समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)
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आँखों को कुछ ठीक लगे तो आकृष्ट होती है, इससे कोई गुनाह नहीं लगता। वह तो प्रतिक्रमण कर लेने से धुल जाता है। वह पिछले जन्म की गलती है और जहाँ वैसा हिसाब होगा तभी वहाँ जाएगा, वर्ना जाएगा ही नहीं कभी भी। वह मिल जाए तभी आकर्षण होता है। वह तो प्रतिक्रमण से धुल जाएगा। उसका और क्या हिसाब है? वह तो, श्री विज्ञान रखने के बावजूद भी दिखता है कि आकर्षण हो रहा है। समझ में आए ऐसी बात है या नहीं?
प्रश्नकर्ता : समझ में आ रहा है न! मुझे ऐसा था कि इतना सुंदर ज्ञान मिला है और छूटने के ऐसे सब सुंदर संयोग मिले हैं, तो यदि प्योर हो जाएँ इस एक ही चीज़ में, तो बहुत अच्छा रहेगा, ऐसा।
दादाश्री : हाँ, लेकिन प्योर ही है। निश्चय है तब तक प्योर है और ऐसे इम्प्योरिटी माना, वह भी गलती है अपनी। निश्चय अपना था इसलिए प्योर रहता है। फिर जो आकर्षण होता है, उसके उपाय हैं! आकर्षण भी कैसा, फिसल गए तो क्या कोई गुनाह है? फिर से खड़े होकर चलने लगना। कपड़े बिगड़ गए हों तो धो लेना। हम फिसल पड़ें तो गुनाह है, फिसल गए तो गुनाह नहीं।
प्रश्नकर्ता : मुझे अंदर यों ऐसा खेद रहा करता है कि ऐसा सुंदर ज्ञान मिला है, फिर भी अभी तक ऐसी स्थिति क्यों अनुभव कर रहा हूँ?
दादाश्री : नहीं, वह तो सभी को ऐसा होता है। वह तो बल्कि यदि हम प्रतिक्रमण से धो डालें तो दिन बदलेंगे। वर्ना बाकी रहा, ऐसा कहा जाएगा। पिछले जन्म में जो हस्ताक्षर किए थे, वे छोड़ेंगे नहीं न!
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[ ४ ]
विषय विचार परेशान करें तब...
वह तो है भरा हुआ माल
प्रश्नकर्ता : मुझे व्यापार के कारण बाहर बहुत घूमना पड़ता है।
दादाश्री : हाँ, लेकिन उन संयोगों में हमें सावधान रहना है, वह चढ़ बैठे तो चढ़ने मत देना। वह न्यूट्रल है और हम तो पुरुष हैं। न्यूट्रल कभी भी पुरुष को नहीं जीत सकता।
मांसाहार की दुकान में जाने पर भी विचार नहीं आते, ऐसा क्यों? क्योंकि वह माल नहीं भरा है न! तब फिर हमें समझ नहीं जाना चाहिए कि 'भाई, जो भरा हुआ है वही कूद रहा है। नहीं भरा होगा तो नहीं कूदगा।' इतना समझ सकते हैं या नहीं?
प्रश्नकर्ता : वह ठीक है। लेकिन बहुत विचार आते हैं, इसलिए फिर ऐसा लगता है कि अरे! ऐसा सब?!
दादाश्री : बाहर लोग शोर मचा रहे हों और हम दरवाजा बंद करके बैठे हों एक तरफ, तो कोई झंझट है? अगर हमें उसके साथ व्यवहार ही नहीं करना है तो फिर हम रह सकेंगे। यानी कि वह तूफान आकर फिर पार निकल जाएगा, और तूफान शांत हो जाएगा। बवंडर क्या रोज आते हैं? बस दो दिन। पूरे दिन चलता रहे तो भी उसका रास्ता निकालेंगे। ये सब बताते हैं न। इन्हें क्या बवंडर नहीं आते होंगे? अब इसे कितने बवंडर आते हैं, लेकिन क्या करे?
विषय विचार परेशान करें तब... (खंड-2-४)
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प्रश्नकर्ता : चंद्रेश विषय भोग रहा हो ऐसे विचार आते हैं। ऐसा सब दिखता है, फोटो दिखते हैं, अंदर। फिर अंदर कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
दादाश्री : भले ही अच्छा न लगे। अच्छा नहीं लगता वह भी चंद्रेश को ही न? तुझे तो नहीं न? तू तो अलग है न इसमें! विषय नहीं होना चाहिए, अन्य कोई गलती हो जाए तो चला सकते हैं।
प्रश्नकर्ता : ऐसा विचार आता है कि मुझे इन्टरेस्ट है, अतः चोर नीयत होगी तभी इन्टरेस्ट आता है। नहीं तो इन्टरेस्ट आना ही नहीं चाहिए।
दादाश्री : इन्टरेस्ट आए ऐसा माल लेकर आए हो तुम। तुम्हें पता चलता है कि ओहो! इन्टरेस्ट आए ऐसा है। अतः तब कहना, 'इन्टरेस्ट का इस्तेमाल करो तुम। शादी भी कर लो, कौन मना कर रहा है?'
आत्मा को इसमें इन्टरेस्ट है ही नहीं। यह इन्टरेस्ट है, आहारी को। आहारी देखे हैं तूने? ज्यादा खा जाए तो भी दुःखी होते हैं और वापस वही आहारी उपवास भी करने बैठते हैं!
प्रश्नकर्ता : फिर ऐसे विचार आते हैं कि यह निश्चय में कमी है या चोर नीयत है या फिर ऐसा क्यों हो रहा है?
दादाश्री : नहीं, वह तो भरा हुआ माल है और टाइम आ गया है। आसपास के संयोग वैसे हैं, इसलिए फूट रहे हैं।
प्रश्नकर्ता : एक तो अज्ञाने में विषय में खिंच गए और दूसरा जागृतिपूर्वक खिंच गए, कुछ चला ही नहीं वहाँ पर। तब फिर क्या करें? और इसका कितना दोष लगता है?
दादाश्री : दोष तो है न! वैद्य ने कहा हो कि मिर्च मत खाना और हम मिर्च खाएँ, तो क्या होगा?
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
प्रश्नकर्ता : आज्ञा का पालन नहीं हो सका तो क्या करना चाहिए फिर?
दादाश्री : वह तो उसने मिर्च खाई, इसलिए फिर रोग बढ़ा।
प्रश्नकर्ता : लेकिन उसका उपाय तो होना चाहिए न?
दादाश्री : प्रतिक्रमण करना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : लेकिन जिन्होंने आज्ञा दी है, उन्हें कहना तो पड़ेगा न?
दादाश्री : हाँ। कह दो फिर भी वे प्रतिक्रमण करने को कहेंगे। और क्या कहें? रूबरू प्रतिक्रमण कर।
कभी अगर अंदर कोई खराब विचार उग आए और निकाल देने में देर हो जाए तो उसका बड़ा प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। वह तो जब विचार उगे कि तुरंत निकाल देना है, फेंक देना है।
प्रश्नकर्ता : पहले ऐसी स्थिति थी कि मैं इन सबसे अलग हो जाऊँ न, तो ब्रह्मचर्य रह ही नहीं पाता था, ऐसी स्थिति हो गई थी। जरा सा भी इस समूह से जुदा रहूँ या अकेला घर पर रहूँ न तो सभी विचार घेर लेते थे।
दादाश्री : विचार घेर लेते हैं, उसमें अपना क्या जाता है? हम देखनेवाले हैं उसे! होली में क्यों हाथ नहीं डालते? होली का दोष निकाले, वह गलत है न! दोष तो, अगर तुम हाथ डाल दो, उसे कहते हैं।
विचार तो सभी तरह के आ सकते हैं। मच्छर घेर लेते हो, उन्हें हम यों-यों करे तो नहीं रहेंगे। इसमें तो हाथ दर्द करता है, लेकिन कुदरत का हाथ तो दुःख ही नहीं सकता। हम कहें कि मच्छर छूने नहीं देना है, तो अंदर वैसा ही हो जाएगा। ऐसा निश्चय करो तब कैसा सुंदर ब्रह्मचर्य पालन किया जा सकेगा!!
विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)
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जुदापन से जीत सकते हैं
दादाश्री : तुझे कैसा रहता है? तेरा ठीक हो जाएगा न?
प्रश्नकर्ता : हो जाएगा।
दादाश्री : हं। तू तो ऐसा ही कहता है न, 'गिर जाएगा, गिर जाएगा', उसी जगह से उगता है और उसी जगह पर ढलता है। वह गिरता नहीं न, वह कहता है, गिर जाएगा सूर्यनारायण!
प्रश्नकर्ता : ये अंदर का ठीक हो जाएगा, चंद्रेश का।
दादाश्री : ऐसा। लेकिन शादी करने का कहता है?
प्रश्नकर्ता : वैसी गाँठें फूट रही हैं।
दादाश्री : उसे कहना कि 'यदि गाँठें फूटेंगी न, तो जब तक हम एक्सेप्ट नहीं करेंगे तब तक तुम्हारा कुछ नहीं चलनेवाला। बेकार में तेरे दिन ही बिगड़ेंगे, चुपचाप बैठ रह न।' बेकार में शादी करना और विधुर होना। शादी करना और विधुर होना, ऐसे करते रहते थे। बैठे रहो न, शादी भी मत करना और विधुर भी मत होना। हम कोई सहायोग नहीं देंगे।
प्रश्नकर्ता : यानी कि जब तक मैं दस्तखत नहीं करता, तब तक गाड़ी फर्स्ट क्लास चलती है।
दादाश्री : तुम्हें खुद को ही डाँटना पड़ेगा कि कुछ नहीं होगा। इसलिए चुप बैठो न! ऐसे दो-चार प्रकार के प्रयोग सेट कर देना ताकि जुदा रह सको।
दादाश्री : तुझे पछतावा नहीं होता, शादी नहीं की उसका?
प्रश्नकर्ता : नहीं, ऐसा नहीं है।
दादाश्री : तो शादी नहीं की, वह अच्छा लगा तुझे?
प्रश्नकर्ता : हाँ, दूसरे लोग जो शादीशुदा हैं, उनका सारा
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दुःख देखने को मिलता है न? घर और बाहर, सभी ओर देखने को मिलता है। खुला ही है न!
दादाश्री : अरे, इन प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाले दुःखों को छोड़ो न। उन दुःखों को देख लेंगे थोड़ा बहुत। दादा के कहे अनुसार करेंगे तो, ठीक हो जाएगा। अपने महात्माओं को तो पच जाएगा। लेकिन एक वह (ब्रह्मचर्य की) किताब रखनी पड़ेगी साथ में। तू नहीं रखता?
प्रश्नकर्ता : रखता हूँ।
दादाश्री : पढ़ता है न फिर। थोड़ा-थोड़ा पढ़ना पड़ेगा। उसे पढ़ने से, मन जो बहुत उछल-कूद कर रहा था, वह शांत हो जाएगा। तेरा तो बिल्कुल ठीक रहता है न?
प्रश्नकर्ता : ठीक है। वह किताब हेल्प करती है थोड़ी-बहुत, लेकिन यह विज्ञान तो बिल्कुल जुदा ही रखता है।
दादाश्री : इस विज्ञान की तो बात ही अलग है। इस विज्ञान की तो बात ही क्या!
प्रश्नकर्ता : इस किताब की हेल्प लेते हैं न, लेकिन विज्ञान पर अधिक जोर देते हैं हम।
दादाश्री : विज्ञान तो बहुत काम करता है।
प्रश्नकर्ता : फिर भले ही कैसे भी संयोग आएँ वे इस किताब में नहीं है।
दादाश्री : तेरी गाड़ी राह पर आ गई है, अब। पहले तो मुझे लगता था, कि यह स्त्री बन जाएगा। लेकिन फिर बहुत टोका। नहीं तो क्या करें? मैंने कहा, 'अगले जन्म में स्त्री के कपड़े पहनने पड़ेंगे, साड़ी-ब्लाउज।' और क्या कहूँ? अब सब निकल गया। चेहरे पर देख लेते हैं न हम! उसके विचार वगैरह सब
विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)
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दिखाई देते हैं हमें। स्त्री के कपड़े पहनने अच्छे लगेंगे? विषय चाहिए तो स्त्री के कपड़े लाने ही पड़ेंगे न फिर?
प्रश्नकर्ता : आपने शुरू से ही हमारा बहुत ध्यान रखा है।
दादाश्री : वह तो रखना ही पड़ेगा न! अब ध्यान रखने जैसा नहीं है, अब चलता रहेगा। इसलिए अब दूसरे को पकड़ते हैं। जो कच्चा है, उसे पकड़ते हैं।
प्रश्नकर्ता : लेकिन अभी भी बहुत ज़रूरत है। अब सबकुछ जल्दी से खाली हो जाए, ऐसा कुछ कर दीजिए।
दादाश्री : ऐसा है न, जल्दी खाली होने का मतलब इस देह का खत्म होना।
प्रश्नकर्ता : यानी कि यह जो सारा विषय और कपट का जो माल भरा है, वह सारा माल खाली करना है।
दादाश्री : ओहोहो! विषय का! विषय का खाली करना है, क्या? लेकिन उसके टाइम पर खाली करोगे तब भी हर्ज क्या है लेकिन?
प्रश्नकर्ता : वह चुभता है अंदर।
दादाश्री : वह माल फूटे तो उसमें तुझे क्या परेशानी है? चुभेगा तभी जब तू उस तरफ सो जाएगा। इस ओर सो जाऊँ, अपने अंदर सो जाऊँ तो? 'स्त्री' के पलंग पर सो जाएगा, तब चुभेगा न! 'अपने' पलंग पर सो जाऊँ तो फिर हमें क्या चुभेगा? बहुत चुभता है? तो फिर शादी कर ले।
प्रश्नकर्ता : नहीं, ऐसा नहीं। ये जो गॉटें फूटती हैं, वे चुभती हैं।
दादाश्री : उसमें क्या चुभना? 'देखते' रहना है। उसमें चुभता क्या है? 'हम' 'वहाँ' बैठेंगे तभी चुभेगा।
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प्रश्नकर्ता : हाँ। यानी कि चंद्रेश को ही चुभता है कि 'ऐसा नहीं होना चाहिए।'
दादाश्री : चंद्रेश को चुभे उसमें तुझे क्या है? चंद्रेश से कहना, 'ले अब ले स्वाद!' ले तेरा किया तू भुगत। हमें कुछ नहीं कर सकता। तुम्हारी तो उम्र छोटी है तो अभी परेशानीवाले स्टेशन आएँगे। निरी झाड़ी और जंगल सारा!
स्त्री विषय, वह गलत चीज़ है, ऐसा तुझे निरंतर रहा करता है?
प्रश्नकर्ता : निरंतर।
दादाश्री : और अभिप्राय भी वही रहता है?
प्रश्नकर्ता : वही।
दादाश्री : अब पहले माना था कि स्त्री विषय अच्छा है, इसीलिए तो अंदर गँठि भर गई हैं, अब वे खत्म हो जाएँगी धीरे-धीरे। नया माल नहीं भर रहा है, इसलिए तुझे जोखिम नहीं रहा न! नया भर सके, अपना ज्ञान ऐसा है ही नहीं न!
सत्संग में भी सतर्क रहना है
जिन स्त्री-पुरुषों में विकार नहीं हों, वे पवित्र।
तुम जितना काम का बदला दोगे, उससे अधिक बदला तुम्हें मिलेगा, इसलिए यह करना है। जगत् कल्याण होगा और अपना भी। वर्ना इसमें तो कोई माल ही नहीं था। नमक-मिर्च भी नहीं था न! वह तो अब जो है, नए सिर से बड़ी बड़ी दुकानें खुली हैं।
प्रश्नकर्ता : विषय से संबंधित खास ध्यान रखना पड़ता है। गाँवों में जाते हैं न, वहाँ जेन्ट्स से अधिक लेडीज होती हैं हमेशा। ये गाँवों में सत्संग में जाते हैं न तो सत्तर प्रतिशत तो लेडीज
विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)
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ही होती हैं और पुरुष तीस प्रतिशत ही होते हैं इसलिए ब्रह्मचर्य से संबंधित अत्यंत जागृत रहना पड़ता है। उन लोगों का रिस्पोंन्स बहुत होता है। जैसे कि अच्छे पद गवाई, तो वे लोग यों खुश हो जाती हैं।
दादाश्री : ऐसा स्थूल अब्रह्मचर्य तो नहीं होता न! झंझट तो सूक्ष्म में है। वे भी रास्ते में और शहरों में मिलते हैं। गाँवों में तो रुचि का इतना कारण ही नहीं है न!
प्रश्नकर्ता : लेकिन गाँठें फूटती हैं कभी कभार।
दादाश्री : उन्हें तो तोड़ देना।
प्रश्नकर्ता : उनका निवारण तुरंत हो जाता है, तुरंत पाँच ही मिनट में।
दादाश्री : जितना धुल जाए, उतना कम है। 'शूट ऑन साइट' ही होना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : 'शूट ऑन साइट' ही हो जाता है। यह तो हमें जब मिलने का मौका आता है न। यों घर पर रहते हैं तब नहीं आते।
दादाश्री : अनंत जन्मों से यही के यही प्रतिस्पंदन। पहले के संस्कार, वह भान ही नहीं था न!
मन की पोलों के सामने...
कोई स्त्री अपने सामने आँख मारती रहे तो, उसमें हमें क्या? वह तो स्त्री तो मारेगी ही। उससे हमें क्या? तू भी गजब का है? ऐसा कानून है क्या, कि स्त्री आँखें नहीं मार सकती? क्या हम उसे ऐसा कह सकते हैं?
प्रश्नकर्ता : स्त्री से नहीं कह सकते। लेकिन चंद्रेश अंदर लपेट में आ जाता है। उसका क्या? चंद्रेश खिंच जाता है।
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दादाश्री : इसीलिए, वह शादी कर ले तो अच्छा है न!
प्रश्नकर्ता : नहीं, ऐसा नहीं चाहिए।
दादाश्री : ऐसा ही है न! यही तेरी कमजोरी है! आँख मारे, उसमें तुझे क्या? श्री विज्ञन से देख ले तो, क्या दिखेगा उसमें? तू श्री विज्ञन नहीं देखता?
माँ-बाप अगर तेरे ध्येय को बदलवा रहे हों तो तू वह नहीं सुनता तो मन की क्यों सुने? उठाकर ले गया कोई?
प्रश्नकर्ता : खुद ही खिंच गए।
दादाश्री : जो साँप के मुँह में जाए, उसका कोई क्या करे?
मन से कह देना कि 'तू अब फँसाएगा तो मैं आपत्तियों को सौ रुपये की आइस्त्रीम खिलाऊँगा या खाना खिलाऊँगा।' तो फिर नहीं करेगा वैसा। एक गलती पर सौ रुपया का दंड!
प्रश्नकर्ता : तभी अंदर हुआ कि यह गलत है, फिर भी उस ओर चला गया। मन का मान लिया उस समय।
दादाश्री : तो फिर अब गलत हुआ, वह जानता है। ऊपर से यह भी जानता है कि 'समुद्र में डूब जाऊँगा और मर जाऊँगा,' फिर भी यदि कोई जाए तो क्या समुद्र उसे मना करेगा? समुद्र तो कहेगा, 'आ भाई, मैं तो विशाल पेटवाला हूँ। कई लोगों को समा लिया है।'
प्रश्नकर्ता : पिछले एक साल से मैं रजिस्ट कर रहा था।
दादाश्री : मन तो बहुत मजबूत है, लेकिन तू खुद कमजोर होगा तो फिर से शादी कर लेगा।
प्रश्नकर्ता : जब ऐसा हो, तब मन मजबूत कहलाता है?
दादाश्री : इंसान कमजोर ही कहलाएगा न! मन कमजोर
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नहीं कहलाता। बल्कि मन उसे खींच ले गया। मन तो मजबूत कहलाएगा।
प्रश्नकर्ता : इस केस में आपने मन को ‘मजबूत’ कहा और ईंसान को ‘कमजोर’ कहा। तो ईंसान यानी कौन कमजोर कहलाएगा?
दादाश्री : अहंकार और बुद्धि कमजोर हैं। इसमें असल गवर्नमेन्ट का राज है, तो इसमें बुद्धि और अहंकार हैं। इसमें अगर मन का राज हो जाए तो खत्म। मन का तो पार्लियामेन्टरी पद्धति से, उसका सिर्फ एक रोल ही है। वह भी अगर बुद्धि माने, स्वीकार करे, तब अहंकार दस्तखत करता है। बर्ना तब तक दस्तखत भी नहीं होते।
प्रश्नकर्ता : यों अकेले सो गए हों न, तो वे विचार फूटते हैं कि ऐसा हो जाए तो? इस तरह विषय भोंगें तो? फिर उस समय मुझे आश्चर्य होता है कि मुझे तो ब्रह्मचर्य पालन करना है तो यह सब फूटा कहाँ से? और अच्छे भी लगते हैं, वे विचार।
दादाश्री : फूटें उसमें हर्ज नहीं है, लेकिन वे तो तुझे अच्छे लगते हैं?
प्रश्नकर्ता : वे किसी को तो अच्छे लगते ही होंगे न अंदर?
दादाश्री : ओहो, तुझे किसी से लेना-देना है?!
प्रश्नकर्ता : वे जिसे अच्छे लगते हैं, उसे भी निकालना तो पड़ेगा न!
दादाश्री : उसे डॉटना, ‘यहाँ क्या हंगामा मचा रखा है हमारे घर में? हमारे पवित्र घर में, होम में?’
प्रश्नकर्ता : तो फिर इसका इलाज क्या है?
दादाश्री : तुझे इलाज करके क्या करना है?
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
प्रश्नकर्ता : लेकिन यह तो बहुत बड़ा रोग है। यह तो फिर वापस बिल्ली मटकी में मुँह डाले न, तो उसे लेकर घूमना पड़ेगा फिर।
दादाश्री : उसमें तो चारा ही नहीं है न। बाद में कौन निकालेगा? बीत गई यह पूरी ज़िंदगी! आ फँसे भई आ फँसे। दुःख अच्छा लगता हो तो फिर उसका कोई उपाय ही नहीं है न!
प्रश्नकर्ता : दुःख अच्छा नहीं लगता। लेकिन वह विषय का इन्टरेस्ट अच्छा लगता है, उसमें कहाँ दुःख है?
दादाश्री : नहीं, उसका फल ही दुःख आता है न! जिसका फल दुःख आए, वह चीज़ अच्छी नहीं लगनी चाहिए। वह दुःख ही है।
प्रश्नकर्ता : ऐसे विचार आ गए, फिर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता कि 'ये ऐसे विचार क्यों आए?'
दादाश्री : वह तो मटकी में मुँह डालने के बाद न? फँसने के बाद आएँगे विचार! अरे, एक बार विचारों को उखाड़कर-निकालकर कहना, 'इन सभी लोगों ने शादी की ही हैं न।'
प्रश्नकर्ता : शादी के विचार आते हों तो अच्छा है। एक बार शादी कर ले। ये तो विषय के विचार आते हैं। इसमें जोखिमदारी कितनी है!! फिर ऐसा विचार आता है कि दादा तो कहते हैं कि ऐसा नहीं चलाएँगे, तो क्या होगा मेरा?
दादाश्री : क्या होनेवाला है? क्या इस नर्मदा का गोल्डन ब्रिज गिर गया है? गोल्डन ब्रिज बनानेवाले चले गए, सभी चले गए! क्या हो जाएगा? क्या वह गिर जाएगा? अपनी तैयारी होनी चाहिए।
प्रश्नकर्ता : लेकिन तैयारी में अंदर पोल (ढील) बहुत हो
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जाती है। संयोग नहीं मिलें तब तक अच्छा रहता है, लेकिन मिल जाएँ तब सारा माल निकलता है।
दादाश्री : नहीं, लेकिन यह जो बात तू कर रहा है न, वह सब के लिए नहीं है। यह सिर्फ तेरे लिए है। किसी और की बात नहीं है। तुझे जैसा ठीक लगे, उस अनुसार कर ले ताकि झंझट मिटे। फिर औरों का कोई झंझट नहीं। इससे तो दूसरों के मन बिगड़ते हैं फिर। क्या होगा फिर? अच्छा लगे, तब? अच्छा लगे, तब तक हम कुछ नहीं कह सकते। मालिक भी कहता है कि अच्छा लग रहा है और अच्छा लगनेवाला कहता है कि अच्छा लग रहा है। दोनों ऐसा कहेंगे तो फिर क्या होगा?
प्रश्नकर्ता : जो अच्छा लगे उसे खत्म करना पड़ेगा न?
दादाश्री : यह तो अच्छा लगनेवाला कहता है, 'मुझे पसंद है' और मालिक कहता है, 'पसंद नहीं है' यदि इन दोनों में संघर्ष हो तो खत्म कर सकते हैं। यह तो संघर्ष नहीं है, एक मत है, फिर कैसे खत्म करेंगे?! मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा मियाँ काजी? फिर काजी साहब क्या करेंगे?!
प्रश्नकर्ता : लेकिन फँसना तो अच्छा नहीं लगता मुझे। इस विषय में फँसना मुझे अच्छा नहीं लगता।
दादाश्री : देख अब क्या कह रहा है, पहले क्या कह रहा था, अभी?
प्रश्नकर्ता : वे जो विचार आते हैं, वे अच्छे लगते हैं, वे उतने समय के लिए ही। फिर बाद में...
दादाश्री : आत्महत्या करना अच्छा लगता है लेकिन मरना नहीं है! एक दिन करके तो देख!
प्रश्नकर्ता : वह जोखिमदारी है। उसके लिए सारी मार खानी पड़ेगी न! कभी ऐसे। फिर ऐसा विचार आता है कि इस पुद्गल
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के फोर्स की वजह से ऐसा हो रहा होगा, इसलिए फिर पुद्गल के फोर्स को कम कर दें, खाना कम कर दें, उसका कोई रास्ता बताइए।
दादाश्री : लेकिन उससे तुझे क्या? तुझे अच्छा नहीं लगता हो तो रास्ता बता सकते हैं। तुझे तो अच्छा लगता है न?
प्रश्नकर्ता : ऐसे लगातार अच्छा नहीं लगता। वे विचार आते हैं न, तो थोड़े वक्त के लिए ही अच्छा लगता है। बाद में कहीं ऐसा अच्छा लगता होगा?
दादाश्री : नहीं, नहीं। अच्छा लगता है मतलब साइन हो गई न थोड़ी देर के लिए। तू अगर विरोधी हो तो बात काम की।
प्रश्नकर्ता : पूरे चौबीस घंटों में मैं विरोधी ही हूँ। लेकिन वे संयोग ऐसे आ मिलते हैं कि विचार फूटें तो एक जरा सा, एक मिनट के लिए अच्छा लग जाता है कि ये विचार अच्छे हैं।
दादाश्री : मिनट के लिए ही लोगों ने शायदियाँ कर लीं।
प्रश्नकर्ता : पूरे दिन मैं ऑफिस में 'दादा, मुझे ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्ति दीजिए' ऐसे माँगता ही रहता हूँ।
दादाश्री : हाँ, तो माँगता रह न फिर। लेकिन अगर अच्छा लगता है तो उसमें हर्ज नहीं है न! अंदर हैं न, ऐसे व्यापारी हैं न! हर तरह के व्यापारी होते हैं न! नुकसान करें ऐसे व्यापारी! कभी अगर डूब गए तो क्या हर्ज है?
प्रश्नकर्ता : लेकिन वह जो आप एक्जेक्ट उदाहरण देते हैं न, कि भाई एक बार तू नदी में डूब जाएगा तो? तो वह सोचने लगता है कि यदि एक बार विषय में स्लिप हो जाऊँगा तो?
दादाश्री : नहीं, लेकिन दूसरी बार उसे जागृति रहती है
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न! सौ दिन तक तैरे लेकिन एक दिन डूब गए तो फिर व्यर्थ ही है!
पिछले जन्म की माँ आज बेटी भी बन सकती है। जैसा ऋण बंधा हो वैसा ही होता है। काकी बन सकती है, मामी बन सकती है, मौसी बन सकती है, पत्नी भी बन सकती है। ऐसा सब हो सकता है! यदि माँ हो और इस जन्म में पत्नी बने तो वैराग्य नहीं आएगा? ऐसा समझना है!
प्रश्नकर्ता : जब तक कुसंग का वातावरण है, तब तक इसका निबेड़ा नहीं है।
दादाश्री : इस सत्संग से निबेड़ा आता ही है न! अपनी सारी मेहनत मिट्टी में मिला देता है कुसंग।
प्रश्नकर्ता : कुसंग में माल फूटता है।
दादाश्री : कुसंग की गंध ही ऐसी है। कुसंग में जाना पड़े तो भी प्रतिक्रमण करना पड़ेगा।
प्रश्नकर्ता : मतलब एक ओर विषय के विचार अच्छे लगते हैं और एक ओर नहीं भी लगते, इस प्रकार दोनों चीज होती हैं।
दादाश्री : ऐसा नहीं चलेगा, अगर ब्रह्मचारी रहना हो तो। वरना शादी कर लो।
बहुत लूज हो रहा हो तो मजबूत कर दे अब! ऐसे पूछना और सारी बातचीत करना!
बुद्धि की वकालत, बिना फीस के
प्रश्नकर्ता : प्रकृति अभी भी एकदम अपना स्वभाव तुरंत छोड़ती नहीं है न! विचार वगैरह सब थोड़ा-थोड़ा रहता है।
दादाश्री : बहुत नहीं न लेकिन!
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प्रश्नकर्ता : नहीं, लेकिन अभी भी अगर विचार आ जाएँ तो हम से वापस अंदर से गड़बड़ भी हो जाती है।
दादाश्री : ज्ञान तुरंत हाज़िर हो जाता है न!
प्रश्नकर्ता : ज्ञान हाज़िर रहता है लेकिन उस पर थोड़ा विश्वास रखने जाएँ और यह विचार आता है कि 'हमें क्या हर्ज है?'
दादाश्री : ऐसा कहता है?! उसे पहचानता नहीं है कि यह कौन कह रहा है? 'वकील बोल रहा है,' ऐसा नहीं जान जाता?
प्रश्नकर्ता : अंदर वकील ऐसा कहता है।
दादाश्री : इसीलिए तो तुझे मजा आ गया न(!)
प्रश्नकर्ता : उसका तो नहीं मान सकते।
दादाश्री : कभी मानना चाहिए क्या, उस वकील का? तू मानता है? अच्छा लगता है वह?
प्रश्नकर्ता : ऐसा विचार आए न तो तुरंत उखाड़कर फेंक देने चाहिए, इसके बजाय, 'देखते हैं क्या हो रहा है, सिर्फ विचार ही आया है न!' वकील ऐसा बताता है।
दादाश्री : तब तो आराम से शादी करवा देगा। तुझे तो हर्ज ही नहीं है, शादी का सिग्नल पड़ गया!
प्रश्नकर्ता : नहीं चाहिए ऐसा, लेकिन मन में ऐसा होता है कि दादा ऐसा क्यों कहते होंगे कि 'विचारों को उखाड़कर तुरंत फेंक देना चाहिए?'
दादाश्री : वह तेरा माल है न!
बढ़ता है विषय की लिंक से वह
कहीं भी बैठे हों या फिर नौकरी करते हुए फुरसत मिले तब भी यही करते रहो। ऑफिस में बैठे हुए और फुरसत मिले,
विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)
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तब भी निश्चय मजबूत कर लेना, थोड़ी देर। दो शब्द पढ़ ले तो क्या टाइम लगेगा उसमें? इससे लिंक टूट जाएगी सारी। अंदर जो लिंक चल रही होगी न, वे टूट जाएँगी सारी। तहस-नहस हो जाएँगी। लिंक तहस-नहस करनी हैं। लिंकों से विषय बढ़ता है।
अंदर आनंद होता है न, सामायिक प्रतिक्रमण करते हो उस समय? जैसे कि मुक्त हों, ऐसा लगता है न?
प्रश्नकर्ता : यह चित्त जो भटक रहा होता था, मन जो विचार कर रहा होता था, वह सब बंद हो जाता है, वहाँ सभी चीजें ठहर जाती हैं।
दादाश्री : सबकुछ ठहर जाएगा। ऐसा है न, आप और कुछ सेट कर दो तो विषय तो दूर खड़ा रह जाएगा। ऐसा है बेचारा। वह तो घबराता है बेचारा। जैसे कि, अगर यहाँ अच्छे लोग खड़े हों, तो उस समय हल्की जाति के लोग खड़े नहीं रहेंगे, उसी तरह।
प्रश्नकर्ता : यह आप जब से, दो दिन से बोले हो न, तो यों ऐसे पराक्रम जैसा खड़ा हो गया है कि यों जितनी पोलम्पोल चल रही थी, वह सब बंद हो गई है।
दादाश्री : हाँ, बंद हो जाती है। यह तो दादा के ये शब्द, सारी पोलम्पोल सबकुछ बंद हो जाती है। आप ध्यान रखो तो बहुत अच्छा है। अंदर सतर्क और इसमें भी सतर्क, लेकिन उतना ही यदि इसमें सतर्क रहे तो इसमें फर्स्टक्लास हो जाएगा। वह कुशलता है न एक प्रकार की! लेकिन कहे अनुसार करोगे तो। बार-बार मौका नहीं मिलेगा ऐसा। यह आखिरी मौका है। उठा लो फायदा इस आखिरी मौका का।
कला से काम निकालो
कुछ बदलाव होने लगे तो कागज़ पर लिखकर मुझे चिट्ठी भेज देना। अन्य सभी गलतियाँ चला लेंगे। अन्य सभी तरह की
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
गलतियाँ नहीं चलाएँ तो इंसान परेशानी में पड़ जाए, वह परेशान हो जाएगा बेचारा। खाने-पीने की ही तकलीफ है। फिर अगर खाना नहीं खाने दें कि यह नहीं खा सकते तो वह क्या करे? क्या कुएँ में गिर जाए? अपने यहाँ सारी छूट दी है। खाना भाई, आइस्क्रिम भी खाना। कुछ भी करके तेरे मन को मनाना।
प्रश्नकर्ता : मन को इस तरह मनाने से पूर्ण हो जाएगा?
दादाश्री : नहीं, पूर्ण नहीं होगा।
प्रश्नकर्ता : तो?
दादाश्री : अपना दिन बीत जाएगा न अभी।
प्रश्नकर्ता : यानी सिर्फ संतोष के लिए। लेकिन आगे जाकर वापस करना तो पड़ेगा न?
दादाश्री : वह तो फिर से ब्रेक लगाना वापस। जरा अभी का पल गुजर गया। उसके बाद हथियार लेकर उसके पीछे पड़ जाना। अभी समय निकाल दो। टेढ़ा पुलिसवाला मिल जाए तो 'साहब, सलाम' करके एकबार खिसक जाना और बाद में उसे देख सकते हैं। बाद में उसके पीछे पड़ेंगे। लेकिन अगर अभी डॉटिंगे तो नहीं चलेगा। अभी हम हाथ लग गए, पकड़े गए तो फिर? कला से काम लेना पड़ेगा और मन तो जड़ है। वह जड़ है, इसलिए किसी की सुनता नहीं है न, हम कला से काम लेंगे तो ठिकाने पर आ जाएगा!
वापस ऐसा मौका नहीं मिलेगा और सरल तरीके से, कम मेहनत में और वापस आनंदपूर्वक। पहले तप करने पड़ते थे, वे भी सब कठोर तप। सहन ही नहीं हो सकते थे, देखते ही धिन् आए।
अपना ज्ञान है इसलिए हमें तो परेशानी है ही नहीं। ज्ञान तो मन को देखता है कि मन क्या कर रहा है और क्या नहीं?
विषय विचार परेशान करें तब... (खंड-2-४)
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ऐसा सब देख सकता है। बाहर क्रमिक मार्ग में मन की परेशानी और (मीठी) गोलियाँ खिलानी पड़ती हैं। फिर भी, हमें भी यदि कभी खिलानी पड़ें तो खिला देना।
इसलिए हम कहते हैं न कि गोलियाँ खिलाकर काम लेना। एक ही चीज नहीं जँचती, उसे ऐसा नहीं है। उसे तो सभी बातें, जिसमें टेस्ट आए, उसमें जँचता है!
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[ ५ ]
नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार
ज्ञान से करो स्वच्छ, मन को
दादाश्री : मन बिगड़ता है अभी भी?
प्रश्नकर्ता : बिगड़ता है।
दादाश्री : तेरी दुकान में माल होगा, तब तक बिगड़ेगा लेकिन अब जो माल है, तो फिर उसे धो देना। धोकर साफ करते हो या नहीं करते?
प्रश्नकर्ता : हाँ, करता हूँ।
दादाश्री : यानी स्वच्छ जीवन। मन भी नहीं बिगड़े कभी भी! देह तो बिगड़े ही नहीं लेकिन मन भी नहीं बिगड़े और बिगड़ जाए तो तुरंत ही धोकर साफ करके, इस्त्री करके एक तरफ रख देना।
जहाँ ज्ञान है, वहाँ संसार का एक भी विचार नहीं आना चाहिए। हमें संसार का एक भी विचार नहीं आता। वह भी स्त्री का? ये सभी स्त्रियाँ बैठी हैं, लेकिन हमें स्त्री से संबंधित विचार तक नहीं आते। अर्थात सब खाली हो जाना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : हो जाना चाहिए या कर देना चाहिए?
दादाश्री : हो जाना चाहिए। यह मार्ग ऐसा है कि आपको खाली नहीं करना पड़ेगा। अपने आप खाली होता रहेगा। हमारी आज्ञा में रहोगे तो खाली होता रहेगा।