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भारतकोश
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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

नामानुक्रमणिका

अंगद—४।११ अंगिरा—१०।१२-१३ अगस्त्य—२।२४ अग्निदेव—१।१४; १०।२३; १५।१२ अजामिल—६।४०; ८।५; ९।३० अर्जुन—२।३ टि.; ४।१, ३, ११; ५।१; १०।१ परि., १६, ३७; ११।४१-४२; १६।५ मा.; १८।५८, ६६ वि., ७४ अर्यमा—१०।२९ अश्वपति—४।२ इन्द्र—१।१४; ३।१४; ६।३२; ७।१९; ८।१६; ९।२०, २२ परि.; १०।२२, २७; ११।३५; १५।१२; १६।२; १७।२२ उतंक—३।२२ परि.; ४।९ उत्तरा—७।१६ उद्भव—२।३८; ७।१६; १०।३९; १८।६४, ६६, ७६ परि. उर्वशी—१६।५; १८।३६ कंस—७।२७ कपिल—१०।२६ करमाबाई—९।३२ करमेली—९।३२ कर्ण—११।२६ टि.; १८।६६, ७३ कर्णपिशाचिनी—९।२५ वि. काकभुशुण्डि—१०।३४; १८।६६ वि. कामधेनु—१०।२८ कुन्ती—१।११; ३।१६; ६।३५; ९।३२ कुबेर—१०।२३ कौसल्या—११।४७; १८।७७ खाण्डववन—१।१४ गंगा—३।३४; ४।११; ८।५; १०।३१; १२।१६; १५।३, ६, ८; १८।१७ परि., ४५, ४६ परि., ६१ गजेन्द्र—७।१६; ९।२६, ३२गणेश—४।१८ परि.; ९।३ परि. गन्धर्व—११।२२ गरुड—१०।३०; १८।६६ वि. गोपियाँ—२।६५; ४।६; ६।४०; ७।१६, १७, २७; ९।३२; १०।९, ११ वि., परि.; ११।२४; १८।६६ वि. गोवर्धन—१।१४; ४।६; ११।३३ चन्द्रमा—७।८; १०।२१; १५।१२, १३ चित्ररथ—१०।२६ चैतन्य महाप्रभु—१८।७१ जटायु—९।३२ जनक—३।२०; ४।२, ६; १०।४-५ जयद्रथ—११।३४ तारा—२।२७ तुकाराम—१८।६६ वि. तुलसीदास—१२।१३-१४ परि.; १८।६६ तुलाधार—९।३२ तृणावर्त—४।६ दधीचि—६।३२; १०।२८; १६।२ दमयन्ती—२।२४ दशरथ—४।११ दुर्योधन—१।२, १०, १९; ३।३६ दुष्यन्त—३।३४ टि.; १२।१४ देवहूति—९।३२ देवी—४।१६ द्रोणाचार्य—१।३८; २।४; ११।२६ टि. द्रौपदी—४।६; ७।१६; ९।३ परि. २६, ३२; १२।५ वि.; १८।१२, ६६ वि. ध्रुव—७।१६; ११।५४ नन्द-उपनन्द—१।१४ नर नारायण—२।२५ नल—३।३४ नामदेव—९।२४ टि., २५ टि.नारद—३।११; ७।१९; १०।१२-१३, २६ निषादराज—७।२२; ९।३२; १८।७० पंचजन—१।१५ पार्वती—५।१२; १२।८; १५।१२; १८।६६ वि. पूतना—४।६; १८।६६ वि. प्रह्लाद—१०।३०; ११।४९; १३।७ वि. फूलीबाई—९।३२ बद्रीनारायण—१।४६; १६।३ बलराम—६।३० बिल्वमंगल—६।४०; ७।२७ बृहस्पति—१०।२४, ४१ ब्रह्मा—३।१०-११, १४; ४।६; ६।३०; ७।३०; ८।१६, १७, १८, २०, २२, २४; ९।७, १७; १०।६, ३३ टि.; ११।१५; १३।१६; १४।३; १५।१ ब्रह्मा-विष्णु-महेश—११।१५; १३।१६ भरत मुनि—६।४०; १४।१५ भीष्मपितामह—१।१२; २।४; ३।३४; ८।२५ वि.; ९।३१; ११।२६ टि., ४७; १८।४६ भृगु—१०।१२-२३, २५ मधुसूदनाचार्य—७।३० वि. मनु—५।१२; १०।६ मरुत—१०।२१; ११।६ मार्कण्डेय—१०।१२-१३ मीराबाई—७।१९; ९।३२; १८।६६ वि. यमराज—८।१६; ९।५; १०।२९; ११।३९ यशोदा—११।१३, ४७; १८।६६ वि., ७७ याज्ञवल्क्य—२।२४ युधिष्ठिर—१८।१२, ४४ रत्नदेव—९।२६
  • पारिभाषिक शब्दावली *

१२९३

राधा (श्रीजी)—४।६;६।३१;९।३४

राम—३।२६,३४;४।६,९,११;

७।२२;२०।४-५,३१;

१८।४६ परि.,६६ वि.

रावण—१।१९;१६।१

रुक्मिणी—४।६

लक्ष्मण—५।१८ वि.;१८।७०

लक्ष्मी—१८।६६ वि.

वरुण—१०।२९;११।३९

वसिष्ठ—१०।४१

वामन—१०।२१

वाराह—६।११

वाल्मीकि—९।३०

वासुकि—१०।२८

विदुर—९।३२

विदुरानी—४।११ परि.;९।२६

विभीषण—७।२२;११।५४;

१८।६६ वि.

विश्वामित्र—४।११

विश्वेदेव—११।२२

विष्णु—७।३०;१०।२१;११।१५,

१७,४६,५१-५२;१३।१६

वृन्दावन—११।४९ परि.

वेदव्यास—१।१ अव.;१०।१२-१३,

३७;११।९ परि.;१८।४४,७५

शंकर—१०।२३,२५;११।१५;१३।१६

शंकराचार्य—२।४८

शक्टासुर—४।६

शकुन्तला—१२।१४

शतरूपा—५।१२;१२।८

शबरी—९।२६,३२;१८।४७ वि.

शिशुपाल—७।२७

शुकदेव—४।२

शुक्राचार्य—१०।३७

शेषनाग—१०।२९

संजय—१।१,१०;९।३२;११।९,

४९;१८।७५-७७

संभाजी—६।२१

संवर्तक—१४।२

सत्यकाम—१३।२५ परि.

सदन कसाई—९।३०

सनकादि—४।९;५।१९;७।१९;

१०।६,९,१२-१३

सप्तऋषि—१०।६

समाधि—९।३२

साध्य—११।२२

सीता—२।५;४।६;१६।१;

१८।६६ वि.

सुग्रीव—७।२२

सुनयना—१०।४-५

सुमेरु—१०।२३

सूरदास—१८।६६ वि.

सूर्य—४।१;७।८;९।१९;१०।२१;

१३।२९,३३;१५।६,१२

स्कन्द (कार्तिकेय)—१०।२४

हनुमान्—१।२०;२।५;१८।६६ वि.

हरिश्चन्द्र—३।३४,३५

हिमालय—१०।२५

पारिभाषिक शब्दावली

(साधक-संजीवनीके अनुसार)

अक्षौहिणी सेना—एक अक्षौहिणी सेनामें २१,८७० रथ,

२१,८७० हाथी, ६५,६१० घोड़े और १,०९,३५०

पैदल सैनिक होते हैं। (१।३ टि.)

अन्न—प्राणोंको धारण करनेके लिये जो खाया जाता है,

वह 'अन्न' कहलाता है। (३।१४)

अभिमान—अहंतावाली चीजोंको लेकर अर्थात् स्थूल,

सूक्ष्म और कारणशरीरको लेकर अपनेमें बड़प्पनका

अनुभव होना। (१६।४)

अमर्ष—किसीके उत्कर्ष (उन्नति)-को सहन न करना।

(१२।१५)

अर्पण—आदरपूर्वक देना और उसीकी वस्तु उसीको देना

'अर्पण' कहलाता है। (९।२७ परि.)

असुर—जो प्राणोंको बनाये रखना चाहते हैं, प्राणोंमें ही

जिनकी रति है, ऐसे प्राणपोषणपरायण लोग—

'असुषु प्राणेषु रमन्ते इति असुराः।' (१६।५)

अहंकृति—शरीरके साथ तादात्म्य माननेसे शरीरकी क्रियाको

लेकर 'मैं करता हूँ'—ऐसा भाव उत्पन्न होना

'अहंकृति' है। (१८।१७)

अहंस्फूर्ति—गाढ़ नींदसे उठते ही सबसे पहले मनुष्यको

अपने होनेपन (सत्तामात्र)-का भान होता है,

इसको 'अहंस्फूर्ति' कहते हैं। (१८।१७)

अहिंसा—(१) मन, वाणी और शरीरसे कभी किसीको

किंचिन्मात्र भी दुःख न देना। (१३।७)

(२) शरीर, मन, वाणी, भाव आदिके द्वारा

किसीका भी किसी प्रकारसे अनिष्ट न करनेको

तथा अनिष्ट न चाहना। (१६।२)

आततायी—आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें

शस्त्र लेकर मारनेको तैयार हुआ, धनको हरनेवाला,

जमीन (राज्य) छीननेवाला और स्त्रीका हरण

करनेवाला—ये छः आततायी कहलाते हैं। (१।३६)

आधि और व्याधि—मनकी चिन्ता 'आधि' (मानसिक

रोग) है और शरीरका रोग 'व्याधि' (शारीरिक

रोग) है। आधि भी दो तरहकी होती है—

१. पागलपन और २. चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग

आदि। (७।१६ टि.;१८।१२)

आर्जव—शरीर, वाणी आदिके व्यवहारमें सरलता हो और

१२१४

  • साधक-संजीवनी-कोश *

मनमें छल, कपट, छिपाव आदि दुर्भाव न हों अर्थात् सीधा-सादापन हो, उसका नाम 'आर्जव' है। (१८।४२)

आसक्ति —अपने स्वरूपसे विजातीय (जड़) पदार्थोंके प्रति आकर्षण। (३।१९)

ईश्वर —'ईश्वर' शब्द सगुणका वाचक माना जाता है, जिसका अर्थ है—शासन करनेवाला। (१५।१७)

उदासीन —उत्+आसीन अर्थात् ऊपर बैठा हुआ, तटस्थ, पक्षपातसे रहित। (१२।१६)

उद्देग —मनका एकरूप न रहकर हलचलयुक्त हो जाना। (१२।१५)

ऋषि —'ऋषु' धातुका अर्थ है—ज्ञान। उस ज्ञान (विवेक) को महत्त्व देनेवाले 'ऋषि' कहलाते हैं। (५।२५)

करण —पाणि, पाद, वाक्, उपस्थ और पायु—ये पाँच कर्मन्द्रियाँ और श्रोत्र, चक्षु, त्वक्, रसना और प्राण—ये पाँच ज्ञानन्द्रियाँ—ये दस 'बहिःकरण' हैं तथा मन, बुद्धि और अहंकार—ये तीन 'अन्तःकरण' हैं। (१८।१४)

कर्तव्य —(१) कर्तव्य उसे कहते हैं, जिसको कर सकते हैं और जिसको अवश्य करना चाहिये। (३।१९)

(२) केवल दूसरोंके हितके लिये किया जाने-वाला कर्म ही कर्तव्य होता है। जो कर्म अपने लिये किया जाता है, वह कर्तव्य नहीं होता, प्रत्युत कर्ममात्र होता है। (४।३१)

काम —(१) वस्तु, व्यक्ति और क्रियासे सुख चाहनेका नाम 'काम' है। (३।३७ परि.)

(२) नाशवान् संसारमें थोड़ी भी महत्त्वबुद्धिका होना 'काम' है। (३।३९)

कामना —अप्राप्तको प्राप्त करनेकी चाह 'कामना' है। अन्तःकरणमें जो अनेक सूक्ष्म कामनाएँ दबी रहती हैं, उनको 'वासना' कहते हैं। वस्तुओंकी आवश्यकता प्रतीत होना 'स्मृह' है। वस्तुमें उत्तमता और प्रियता दीखना 'आसक्ति' है। वस्तुमिलनेकी सम्भावना रखना 'आशा' है और अधिक वस्तु मिल जाय—यह 'लोभ' या 'तृष्णा' है। वस्तुकी इच्छा अधिक बढ़नेपर 'याचना' होती है। ये सभी 'काम' के ही रूप हैं। (३।३९)

कारक पुरुष —जो महापुरुष भगवान्को प्राप्त हो चुके हैं और भगवद्भ्राममें विराजते हैं, वे 'कारक पुरुष' कहलाते हैं। (४।८ टि.)

कूटस्थ —जो कूट (अहरन) की तरह स्थित रहता है—'कूटवत् तिष्ठतीति कूटस्थः।' (६।८)

क्षण —कमलके पत्तेपर सूर्य मारी जाय तो सूर्यके दूसरी तरफ निकलनेमें तीन क्षण लगते हैं—पहले क्षणमें

स्पर्श, दूसरे क्षणमें छेदन और तीसरे क्षणमें पार निकलना (१५।१ टि.)

क्षमा —बिना कारण अपराध करनेवालेको दण्ड देनेकी सामर्थ्य रहते हुए भी उसके अपराध सह लेना और उसको माफ कर देना। (१६।३)

गति —इसके तीन अर्थ होते हैं—ज्ञान, गमन और प्राप्ति। (७।१८ परि.)

चेतन और जड़ —जो अपनेको तथा दूसरेको भी जाने, वह 'चेतन' है और जो अपनेको तथा दूसरेको भी नहीं जाने, वह 'जड़' है। (७।२० टि.)

जगत् —जो परिवर्तनशील है, उसको जगत् कहते हैं—'गच्छतीति जगत्।' (७।६)

जाति —'जाति' शब्द 'जनि प्रादुर्भावै' धातुसे बनता है, जो जन्मसे जातिको सिद्ध करता है। कर्मसे तो 'कृति' शब्द होता है, जो 'डुकृञ् करणे' धातुसे बनता है। हाँ, जातिकी पूर्ण रक्षा उसके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेसे ही होती है। (४।१४ परि.)

तप —भूख-प्यास, सरदी-गरमी, वर्षा आदि सहना भी एक तप है, पर इस तपमें भूख-प्यास आदिको जानकर सहते हैं। वास्तवमें साधन करते हुए अथवा जीवन-निर्वाह करते हुए देश, काल, परिस्थिति आदिको लेकर जो कष्ट, आफत, विघ्न आदि आते हैं, उनको प्रसन्नतापूर्वक सहना 'तप' है। (१६।१२)

दम —(१) इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाना। (४।३३) (२) जिस इन्द्रियसे जब जो काम करना चाहें, तब वह काम कर लें और जिस इन्द्रियको जब जहाँसे हटाना चाहें, तब वहाँसे हटा लें—इस प्रकार इन्द्रियोंको वशमें करना 'दम' है। (१८।४२)

दम्भ —मान, बड़ाई, पूजा, ख्याति आदि प्राप्त करनेके लिये, अपनी वैसी स्थिति न होनेपर भी वैसी स्थिति दिखानेका नाम 'दम्भ' है। (१६।४)

दया —(१) दूसरोंको दुःखी देखकर उनका दुःख दूर करनेकी भावना। (१६।२)

(२) भक्तलोग भगवान्की दयाके दो भेद मानते हैं—कृपा और दया। मात्र मनुष्योंको पापोंसे शुद्ध करनेके लिये उनके मनके विरुद्ध (प्रतिकूल) परिस्थितिको भेजना 'कृपा' है और अनुकूल परिस्थितिको भेजना 'दया' है। (१६।२)

दर्प (घमण्ड) —धन-वैभव, जमीन-जायदाद, मकान-परिवार आदि ममतावाली चीजोंको लेकर अपनेमें बड़प्पनका अनुभव होना। (१६।४)

दान —लोकदृष्टिमें जिन वस्तुओंको अपना माना जाता है, उन

  • पारिभाषिक शब्दावली *

१२१५

वस्तुओंको सत्पात्रका तथा देश, काल, परिस्थिति आदिका विचार रखते हुए आवश्यकतानुसार दूसरोंको वित्तीण कर देना। (१६।१)

दन्द्र — एक ही विषयमें, एक ही वस्तुमें दो भाव कर लेना। (२।४५ टि.)

धर्म — (१) 'धर्म' नाम दो बातोंका है—(क) दान करना, प्याऊ लगाना, अन्नक्षेत्र खोलना आदि परोपकारके कार्य करना और (ख) वर्ण-आश्रमके अनुसार शास्त्रविहित अपने कर्तव्य-कर्मका तत्परतासे पालन करना। (२।४०)

(२) धर्म कहो चाहे कर्तव्य कहो, एक ही बात है। (२।३९ परि.)

धृति (धैर्य)—(१) किसी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिमें विचलित न होकर अपनी स्थितिमें कायम रहनेकी शक्तिका नाम 'धृति' है। (१६।३)

(२) बुद्धिके निश्चयको, विचारको दृढ़तासे ठीक तरह रखनेवाली और अपने लक्ष्यसे विचलित न होने देनेवाली धारण-शक्तिका नाम 'धृति' है। (१८।२९)

(३) अपनी मान्यता, सिद्धान्त, लक्ष्य, भाव, क्रिया, वृत्ति, विचार आदिको दृढ़, अटल रखनेकी शक्तिका नाम 'धृति' है। (१८।३३)

नैष्कर्म्य —जिस स्थितिमें मनुष्यके कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् बन्धनकारक नहीं होते, उस स्थितिको 'नैष्कर्म्यता' कहते हैं। (३।४)

पण्डित —सत्-असत्-विवेकवती बुद्धिका नाम 'पण्डा' है। वह 'पण्डा' जिनकी विकसित हो गयी है, वे 'पण्डित' हैं। (२।११)

परमात्मा —'परमात्मा' शब्द निर्गुणका वाचक माना जाता है, जिसका अर्थ है—परम (श्रेष्ठ) आत्मा अथवा सम्पूर्ण जीवोंकी आत्मा। (१५।१७)

परलोक —मरनेके बाद जो जन्म होता है, वह चाहे मृत्युलोकमें हो, चाहे किसी अन्य लोकमें हो, चाहे मनुष्य, पशु-पक्षी आदि किसी योनिविशेषमें हो, वह सब 'परलोक' ही है। (१६।८ टि.)

परिग्रह —ममता-आसक्तिपूर्वक अपने सुखभोग और आरामके लिये धनादि पदार्थोंका संग्रह करना। (४।५)

पिशुनता (चुगली)—किसीके दोषको दूसरेके आगे प्रकट करके दूसरोंमें उसके प्रति दुर्भाव पैदा करना। (१६।२)

प्रकृति —जिसमें अच्छी रीतिसे क्रियाशीलता हो, उसको 'प्रकृति' कहते हैं—प्रकृषेण करणं (भावेल्युट्ट) इति प्रकृतिः।' (१८।११)

प्रमाद —(१) करनेलायक कामको न करना और न करनेलायक कामको करना। (१४।७)

(२) बीड़ी-सिगरेट, ताश-चौपड़, खेल-तमाशे आदि कार्यमें लगना। (१४।१३)

भय —इष्टके वियोग और अनिष्टके संयोगकी आशंकासे होनेवाले विकारको 'भय' कहते हैं। (१२।१५)

भूत-प्रेत —जो भूतयोनिमें चले गये हैं, उन्हें 'भूत' कहते हैं और जो मर गये हैं, उन्हें 'प्रेत' कहते हैं। (१७।४)

भोग —शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय, शरीरका आराम, मान और नामकी बड़ाई—इन (आठों) के द्वारा सुख लेनेका नाम 'भोग' है। (२।४४)

मद —हमारे पास इतनी विद्या, बुद्धि, योग्यता आदि है—इस बातको लेकर नशा-सा आ जाना 'मद' है। (१६।१०)

महात्मा —महान् आत्मा अर्थात् अहंभाव, व्यक्तित्व, एकदेशीयतासे सर्वथा रहित आत्मा। (७।१९ परि.)

महारथी —जो शास्त्र और शास्त्रविद्या—दोनोंमें प्रवीण है और युद्धमें अकेले ही एक साथ दस हजार धनुर्धारी योद्धाओंका संचालन कर सकता है, वह वीर पुरुष 'महारथी' कहलाता है। (१।६)

मान-बड़ाई —शरीरका आदर-सत्कार होनेसे जो सुख होता है, वह 'मान' का सुख है। नामकी प्रशंसा, वाह-वाह होनेसे जो सुख होता है, वह 'बड़ाई' का सुख है। (१८।१२)

मार्दव —बिना कारण दुःख देनेवालों और वैर रखनेवालोंके प्रति भी अन्तःकरणमें कठोरताका भाव न होना तथा स्वाभाविक कोमलताका रहना। (१६।२)

मोह —शरीरमें अहंता और ममता करना तथा शरीर-सम्बन्धी माता-पिता, भाई-भौजाई, स्त्री-पुत्र, वस्तु, पदार्थ आदिमें ममता करना 'मोह' है। (२।५२)

यक्ष-राक्षस —'यक्ष' में धन-संग्रहकी मुख्यता और 'राक्षस' में दूसरोंका नाश करनेकी मुख्यता होती है। (१७।४)

यज्ञ —(१) गीताके अनुसार कर्तव्यमात्रका नाम 'यज्ञ' है। (३।९)

(२) निष्कामभावपूर्वक किये जानेवाले लौकिक और शास्त्रीय सभी विहित कर्मोंका नाम 'यज्ञ' है। (३।१४)

यज्ञशेष —यज्ञकी सिद्धिके बाद स्वतः अवशिष्ट रहनेवाला 'योग' अपने लिये होता है। यह योग (समता) ही यज्ञशेष है। (३।१३)

यज्ञार्थ कर्म —दूसरोंको सुख पहुँचाने तथा उनका हित करनेके लिये जो भी कर्म किये जाते हैं, वे सभी यज्ञार्थ कर्म हैं। (३।९)

१२९६

  • साधक-संजीवनी-कोश *

यत्— भीतरकी लगन, जिसे पूर्ण किये बिना चैनसे न रहा जाय, 'यत्' कहलाती है। (१५।११)

योग—(१)—१. 'युजिर् योगे'—समरूप परमात्माके साथ नित्य-सम्बन्ध, २. 'युज समाधी'—चित्तकी स्थिरता अर्थात् समाधिमें स्थिति, और ३. 'युज संयमन'—संयमन, सामर्थ्य, प्रभाव। (प्रा.) (२) जीवका भगवान्के साथ जो नित्य-सम्बन्ध है, उसका नाम 'योग' है। (१८।७५)

योगक्षेम—(१) अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिका नाम 'योग' है और प्राप्त वस्तुकी रक्षाका नाम 'क्षेम' है। (२।४५ टि.; १।२२)

(२) 'योग' नाम भगवान्के साथ सम्बन्धका है और 'क्षेम' नाम जीवके कल्याणका है। (१।२२)

राग— संसारके पदार्थोंका मनपर जो रंग चढ़ जाता है, उसको राग कहते हैं। (२।५६)

लज्जा— शास्त्र और लोक-मर्यादाके विरुद्ध काम करनेमें संकोच होना। (१६।२)

लोक—(१) इसके तीन अर्थ होते हैं—१. मनुष्यलोक आदि लोक, २. उन लोकोंको रहनेवाले प्राणी, और ३. शास्त्र (वेदोंके अतिरिक्त सब शास्त्र)। (३।२०) (२) जिनके साथ जीवकी तात्त्विक एकता अथवा स्वरूपकी एकता नहीं है, ऐसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यमात्रका नाम 'लोक' है। (१५।७)

वर्णसंकर— पुरुष और स्त्री—दोनों अलग-अलग वर्णके होनेपर उनसे जो सन्तान पैदा होती है, वह 'वर्णसंकर' कहलाती है। [परस्परविरुद्ध धर्मोंका मिश्रण होकर जो बनता है, उसको 'संकर' कहते हैं।] (१।४१)

व्यभिचार— जीव परमात्माका अंश है, इसलिये परमात्माके सिवाय कहीं भी जाना 'व्यभिचार' है और केवल परमात्माकी तरफ चलना 'अव्यभिचार' है। (१८।३३ परि.)

शम—(१) मनको इन्द्रियोंके विषयोंसे हटाना। (४।३३) (२) मनको जहाँ लगाना चाहें, वहाँ लग जाय और जहाँसे हटाना चाहें, वहाँसे हट जाय—इस प्रकार मनके निग्रहको 'शम' कहते हैं। (१८।४२)

श्रद्धा—(१) ईश्वर, शास्त्र आदिपर पूज्यभावपूर्वक प्रत्यक्षसे भी अधिक विश्वास करना। (४।३३)

(२) जिसे हम अपने अनुभवसे नहीं जानते, पर पूर्वके स्वाभाविक संस्कारोंसे, शास्त्रोंसे, सन्त-महात्माओंसे सुनकर पूज्यभावसहित विश्वास कर लेते हैं, उसका नाम 'श्रद्धा' है। (१७।३ मा.)

सत्य— अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे जैसा सुना, देखा, पढ़ा, समझा और निश्चय किया है, उससे न अधिक और न कम— वैसा-का-वैसा प्रिय शब्दोंमें कह देना। (१६।२)

संकल्प— सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, देश, काल, घटना, परिस्थिति आदिको लेकर मनमें जो तरह-तरहकी स्फुरणाएँ होती हैं, उन स्फुरणाओंमेंसे जिस स्फुरणामें प्रियता, सुन्दरता और आवश्यकता दीखती है, वह स्फुरणा 'संकल्प' का रूप धारण कर लेती है। (१६।२४)

संन्यास— अच्छी तरहसे रखनेका नाम 'संन्यास' है— 'सम्यक् न्यासः संन्यासः।' तात्पर्य है कि प्रकृतिकी चीज सर्वथा प्रकृतिमें देने (छोड़ देने) और विवेकद्वारा प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेनेका नाम 'संन्यास' है। (१८।१)

सुहृद् और मित्र— जो माताकी तरह ही, पर ममतरहित होकर बिना किसी कारणके सबका हित चाहनेके और हित करनेके स्वभाववाला होता है, उसको 'सुहृद्' कहते हैं और जो उपकारके बदले उपकार करनेवाला होता है, उसको 'मित्र' कहते हैं। (६।९)

स्पृहा—(१) शरीरके निर्वाहमात्रके लिये देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिकी जो आवश्यकता दीखती है अर्थात् जीवन-निर्वाहके लिये प्राप्त और अप्राप्त वस्तु आदिकी जो जरूरत दीखती है, उसका नाम 'स्पृहा' है। (२।७१)

(२) जीवन-धारणमात्रके लिये जिनकी विशेष जरूरत होती है, उन चीजोंकी सूक्ष्म इच्छाका नाम 'स्पृहा' है। (१८।४९)

स्वाध्याय— अपने ध्येयकी सिद्धिके लिये भगवन्नामका जप और गीता, भागवत, रामायण, महाभारत आदिके पठन-पाठनका नाम 'स्वाध्याय' है। वास्तवमें तो 'स्वस्य अध्यायः (अध्वयनम्) स्वाध्यायः' के अनुसार अपनी वृत्तियोंका, अपनी स्थितिका ठीक तरहसे अध्ययन करना ही 'स्वाध्याय' है। (१६।१)

स्वाभिमान— दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता देखनेसे 'अभिमान' होता है और अपने कर्तव्यको देखनेसे 'स्वाभिमान' होता है कि मैं साधन-विरुद्ध काम कैसे कर सकता हूँ। अभिमान होनेपर तो मनुष्य साधन-विरुद्ध काम कर बैठेगा, पर स्वाभिमान होनेपर उसको साधन-विरुद्ध काम करनेमें लज्जा होगी। (१७।३ परि.)

संकेत-सूची:— अव.—अवतरणिका, अ.सा.—अध्यायका सार, टि.—टिप्पणी, दे.—देखें, न.नि.—साधक-संजीवनी परिशिष्टका नम्र निवेदन, परि.—परिशिष्ट, पु.—पुष्पिका, प्रा.—प्राकथन, मा.—मार्मिक बात, वि.—विशेष बात, सं.—सम्बन्ध।

॥ श्रीहरिः ॥

श्रद्धेय स्वामी

रामसुखदासजी महाराजके महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ एवं शीघ्र

कल्याणकारी पुस्तकें

  • १-गीता-साधक-संजीवनी (हिन्दी-टीका) बृहदाकार, ग्रन्थाकार, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी एवं बंगला अनुवाद भी
  • २-साधक-संजीवनी (परिशिष्ट)
  • ३-गीता-दर्पण—(हिन्दी, मराठी, बंगला, गुजराती)
  • ४-साधन-सुधा-सिन्धु
  • ५-गीता-ज्ञान-प्रवेशिका
  • ६-गीता-माधुर्य—(संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, तमिल, कन्नड, मराठी, गुजराती, असमिया, उर्दू, नेपाली, बंगला, उड़िया)
  • ७-कल्याण-पथ
  • ८-जित देखुं तित तू
  • ९-भगवत्प्राप्ति सहज है
  • १०-सुन्दर समाजका निर्माण
  • ११-मानसमें नाम-वन्दना
  • १२-जीवनका कर्तव्य
  • १३-कल्याणकारी प्रवचन— (हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, बंगला)
  • १४-नित्ययोगकी प्राप्ति
  • १५-भगवत्प्राप्तिकी सुगमता— (हिन्दी, अंग्रेजी, कन्नड)
  • १६-भगवान्से अपनापन
  • १७-वास्तविक सुख
  • १८-साधन और साध्य
  • १९-तात्त्विक प्रवचन— (हिन्दी, गुजराती)
  • २०-तत्त्वज्ञान कैसे हो?
  • २१-किसान और गाय
  • २२-जीवनोपयोगी प्रवचन
  • २३-जीवनका सत्य— (हिन्दी, अंग्रेजी)
  • २४-अमृत बिन्दु
  • २५-भगवन्नाम
  • २६-साधकोंके प्रति
  • २७-सत्संगकी विलक्षणता
  • २८-मातृशक्तिका घोर अपमान (तमिल, बंगला)

श्रीमद्भगवद्गीता

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श्रीमद्भगवद्गीता ग्रन्थमें इतनी विलक्षणता है कि अपना वास्तविक कल्याण चाहनेवाला किसी भी वर्ण, आश्रम, देश, सम्प्रदाय, मत आदिका कोई भी मनुष्य क्यों न हो, इस ग्रन्थको पढ़ते ही इसमें आकृष्ट हो जाता है। अगर मनुष्य इस ग्रन्थका थोड़ा-सा भी पठन-पाठन करे तो उसको अपने उद्धारके लिये बहुत ही सन्तोषजनक उपाय मिलते हैं। हरेक दर्शनकेअलग-अलग अधिकारी होते हैं, पर गीताकी यह विलक्षणता है कि अपना उद्धार चाहनेवाले सब-के-सब इसके अधिकारी हैं।

परमश्रद्धेय स्वामीजीने गीताकी यह टीका किसी दार्शनिक विचारकी दृष्टिसे अथवा अपनी विद्वत्ताका प्रदर्शन करनेके लिये नहीं लिखी है, अपितु साधकोंका हित कैसे हो—इसी दृष्टिसे लिखी है। परमशान्तिकी प्राप्ति चाहनेवाले प्रत्येक साधकके लिये, चाहे वह किसी भी देश, वेश, भाषा, मत, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो, यह टीका संजीवनी बूटीके समान है। इस टीकाका अध्ययन करनेसे हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई, मुसलमान आदि सभी धर्मोंके अनुयायियोंको अपने-अपने मतके अनुसार ही उद्धारके उपाय मिल जायेंगे। इस टीकामें साधकोंको अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये पूरी सामग्री मिलेगी।

परमशान्तिकी प्राप्तिके इच्छुक सभी भाई-बहनोंसे विनम्र निवेदन है कि वे इस ग्रन्थ-रत्नको अवश्य ही मनोयोगपूर्वक पढ़ें, समझें और यथासाध्य आचरणमें लानेका प्रयत्न करें।

—प्रकाशक

गीताप्रेस, गोरखपुर — २७३००५

फोन : (०५५१) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३३०३०