में खचं--पंचमेंश, व्ययेश, लग्नेश और गुरु का शुभ सम्बन्ध

होने से पुत्र कायं या विद्या कार्य, परोपकार या घामिक कार्यों में खर्च हो ।

नेत्र कष्ट--व्यय में सूर्य शुक्र लग्नेश इनमें २ या ३ ग्रह हों तो नेत्र में रोग हो ।

बीमारी में खर्चं- अष्टमेश ब्यय में हो तो बीमारी अच्छी करने में खर्च हो ।

वाणी से अपकीति--व्यय में बुध हो तो अपनी वाणी के कारण अपकीति हो ।

बड़प्पन या सरकारी काम में खर्चे--दशमेश व्यय में हो तो सरकारी काम में या

अपने बड़प्पन में पैसा खच करे ।

असावधानी से अड़चन--अ्यय में मंगल हो तो बहुत सावधानी से कोई काम या व्यापार करना चाहिए नहीं तो असावधानो होने से अड्चन में फंस जाना पड़ेगा 1

वाहन में खर्च--जिस प्रकार चौथे भाव से वाहन का विचार होता है वे योग व्यय भाव से भी विचारना । वाहन योग होने से वाहन में खर्च होगा ।

दुष्ट स्वभाव- व्यय में सूर्यादि पापप्रह हों तो उसका दुष्ट स्वभाव हो, दुःखभोण अधिक खर्च करे । नेत्र विकार हो ।

फलित में ग्रहों के फल का विचार : ३६३

चंद्र कुंडली का फल विचार

चन्द्र के स्थान से पृथक्‌-थपुक्‌ स्थानों में ग्रह फल विचार । १--सूर्यं का फल

(चन्द्रमा से स्थान का विचार कर) ।

१-टसूर्य चन्द्र एक साथ-परदेश में रहने वाला, भोगी, कलह में मन।

२-द्वितीय में सूरय -अनेक भृत्य रखे, बड़ा यशस्वी, राजमान्य । ३--तृतीय स्थान में सूयं-सुवणं का चाहने वाला, पवित्र राजा के तुल्य, अधिक जनों का स्वामी ।

४-चतुर्थ में सूर्य॑-मातृहंता ओर उसकी भक्ति न करने वाला ।

w—q में सूर्य-कन्याओं के निमित्त दुःख पाने वाला, बहुत पुत्र ।

६--षष्ठ में सूर्य-शात्रुओं को जीतने वाला, शूरवीर, क्षत्रिय के कमं में निरत।

७--सप्तम में सूय॑-सुन्दर भार्या, सुशील आचरण, राजा से सत्कार, तपस्वी ।

८--अष्टम में सूयं-सदा बलेशकारी, अति रोगों से पीडित ।

९--नवम में सूयं-धमं करने वाला, सत्यभाषो, भाई बन्धुओं से द्वेष करने वाला ४

१०-दशम में सूर्य-द्वार पर बड़े घनवान्‌ खड़े रहें ।

११-लाभ में सूर्य-राज गवं वाला, बहुज्ञ, सर्वत्र प्रसिद्ध, कुल का स्वामी ।

१२-च्यय में सूयं-काना हो । लग्न से १२ वें सूयं हो तो अंघा हो ।

(२) मंगल का फल

१ प्रथम स्थान में-लाळ नेत्र, रुधिर श्राव, विकार से युक्त, रक्त वर्ण 1

२--द्वितीय स्थान में भूमि स्वामी, पुत्र खेती करे ।

३--तृतीय स्थान में-चार भाई हों, बड़ा सुशील, सदा सुखी ।

४--चतुर्थ स्थान में-सुख से रहित, महा दरिद्री, उसकी स्त्री मर जाती ë 1

५--पंचम स्थान में-पुत्रहीन । स्त्री के भो ये ही योग हों तो संतान का अभाव रहे t

६--षष्ठ स्थान में-अधर्म में फंस कर मनुष्यों से शत्रुता, सदा रोगों से पीडित ।

७--सप्तम स्थान में-दुष्ट स्वभाव की स्त्री, दुर्वाक्य कहने वाली ।

८--अष्टम स्थान में-जीवों को मारने वाला, महापापी, जील और सत्य से रहित ॥

९--नवम स्थान में-घनी, वृद्धावस्था में पुत्र हो ।

१०-दशम स्थान में-द्वार पर हाथी घोड़े की भोड़ लगी रहे 1

११-लाभ स्थान में-राज द्वार में प्रसिद्ध, यश रूप से सम्पन्न 1

१२-व्यय स्थान में-माता को दुःखदायक , सदा कष्ट देने वाला ।

(३) चंद्र स्थान से बुध का फल

१--प्रथम में बुघ-सुख और रूप से हीन, दुष्टमाषी, मतिञ्चष्ट, स्थान भ्रष्ट ।

२--द्वितीय में बुघ-धनघान्य युक्त, बन्धु तथा घन की प्राप्ति, शीत के रोग से

मरण ।

३६४ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतोय फलित खण्ड

३-- तृतोय में बुघ--अथं सम्पत्ति का कर्ता, राज्य तथा सत्संग का लाभ ।

४--चतुथ्थ॑ में बुघ-सुखी, मातृ पक्ष से महालाभ, सुखी जोवन ।

w— में बुघ--बुद्धिमान्‌, चतुर, रूपवान, कामी, कुवादय वाची ।

६--षष्ठ में बुघ-कुपण, कायर, विवाद से डरने वाला, शरीर के रोंगटे खडे ।

७--सप्ठम में बुघ-स्त्रियों के वश रहें, बड़ा कृपण, घनाढ्य, दोर्घायु ।

८--अष्टम में बुध-शोत प्रकृति, राजाओं में प्रसिद्ध, शत्रु को भयदायक ।

९--नवम में बुघ-घर्म का विरोधी, अन्य. घमं में निरत, पुरुषों का विरोधी,

अहादारुण ।

१०--दशम में बुघ-राज योग वाला, अपने कुटुम् का स्वामी ।

११--छाभ में बुध-क्षण-क्षण में लाभ, ग्यारहवें वर्ष में विवाह ।

१२--व्यय में बुघ-कृपण, पुत्र को कमी, जीत नहीं होती, सदा पराजय ।

(४) चन्द्र स्थान से गुरु का फल

१--प्रथम में गुरु जीने योग्य, व्याधि रहित, बड़ा शूर, सदा घन सम्पन्न 1

२-द्वितीय में गुरु-राजा से मान प्राप्त, उग्र प्रतापी, धर्मात्मा, पाप रहित, बायु

१०० वषं ।

३--तुतीय में गुरु-स्त्रियों का प्रिय, उसके पिता के घर में १७ वर्ष में घन वृद्धि ।

४--चतुर्थ में गुरु_पुख रहित, मातृपक्ष से महाकष्ट, अन्य का भृत्य ।

५-पंचम में गुरु-दिव्य दृष्टि, तेजस्वी, पुत्रवती स्त्री, घनवान्‌, स्वयं महाउग्न ।

६-षष्ठ में गुरु-उदासीन, घर से हीन, देशान्तर में भ्रमण, अधिक खच, भिक्षुक,

व्यवस्था हीन । )

७--सप्तम में गुरु--दीघेजोवी, कम खर्च, पुष्ट देह, नपुंसक, पांडु रोगी, अनेक

चर का स्वामी ।

८-अष्टम में गुरु-रोगी, अच्छा पिता, महाक्लेश, स्वप्न में भी सुख नहीं ।

६--नवम में गुरु-घर्मात्मा, घन से पूर्ण, सुमागंगामी, गुरु और देव का भक्‍त । १०-दशम में गुरु-पुत्र हीन, तपस्वी, स्त्रो का त्याग करने वाला ।

११-लाभ में गुरु-पूत्र राजा के समान, घोड़ों पर बैठने वाला ।

१२- व्यय में गुरु-कुटुम्ब का विरोधी ।

९५) चन्द्रमा से शुक्र का फल

१-प्रथम स्थान में शुक्र-जल में डूबकर मृत्यु, सन्निपात रोग, हिंसा से मृत्यु । २-द्वितीय स्थान में शुक्र महा धनवान्‌, ज्ञानो, राजा के तुल्य । ३- तृतीय स्थात में शुक्रे-बड़ा धर्मात्मा, बुद्धिमान्‌, म्लेच्छ द्वारा घन लाम । ४ चतुय स्थान में शुक्र-कफ अधिक, अति दुबंल अग, वृद्धापन में घनहीन । ५--पंचम स्थान में शुक्र-कन्या संतान हो, घनाढय , यशहीन ।

६-षष्ठ स्थान में शुक्र--खोटे खर्च से मय करने वाळा, संग्राम में हारने वाला ।

फलित में ग्रहों के फल का विचार : ३६५.

७---प्प्तम स्थान में शुक्र-होन पुरुषाथं, क्षण-क्षण में शंका युक्त । ८--अष्टम स्थान में शुक्र-पचित्र, प्रसिद्ध, महायोघा, दाता, भोक्ता, महाधनवान्‌ । %*— स्थान में शुक्र-बहुत भाई, मित्र युक्त, बहुत बहिन । १०--दशम स्थान. में शुक्र-माता-पिता को सुखदाई, दोर्घायु । ११-छाग स्थान में शुक्र-दोर्घायु, शत्रु व रोग से रहित । १३--व्यय स्थान में शुक्र-पर स्त्री गामो, लम्पट, ज्ञान से हीन । (६) चन्द्रमा से शनि का फल १--अ्रंम स्थान में शनि-प्राणांत दुःख, घन का नाश, वन्धु नाश । २--दितीय स्यान में शनि-माता को कष्ट देने वाला, बकरी का दूध पीकर जीता है ।

३--तृतीय स्थान में शनि-बहुत सन्तति होकर मर जातो है । ४-यतुर्थ स्थान में शनि-बड़ा पुरुषार्थी, शत्रुओं को मारने वाला । ५--पंचस स्थान में शनि-श्याम रंग की और प्रिय वचन वालो स्त्री गिलती है । s ६--षष्ठ स्थान में शनि-महा क्लेश कष्ट प्राप्त, अल्पायु । , ७--सप्तम स्थान में शनि-धर्मात्मा, दानी, बहुत स्त्रियों का पाणिग्रहण करनेवाला t <—ss= स्थान में शनि-पिता को कष्ट देवे, बहुत दान करने से शुभ होता š ९--जवम स्थान में शनि-जव शनि की दशा आती हे तब घन का नाश होता है । १०-दशम स्थान में शनि-राजा के तुल्य, अति कृपण, घन से परिपुणं ।

११-लाम स्थान में शनि-देह में दुःख पाने वाला, महा कष्ट भोगे, अघर्मी ।

१२-व्यय स्थान में दानि-घन होन, भिक्षुक, घमं से रहित । (७) चन्द्र से राहु का फल

१-चन्द से प्रथम, नवम, दशम स्थान में राहु-वृद्धावस्था में राजा के समान घनी हो ।

२--चन्द्र से द्वितीय, एकादश में-घन ओर मनुष्यों से युक्त होने पर मी कभी सुख

न होवे ।

३--चन्द्र से चतुर्थ, सप्तम में-माता पिता को अति कष्ट हों, स्वयं दुःखदाई होता है ।

४--चन्द्र से पंचम में-क्षण क्षण में आपत्ति, जल मे मृत्यु भय।

५--चन्द्र से छठे, बारहवे-राजा या राजा का मंत्री हो, घन घान्य से परिपूर्ण हो ।

चन्द्र राशि के तुल्य लर्न राशि फल--जो चंद्र राशि के फल कहे हैं वह saq से भी

कहना । दृष्टि फल भी लग्न के बराबर चन्द्र के भी कहना ।

बुध का विशेष विचार--बुघ शुभ ग्रह के साथ हो तो शुभ ग्रह जैसा फल देता है

ओर पाप ग्रह के साथ हो तो पाप ग्रह जैसा फल देता है शुभ और पाप दोनों के साथ

हो तो मिश्रित फल देता है ।

३६६ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड

चन्द्र का विशेष फल--पाप युक्त चन्द्र-माता का नाश करता ë । पाप युक्त सूर्य￾पिता का नाश करता ë मिश्रित से मिश्चित फळ होगा ।

चन्द्रमा जन्म में शुभ युक्त हो तो--भूमि, यश, घन, कुल में श्रेष्ठ, श्रेष्ठ कोति,

प्राप्त हो ।

चन्द्र से केन्द्र में -गुरु, बुध, शुक्र में से कोई हो-स्वतंत्र जीवन व्यतीत करे।

चन्द्र से २-१२ घर मे--गुरु, वुध, शुक्र, में से कोई हो--स्वतन्त्र घन्धा करे ।

चन्द्र से ३-११ घर में--गुरु शुक्र हो तो स्वतंत्र धन्धा करे या उच्च ओहदे पर रहे।

चन्द्र से दशम स्थान में भिन्न भिन्न ग्रहों का फल

१-सूर्यं हो-सिद्ध कर्म, घनो, सात्विक गुण, राजा के तुल्य, दुष्टजनों का आश्रय ।

२--मंगल हो-म्लेच्छदेश में वास, विषम स्वभाव, लोभी, क्रूर साहसी, चंडाळ सम

आचरण ।

३--बुघ हो-बहुत पुत्र, घ्म कार्य में रत, विद्वान्‌, कला जाननेवाला, धनी, पडित,

विख्यात ।

४--गुरु हो-शुम आचरण, विशुद्ध घन वाला, समृद्ध , धर्मात्मा, राजा व मंत्री हो!

५--शुक्र हो-सिद्ध कार्यकर्ता, घनवान्‌, सुन्दर, ऐश्वर्य सम्पन्न, राज पूजित । ,

६--शनि हो-व्यानि युक्त, दु-खी, निर्धन, बुद्धि होत, कार्यों में नित्य उद्विग्न ।

चन्द्र के अंग का फल

चन्द्र स्वनवांश, मित्र या अधिमित्र नवांश में हो, दिन का जन्म हो और गुरु की

दृष्टि हो, रात का जन्म हो और शुक्र की दृष्टि हो तो सुखी और घनवान्‌ होता दै इसके

विपरीत हो तो निर्धन या अल्प घन हो ।

सूर्य के स्थान से चन्द्र का फल

सूर्य से चन्द्र- केन्द्र में हो तो-मूखं दरिद्री हो!

पणफर २-५-८-११ में-मध्यम फल ।

आपोक्लिम ३, ६, ९, १२ में-उत्तम फल ।

सूर्य से दशम में भिन्न-भिन्न ग्रहों का फल

दशम में चन्द्र हो-हिपक, मंगल हो-क्षुद्र, बुध होऱ कुकर्म कर्ता । गुरु हो-काम,

रोगी, शुक्र हो-बहुत से शोक वाला, शनि हा-रक्ष। कमं करने वाला 1

ग्रहांश कोष्ठक--(ग्रहांश के विचार से फल का समय) ।

जन्म लग्न या जन्म राशि के अंशों पर से ग्रहों के रायन्तर होने पर वे कितने

समय के बाद फल देंगे यह जानने का चक्र ।

ग्रह को एक राशि ३०० भोगने में इतना समय लगता ë तो १० भोगने में कितना

समय लगेगा । यही गणित ते निकाल कर चक्र में दिया हैं ।

अंश रवि बुध शुक्र मंगल

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नर

दिन दिन

१ श॥

२ ३

३ Yl

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५ ७॥

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७ १०॥

८ १२

९ १३॥

१० १५

११ १६॥

१२ १८

१३ १९॥

१४ २१

१५ २२॥

१६ २४

१७ २५॥

१८ २७

१९ २८॥

२० ३०

२१ ३१॥

२२ ३३

२३ ३४॥

२४ ३६

२५ ३७॥

२६ ३९

२७ Yoll

२८ ४२

२९ ४३॥

३० ४५

गुरु

वर्ष मा. दिन ०-०-१३

०-०-२६

०-१-९

०-१-२२ ०-२-५

०-२-१८

०-३-१

०-३-१४

०-३-२७

०--४-१०

०-४-२३ ०-५-६

१-५-१९

०-६-२

०-६-१५

०-६-२८ ०-७-११

०-७-२४

०-८-७

७००८-२०

०-९-३ ०-९-१६

०-९-२९

०-१०-१२ ०-१०-२५

०-११-८

०-११-२१

१-०-४

१-०-१७

9— =°

फलित में ग्रहों के फल का विचार : ३६७

शनि

व, मा. दिन

o—?—o

०--२-०

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०-१०-०

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१-०-०

१-१-०

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१-५-० १-६-०

१-७-०

१-८-०

१-९-०

१-१०-०

१-११-०

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२-१-०

२-२-०

२-३-०

२-४-०

१-५-०

२-६-०

राहु केतु

च. मा. दिन

०-०-१८ ०-१-६

०-१-२४ ०-२-१२

०-३-०

०-३-१८

०-४-६

७-४-२४

०-१२

e—<—o

०-६-१८

०-७-६

०-७-२४

०-८-१२

०००९--०

०-९-१८

०-१०-६

०-१०-२४

०-११-१२

१-०-०

१-०-१८

१-१-६

१-१-२४

१०२-१२

१-३--०

१-३-१८

१-४-६

१-४-२४

१-५-१२

१-६-०

३६८ : ज्योतिष-शिक्षा, qata खण्ड फलित

अध्याय १७

भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल

(१) लग्नेश का फल भिन्न-भिन्न भावों में

१--लग्न मे-दोर्घायु, अतिबली, बहुत भूमि का स्वामी, भूमि लाभ ( मान० ) *

रोगहीन, दोर्घायु, बलवान्‌, दृढ़ शरीर, रूपवान्‌, प्रतिष्ठित ( जा० सं० ) ।

हृष्ट पुष्ट शरीर, पर क्रमी, मनस्वी, अति चंचळ, २ पत्नी या अन्य रखेल स्त्री

(<° पा० )!

२--दितीय में-बड़ा घनवान्‌, दीर्घायु, बडा वली, राजा या भूमि लाभकर्ता, श्रेष्ठ,

घमं रक्षा में मन ( मान० ) ।

घनी, बडी आयु, सामथ्यं, सत्कर्म परायण, स्थूळ, स्थान प्रधान ( जा० सं० ) ।

घनी, सुखी, सुशील, विद्वान्‌, बहुत स्त्री वाला ( वृ० पा०)।

३- तृतीय मे-बन्धुजनों और उत्तम मित्रों से युक्त, घर्म नाश करने में तत्पर, दानी

बूरवोर, बलवान्‌ ( मान० ) । :

अच्छे बांघवों व श्रेष्ठ मित्रो से युक्त, धर्मात्मा, दानी, शूरवीर, वली (siro सं०) 1

सिह के समान पराक्रमी, सब सम्पत्ति से युक्त, सानी, दो स्त्रियों वाला, बुद्धिमान्‌

और सुखी ( qo पा० ) ।

४--चतुर्थ॑ में-राजा का प्रेमी, बड़ी भारी जीविका करने वाला, far Sen,

माता पिता का मक्त, अल्प भोजी ( मान० ) । 3

राजा का प्रिय, बड़ो आयु वाला, लाभ वाला, बहुत स्त्रियों Š युवत, माता पिता का

भक्त ( जा० सं० ) ।

माता पिता से सुख पाने वाळा, बहुत भाई वाला, कामी, गुण और रूप युषत

( बृ० पा० ) । ५---पंचम में-देव पितू पूजक, सुन्दर पुत्र, स्वतः दान शीळ, घनो, संग्राम में प्रसि

दीर्घायु, मान करने योग्य, अच्छे कमं । ( मान० ) 1

पुत्र बाला, दानी, समर्थ, विख्यात, दीर्घायु, अच्छा शीळ, सत्कमं ( जा० सं० )

पुत्र का सुख मध्यम, ज्येष्ठ संतान का नाश, मानी, क्रोधी, राजा का प्रिय ( 4°

जा०) ।

६--षष्ठ में-रोगहोन, भूमि लाम, बलवान्‌, कृपण, -घनाढय, शत्रुनाशक, सदा-

चारी, अच्छे कमं ( मान० ) ( जा० सं० ) ।

देह सुख से हीन, पापयुक्त । शुभग्रह से दुष्ट न हो तो शत्रु से दुःखी रहता हैं (बृ पा० ) । ७--सप्तम में छग्नेश-तेजस्वी, शोक करने वाला, स्त्री शीलवतो, प्रज्वलित तेज

वालो ओर रूपवती ( मा० ) ( जा० ) ।

भावेरा का भिन्न-भिन्त भावों में फल : ३६९

यदि यह पाप ग्रह हो तो उसकी स्त्री का नाश । शुमग्रद हो तो सण करने वाळा

दरिद्री, विरागी राजा होता है ( जा० पा० )!

<--अष्टम म लग्नश-कृपण, धन संग्रहकर्त्ता, दोर्घाय 1 लरनेदा पापग्रड हो ठो काना |

शुभ ग्रह हो तो सुन्दर रूप वाला हो ( मा०) 1

पाप ग्रह हो तो क्रूर स्वभाव, शुभ ग्रह हो तो सोम्य स्वनाव ( करार = |

सिद्ध विद्या जानने वाला, रोगी, चोर, क्रोबी, जुआड़ी, परस्तरीगाम | ३० == 0१

६--नवम में छग्नेश-बहुत भाई qeq , पुण्य कर्मा, सद का मित्र, सुझोल, प्छिद

विख्यात, बड़ा तेजस्वी ( मान० ) (जा० सं० ) 1

भाग्यवान्‌, लोगों का प्रिय, विष्णु का भक्त, चतुर वक्ता, स्त्रो पुत्र ओर घन Z= ( वृ० पा० )।

१०--दशम में-राजा से लाभ, बड़ा पण्डित, सुशील, गुरु माता पिता का पूजक,

राजाओं में प्रसिद्ध ( मान० ) 1

राजा का मित्र, पण्डित, सुशील, गुरुमाताओ का पूजक, राज समृद्ध पुरुष

(जा० सं० )। :

पिता से सुख पाने वाला, राज्यमान्य, विख्यात, अपने भुजवल से घनोपाजंब

(वृ० पा० )।

११--लाम में लग्नेश-सुख पूर्वक जीवन, पुत्र से युक्त, तेज युक्त, बलदान्‌, घोड़ा

हाथी आदि वाहनों से युक्त ( मान० ) 1

दीर्घजीवी, पुत्रवान्‌, विख्यात, तेज सम्पन्न हो तो ये फल, बल हीन हो तो-ये फरक

नहीं होते ( जा० सं० ) ।

लाभ करने वाला, सुशील, विख्यात यश, उदार, गुणों से युक्त ( qo पा० )।

१२--व्यय में लग्नेश-दुष्कमं कर्ता, महापापी, नीच, सहगोत्रजनों के साथ मान

करने वाला, विदेश वासी, कंगाल मनुष्यों को भात देने वाला ( मान० ) ।

चतुर वाणी, कर्ण रहित, गोत्रजनो के साथ मेल न रखने वाला, विदेशी भोर घन

भोक्ता ( जा० सं० )।

देह सुख से हीन, व्यथं खच, महाक्रोधी, यदि शुभ ग्रह का योग या दृष्टि न हो ।

शुभग्रह के योग या दृष्टि से अशुभ फल अल्प होता है ( वृ० पा० )।

लग्नेश का विशेष फल

१-लग्नेश से सौभाग्य का विचार करना ।

२-लम्नेश बली हो तो सोभाग्य सम्पन्न हो, शरोर बलिष्ठ हो । लग्नेश बलो'हो शुभग्रह से

युक्त या दृष्ट हो--स्वास्थ ठोक रहे, लग्नेश बली अर्थात्‌ अच्छे स्थान में, अच्छी स्थिति

में अच्छी दृष्टि युक्त या शुभ qaa भे हो तो महत्व का होता है ।

मनुष्य फे जीवन के सुख का विचार करते को लग्ेक्ष फा बल देखना चाहिए ।

३--ऊग्नेश बलहीन हो उसमें पाप प्रह हो-तो शरोर रोग से पीड़ित रहे ।

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३७० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

४--.लग्नेश या लग्न निबेळ या अस्त हो-तो उस भाव का सामान्य फल देगा ।

५--लग्नेश शुभ ग्रह हो या लग्न में हो या लग्न को देखे-तो बिना बेश दीर्घायु

हो ओर सुखी हो ।

६--लग्नेश केन्द्र या कोण में हो या लाम में हो-देह सुख कारक हो, रोग नाश हो

रोगी न हो । ७--लग्नेश कोण या केन्द्र में हो, शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, वलवान्‌ होकर

शुभ ग्रह की राश्षिमें हो--तो भूमंडळ में उसका यश फैले (जा० पारि०) ।

८--लग्नेश केन्द्र कोण में प्रकाशित किरणों से युक्त हो अर्थात्‌ अस्त q हो, उच्च या

स्वगृही केन्द्र छोड़ कर अष्टमेश और फहीं हो, छण्न में कोई शुम पह छो-तो दीर्घायु,

घनी, माननीय, सतगुणी, राजा से प्रशंसित, भाग्यवान्‌, सुन्दर अंग, दृढ़ शरीर, निर्भय

घामिक सत्कुटम्वी हो (फळ०) । :

९--लग्नेश उच्च, मित्र गृहो, स्वनवांश आदि में हो और शुभ ग्रह से युक्त या

दृष्ट न हो--तो सदा देह सौख्य हो (go चि०)।

१०--छूस्नेश शुभ ग्रह होकर या शुभ युवत होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो पाप दृष्ट

न हो तो सदा देह सौख्य हो (qo चि०) ।

११--लग्नेश अच्छे प्रकार सम्बन्धित हो-तो अच्छे ग्राम में या अच्छे साथियों छे

युक्त रहे जब सहयोगी ग्रह बळी हो--तो वली राजा के आय में <ë l

ग्रह यदि स्वस्थानी हो--तो अपने स्थान घें रहे, प्रह यदि चर राशि में हो-चल्ता

रहे, ग्रह यदि स्थिर राशि में हो--एफ स्थान में स्थिर रहे, ग्रह यदि दिस्वभाव मैं हो--

मिथ्चित फल हो (फल०) । [

१२--लग्नेश लग्न में बली हो--स्वशविश पर अवलंबित रहे अच्छी उन्नति फरे

शीघ्र प्रसिद्ध हो ।

यदि वह बलहीन हो--दु:खित, शक्तिहीन, रोगी, विपत्ति से खिन्न हो (फल०) ।

१३--चंद्रमा और शुक्र लग्नेश होकर चतुर्थ में-विरोष करके रोप्य, घन, अम्य

घर में सदा <ë (जा० सं०) ।

१४--लग्नेश बुध गुरु या शुक्र केन्द्र त्रिकोण में हो-दीर्घायु, धनी, बुद्धिमान्‌, राज￾प्रिय हो (go पा०) |

१५--लभ्नेश जन्म में प्रकाशित किरणों वाला हो-तो जातक प्रसिद्ध हो, यदि

झच्छे स्थान में होतो सुखो हो, दुःस्थान में, पापगृही या नोच में हो--तो पतित या नीच हो (फल) 1

१६--लग्नेश पापयुक्त होकर दुःस्थान में हो--शरीर में सुख नहीं मिले । क्लेश कारक हो । हि

१७--लग्नेश ४-६-८-१२ घर मे हो-तों भो उपरोक्त फछ।

5 हल दुष्ट स्थान के स्वामी से युक्त हो या दुष्ट स्थानेश लग्न में हो -तो

भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३७१

१९--छग्नेश जिस भाव में हो उसका स्वामी दुष्ट स्थान में हो--तो देह दुवंरू रहे और रोगी <ë (go चि०) ।

ऐसे ही अन्य भावेश के सम्बन्ध से विचारना । अर्थात्‌ जिस भाव का स्वामी दुष्ट स्थान में हो उस भाव का फल नाश हो (स० चि०) ।

२०--लग्नेश पापग्रह हो या चन्द्रमा लग्न में हो या दोनों योग हो तो--अति रोगी हो

१-छग्नेश अस्त शत्रुगृही या नोच में हो--रोग कारक (qo पा०) ।

२२--लग्नेश पापयुक्त-शरीर सुख नष्ट ।

२३--लग्नेश अष्टमं हो तो भी उपरोक्त फल होगा परन्तु शुभग्रह की दृष्टि हो तो

चैसा नहीं होता कुछ शुभ भी होता है (स० चि०) ।

२४--लग्नेश पापयुक्त हो और लग्न में राहु हो-ठग चोरों का भय हो 1

२५---लग्नेश शनि युक्त व दृष्ट हो-तो निश्चय ठग चोर या राजा से भय ।

२६--अष्टम में लग्नेश राहु या केतु युक्त-उपरोक्त फल ।

२७--छग्नेश जिस राशि के जिस अंश में हो उसका स्वामी यदि राहु मंगळ केखु .

शनि से युक्त हो-तो उपरोक्त फल ।

२८--लग्नेश मंगल लग्न में पापयुक्त या दृष्ट-पत्यर फी चोट से या खञ्ज आदि से न्नुण (qo चिं०) ।

२९-<-लग्नेश निवंल ग्रहयुक्त या निर्बल ग्रह के घर में-देह दुर्वळ हो ।

३०--लग्नेश निर्बल होकर अष्टम में तथा लग्न में निर्बल: राशि हो-खरीर

दुबला कष्ट युक्त रहे (qo चि०)

३१--लग्नेश जिस “ग्रह के राणि अंश में हो वह निर्बल राशि हो या स्वयं

निबंल हो तो-शरीर सूखा <ë (स० चि०)।

३२-छग्नेश जल ग्रह हो और वली हो शुभ ग्रह युक्त हो तो-स्थूळ शरीर हो ।

३३--ळग्तेश जल राशि में हो शुभ ग्रह युक्त हो जल ग्रह की उस पर दृष्टि हो

सो-स्यूल शरीर हो ।

३४--लरनेश जिस राशि के अंशक में हो उसका स्वामी जल राशि में हो wm में

शुभ ग्रह की राशि हो तो-उपरोक्त फल (qo चि ०) ।

३५--लग्नेश बलवान्‌ हो, सूर्य देवलोकांश में हो, भाग्येश उच्च राशि में हो तो-

बहुत माध्यवान्‌, कोतिमान्‌ हो 1

३६--लग्नेश बलवान्‌ शुभ वर्ग में हो या स्वनवांश में शुभ ग्रह युक्त हो, केन्द्रेश

=s के साथ हो तो-उत्तम भाग्य कीति हो घन, अन्न की बढ़ती हो (go चि०) । _

३७--लग्नेश बलहीन होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो तो-बुरा स्वास्थ्य रहे

(go चि०) ।

३८--लगन में मांदि (गुलिक) हो और लग्नेश नीच में हो तो-५६ वर्ष में पुत्र

शोक हो (qe पा०) 1

RC. Ç

| | | | |

| हा > युक्‍त गुणवान्‌ हो । (स० चि०) 1

३७२ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतोय फित खण्ड

३९--ऊग्नेश पारिजात में सुखी, वर्गोत्तम में निरोग, गौरपुर में-घन-घान्य पूणं,

(सहासन में-राजा हो, लग्नेश पारावत में-विद्वान्‌, लग्नेश देवलोक में-श्रोमान्‌, लग्नेशः

ऐरावत में-विख्यात और राजमान्य (qo पा० )।

४०--लर्नेश से १२ वें उसके उच्च स्थान या मित्र राशि हो, मित्र या उच्च

ग्रह से दृष्ट हो या लग्नेश का मित्र ग्रह उसको राशि में हो तो-उसकी स्थित जन्म भूमि

में हो (जा० पारि०) ।

४१--लस्नेश से १२ वें स्थान का स्वामी लग्नेश का शत्रु हो ओर यदि वह नीच में

हो या निबंछ हो ओर उस पर शुक्र की दृष्टि हो तो-बिदेश में जाय ।

४२--ऋम्नेश से १२ वें स्थान का स्वामी सूर्य से अस्त हो तो उसो जगह रहे और

छोटे ग्राम में निवास करे । यदि बलवान्‌ हो तो शहर में निवास करे (जा० पारि०) ।

४३--रमणीय भूमि में वास-ऊग्नेश से व्ययेश यदि लग्न से केन्द्र या कोण में हो

अपने उच्च या मित्र ग्रह में हो उसके दोनों ओर शुभ ग्रह हो तो रमणीय भूमि रें

वास हो ।

उदाहरण-यहाँ लग्नेश चंद्र लाभ में

है । छाम का व्ययेश यहाँ दशमेश मंगल है

जो लग्न से त्रिकोण नवम में अपने मित्र

गुरु के घर में है इसके दोनों ओर शुभ

ग्रह गुर और शुक्र हैं (जा० पारि०) ।

४४--जन्म भूमि में वास, तीथं आदि दिव्य स्थान प्राप्त-यदि उसके दूसरे या छठे

स्थान पर गुरु चंद्र या शुक्र की दृष्टि हो तो जन्म भूमि में वास करे और दिव्य स्थान

तीर्थ आदि प्राप्त हो (जां० पारि०) 1

४५--स्वदेश में भाग्य-लग्नेश स्थिर राशि में हो, लग्न स्थिर हो स्थिर ग्रह युक्त

हो तो अपने ही देश में भाग्योदय हो ( स० चि० )! !

४६--मूखं--लग्नेश होन बळ, नीच अस्तगत आदि हो ।

४७--सत्कीति युवत-लग्नेश दशम में उच्च का हो । लग्न में qq शुभ ग्रह

युक्त हो।

४८- दीर्घायु, घनी आदि-छग्नेश शुभ ग्रह युक्त उच्च का केन्द्र त्रिकोण में शुभ

ग्रहों से दुष्ट हो या दशमेश से युक्त हो तो उत्तम ऐइवयं उत्तम कोति दोर्घायु घन युबत

हो (go चि०)।

४९--दीर्घायु घनी गुणी-रूग्नेश अति बलवान्‌ हो, पाप ग्रह को दृष्टि न हो, केन्द्र

में हो, शुम ग्रह की दृष्टि हो तो मृत्यु को हटा कर दोर्घायु करता हूँ। श्रेष्ठ लक्ष्मी

भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३७३

_ ९०--दौर्धायु सुखी निरोग-लग्नेश तथा गुर केन्द्र में हो । केन्द्र त्रिकोण ओर अष्टम म पाप ग्रह न हो-तो अनेक सुख भोग करे, पुण्यकर्मा हो निरोग रह कर १०० वर्ष की

आयु पावे (स० चि०) 1

2 ५१--अल्पायु आदि-लग्नेश से अष्टमेश अधिक बली हो, केन्द्र, अष्टम, छठे स्थान

सें पाप ग्रह हो तो अल्पायु या मध्यम आयु होवे, अनेक संकट भोगे ।

५२-३० वर्ष बाद सुंख-लग्नेश जिस नवांशक में है उसका स्वामी केन्द्र त्रिकोण या उच्च में हो वैसे ही लामेशसे भी युक्त हो तो ३० वषं के बाद सुख मिळे (go चि०)।

५३-२० वषं बाद सुख-छग्नेश या जिस अंशक में लग्नेश है उसका स्वामी दूसरे

भाव में हो या ऐसा ही लामेश भी हो तो २० वर्ष बाद सुख मिले (go चि०)।

५४-१६ वषं बाद सुख-लग्नेश शुभ ग्रह की राशि में हो उसे शुम प्रह देखे या

गोपुरां में हो तो १६ वषं के पश्चात्‌ सुखी हो (go feo) ।

५५--जीवन भर सुखो-लग्नेश वर्गोत्तमांश में या उच्चांशक में व मित्र द्रेष्काण

में शुभ ग्रह से युक्त या दुष्ट हो तो जीवन पयंन्त सुखी <ë (स० चि०) 1

५६--दुःख के बाद सुख- लग्नेश उत्तमांश में हो, लग्न में शुभ ग्रह हो, घन स्थान में

पाप ग्रह हो, केन्द्र में भो पाप ग्रह हो तो प्रथम दुःख पीछे सुख (ae चि०)।

५७-बाल्प्रावस्था में सुख-लग्नेश उत्तमांशमें हो लग्न में पाप ग्रह घन स्थान में

शुभ ग्रह तथा नवम स्थान में कोई शुभ ग्रह हो तो बाल्यावस्था में सुख मिले अन्यथा

नहीं मिले (qo चि०)।

५८--यशस्वी घनी-लग्नेश चर राशि में हो ओर शुम ग्रहों से दुष्ट हो तो-यशस्वी

चनी, भोगी ओर सुखी हो (qo पा०)।

५९--मुख में ब्रण-लग्नेश मंगल या वुध को राशि में किसी भाव में बुघ से युफ्त

q दुष्ट हो तो मुख में व्रण हो (qo पा०) 1

३०--लग्नेश और षष्ठेश-यदि चन्द्र के होरा द्रेष्काण नवांश व द्वादशांश में

हो-जळ में इबने का भय । यदि बुघ के होरा द्रेष्काण नवांश व द्वादशांश में हो-बात

व्याधि, कष्ट। यदि शनि के होरा द्रेष्काण नवांश व द्वादशांश में हो-सन्निपात

आदि व्याधि । यदि शुक्र के होरा द्रेष्काण नवांश व द्वादशांश में हो-वीर्य विकार

(त्रि० ज्यो०) ।

(२) भिन्न-भिन्न भावों में धनेश का फल

१--लग्न में घनेश-बड़ा कृपण, व्यवसाय करने वाला, सत्कर्मी, घनवान्‌, घनी

होने से प्रसिद्ध, अनेक भोगों का भोगने वाळा ( मान० ) (जा० सं० ) । पुत्रवान्‌,

छुटुम्वियो का विरोध, कामी, निठुर, परकार्यं कर्ता ( qo पा० ) 1

२--धन में घनेश-च्यवसाय करने वाळा, उत्तम लाम, उत्तम वस्तुओं का भोगी,

आसंगिक बातों को सत्य करने वाला, बड़ा नीच, सत्यवादी, प्रसिद्ध, बड़ा उद्वेगी (मान०) ।

घमं कर्म में तत्पर, घनी, लाभ से पूण, लोभी, दानी ( जा० सं० ) । शुभ युक्त या

]

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३७४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

दुष्ट हो.तो घन वृद्धि । अपनी राशि को छोड़ कर अन्य राशि में हो, चन्द्रमा क्षीण हो,

पाप से युक्त व दृष्ट हो तो घन हरण हो 1 (जातकसार) ।

घनी, गौरव युक्त, दो या. अधिक स्त्री कितु पुत्र हीन (qo पा०) 1

३--तृतीय में घनेश-माई बंदो से भेद भाव रहित, यह शुभ. ग्रह हो तो राजा से

चैमनस्य हो 1 घनेश मंगल हो तो अवश्य चोर हो ( मान० ) । व्यवसाय रखने वाला,

कलह कर्ता, बल होन, चोर तथा चंचल घन वाला, विनय तथा न्याय से हीन ( जा?

सं० ) । शुभ ग्रह से युक्त हो तो पराक्रमी, बुद्धिमान्‌, गुणी, कामी, लोभी । पापयुक्त हो

तो देवनिदक ( नास्तिक ) हो (qo पा०) ।

४--चतुर्थ में घनेश-पिता द्वारा पूर्ण लाभ, वक्ता, प्राणियों पर दया भाव,

दीर्घायु। घनेश क्रूर ग्रह हो तो मृत्यु देवे ( मान० ) 1 पिता से लाभ, उद्योग कर्ता,

दीर्घायु । पाप ग्रह हो तो मरण ( जा० सं० ) । सब सम्पत्ति से युवत । यदि गुरु से युदत

या अपने उच्च में हो तो राजा या राजा तुल्य हो (बु०्पा०)। .

५--पंचम में घनेश-पुत्र प्रफुल्लित, कठिन से कठिन काये करने में प्रसिद्ध, गति

छुपण, दुःख का भोगी ( मान० ) । सदा विलासी, नेत्रो से युक्त, कठिन कायं में वर्त￾मान, विख्यात, कृपण और दुःख नाशक ( जा० सं० )। धनी, पुत्र भी घनोपाजंन करने बाळा ( वु० पा० )

६--षष्ठ में घनेश-धन संग्रह करने में तत्पर, शत्रओं को मारने वाला । घचेल

हो तो भूमि फा छाम हो, पापग्रह हो तो घन हीन करे (सान०) 1 घन संग्रह

करने में निपुण, कृतघ्न, पृथ्वी का स्वामी (जा० सं०) । शुभग्रह से युक्त हो तो शत्रु से

घन लाम । पाप युक्त हो तो शत्रु के द्वारा हानि तथा कमजोर जांघ वाला (go पा०)॥

` ७--सप्तम में घनेश--बड़े गौरव. युक्त किसो कार्य को करे । श्रेष्ठ गुगवती, धन

संग्रह करने वाली, क्रीडा करने वाली स्त्री मिळे, क्रूर ग्रह हो तो स्त्री वंध्या हो (मान०) ॥

रेष्ठ स्त्री के साथ भोग विलास, धन संग्रह करने वाली स्त्री हो, पापग्रह हो तो स्त्री

बंघ्या हो (जा० सं०) । परस्त्री गामी, वंद्य । पाप योग या दृष्टि हो तो स्त्री व्यभि-

हो । (qo पा० . ८-अष्टम में धनेश-अष्टकपाली अर्थात्‌ मुर्दा की खोपड़ी लेकर भीख मांगने वाला,

धात्मघात करने वाळा, इच्छा प्राप्त वस्तुओं की भोगने वाला, विलासी, दूसरे के घन को चुराने वाला, हिसक, भविष्य को मुख्य मानने वाळा (मान०) । थोड़ा कलह

वाला, आत्मघाती, उत्पन्न हुए भोग भोगने वाला, विलासी, हिंसक, सदा प्रारव्घवदय (जा० सं०) । बहुत भूमि और घन से युक्त हो । स्त्रो सुख अल्प, बड़े भाई से

सुख नहीं होता (qo पा०) । सट्टा लाटरी, वसीयत नामा आदि से अकल्पित लाभ 1 ९--नवम में.धनेश-दानो, क्रूर ग्रह हो तो दरिद्रो, भिक्षुक, प्रत्येक कार्य में उपहास

प्राप्त (मान०) । शुभ ग्रह हो तो विख्यात दानो। पाप ग्रह हो तो दरिद्र, भिक्षुक तथा ठग (जा० सं०) 1 घनी उद्योगी चतुर, बाल्यावस्था में दुःखी पोछे सुखी तथा तीर्थ ब्रत करने वाळा 1

भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३७५

१०--दशम में घनेश-राजाओं का मान्य, राजा से लक्ष्मी प्राप्त । शुभग्रह हो तो

माता पिता का पालन कर्ता (मान०) राजाओं का मान्य तथा राजा हो । शुभग्रह हो-

न पिता का पालक, कामी, मानी, पंडित, बहुत स्त्री और घन से युक्त किंतु पुत्र सुख

से होन ।

११--लाभ में घनेश-ग्रहों का जानने वाला, पक्षियों के व्यौहार में प्रसिद्ध, लक्ष्मी

का स्वामी, लोक समूह के पालन करने में सदा तत्पर या नामवर, (मा०) । व्यौहार

में निपुण, लक्ष्मी का पति, विख्यात, बहुतों का पालक, लोक में विख्यात (जा० सं०) ।

सब प्रकार लाभ करने वाला, सदा उद्योगी, मानी, यशस्वी (qo पा०) ।

१२--व्यय में घनेश-क्रूर हो तो महा कृपण, घन होन । शुभ हो तो कभी हानि

कभी लाभ (मान०) । अष्टकपाली, परदेश में समृद्धि वाला । पापग्रह हो-- बुरे कर्म

करने वाला, शुभग्रह हो -तो संग्रह कर्ता (जा० सं०) साहसी, घन होन, दुसरे के

आश्रित जीवन, उसकी ज्येष्ठ संतति नहीं जीती । (ao पा०) ।

(र) द्वितीयेश का विशेष फल

१--गुणी घनी आदि-द्वितीयेश छनन में हो और शुभ ग्रह दूसरे में हो तो-गुणी,

उन्नतिशोल, कुटुम्बी हो, घनी, दूरदर्शी और सुमुख हो ।

२--द्वितीयेश सूयं से संबंधित हो तो जनता को अधिक सहायता पहुँचाने वाला हो

ज्ञान और घन प्राप्त करे।

शनि से हो तो--उसकी विद्या अल्प हो वह क्षुद्र हो ।

गुरु से हो तो--वैदिक घर्म शास्त्र में निपुण हो ।

बुघ से हो तो--अथं शास्त्र में चतुर ।

शुक्र से हो तो--एगार सम्बन्धी कार्य में चतुर ।

चंद्र से हो तो--काल के सम्बन्ध में कुछ ज्ञान हो ।

मंगल से हो तो--५र कला ओर पिशुनता ( चुगल खोरी ) में निपुण ।

राहु से हो तो--अस्पष्ट भाषी अर्थात्‌ शुद्ध शब्द न बोल सके ।

केतु से हो तो--असावधानी से चलने वाला, झूठ बोलने वाला ( फल दो०)।

३--धनेश चन्द्र हो घन में हो-घन सम्बन्धी सूत्र प्रयोग व योग करने को विद्या

आवे, गणित भी अच्छा आवे, लाल नेत्र, केश भूरे, चपल हो ( qe यो० )।

४--घनेश का नवांद-घनेश कहीं हो केवल जिस भाव के नवांश में वह हो वही

अपने अधिकार प्रमाण से घन भाव में सब बातें देता है। या घन भाव में जो ग्रह हो

चे फल देते हैं ( प्रा० यो० ) ।

५- घन वृद्धि-घनेश घन भाव या त्रिकोण में हो तो घन वृद्धि हो, ६-८१२ माव

में हो तो घन हानि हो (ao पा० ) ।

६ -पूर्ण घन छाम-घनेश केन्द्र में हो उससे त्रिकोण में लामेश हो या गुरु शुक्र से

युक्त हो तो पूर्ण लाभ द्वोता है । ( वृ० पा० ) 1

३७६ :.ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

तात गुरु हो घन भाव में हो या मंगल के साथ हो तो धन￾वान्‌ हो ।

८- घनवान्‌-घनेश लाभ में या लामेश धन में हो या वे दोनों केन्द्र त्रिकोण मे हों

तो घनवान्‌ हो ( qo पा० ) ।

९--निर्घन-धनेश और लामेश षष्ठ भाव में हो तथा घन भाव और लाभ भाव

पाप युक्त हो तो निर्घन हो । (qo पा०)

१०--घन हीन-घनेश लामेश दोनों अस्त या पाप युक्त हों तो जन्म से हो घन

हीन हो (qe पा० ) ।

११--राज दंड से घन नाश-धनेश छामेश दोनों ६-८-१२ भाव में हों, ११ में

मंगल २ में राहु हो तो राज दंड से घन नाश हो ( qo पा० ) ।

१२--घमे कायं में व्यय--घनेश शुभग्रह युक्त हो, लाम में गुर, घन भाव में शुक्र

हो, व्यय में शुभग्रह हो तो घमं कार्य में व्यय हो ।

१३--परोपकारो विख्यात--धनेश् यदि स्वगृही या उच्च में हो तो परिवार पालक,

परोपकारी और विख्यात हो (qo पा०) ।

१४--सम्पत्ति प्राप्त-षनेश पारावतांश्ादि शुभव्ग में हो या शुभग्रह युक्त हो तो

उसके घर में विना प्रयत्न के ही सब सम्पत्ति का आगमन हो (qo पा०)।

१५--सुलोचन-घनेश (नेत्र भाव पति) वली और शुभ युक्त हो तो सुलोसन हो।

१६-नेत्ररोगी-धनेश ६-८-१२ में हो तो नेत्र रोगी हो (qo पा.) `

१७--रोगी असत्यवक्ता-धनेश या धन भाव यदि पापग्रह युक्त हो तो वह चुगुल￾खोर रसत्यत्क्ता ओर वात रोगी हो (qe पा०) ।

१८- नेत्र रोगी-घनेश शुक्र से युक्त या शुक्र के घर में या त्रिक स्थान में हो चाहे

इनसे कोई संबंध हो तो नेत्रों से विपरीत भाव होता है, अपने उच्च या स्वगृही ग्रह हो

तो यह दोष नहीं होता, ६-८-१२ स्थानों को छोड़कर अत्यन्त शुभ होता है ।

(३) तुतोयेश का प्रत्येक भाव में फल

१-छग्न में तुतीयेश-बातचीत करने में प्रत्येक से झगड़ा करने वाला (मान०) ।

वचनविवादी, लम्पट, स्वजनों का भेदन कर्ता, सेवाकर्ता, बुरे मित्र, क्रूर (जा० सं०) ।

स्वयं घन उपार्जन करने वाळा, सेवा जानने वाळा, साहसी, विना पढ़ा लिखा भी बुद्धि-

मान्‌ होता है । (go पा०)।

२--घन में तृतीयेश-पापग्रह हो-भीख मांगने वाला, दरिद्र, अल्प जीवन, स्वकु- टुम्बियो से विरोध करने वाला । शुभग्रह हो तो घनाळ्य (मान०) । यदि पापग्रह हो भिक्षुक, निधन, अल्पायु, बंधु विरोध कर्ता । शुभग्रह हो तो qg बली तथा शक्तिशाली

हो (जा० सं०) । स्थूल देह, बलहीन, थोड़ा कार्य आरम्म करने वाला, सुखहीन, पर- स्त्रीगामी (qo पा०) ।

३-तृतीय में तृतीयेश--सतगुणो, अच्छे मित्र, श्रेष्ठ कुटुम्बी, देवगुरु जनों का सेवक

राजा से लाम करने वाला (मान०) । पुरुषों के समान पराक्रम, सबका मित्र, देवगुर

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भावेश का भिन्न-भिन्न भावों में फल : ३७७

जनों का पूजक, शुभाचार, राजा से लाम (जा० सं०) 1 सहोदर से सुखी, घन पुत्र से

युक्त, अधिक सुख भोगी (qo पा०) ।

४चुर्थ में तृतोयेश-पिता तथा भाई बंदों के साय सुख भोगने वाला, माता के

साथ वेर करने वाला, पिता के घन का नाशक (मान०) । पिता को आनन्द और सुख￾कर्ता । माता पिता का उदय कर्ता। माता के साथ वर, पिता का बन भक्षण करने वाला (जा० सं०) । सुखी घनी, बुद्धिमान्‌, दुष्ट स्त्री का पति (वृ० पा०) 1

५--पंचम में तृतोयेश-पुत्र, भाई बंदों के पुत्र ओर सहोदार द्वारा पालन करने

लायक, दीर्घायु, परोपकार में बुद्धि (मान०) । अच्छे बांववों बाला, सहोदर त्राताओ

से पाला जाने वाला, बड़ी आयु वालः, पर जनों का उपकार कर्ता (जा० सं०) । पुत्रबान्‌

गुणी, यदि पापयुक्त हो तो दुष्ट स्त्रो का पति हो (qo पा०) |

६--षष्ठ में तृतीयेश-भाई बंधुओं का विरोधी, नेत्र का रोगो, अकस्मात्‌ मुमि

राभ, रोग व्याप्त (मान०) (जा० áo) 1 भाई से शत्रुता करने वाला, बड़ा बनी,

मामा से शत्रुता और पापो से प्रेम करने वाला (वृ०.पा०) ।

७--पप्तम में तृतीये थ-सुशोला, सोमाग्यवतो स्त्रो हो, कूर ग्रह हो तो देवर के

घर में रहने बाली हो (मान०) 1 राजा का सेवक, वास्यावस्या में दुःखी, अंत में

सुखी (बृ० पा०) 1 ८--अष्टम में तृतीयेश-भाई मरे । यदि पापग्रह हो तो बांह को पीडा से दुःखो,

८ वषं जीवे (मान०) । मरे हुए सदाहर भ्राताओं वाला । पापग्रह हो तो ८ वर्ष दक

जी सके तो भुजा से होन अंग वाला हा (जा० सं०) । चोर, नोकरो करने वाला,

राजा के द्वारा मरण पाने वाला (qo पा०) ।

९---नवम में तुतीयेश--माई बंदों से होन। शुभग्रह हो-बांवव जन सज्जन हों

स्वयं विद्वान्‌ और सहोदर भाई का भक्त (मान०) । पुण्यवान्‌, सगे भाई से स्नेद करने

बाला, बांघवों से पराजित होता है । शुमग्रह हा-अच्छे वांधवों से युक्त अच्छे कायं करने

चाला, अआताओं का भक्त (जा० सं०) । पिता के gq से होन, स्तो के दारा भाग्योदय,

पुत्रादि से युक्त (qo पा०) ।

१०--दशम में तृतीयेश-राजाओं का पुज्य, भाता पिता भाई बंबुओं का मक्त,

उत्तम बुढि, सब बंघुओं से मेल (मान०) । राजा से सत्कार पाने वाला, बांबवो का

भक्त, उत्तम बांघव जनों से मान्य, अच्छे निश्‍चय वाला (जा० सं०)। सब प्रहार से

सुखो, अपने पराक्रम से घन कमाये, दुष्ट स्त्रियों को पालने बाला (वृ० पाऽ) 1

११--छाम में तृतीयेश-सत्पात्र, बांधवों से युक्त, किसी राजा के द्वारा शोमा पाने

वाला, भाई बंदों का सेवक, मोग विलास युक्त (मान०) 1 अच्छे ahaqi से युक्त, बांघवों

से पूज्य, सेवा चाहने बाला, भोगवान्‌ (जा० सं०) व्यापार में बनी, विद्याहोन भी

बुद्धिमान्‌, साहसो ओर दूसरों को सेवा करने याला (बुर पाऽ)

१२--व्यय में तृतीयेश-मिन्रों से विरोध करने बाला, आई बंदों को संताप देने