समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
दृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञन' से (खं-2-२)
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दृष्टि सम्यक हो जाए तो सभी दुःखों का क्षय हो जाएगा! फिर वह गलती नहीं होने देगी, दृष्टि आकृष्ट नहीं होगी।
कृपालुदेव ने तो कितना कुछ कहा है, फिर भी कहते हैं कि 'देखत भूली' होती है, देखते हैं और गलती हो जाती है। देखत भूली टल जाए तो सभी दुःखों का क्षय हो जाएगा। तो 'देखत भूली' टलने का मैंने यह मार्ग बताया कि 'यह जो स्त्री जा रही है, उनमें तू शुद्धात्मा देखना।' तुझे शुद्धात्मा दिखेंगे तो फिर देखने को और कुछ नहीं रहेगा। बाकी तो जंग लगा हुआ है। किसी को लाल जंग लगा होता है, किसी को पीला जंग लगा होता है, किसी को हरा जंग लगा होता है, लेकिन हमें तो सिर्फ लोहा ही देखना है न? और जंग दिख जाए तो उसके सामने उपाय दे दिया है। संयोगवश फँस जाए तो उसमें हर्ज नहीं है, लेकिन इच्छापूर्वक नहीं होना चाहिए। संयोगवश तो ज्ञानी भी फँस सकते हैं।
यह विषय तो अविचार की वजह से है। सोचने से हमें फायदा-नुकसान का पता चलता है या नहीं? और जिसे विचार नहीं आते तो उसे फायदा-नुकसान का पता नहीं चलता न? उसी तरह यदि कोई सोचनेवाला होगा तो यह विषय तो खड़ा ही नहीं रहेगा, लेकिन यह कालचक्र ऐसा है कि जलन में उसे हिताहित का भान ही नहीं रहा कि खुद का हित किस में है और अहित किस में? दूसरा, इस विषय के स्वरूप को समझपूर्वक बहुत सोचा हो तब भी अभी जो विषय खड़ा होता है, वह पहले के अविचारों का कारण है। इसलिए 'देखत भूली' टलती नहीं है न! विषय का विचार नहीं आया हो, लेकिन कहीं पर ऐसा देखने में आ जाए, तो भी तुरंत ही भूल हो जाती है। देखे और भूल जाए, ऐसा होता है या नहीं?
'देखत भूली' का अर्थ क्या है? मिथ्यादर्शन! लेकिन बाकी सब 'देखत भूली' हो तो उसमें हर्ज नहीं है, लेकिन इस विषय
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
से संबंधित, चारित्र से संबंधित 'देखत भूली' का उपाय क्या है? अगर ज्ञान मिला हो तो खुद को गलती का पता चलता है कि 'यहाँ पर यह गलती हुई, यहाँ मेरी दृष्टि बिगड़ गई थी।' वहाँ पर फिर खुद आलोचना-प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान करके धो देता है। लेकिन जिसे यह ज्ञान नहीं मिला है, वह क्या करेगा बेचारा? उसे तो भयंकर झूठी चीज़ को सच मानकर चलना पड़ता है। यह आश्चर्य है न! यह तो जिसे ज्ञान मिल गया है, उसे दिक्कत नहीं है, वह तो दृष्टि बिगड़ी कि तुरंत धो देता है।
यदि आपका शुद्ध उपयोग है, तो सामनेवाले का कैसा भी भाव हो तब भी आपको छू नहीं पाएगा!
प्रश्नकर्ता : एक स्त्री को देखकर किसी पुरुष को खराब भाव हो जाए, तो इसमें स्त्री का दोष है क्या?
दादाश्री : नहीं, इसमें स्त्री का कोई दोष नहीं है! भगवान महावीर का लावण्य देखकर कई स्त्रियों को मोह उत्पन्न होता था, लेकिन उस की वजह से भगवान को कुछ भी नहीं स्पर्श करता था। यानी ज्ञान क्या कहता है कि आपकी क्रिया हेतुसहित होनी चाहिए। आपको ऐसे बाल नहीं बनाने चाहिए या ऐसे कपड़े भी नहीं पहनने चाहिए कि जिससे सामनेवाले को मोह उत्पन्न हो। अपना भाव साफ होगा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। भगवान केश का लुंचन क्यों करते थे? कि इन बालों की वजह से अगर किसी स्त्री का मुझ पर भाव बिगड़े तो? इसलिए ये बाल ही निकाल दो ताकि भाव ही नहीं बिगड़ें। क्योंकि भगवान तो बहुत रूपवान होते हैं, महावीर भगवान का रूप, पूरे वर्ल्ड में सुंदर! देवता भी बहुत रूपवान होते हैं, लेकिन उस समय तो रूप से भी रूपवान तो भगवान महावीर थे! उन पर कोई स्त्री मोहित न हो जाए, इसलिए उन्हें जागृति रखनी पड़ती थी। फिर भी कोई मोहित हो जाए तो उसके लिए वे खुद जिम्मेदार नहीं थे, क्योंकि खुद की वैसी इच्छा नहीं थी न!
दृष्टि उखड़े, 'श्री विजन' से (खं-2-२)
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मोह राजा का अंतिम व्यूह
मोहबाजार चौदह साल की उम्र में शुरू होता है और चालीस साल के बाद खत्म होता है, तब वह पेड़ सूख जाता है! ये तो तरह-तरह के मोह हैं! वर्ना हिन्दुस्तान के एक-एक मनुष्य में तो ऐसी शक्तियाँ हैं कि काम निकाल दें!
प्रश्नकर्ता : सबसे ज्यादा शक्तियाँ कहाँ खर्च होती है? शक्तियाँ ज्यादातर कहाँ व्यर्थ हो जाती हैं?
दादाश्री : इस मोह में ही, मोह और अजागृति में। बाकी जितना मोह कम उतनी ही शक्ति ज्यादा।
मोहराजा ने अंतिम पांसा फेंका है। अभी सर्वत्र विषय का ही मोह व्याप्त हो गया है। पहले तो मान का मोह, कीर्ति का मोह, लक्ष्मी का मोह, मोह सर्वत्र बिखरा हुआ था। आज सभी मोह सिर्फ विषय में ही व्याप्त हो गया है और भयंकर जलन में ही जीवन जी रहे हैं। सिर्फ ये साधु-महाराज ही विषय से अलग हुए हैं, इसलिए उन्हें थोड़ी-बहुत शांति है।
जिसमें ज्ञानशक्ति जबरदस्त हो और विषय का तो विचार तक नहीं आता हो, तो वह भले ही शादी न करे। लेकिन जब तक रूप पर मोह है, तब तक शादी कर लेनी चाहिए। शादी करना आवश्यक है और शादी करना बहुत बड़ा जोखिम है और जोखिम उठाए (में उतरे/पड़े) बिना पार आए ऐसा भी नहीं है। जिसे मोह है, उसे शादी कर ही लेनी चाहिए। वर्ना हरहाया पशु बन जाएगा। किसी के खेत में घुसा कि मारा जाएगा और भयंकर अधोगति को न्यौता देगा। शादी यानी क्या कि हक का भोगना, और उसमें तो अणहक्क का विचार आए तो अधोगति में जाएगा! शरीर पर राग ही क्यों होना चाहिए? शरीर किसका बना हुआ है?
प्रश्नकर्ता : पुद्गल का।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दादाश्री : हाँ, पुद्गल तो है, लेकिन कैसा पुद्गल? यदि सिर्फ़ सोने से बना होता तो दुर्गंध नहीं आती, हाथ नहीं बिगड़ते, कुछ भी नहीं, लेकिन यह तो सुंदर चादर से पोटली बाँधी हुई है, इसलिए कितना फँसाव हो गया है। उसी का नाम मोह है न! जो है वह दिखता नहीं है और जो नहीं है, वह दिखता है! निर्माही कौन? ज्ञानीपुरुष। उन्हें जैसा है वही दिखता है! आरपार अंदर, हड़िड़यों-वड़िड़यों, आंतें-वांतें सबकुछ दिखता है, यों ही सहज स्वभाव से सबकुछ दिखता है।
प्रश्नकर्ता : उस तरह की दृष्टि होगी तो फिर आकर्षण रहेगा ही नहीं न?
दादाश्री : इस संडास को देखते हैं, तब वहाँ पर क्या कभी आकर्षण होता है? देखते ही मूर्छित हो जाएं तो, वह इसलिए कि पिछले जन्म का मोह छप गया है। यह चमड़ी से ढका हुआ मांस ही है। लेकिन ऐसा रहता नहीं है न! जिन्हें मूर्च्छा नहीं होती, उन्हें वह जागृति रहती है। जैसा है वही दिखे, उसी को जागृति कहते हैं! केवल शुद्धात्मा के दर्शन करने जैसा है, बाकी का सब तो रेशमी चादर से लपेटा हुआ मांस ही है!
हमारी आज्ञा का पालन करोगे तो तुम्हारा मोह जाएगा। मोह को तुम खुद निकालने जाओगे तो वही तुम्हें निकाल दे, ऐसा है! इसलिए उसे निकालने की बजाय उससे कहना, 'बैठिए साहब, हम आपकी पूजा करेंगे।' फिर अलग होकर तुमने उस पर उपयोग रखा और दादा की आज्ञा में आ गए तो मोह को तुरंत अपने आप जाना ही पड़ेगा। फिर मोह खुद ही कहेगा कि, 'अपना तो इधर कुछ भी नहीं चलेगा, इधर दादा का साम्राज्य हो गया है, अब अपना कुछ नहीं चलेगा।' तो मोह सभी बोरिया-बिस्तर समेटकर चला जाएगा। बाकी और किसी भी तरीके से मोह को कोई निकाल नहीं सका है। वह तो मोहराजा कहलाता है!
दृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञान' से (खं-2-२)
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विषय में 'छिपी हुई रुचि' तो नहीं है न?
विषय का विरेचन करनेवाली दवाई, वर्ल्ड में कोई भी नहीं है। अपना ज्ञान ऐसा है कि विषय का विरेचन हो जाता है। अंदर विचार आया और वह अवस्था खड़ी हुई, कि तुरंत ही उसकी आहुति दे दी जाती है। सिर्फ यह विषय ही ऐसा है कि निरे कपट का ही संग्रहस्थान है न! जिसमें अनंत दोष लगते हैं और कितने ही जन्म बिगाड़ देता है! यदि विषय हो तो वे एकदम से चले नहीं जाएंगे। लेकिन उससे तंग आ जाए और उसका प्रतिक्रमण करता रहे तो हल आ जाएगा। प्रतिक्रमण किसे कहते हैं कि दाग लगा कि तुरंत धो देना। उसे प्रतिक्रमण कहते हैं। इस दाग को क्यों धोते हो? क्योंकि वह क्रमण नहीं है, यह अतिक्रमण है। इसलिए उसका प्रतिक्रमण करो और वह 'शूट ऑन साइट' होना चाहिए। अक्रम विज्ञान का प्रतिक्रमण 'शूट ऑन साइट' है। बर्ना ये लफड़े छूटेंगे ही नहीं न?! एकावतारी होना है, लेकिन ये लफड़े कब छूटेंगे? 'शूट ऑन साइट' प्रतिक्रमण से छूट जा सकता है।
विषय का प्रतिक्रमण रविवार को पूरा दिन करता रहे, तो बाद में छः दिन तक विषय की बात खड़ी हो, उससे पहले ही प्रतिक्रमण उसे घेर लेंगे। अंदर विषय तो खड़े होंगे, लेकिन प्रतिक्रमण का ऐसा जोर रखना कि प्रतिक्रमण के सभी पुलिस (सिपाही) उसे घेर लें।
प्रश्नकर्ता : जैसे-जैसे हम प्रतिक्रमण करेंगे, वैसे-वैसे विषय कम होगा न?
दादाश्री : हाँ, प्रतिक्रमण करने से कम होता जाएगा। प्रतिक्रमण करता तो है, लेकिन अंदर विषय की रुचि रहा करती है। उसका खुद को पता नहीं चलता। वह रुचि बिल्कुल भी नहीं रहनी चाहिए। अरुचि उत्पन्न होनी चाहिए। अरुचि मतलब तिरस्कार नहीं, लेकिन इसमें कुछ है ही नहीं ऐसा होना चाहिए।
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प्रश्नकर्ता : अंदर जो रुचि पड़ी हुई है, उसका क्यों पता नहीं चलता?
दादाश्री : वह इतना ज्यादा आवरण है कि उसका पता ही नहीं चल पाता।
प्रश्नकर्ता : लेकिन यों तो ऐसा लगता है कि मुझे तो यह विषय भोगना ही नहीं है।
दादाश्री : वह तो ऐसा लगता है, लेकिन वह सब शाब्दिक है। अभी अंदर जो रुचि है, वह गई नहीं है। रुचि का बीज अंदर है, धीरे-धीरे वह तुझे समझ में आएगा। जो डेवेलप्ड इंसान है, उसे समझ में आ जाता है।
प्रश्नकर्ता : क्षत्रिय को विषय के सामने क्षत्रियपना नहीं आ जाता?
दादाश्री : आता है न! लेकिन विषय में क्षत्रियपना आ पाए, ऐसा नहीं है। क्षत्रियपना होता, तब तो उसे काट देने को कहते, लेकिन यह विषय वह समझने का विषय (सब्जेक्ट) है। इसलिए बहुत सोचने और समझने पर विषय जाता है। इसलिए विषय से छूटने के लिए मैंने ये तीन विज्ञान बताए हैं न? फिर उसे राग नहीं होता न! वरना यदि स्त्री ने यों अच्छे गहने और अच्छे कपड़े पहने हो तो सबकुछ भूल जाता है और मोह उत्पन्न हो जाता है।
प्रश्नकर्ता : अभी भी अंदर से विषय में रुचि है, फिर भी पता नहीं चलता कि रुचि है या नहीं।
दादाश्री : इतना जान लिया, वह भी अच्छा है।
प्रश्नकर्ता : विषयों में जो इन्टरेस्ट उत्पन्न होता है, वह रुचि पड़ी है, उसके आधार पर उत्पन्न होता है?
दादाश्री : हाँ। रुचि नहीं हो तो कुछ नहीं होगा। अरुचिवाली
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चीज़ पर विषय कैसे उत्पन्न हो सकता है? अरुचि पर विषय कैसे उत्पन्न होगा? किसी स्त्री का हाथ जल गया हो, रोज पूरे शरीर को पुरुष छूता हो, लेकिन हाथ जल जाए और छाले पड़ गए हों और फिर पीप निकल रहा हो, उस समय वह स्त्री कहे कि 'यहाँ ये जरा धो दीजिए न।' तो क्या कहेगा?
प्रश्नकर्ता : मना कर देगा।
दादाश्री : अब उसमें रुचि थी, तो वहाँ ऐसा देखकर अरुचि हो जाती है न! फिर वापस रुचि उत्पन्न नहीं होनी चाहिए। लेकिन स्टैबिलाइज़ रहना चाहिए। यह तो यों फिर से ठीक हो जाए तो, जैसे थे वैसे के वैसे ही हो जाते हैं, क्या ऐसा नहीं है? स्टैबिलाइज़ हो जाना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : स्टैबिलाइज़ किस प्रकार से हो सकते हैं?
दादाश्री : वह तो यहाँ, इस रोड पर जाकर पूछ आना न! जैसा वे लोग करते हैं वैसे ही तू भी करना! कंकर-मेटल डालकर वहाँ पर रोलर घुमाते हैं और वह स्टैबिलाइज़ हो जाता है। वह देख लेना।
प्रश्नकर्ता : लेकिन कौन सा रोलर घुमाना चाहिए?
दादाश्री : वह तो उस रोलर से हमें पश्चाताप कर करके, दोष को निकालना है।
प्रश्नकर्ता : इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद खुद का निश्चय है, ध्येय है, उसके बावजूद भी जो रुचि रही हुई है, उस रुचि को तोड़ने के लिए, उसका छेदन करने के लिए क्या करना चाहिए?
दादाश्री : एकजोक्ट प्रतिक्रमण करेगा तब हो पाएगा। अरुचि देखने के अन्य सभी साधन उसके अंदर हैं, अरुचि देखने के। वह सब हेलप करता रहेगा।
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प्रश्नकर्ता : स्त्री के प्रति मोह और राग जाएगा, क्या तब रुचि खत्म हो जाएगी?
दादाश्री : रुचि की गाँठ तो अनंत जन्मों से पड़ी हुई है। कब फूट निकले, वह कहा नहीं जा सकता। इसलिए इस संग में ही रहना। इस संग से बाहर गए कि फिर से उस रुचि के आधार पर सब फूट निकलेगा वापस। इसलिए इन ब्रह्मचारियों के संग में ही रहना पड़ेगा। अभी तक यह रुचि गई नहीं है, इसलिए दूसरे कुसंग में गए कि तुरंत ही वह शुरू हो जाता है। क्योंकि कुसंग का पूरा स्वभाव ही ऐसा है।
प्रश्नकर्ता : प्रतिक्रमण करें फिर भी ?
दादाश्री : वहाँ तू लाख प्रतिक्रमण करेगा, फिर भी यदि कुसंग होगा तो सबकुछ उल्टा ही होगा!
प्रश्नकर्ता : लेकिन वह कुसंग तो हमें चाहिए नहीं। उसकी तो हमें इच्छा ही नहीं है, फिर भी ?
दादाश्री : कुसंग तो हमें नहीं चाहिए, लेकिन कभी कभार ऐसा संयोग आ जाता है न? सत्संग छूट गया और कुसंग में आ गया तो क्योंकि अंदर रुचि पड़ी है इसलिए कुसंग घेर लेगा। लेकिन जिसकी रुचि खत्म हो गई है उसे फिर कुसंग नहीं छूएगा। रुचि खत्म हो गई है यानी उसमें रुचि का बीज नहीं है, फिर संयोग मिलने पर भी बीज उगेगा ही नहीं न!
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[ ३ ]
दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार
जो कभी न डगमगाए, वही निश्चय
एक भाई मुझसे कह रहे थे कि 'इच्छा ही नहीं है फिर भी विषय के विचार आते हैं, तो मैं क्या करूँ?' इसके अलावा और कुछ किया ही नहीं न! अनंत जन्म इसी का सेवन किया, उसे इसी के प्रतिस्पंदन आते रहते हैं! ज्ञानी मिलें तो उसे छुड़वा देंगे, नहीं तो कोई नहीं छुड़वा सकता। कैसे छुड़वाएगा? कौन छुड़वाएगा? जो छूटा हुआ हो, वही छुड़वा सकता है और विषय से छूट गए तो समझना मुक्त हो गए! सिर्फ इस विषय से छूट गए कि काम हो गया। जिसे छूटने की इच्छा है, उसे कभी न कभी साधन मिल जाता है। स्ट्रोंग इच्छावाले को जल्दी मिल जाता है और मंद इच्छावाले को देरी से मिलता है, लेकिन इच्छा यदि सच्ची है तो मिल ही जाता है। शादी की इच्छावाले की शादी हुए बिना रहती है? उसी तरह इसकी भी स्ट्रोंग इच्छा होनी चाहिए।
निश्चय किसे कहते हैं? कि कैसा भी लशकर आ जाए फिर भी उसकी सुने नहीं! अंदर कितने भी समझानेवाले मिलें फिर भी उनकी सुनें नहीं! निश्चय करने के बाद, फिर वह बदले नहीं, तो उसी को निश्चय कहते हैं।
निश्चय ही करना है, और कुछ भी नहीं करना है। लोग भाव को तो समझते ही नहीं कि भाव किसे कहते हैं? भाव आने के बाद तो अभाव होता है, लेकिन यह तो निश्चय है कि
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
हमें ऐसा तो नहीं ही! निश्चय, वह पुरुषार्थ है! आपने जितने निश्चय किए थे न, यह रोज सत्संग में कैसे आ सकते हो? निश्चय किया है, 'जाना है', इसलिए जा पाते हो! उसके बगैर रूपक में आएगा नहीं न! ये तुम्हारे पहले के निश्चय ओपन हुए हैं। इस अनिश्चय की वजह से ही तो सभी दुःख हैं। ये भी चलेगा और वह भी चलेगा, तो उसे वैसा मिलेगा। यह तो हम बहुत सूक्ष्म बात कहना चाहते हैं।
जितने निश्चय किए हैं, उतने फल मिलेंगे। देखो न, नौकरी के निश्चय किए, व्यापार के निश्चय किए, ऐसे रहना है, वैसे निश्चय किए, घर में नहीं रहना है, उसके निश्चय किए। वापस घर में रहना है, ऐसे निश्चय किए और उसी अनुसार फल मिले। यही देखना है, कि यह फिल्म कैसे चल रही है! हमने ऐसा निश्चय किया था कि 'सत्संग करना है, जगत् कल्याण के लिए प्रयत्न करना है।' वह आज हमारा बाईस साल से चल रहा है और यह तो अभी और भी रहनेवाला है! आज हमने जो तय किया, वही ठेठ तक रहे, उसे निश्चय कहते हैं! तो फिर उसकी लिंक आगे मिल जाती है वापस। यहाँ से अर्था निकलने से पहले निश्चय बदल दे तो फिर आगे जाकर निश्चय कहाँ से मिलेगा? आगे जाकर उसे टाइम पर निश्चय मिलेगा जरूर, लेकिन वह सत्त् नहीं, पीसेजवाला (टुकड़े-टुकड़े) मिलेगा।
किसी बड़े ज्योतिष ने कहा हो कि कढ़ी ढुलनेवाली है, फिर भी हमें प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि अगर टाइमिंग बदल जाए तो उसका ज्योतिष झूठा पड़ जाएगा और दिन में टाइमिंग तो बदलते ही रहते हैं! ऐसे ऐसे संयोग खड़े होते हैं, उससे टाइमिंग बदल जाता है! अपनी भावना अत्यंत मजबूत हो तो टाइमिंग भी बदल जाता है! आत्मा अनंत शक्तिवाला है!
प्रश्नकर्ता : क्या निश्चय के सामने टाइमिंग बदल जाता है?
दादाश्री : निश्चय के सामने सारे टाइमिंग बदल जाते हैं।
दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)
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ये भाई कह रहे थे कि ‘मैं पक्का वहाँ आ जाऊँगा लेकिन यदि नहीं आ पाऊँ तो निकल जाना।’ तो हम समझ गए कि इन्होंने कच्चा निश्चय किया है, उसकी वजह से आगे जाकर एविडेन्स ऐसे मिलेंगे कि तय किए अनुसार नहीं हो पाएगा।
अतः हमें निश्चय करना है, ऐसा तय करना, लेकिन कभी कभार संयोग वापस भुला देते हैं। अब अगर वे भाई यदि निश्चय से कहते कि ‘मैं आ ही रहा हूँ।’ तो आगे जाकर निश्चय को टाईमिंग मिल जाता और यहाँ आ पाते। इसलिए जो निश्चय किया है, वह आगे एविडेन्स खड़े करता है। हमें निश्चय करना है, लेकिन यदि संयोग उसे भी भुला दें तो समझना कि व्यवस्थित! यह तो यदि खुद की सारी सत्ता यदि हाथ में आ जाए तब तो तू व्यवस्थित को भी नचाएगा! लेकिन ऐसी सत्ता है नहीं न!
पकड़े रखे निश्चय को ठेठ तक....
निश्चय शक्ति तो सबसे बड़ी शक्ति है, नदी पार करनी है या नहीं? तो कहता है, करनी है! पार करनी है मतलब करनी है और नहीं तो नहीं! उन विषय के विचारों पर प्रतिक्रमण का जोर रखना और अब संभाल लोगे तो अंदर जो फ्रैक्चर हो गया है, वह ठीक हो जाएगा।
तुझे ‘उपादान’ जागृत रखना है और हम तो ‘निमित्त’ हैं। हम आशीर्वाद देते हैं, वचनबल रखते हैं, लेकिन निश्चय संभालना तेरे हाथ में है। यह ज्ञान मिला है, अर्थात ऐसा ऊँचा पद मिला है कि कोई भी तय किया हुआ काम हो सकता है। और किसी जगह पर जोखिम नहीं है। सिर्फ यही एक जोखिम है और ‘इस’ तरफ पैर रखा कि मुक्ति! यदि आपका निश्चय नहीं डिगे तो काम हो जाएगा, अतः दिन-रात यही एक स्कू टाइट करते रहना। चाय पी ली कि वापस टाइट करना। क्योंकि जगत् की विचित्रता का अंत नहीं है। कब फँसा दे, यह कह नहीं सकते।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
जरा सा भी कच्चा पड़ जाए न, तो वहाँ पर ब्रह्मचर्य खत्म हो जाएगा। स्ट्रोंग निश्चय यदि कभी थोड़ा सा, जरा सा एक बार भी टूटा, निश्चय सेट नहीं किया और अगर टूट गया तो फिर इस ओर मुड़ जाएगा! फिर खत्म हो जाएगा।
मन इस तरफ स्टेडी (स्थिर) रहता है तो अच्छा है, वर्ना खराब विचार आए तो हमें बता देना। तो हम उपाय बताएँगे, कि इस रास्ते पर ऐसा है, वर्ना मारा जाएगा। उपाय हमेशा हाथ में होना चाहिए। दादा को बता देने से मन बंध जाता है। विचार ऐसी चीज है, गॉठ चार-छः महीने बंद रहती है और फिर फूटे तब विचार तो आएँगे लेकिन हमें प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए।
विषय तो प्रत्यक्ष महादुःख है, निरे अपयश के ही पोटले! अतः जागृति तो इतनी रहनी चाहिए कि यह कर्म करने से पहले क्या स्थिति, फिर क्या स्थिति, वह सबकुछ एकदम दिखे ज्ञान इतना निरावरण हो जाए, उसके बाद दिक्कत नहीं है।
समझो निश्चय के स्वरूप को...
प्रश्नकर्ता : अपने निश्चय को तुड़वाता कौन है?
दादाश्री : वही, अपना ही अहंकार। मोहवाला अहंकार है न! मूर्छित अहंकार! जैसे शराब पीया हुआ इंसान अंदर घूम रहा हो, वैसा ही है वह, वह तुड़वा देता है!
प्रश्नकर्ता : ऐसा हो तो हमें क्या करना चाहिए?
दादाश्री : करना तो कुछ है ही नहीं न! दादा की आज्ञा का पालन करे तो ऐसा सब रहेगा ही नहीं न!! 'मैं शुद्धात्मा हूँ', उसके बाद अहंकार का सब देखते रहना है, आज्ञा का पालन करे तो कुछ है ही नहीं। लेकिन 'आज्ञा क्या है', वह समझे ही नहीं हैं न अभी तक? सिर्फ समभाव से निकाल करते हैं, वह भी थोड़ा-बहुत समझकर करते हैं अभी तक! वह शराब पीकर
दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)
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घूमता है, इसलिए मोह करवाता ही रहता है न? ! अंदर जो अहंकार है, वह पूरे दिन मोह की शराब पीकर घूमता ही रहता है और जहाँ मोहवाली चीज़ देखे कि वापस वहाँ खिंच जाता है।
प्रश्नकर्ता : वहाँ पर क्या निश्चय काम नहीं आता?
दादाश्री : निश्चय तो काम आता है, लेकिन पहले से निश्चय हो और दादा की आज्ञा में रहे, तब काम आता है। दादा की आज्ञा से निश्चय मजबूत होता है। वह निश्चय काम आता है, बाकी ऐसा गाँठवाला निश्चय नहीं चलेगा। निश्चय कैसा होना चाहिए? कि जो डगमगाए नहीं, फिर से कहना भी नहीं पड़े कि ‘मैंने निश्चय किया है।’ यह तो गाँठ बाँधता है कि आज यह निश्चय किया है, ‘अब यह नहीं खाना है’ और कल वापस खाने बैठ जाता है!
अर्थात दादा की आज्ञा में रहें, तो फिर निश्चय मजबूत हो जाता है। उसके बाद वह निश्चय कभी बदलता ही नहीं। हमारी आज्ञा का पालन करते रहना। आज्ञा आसान और अच्छी है, रिलेटिव और रियल पूरे दिन में एक घंटा देखना ही पड़ेगा न! तब जाकर निश्चय मजबूत होगा। निश्चय को मजबूत करनेवाली ‘यह’ आज्ञा है। हमारी बातों में से सार निकाल लेना कि इसका सार क्या है? उतना ही वाक्य आपको पकड़ लेना है। आपका आहार ऐसा है कि सभी वाक्य तो ध्यान में रहेंगे नहीं!
प्रश्नकर्ता : कैसा निश्चय करना चाहिए?
दादाश्री : हमने जो निश्चय किया हो, उसी तरफ जा सकते हैं। आत्मा अनंत शक्ति स्वरूप है, वह शक्ति प्रकट हो जाएगी। आत्मा निश्चय स्वरूप है, और आपके निश्चय करने की जरूरत है। डगमग डगमग नहीं चलेगा! एक ही स्ट्रॉंग अभिप्राय जिंदगी भर त्याग करवाता है! अभिप्राय थोड़ा सा भी कच्चा रह जाए तो उससे क्या होगा? जब कर्म के उदय आएँगे तो फिर इंसान का कुछ भी नहीं चलेगा, फिर वह स्लिप हो जाएगा। अरे, शादी तक
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
कर लेगा! 'वे अभिप्राय पक्के नहीं हैं,' इसका क्या मतलब है कि उसमें जरा छूट रहने दी होती है।
निश्चय के परिपोषक
आपका संपूर्ण ब्रह्मचर्य पालन करने का निश्चय और हमारी आज्ञा, वह तो काम ही निकाल देगा, लेकिन यदि भीतर निश्चय जरा सा भी इधर-उधर नहीं हो तो! हमारी आज्ञा तो, वह जहाँ जाएगा वहाँ रास्ता दिखाएगी और हमें बिल्कुल भी प्रतिज्ञा नहीं छोड़नी चाहिए। विषय का विचार आ जाए तो आधे घंटे तक तो धोते रहना चाहिए कि क्यों अभी तक विचार आ रहे हैं! और आँखें गड़ाकर तो किसी के भी सामने देखना ही नहीं चाहिए। जिन्हें ब्रह्मचर्य पालन करना है, उन्हें आँखें गड़ाकर तो देखना ही नहीं चाहिए, बाकी सब तो देखेंगे। तू नीचे देखकर चलता है या ऊपर देखकर चलता है?
प्रश्नकर्ता : नीचे देखकर।
दादाश्री : कितने समय से?
प्रश्नकर्ता : जब से ज्ञान मिला है, तब से।
दादाश्री : उससे पहले ऊपर देखकर चलता था? उससे तो आँखें जल जाती हैं और सभी रोग उसी में हैं। देखते ही रोग घुस जाता है! उसमें क्या आँखों का दोष है? नहीं। अंदर की अज्ञानता का दोष है! अज्ञानता से उसे ऐसा ही लगता है कि 'यह स्त्री है', लेकिन ज्ञान क्या कहता है? कि 'यह शुद्धात्मा है'। मतलब जिसे ज्ञान है, उसकी तो बात ही अलग है न?!
हमारा वचनबल तो रहता है लेकिन इतनी चीजों का ध्यान रखना पड़ेगा। तब आपका निश्चय नहीं डिंगेगा। एक तो किसी के सामने दृष्टि नहीं गड़ानी चाहिए, धर्म संबंधित हो तो हर्ज नहीं है, लेकिन वह सहज होना चाहिए। दूसरा, कपड़े पहना हुआ इंसान
दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)
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यों देखते ही अगर नंगा हो तो कैसा दिखेगा? फिर अगर चमड़ी निकाल दें तो कैसा दिखेगा? फिर चमड़ी काटकर आँतें बाहर निकाल दी हों तो कैसा दिखेगा? इस तरह संपूर्ण दृष्टि आगे-आगे बढ़ती रहे, तो वे सभी पर्याय यों एकजोड़ दिखेंगे। लेकिन ऐसा अभ्यास ही नहीं किया न? तो ऐसा कैसे दिखेगा? इसका तो पहले खूब-खूब सोचकर अभ्यास करना पड़ेगा। इस स्त्री जाति को सिर्फ यों हाथ छू गया हो तो भी निश्चय डिगा देता है। रात को सोने ही नहीं दे, ऐसे हैं वे परमाणु! इसलिए स्पर्श तो होना ही नहीं चाहिए और अगर दृष्टि संभाल ले तो फिर निश्चय नहीं डिगेगा!
ब्रह्मचर्य की भावना करना और बहुत स्ट्रोंग रहना! निश्चय में सावधान रहना, क्योंकि पुण्य अस्त होते देर नहीं लगती। खुद के निश्चय में बहुत ताकत हो तभी काम होता है। बार-बार मन बिगड़ जाता हो तो फिर निश्चय रहेगा ही नहीं न? निश्चय जबरदस्त होना चाहिए, 'स्ट्रोंग' होना चाहिए। उसके बाद सभी सहार देते हैं, सभी 'हेल्प' करते हैं। निश्चय के सामने किसी की नहीं चलती। निश्चय सबसे बड़ी चीज़ है। खुद का निश्चय मज़बूत होना चाहिए। उस निश्चय को, जब अंदर ही अंदर बात निकले तो ठगता रहता है, और फिर अंदर से ही सलाह दे देकर निश्चय को तोड़ देता है। तो जब-जब ये सलाह दी जाए, तब हमें उसकी नहीं सुननी चाहिए। तेरे साथ ऐसा होता है कभी?
प्रश्नकर्ता : दो महीने पहले इन सब में से गुज़र चुका हूँ।
दादाश्री : अभी नहीं होता न अब?
प्रश्नकर्ता : नहीं।
दादाश्री : तब अच्छा है। अंदर तो बहुत भारी 'रेजिमेन्ट' पड़ी हुई हैं, बहुत बड़ी-बड़ी हैं।
इतना ही संभाल लेना ज़रा
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
हमारे वचनबल से कई लोगों का रेग्युलर हो जाता है। हमारा वचनबल और आपका अडिग नक्कीपन, इन दोनों का ही अगर गुणा(मल्टीप्लीकेशन) हो जाए तो बीच में किसी की ताकत नहीं है कि उसे बदल सके! ऐसा है हमारा यह वचनबल। हम आपसे क्या कहते हैं कि ‘आप अडिग हो जाओ, आप ढीले मत पड़ना।’ आपका दृढ़ निश्चय होना चाहिए कि दादा की आज्ञा ही धर्म है और आज्ञा ही मुख्य चीज है।
हम ब्रह्मचर्य व्रत हर किसी को नहीं देते हैं और अगर देते हैं तो भी हम कहते हैं कि ‘हमारा वचनबल है, जबरदस्त वचनबल है। जो कर्म के उदय को बदल दे, ऐसा वचनबल है, लेकिन यदि तेरी स्थिरता नहीं टूटे तो।’ तुझे बहुत मजबूती रखनी चाहिए। ज्ञानी के वचनबल के अलावा अन्य कोई यह कार्य नहीं कर सकता, ज्ञानी का वचनबल इतना अधिक होता है! ज्ञानी का मनोबल अलग तरह का होता है क्योंकि ज्ञानी खुद वचन के मालिक नहीं हैं, मन के मालिक नहीं हैं। जो वचन के मालिक होते हैं, उनके वचन में बल ही नहीं होता। पूरा जगत् वचन का मालिक बनकर बैठा है, उनके वचन में बल नहीं होता। बल तो, अगर वाणी रिकॉर्ड की तरह निकले, तो वह वचनबल कहलाता है।
हमारे वचनबल का काम ऐसा है कि सबकुछ पालन करने दे, सभी कर्मों को तोड़ दे! वचनबल में तो ग़ज़ब की शक्ति है कि काम निकाल दे! खुद यदि जरा भी नहीं डिगे तो कर्म उसे नहीं डिगा सकेगे! यदि कर्म डिगा दे तो उसे वचनबल कहेंगे ही नहीं न? वीतरागों ने वचनबल और मनोबल को तो टॉपमोस्ट कहा है, जबकि देहबल को पाशवी बल कहा है! देहबल से लेना-देना नहीं है, वचनबल से लेना-देना है!
प्रश्नकर्ता : मनोबल यानी क्या? ब्रह्मचर्य के लिए इस तरह पक्का हो जाए, डिगे नहीं, क्या उसे मनोबल कहते हैं?
दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)
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दादाश्री : वह तो अगर एक बंदर कूदे तो फिर दूसरा भी कूदता है। ऐसे एक बार देख ले तो फिर उसे कूदने की हिम्मत आती है। ऐसा करते-करते मनोबल बढ़ता जाता है, लेकिन जिसने देखा ही नहीं हो, वह कैसे कूदेगा?
प्रश्नकर्ता : तो अगर ये बातें सुनेगा तो कूदेगा?
दादाश्री : लेकिन वह तो साथ ही उसकी खुद की अंदर इच्छा हो, खुद की भावना ऐसी हो, तब ऐसी मजबूती आ पाएगी।
प्रश्नकर्ता : भावना तो मेरी ऐसी ही है।
दादाश्री : वह अपने आप ही मजबूत हो जाएगा। एक तरफ बाड़ बनाएँ और उस ओर की बाड़ में सियार छेद कर दें, और उन्हें अगर हम नहीं भरेँ तो क्या होगा? वह तो पीछे के सभी 'होल' भरते जाना चाहिए न? और नई बाड़ बनाते जाना पड़ेगा। भावना इतनी मजबूत हो तो सबकुछ हो सकता है।
प्रश्नकर्ता : पिछले होल भरना अर्थात् प्रतिक्रमण करके ही न?
दादाश्री : प्रतिक्रमण तो करने ही हैं, लेकिन अभी तो कमजोरियाँ जानी चाहिए न? मन मजबूत होना चाहिए न? उस तरफ दृष्टि भी नहीं जाए, ऐसा होना चाहिए। मन में तय किया हो कि उस ओर देखना ही नहीं है तो फिर देखेगा ही नहीं वह! फिर पीछे से भूतों की तरह कितना भी चिल्लाए, लेकिन फिर भी उस तरफ देखेगा ही नहीं, वह घबराएगा ही नहीं न! उस तरह का मनोबल दिन-ब-दिन विकसित होता जाए, तो ठीक है!
प्रश्नकर्ता : वैसी इच्छा तो अंदर से बिल्कुल भी नहीं होती।
दादाश्री : वह तो ऐसा लगता है। दो दिन के लिए ऐसा लगता है। लेकिन वह बात तो, जब एक साथ दस साल का
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
हिसाब देखें, तब जाकर सही है!
प्रश्नकर्ता : यानी ऐसा दस साल तक रहना चाहिए?!
दादाश्री : दस साल नहीं, चौदह साल तक रहना चाहिए, राम वनवास गए थे उतने साल!! चौदह साल बीत गए, तब जाकर राम मजबूत हुए। इसलिए तो हम कहते हैं कि हमारी आज्ञा और साथ में इस ज्ञान को सिन्सियरली एक्जेक्टनेस में रखे तो ग्यारह साल या चौदह साल में पूर्णहुति हो जाएगी।
कहीं पोल को पोषण तो नहीं मिलता न?
प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य 'स्वभाव में होना' मतलब क्या?
दादाश्री : ब्रह्मचर्य 'स्वभाव में रहना' यह शब्द कहाँ से ले आया तू? आत्मा स्वभाव से ही ब्रह्मचारी है, आत्मा को ब्रह्मचारी होने की जरूरत नहीं है।
प्रश्नकर्ता : आपने वह बात कही थी कि पिछले जन्म में जो भावना की हो, अभी वह उसके उदय में आ जाए तो वह ब्रह्मचर्य पालन करता है।
दादाश्री : वह तो जो भावना पहले आई हो, जो पहले 'प्रोजेक्ट' की हो, उसी अनुसार अभी उदय आता है। जैनों के बेटे-बेटियाँ जो दीक्षा लेते हैं, तूने वह देखा है क्या? बीस साल का लड़का होता है, पढ़ा-लिखा होता है, धनवान होता है, वह दीक्षा ले लेता है। उसका क्या कारण है? पिछले जन्मों में उन्होंने दूसरे साधु-साध्वियों के संग में रहने से ऐसी भावना की थी और जैनों में ऐसा रिवाज है कि उनके बेटे-बेटी ऐसी दीक्षा लें तो उन्हें बहुत आनंद होता है, 'ओहोहो! उसके आत्मा का कल्याण कर रहा है। हमें तो मोह है और उसका मोह चला गया है।' इसलिए वे लोग तो बेटे की हेल्प करते हैं! जबकि अपने लोग तो हेल्प नहीं करते। अपने यहाँ तो ऐसा कहते हैं
दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)
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कि बेटा यदि चला जाएगा तो मेरा नाम लुप्त हो जाएगा। लेकिन अपने में भी पहले भावना की हो, तभी तो 'मुझे ब्रह्मचर्य पालन करना है' ऐसा स्ट्रॉंग बोलेगा, बर्ना अंदर डगमगाता रहेगा। क्या होता है ?
प्रश्नकर्ता : डगमगाता है।
दादाश्री : हाँ, डगमगाता है कि 'ऐसा करूँ या वैसा करूँ।' क्षणभर में विचार बदल जाता है और क्षणभर में विचार आता है। तेरा विचार बदल जाता है क्या कभी?
प्रश्नकर्ता : नहीं बदलता।
दादाश्री : कितने समय से नहीं बदला है?
प्रश्नकर्ता : चार महीनों से।
दादाश्री : चार महीने? मतलब अभी यह पौधा बड़ा नहीं कहलाएगा न? उसे तो इतना छोटा सा पौधा कहेंगे। वह तो अगर गाय के पैरों तले आ जाए तो भी दब जाएगा।
प्रश्नकर्ता : किसी का ब्रह्मचर्य का निश्चय डगमगाए तो क्या उसकी पहले की भावना ऐसी होगी, इसलिए?
दादाश्री : नहीं, ऐसा नहीं। निश्चय ही नहीं है उसका। यह पहले का प्रोजेक्ट नहीं है और यह जो निश्चय किया है, वह लोगों का देखकर किया है। यह सिर्फ देखा-देखी है, इसलिए डगमगाता रहता है, इससे अच्छा तो शादी कर ले ना भाई। क्या नुकसान हो जाएगा? कोई लड़की ठिकाने लगेगी। और जो शादी करता है उसकी जिम्मेदारी है न? नहीं करे तो कुछ जिम्मेदारी है क्या उसकी? दूसरे ने शादी की हो तो तुझ पर जिम्मेदारी आएगी? जितना बोझ उठा सको उतना उठाओ। दो बीवियाँ लानी हों तो दो लाओ। बोझ उठना चाहिए न तुमसे? और बोझ नहीं उठा सको तो यों ही कुंवारे रहो, ब्रह्मचारी रहो, लेकिन ब्रह्मचर्य का
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
पालन होना चाहिए न?
नहीं चल सकता अपवाद ब्रह्मचर्य में
ये भाई सच कह रहे हैं कि ऐसे अगर डगमगाए तो उसका क्या अर्थ है?! डगमगाने का इतना ही कारण है कि आज के इन सब के हिसाब से हम करने जाते हैं, दौड़ते हैं लेकिन दौड़ा तो जाता नहीं, फिर वापस थोड़ी देर बैठे रहना पड़ता है। क्या?
प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य व्रत लेने के बाद किसी का डगमगा रहा हो तो?
दादाश्री : डगमगानेवाले को तो व्रत लेना ही नहीं चाहिए और व्रत लेगा तो उसमें बरकत आएगी भी नहीं। डगमगाए तो हम नहीं समझ जाएंगे कि 'कर्मिंग इवेंट्स कास्ट देर शैडोज बिफोर?!'
ब्रह्मचर्य में अपवाद रखा जाए, वह ऐसी चीज नहीं है क्योंकि इंसान का मन पोल (दूसरा उल्टा रास्ता) ढूँढ़ता है, किसी जगह पर अगर इतना सा भी छेद हो तो मन उसे बड़ा कर देता है!
प्रश्नकर्ता : ऐसे पोल ढूँढ़ निकालता है, उसमें कौन सी वृत्ति काम करती है?
दादाश्री : मन ही वह काम करता है, वृत्ति नहीं। मन का स्वभाव ही है। इस तरह से पोल ढूँढ़ने का।
प्रश्नकर्ता : मन पोल मार रहा हो तो उसे कैसे रोकें?
दादाश्री : निश्चय से। निश्चय होगा तो फिर वह पोल मारेगा ही कैसे? अपना निश्चय है तो कोई पोल मारेगा ही नहीं न? जिसे ऐसा निश्चय है कि 'मांसाहार नहीं करना है' तो वह खाता ही नहीं।