भारतकोश
संग्रह पर लौटें

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)

१३९

ही होती हैं और पुरुष तीस प्रतिशत ही होते हैं इसलिए ब्रह्मचर्य से संबंधित अत्यंत जागृत रहना पड़ता है। उन लोगों का रिस्पोंन्स बहुत होता है। जैसे कि अच्छे पद गवाई, तो वे लोग यों खुश हो जाती हैं।

दादाश्री : ऐसा स्थूल अब्रह्मचर्य तो नहीं होता न! झंझट तो सूक्ष्म में है। वे भी रास्ते में और शहरों में मिलते हैं। गाँवों में तो रुचि का इतना कारण ही नहीं है न!

प्रश्नकर्ता : लेकिन गाँठें फूटती हैं कभी कभार।

दादाश्री : उन्हें तो तोड़ देना।

प्रश्नकर्ता : उनका निवारण तुरंत हो जाता है, तुरंत पाँच ही मिनट में।

दादाश्री : जितना धुल जाए, उतना कम है। 'शूट ऑन साइट' ही होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : 'शूट ऑन साइट' ही हो जाता है। यह तो हमें जब मिलने का मौका आता है न। यों घर पर रहते हैं तब नहीं आते।

दादाश्री : अनंत जन्मों से यही के यही प्रतिस्पंदन। पहले के संस्कार, वह भान ही नहीं था न!

मन की पोलों के सामने...

कोई स्त्री अपने सामने आँख मारती रहे तो, उसमें हमें क्या? वह तो स्त्री तो मारेगी ही। उससे हमें क्या? तू भी गजब का है? ऐसा कानून है क्या, कि स्त्री आँखें नहीं मार सकती? क्या हम उसे ऐसा कह सकते हैं?

प्रश्नकर्ता : स्त्री से नहीं कह सकते। लेकिन चंद्रेश अंदर लपेट में आ जाता है। उसका क्या? चंद्रेश खिंच जाता है।

१४०

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

दादाश्री : इसीलिए, वह शादी कर ले तो अच्छा है न!

प्रश्नकर्ता : नहीं, ऐसा नहीं चाहिए।

दादाश्री : ऐसा ही है न! यही तेरी कमजोरी है! आँख मारे, उसमें तुझे क्या? श्री विज्ञन से देख ले तो, क्या दिखेगा उसमें? तू श्री विज्ञन नहीं देखता?

माँ-बाप अगर तेरे ध्येय को बदलवा रहे हों तो तू वह नहीं सुनता तो मन की क्यों सुने? उठाकर ले गया कोई?

प्रश्नकर्ता : खुद ही खिंच गए।

दादाश्री : जो साँप के मुँह में जाए, उसका कोई क्या करे?

मन से कह देना कि 'तू अब फँसाएगा तो मैं आपत्तियों को सौ रुपये की आइस्त्रीम खिलाऊँगा या खाना खिलाऊँगा।' तो फिर नहीं करेगा वैसा। एक गलती पर सौ रुपया का दंड!

प्रश्नकर्ता : तभी अंदर हुआ कि यह गलत है, फिर भी उस ओर चला गया। मन का मान लिया उस समय।

दादाश्री : तो फिर अब गलत हुआ, वह जानता है। ऊपर से यह भी जानता है कि 'समुद्र में डूब जाऊँगा और मर जाऊँगा,' फिर भी यदि कोई जाए तो क्या समुद्र उसे मना करेगा? समुद्र तो कहेगा, 'आ भाई, मैं तो विशाल पेटवाला हूँ। कई लोगों को समा लिया है।'

प्रश्नकर्ता : पिछले एक साल से मैं रजिस्ट कर रहा था।

दादाश्री : मन तो बहुत मजबूत है, लेकिन तू खुद कमजोर होगा तो फिर से शादी कर लेगा।

प्रश्नकर्ता : जब ऐसा हो, तब मन मजबूत कहलाता है?

दादाश्री : इंसान कमजोर ही कहलाएगा न! मन कमजोर

विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)

१४१

नहीं कहलाता। बल्कि मन उसे खींच ले गया। मन तो मजबूत कहलाएगा।

प्रश्नकर्ता : इस केस में आपने मन को ‘मजबूत’ कहा और ईंसान को ‘कमजोर’ कहा। तो ईंसान यानी कौन कमजोर कहलाएगा?

दादाश्री : अहंकार और बुद्धि कमजोर हैं। इसमें असल गवर्नमेन्ट का राज है, तो इसमें बुद्धि और अहंकार हैं। इसमें अगर मन का राज हो जाए तो खत्म। मन का तो पार्लियामेन्टरी पद्धति से, उसका सिर्फ एक रोल ही है। वह भी अगर बुद्धि माने, स्वीकार करे, तब अहंकार दस्तखत करता है। बर्ना तब तक दस्तखत भी नहीं होते।

प्रश्नकर्ता : यों अकेले सो गए हों न, तो वे विचार फूटते हैं कि ऐसा हो जाए तो? इस तरह विषय भोंगें तो? फिर उस समय मुझे आश्चर्य होता है कि मुझे तो ब्रह्मचर्य पालन करना है तो यह सब फूटा कहाँ से? और अच्छे भी लगते हैं, वे विचार।

दादाश्री : फूटें उसमें हर्ज नहीं है, लेकिन वे तो तुझे अच्छे लगते हैं?

प्रश्नकर्ता : वे किसी को तो अच्छे लगते ही होंगे न अंदर?

दादाश्री : ओहो, तुझे किसी से लेना-देना है?!

प्रश्नकर्ता : वे जिसे अच्छे लगते हैं, उसे भी निकालना तो पड़ेगा न!

दादाश्री : उसे डॉटना, ‘यहाँ क्या हंगामा मचा रखा है हमारे घर में? हमारे पवित्र घर में, होम में?’

प्रश्नकर्ता : तो फिर इसका इलाज क्या है?

दादाश्री : तुझे इलाज करके क्या करना है?

१४२

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : लेकिन यह तो बहुत बड़ा रोग है। यह तो फिर वापस बिल्ली मटकी में मुँह डाले न, तो उसे लेकर घूमना पड़ेगा फिर।

दादाश्री : उसमें तो चारा ही नहीं है न। बाद में कौन निकालेगा? बीत गई यह पूरी ज़िंदगी! आ फँसे भई आ फँसे। दुःख अच्छा लगता हो तो फिर उसका कोई उपाय ही नहीं है न!

प्रश्नकर्ता : दुःख अच्छा नहीं लगता। लेकिन वह विषय का इन्टरेस्ट अच्छा लगता है, उसमें कहाँ दुःख है?

दादाश्री : नहीं, उसका फल ही दुःख आता है न! जिसका फल दुःख आए, वह चीज़ अच्छी नहीं लगनी चाहिए। वह दुःख ही है।

प्रश्नकर्ता : ऐसे विचार आ गए, फिर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता कि 'ये ऐसे विचार क्यों आए?'

दादाश्री : वह तो मटकी में मुँह डालने के बाद न? फँसने के बाद आएँगे विचार! अरे, एक बार विचारों को उखाड़कर-निकालकर कहना, 'इन सभी लोगों ने शादी की ही हैं न।'

प्रश्नकर्ता : शादी के विचार आते हों तो अच्छा है। एक बार शादी कर ले। ये तो विषय के विचार आते हैं। इसमें जोखिमदारी कितनी है!! फिर ऐसा विचार आता है कि दादा तो कहते हैं कि ऐसा नहीं चलाएँगे, तो क्या होगा मेरा?

दादाश्री : क्या होनेवाला है? क्या इस नर्मदा का गोल्डन ब्रिज गिर गया है? गोल्डन ब्रिज बनानेवाले चले गए, सभी चले गए! क्या हो जाएगा? क्या वह गिर जाएगा? अपनी तैयारी होनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : लेकिन तैयारी में अंदर पोल (ढील) बहुत हो

विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)

१४३

जाती है। संयोग नहीं मिलें तब तक अच्छा रहता है, लेकिन मिल जाएँ तब सारा माल निकलता है।

दादाश्री : नहीं, लेकिन यह जो बात तू कर रहा है न, वह सब के लिए नहीं है। यह सिर्फ तेरे लिए है। किसी और की बात नहीं है। तुझे जैसा ठीक लगे, उस अनुसार कर ले ताकि झंझट मिटे। फिर औरों का कोई झंझट नहीं। इससे तो दूसरों के मन बिगड़ते हैं फिर। क्या होगा फिर? अच्छा लगे, तब? अच्छा लगे, तब तक हम कुछ नहीं कह सकते। मालिक भी कहता है कि अच्छा लग रहा है और अच्छा लगनेवाला कहता है कि अच्छा लग रहा है। दोनों ऐसा कहेंगे तो फिर क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : जो अच्छा लगे उसे खत्म करना पड़ेगा न?

दादाश्री : यह तो अच्छा लगनेवाला कहता है, 'मुझे पसंद है' और मालिक कहता है, 'पसंद नहीं है' यदि इन दोनों में संघर्ष हो तो खत्म कर सकते हैं। यह तो संघर्ष नहीं है, एक मत है, फिर कैसे खत्म करेंगे?! मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा मियाँ काजी? फिर काजी साहब क्या करेंगे?!

प्रश्नकर्ता : लेकिन फँसना तो अच्छा नहीं लगता मुझे। इस विषय में फँसना मुझे अच्छा नहीं लगता।

दादाश्री : देख अब क्या कह रहा है, पहले क्या कह रहा था, अभी?

प्रश्नकर्ता : वे जो विचार आते हैं, वे अच्छे लगते हैं, वे उतने समय के लिए ही। फिर बाद में...

दादाश्री : आत्महत्या करना अच्छा लगता है लेकिन मरना नहीं है! एक दिन करके तो देख!

प्रश्नकर्ता : वह जोखिमदारी है। उसके लिए सारी मार खानी पड़ेगी न! कभी ऐसे। फिर ऐसा विचार आता है कि इस पुद्गल

१४४

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

के फोर्स की वजह से ऐसा हो रहा होगा, इसलिए फिर पुद्गल के फोर्स को कम कर दें, खाना कम कर दें, उसका कोई रास्ता बताइए।

दादाश्री : लेकिन उससे तुझे क्या? तुझे अच्छा नहीं लगता हो तो रास्ता बता सकते हैं। तुझे तो अच्छा लगता है न?

प्रश्नकर्ता : ऐसे लगातार अच्छा नहीं लगता। वे विचार आते हैं न, तो थोड़े वक्त के लिए ही अच्छा लगता है। बाद में कहीं ऐसा अच्छा लगता होगा?

दादाश्री : नहीं, नहीं। अच्छा लगता है मतलब साइन हो गई न थोड़ी देर के लिए। तू अगर विरोधी हो तो बात काम की।

प्रश्नकर्ता : पूरे चौबीस घंटों में मैं विरोधी ही हूँ। लेकिन वे संयोग ऐसे आ मिलते हैं कि विचार फूटें तो एक जरा सा, एक मिनट के लिए अच्छा लग जाता है कि ये विचार अच्छे हैं।

दादाश्री : मिनट के लिए ही लोगों ने शायदियाँ कर लीं।

प्रश्नकर्ता : पूरे दिन मैं ऑफिस में 'दादा, मुझे ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्ति दीजिए' ऐसे माँगता ही रहता हूँ।

दादाश्री : हाँ, तो माँगता रह न फिर। लेकिन अगर अच्छा लगता है तो उसमें हर्ज नहीं है न! अंदर हैं न, ऐसे व्यापारी हैं न! हर तरह के व्यापारी होते हैं न! नुकसान करें ऐसे व्यापारी! कभी अगर डूब गए तो क्या हर्ज है?

प्रश्नकर्ता : लेकिन वह जो आप एक्जेक्ट उदाहरण देते हैं न, कि भाई एक बार तू नदी में डूब जाएगा तो? तो वह सोचने लगता है कि यदि एक बार विषय में स्लिप हो जाऊँगा तो?

दादाश्री : नहीं, लेकिन दूसरी बार उसे जागृति रहती है

विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)

१४५

न! सौ दिन तक तैरे लेकिन एक दिन डूब गए तो फिर व्यर्थ ही है!

पिछले जन्म की माँ आज बेटी भी बन सकती है। जैसा ऋण बंधा हो वैसा ही होता है। काकी बन सकती है, मामी बन सकती है, मौसी बन सकती है, पत्नी भी बन सकती है। ऐसा सब हो सकता है! यदि माँ हो और इस जन्म में पत्नी बने तो वैराग्य नहीं आएगा? ऐसा समझना है!

प्रश्नकर्ता : जब तक कुसंग का वातावरण है, तब तक इसका निबेड़ा नहीं है।

दादाश्री : इस सत्संग से निबेड़ा आता ही है न! अपनी सारी मेहनत मिट्टी में मिला देता है कुसंग।

प्रश्नकर्ता : कुसंग में माल फूटता है।

दादाश्री : कुसंग की गंध ही ऐसी है। कुसंग में जाना पड़े तो भी प्रतिक्रमण करना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता : मतलब एक ओर विषय के विचार अच्छे लगते हैं और एक ओर नहीं भी लगते, इस प्रकार दोनों चीज होती हैं।

दादाश्री : ऐसा नहीं चलेगा, अगर ब्रह्मचारी रहना हो तो। वरना शादी कर लो।

बहुत लूज हो रहा हो तो मजबूत कर दे अब! ऐसे पूछना और सारी बातचीत करना!

बुद्धि की वकालत, बिना फीस के

प्रश्नकर्ता : प्रकृति अभी भी एकदम अपना स्वभाव तुरंत छोड़ती नहीं है न! विचार वगैरह सब थोड़ा-थोड़ा रहता है।

दादाश्री : बहुत नहीं न लेकिन!

१४६

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : नहीं, लेकिन अभी भी अगर विचार आ जाएँ तो हम से वापस अंदर से गड़बड़ भी हो जाती है।

दादाश्री : ज्ञान तुरंत हाज़िर हो जाता है न!

प्रश्नकर्ता : ज्ञान हाज़िर रहता है लेकिन उस पर थोड़ा विश्वास रखने जाएँ और यह विचार आता है कि 'हमें क्या हर्ज है?'

दादाश्री : ऐसा कहता है?! उसे पहचानता नहीं है कि यह कौन कह रहा है? 'वकील बोल रहा है,' ऐसा नहीं जान जाता?

प्रश्नकर्ता : अंदर वकील ऐसा कहता है।

दादाश्री : इसीलिए तो तुझे मजा आ गया न(!)

प्रश्नकर्ता : उसका तो नहीं मान सकते।

दादाश्री : कभी मानना चाहिए क्या, उस वकील का? तू मानता है? अच्छा लगता है वह?

प्रश्नकर्ता : ऐसा विचार आए न तो तुरंत उखाड़कर फेंक देने चाहिए, इसके बजाय, 'देखते हैं क्या हो रहा है, सिर्फ विचार ही आया है न!' वकील ऐसा बताता है।

दादाश्री : तब तो आराम से शादी करवा देगा। तुझे तो हर्ज ही नहीं है, शादी का सिग्नल पड़ गया!

प्रश्नकर्ता : नहीं चाहिए ऐसा, लेकिन मन में ऐसा होता है कि दादा ऐसा क्यों कहते होंगे कि 'विचारों को उखाड़कर तुरंत फेंक देना चाहिए?'

दादाश्री : वह तेरा माल है न!

बढ़ता है विषय की लिंक से वह

कहीं भी बैठे हों या फिर नौकरी करते हुए फुरसत मिले तब भी यही करते रहो। ऑफिस में बैठे हुए और फुरसत मिले,

विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)

१४७

तब भी निश्चय मजबूत कर लेना, थोड़ी देर। दो शब्द पढ़ ले तो क्या टाइम लगेगा उसमें? इससे लिंक टूट जाएगी सारी। अंदर जो लिंक चल रही होगी न, वे टूट जाएँगी सारी। तहस-नहस हो जाएँगी। लिंक तहस-नहस करनी हैं। लिंकों से विषय बढ़ता है।

अंदर आनंद होता है न, सामायिक प्रतिक्रमण करते हो उस समय? जैसे कि मुक्त हों, ऐसा लगता है न?

प्रश्नकर्ता : यह चित्त जो भटक रहा होता था, मन जो विचार कर रहा होता था, वह सब बंद हो जाता है, वहाँ सभी चीजें ठहर जाती हैं।

दादाश्री : सबकुछ ठहर जाएगा। ऐसा है न, आप और कुछ सेट कर दो तो विषय तो दूर खड़ा रह जाएगा। ऐसा है बेचारा। वह तो घबराता है बेचारा। जैसे कि, अगर यहाँ अच्छे लोग खड़े हों, तो उस समय हल्की जाति के लोग खड़े नहीं रहेंगे, उसी तरह।

प्रश्नकर्ता : यह आप जब से, दो दिन से बोले हो न, तो यों ऐसे पराक्रम जैसा खड़ा हो गया है कि यों जितनी पोलम्पोल चल रही थी, वह सब बंद हो गई है।

दादाश्री : हाँ, बंद हो जाती है। यह तो दादा के ये शब्द, सारी पोलम्पोल सबकुछ बंद हो जाती है। आप ध्यान रखो तो बहुत अच्छा है। अंदर सतर्क और इसमें भी सतर्क, लेकिन उतना ही यदि इसमें सतर्क रहे तो इसमें फर्स्टक्लास हो जाएगा। वह कुशलता है न एक प्रकार की! लेकिन कहे अनुसार करोगे तो। बार-बार मौका नहीं मिलेगा ऐसा। यह आखिरी मौका है। उठा लो फायदा इस आखिरी मौका का।

कला से काम निकालो

कुछ बदलाव होने लगे तो कागज़ पर लिखकर मुझे चिट्ठी भेज देना। अन्य सभी गलतियाँ चला लेंगे। अन्य सभी तरह की

१४८

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

गलतियाँ नहीं चलाएँ तो इंसान परेशानी में पड़ जाए, वह परेशान हो जाएगा बेचारा। खाने-पीने की ही तकलीफ है। फिर अगर खाना नहीं खाने दें कि यह नहीं खा सकते तो वह क्या करे? क्या कुएँ में गिर जाए? अपने यहाँ सारी छूट दी है। खाना भाई, आइस्क्रिम भी खाना। कुछ भी करके तेरे मन को मनाना।

प्रश्नकर्ता : मन को इस तरह मनाने से पूर्ण हो जाएगा?

दादाश्री : नहीं, पूर्ण नहीं होगा।

प्रश्नकर्ता : तो?

दादाश्री : अपना दिन बीत जाएगा न अभी।

प्रश्नकर्ता : यानी सिर्फ संतोष के लिए। लेकिन आगे जाकर वापस करना तो पड़ेगा न?

दादाश्री : वह तो फिर से ब्रेक लगाना वापस। जरा अभी का पल गुजर गया। उसके बाद हथियार लेकर उसके पीछे पड़ जाना। अभी समय निकाल दो। टेढ़ा पुलिसवाला मिल जाए तो 'साहब, सलाम' करके एकबार खिसक जाना और बाद में उसे देख सकते हैं। बाद में उसके पीछे पड़ेंगे। लेकिन अगर अभी डॉटिंगे तो नहीं चलेगा। अभी हम हाथ लग गए, पकड़े गए तो फिर? कला से काम लेना पड़ेगा और मन तो जड़ है। वह जड़ है, इसलिए किसी की सुनता नहीं है न, हम कला से काम लेंगे तो ठिकाने पर आ जाएगा!

वापस ऐसा मौका नहीं मिलेगा और सरल तरीके से, कम मेहनत में और वापस आनंदपूर्वक। पहले तप करने पड़ते थे, वे भी सब कठोर तप। सहन ही नहीं हो सकते थे, देखते ही धिन् आए।

अपना ज्ञान है इसलिए हमें तो परेशानी है ही नहीं। ज्ञान तो मन को देखता है कि मन क्या कर रहा है और क्या नहीं?

विषय विचार परेशान करें तब... (खंड-2-४)

१४९

ऐसा सब देख सकता है। बाहर क्रमिक मार्ग में मन की परेशानी और (मीठी) गोलियाँ खिलानी पड़ती हैं। फिर भी, हमें भी यदि कभी खिलानी पड़ें तो खिला देना।

इसलिए हम कहते हैं न कि गोलियाँ खिलाकर काम लेना। एक ही चीज नहीं जँचती, उसे ऐसा नहीं है। उसे तो सभी बातें, जिसमें टेस्ट आए, उसमें जँचता है!

❖ ❖ ❖ ❖ ❖

[ ५ ]

नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार

ज्ञान से करो स्वच्छ, मन को

दादाश्री : मन बिगड़ता है अभी भी?

प्रश्नकर्ता : बिगड़ता है।

दादाश्री : तेरी दुकान में माल होगा, तब तक बिगड़ेगा लेकिन अब जो माल है, तो फिर उसे धो देना। धोकर साफ करते हो या नहीं करते?

प्रश्नकर्ता : हाँ, करता हूँ।

दादाश्री : यानी स्वच्छ जीवन। मन भी नहीं बिगड़े कभी भी! देह तो बिगड़े ही नहीं लेकिन मन भी नहीं बिगड़े और बिगड़ जाए तो तुरंत ही धोकर साफ करके, इस्त्री करके एक तरफ रख देना।

जहाँ ज्ञान है, वहाँ संसार का एक भी विचार नहीं आना चाहिए। हमें संसार का एक भी विचार नहीं आता। वह भी स्त्री का? ये सभी स्त्रियाँ बैठी हैं, लेकिन हमें स्त्री से संबंधित विचार तक नहीं आते। अर्थात सब खाली हो जाना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : हो जाना चाहिए या कर देना चाहिए?

दादाश्री : हो जाना चाहिए। यह मार्ग ऐसा है कि आपको खाली नहीं करना पड़ेगा। अपने आप खाली होता रहेगा। हमारी आज्ञा में रहोगे तो खाली होता रहेगा।

नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार (खं-2-५)

१५१

वर्ना मन हो जाएं ढीला

प्रश्नकर्ता : हमने नियम लिया हो कि दो ही रोटियाँ खानी हैं। उसके बाद मन के कहे अनुसार चलें तो वह नियम टूट गया, ऐसा हुआ न?

दादाश्री : मन के कहे अनुसार चलना ही नहीं चाहिए। मन का कहा यदि अपने ज्ञान के अनुसार चल रहा हो, तो उतना एडजस्ट कर सकते हैं। अपने ज्ञान के विरुद्ध चले तो बंद कर देना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : अतः मन के कहे अनुसार चले तो नियम टूट जाता है, ऐसा है न?

दादाश्री : रहा ही कहाँ तब नियम? किसी की बात में अपनी होशियारी लगाएँ तो। लेकिन हमें तो ज्ञान के अनुसार चलना है। फिर भी, मन भी नियमवाला है। इसी वजह से तो इस जगत् के लोग बहुत अच्छी तरह से रह सकते हैं।

प्रश्नकर्ता : अज्ञानता हो, तब भी अगर नियम तय करे तो एक्जेक्ट उसी तरह चल सकता है न?

दादाश्री : वह तय करे कि मुझे नियम से ही चलना है, तब फिर नियम से ही चलेगा। फिर बुद्धि दखल करे तो वैसा ही हो जाता है। गाड़ी नियम में नहीं हो तो क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : हाँ। व्यवहार उलझ जाएगा सारा।

दादाश्री : हमारा मन बहुत कहता है कि यह खाओ, यह खाओ, लेकिन नहीं। वर्ना वश में नहीं रहेगा। देर ही नहीं लगेगी न। लेकिन जिसका हावी हो गया उसे पूरे दिन खिंटपिट रहती है। दयनीय स्थिति! 'तू' तो चंद्रेश को रूलानेवाला आदमी है। 'तू' कोई ऐसा-वैसा आदमी है? और फिर यह मन तो चंद्रेश का है, तुझे क्या लेना देना? अब तू है शुद्धात्मा।

१५२

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : बिल्कुल।

दादाश्री : यह मन, यह तो चंद्रेश का है। तुझे उस मन के कहे अनुसार नहीं चलना है। जो मन के कहे अनुसार चले न, तो उसका ब्रह्मचर्य नहीं टिकेगा, कुछ भी नहीं टिकेगा। बल्कि अब्रह्मचर्य हो जाएगा। मन का और हमारा क्या लेनादेना?

अब किसी के गहने पड़े हुए हों और मन कहे कि कोई नहीं है, ले लो न! लेकिन हमें समझना चाहिए। खुद का चलन नहीं रहे, तो मन चढ़ बैठता है।

प्रश्नकर्ता : खुद को समझ में जरूर आता है कि ये दो घंटे व्यर्थ चले गए।

दादाश्री : चले गए, वह अलग चीज है। वह तो अजागृति के कारण। लेकिन फिर भी मन चढ़ नहीं बैठेगा।

विरोधी के पक्षकार ?

प्रश्नकर्ता : एक बार जब हम सत्संग में से उठकर बाहर चाय पीने गए थे, तब आपने कहा था कि बाकी सभी चीजों में ऐसे छूट रखना लेकिन सिर्फ ब्रह्मचर्य के बारे में ही मन की मत सुनना।

दादाश्री : और बाकी बातों में सुनोगे? यदि तुम्हें टेस्ट आता हो तो मानो न! मुझे क्या आपत्ति है? यह तो, अगर ब्रह्मचर्य के बारे में सुनोगे, तब भी मुझे आपत्ति नहीं।

यह तो, आप ब्रह्मचर्य में स्ट्रॉंग(टूढ़) रहो, इसलिए कहना चाहता हूँ। ध्येय को नुकसान न पहुँचाए, इस हेतु से ऐसा कहा था। उसे लेकर अगर तुम ऐसा कहो कि 'बाकी सब चीजों में आराम से मन की सुनना।' तो तुम्हारा काम हो गया! क्या पाओगे इससे? कैसी वकालत कर रहे हो?

प्रश्नकर्ता : खुद की लॉ-बुक(कानूनी किताब) में ले जाते हैं।

नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार (खं-2-५)

१५३

दादाश्री : लों-बुक तो वही की वही। ये पक्षकार कैसे इंसान हैं? विरोधी के पक्षकार! अब समझ जाओ। वर्ना चलेगा नहीं इस दुनिया में।

मन चलाए, मंडप तक...

देखो न, चार सौ साल पहले कबीर जी ने कहा है, कितने सयाने इंसान! कहते हैं, 'मन का चलता तन चले, ताका सर्वस्व जाए।' सयाने नहीं थे कबीरजी? और यह तो मन के कहे अनुसार चलते रहते हैं। अगर मन कहे कि 'इससे शादी करो।' तो शादी कर लोगे?

प्रश्नकर्ता : नहीं। ऐसा नहीं होगा।

दादाश्री : अभी तो वह बोलेगा। ऐसा बोलेगा, उस समय क्या करोगे तुम? ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करना हो तो स्ट्रॉंग रहना पड़ेगा। मन तो ऐसा भी कहेगा और तुमसे भी कहलवाएगा। इसीलिए मैं कह रहा था न कि 'कल सुबह शायद तुम भाग भी जाओगे।' उसका क्या कारण है? मन के कहे अनुसार चलनेवाले का भरोसा ही क्या? क्योंकि तुम्हारा खुद का चलन नहीं है। खुद के चलनवाला ऐसा नहीं करेगा।

इसलिए मैं तुम से कह रहा था कि अंदर मन कहेगा, 'अभी तो, यह लड़की अच्छी है, और अब हर्ज नहीं है। दादाश्री का आत्मज्ञान मिल गया है, हमें। अब कुछ बाकी नहीं रहा। उसने भी शादी कर ली है, अब पुरावे(एविडेन्स) में खास कुछ कमी नहीं है। चलो न, अब इसमें कहाँ गलती हो गई वापस?। ऊपर से फादर का आशीर्वाद बरसेगा।' अंदर ऐसा बताएगा और अगर तू बहक गया तो वह फजीहत करेगा। हम तो तुम सब से कहते हैं कि 'भाग जाओगे।' तब तू कहता है, 'भागकर हम जाऊँ कहाँ?' लेकिन किस आधार पर तुम भागे बिना नहीं रहोगे? क्योंकि तुम मन के कहे अनुसार चलते हो।

१५४

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : अब हम यहाँ से कहीं भी नहीं भागेंगे।

दादाश्री : अरे, लेकिन मन के कहे अनुसार चलनेवाला इंसान यहाँ से नहीं जाएगा, वह किस गारन्टी के आधार पर? अरे, लो, मैं जरा दो दिन तक तेरा पानी हिलाता हूँ। अरे! छपछपाऊँ न, तो परसों ही तू चला जाएगा! यह तो तुझे पता ही नहीं है। तुम लोगों के मन का क्या ठिकाना? बिल्कुल बिना ठिकाने का मन। खुद के सेन्टर में भी नहीं खड़ा है। मन के कहे अनुसार ही तो चल रहे हो अभी भी। यह 'नहीं भागेंगे, नहीं भागेंगे', वह सिर्फ कहने के लिए ही लेकिन अभी तो न जाने क्या करोगे? स्ट्रॉंग इंसान तो कौन कहलाता है कि जो किसी की भी नहीं माने। मन की या बुद्धि की, या अहंकार की या फिर कोई भगवान आ जाएँ, तो उनकी भी नहीं माने। तुम लोगों की तो बिसात ही क्या? तू मुझसे कह रहा था कि, 'स्मशान में जाऊँ फिर भी मन आपत्ति नहीं उठाता।' लेकिन और कहीं मन आपत्ति उठाए कि वहाँ नहीं जाना है, तो नहीं जाता?

प्रश्नकर्ता : मैंने यहाँ दादा के पास आकर जो निश्चय किया है, उस बारे में मन की कभी नहीं सुनी है।

दादाश्री : ऐसा? मन सीधा बोलता भी है?

प्रश्नकर्ता : हाँ, सीधा बोलता है।

दादाश्री : उल्टा नहीं बोला है, इसलिए। थोड़ा-बहुत उल्टा बोलेगा, उसे तुम नहीं सुनोगे, लेकिन अगर सात दिन तक तुम्हें छोड़े नहीं और वापस अंदर कहे, 'यह ज्ञान वगैरह मिल गया है, अब कोई हर्ज नहीं है। लोगों में अपनी बहुत वैल्यू है। ऐसा है।' सब समझा-बुझाकर चलाएगा तुम्हें!

प्रश्नकर्ता : ऐसा नहीं होगा अब।

दादाश्री : बाद में तुम्हें नुकसान नहीं हो, इसलिए हम सावधान

नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार (खं-2-५)

१५५

करके कहते हैं कि इसमें 'मन का चलता' छोड़ दो चुपचाप, अपने स्वतंत्र निश्चय से जीओ। मन की जरूरत हो तो लेना और जरूरत नहीं हो तो छोड़ दो। एक ओर रख दो उसे। लेकिन यह मन तो पंद्रह-पंद्रह दिनों तक घुमाकर फिर शादी करवा देता है। बड़े-बड़े संत भी घबरा चुके हैं, तो तुम लोगों की क्या बिसात?

ध्येय का ही निश्चय

ब्रह्मचारी बनने का यह निश्चय तो तेरा है! लेकिन यह तो तू मन के कहे अनुसार तो सबकुछ कर रहा है तो फिर यह सब तेरा है ही कहाँ? वह तो तेरे 'मन' ने कहा था, उस हिसाब से शादी करने में मजा नहीं है। तो ऐसा सब तेरे 'मन' ने तुझे कहा था और तूने एक्सेप्ट कर लिया?

प्रश्नकर्ता : अब निश्चय हो गया है न लेकिन?

दादाश्री : अब निश्चय तेरा है। यदि उसे तू तय करे कि अब यह है मेरा निश्चय। बाद में मन से कह देना कि, 'अब अगर तू उल्टा करेगा, तो तेरी बात तू जाने!' अब तो इसे अपने सिद्धांत के रूप में स्वीकार करते हैं, तो अपना ही कहलाएगा, वह निश्चय।

प्रश्नकर्ता : सिद्धांत के रूप में स्वीकार करने के बाद 'अपना', वना 'मन' का?

दादाश्री : तो और किसका? उसी का है। 'अपना' कहाँ है यहाँ इस जायदाद में? जो अपनी जायदाद थी, उसे दबोच लिया है, और उसमें भी अपने किराए के मकान में रहता है। उसमें भी वह चोरी करता है न ऊपर से?

किसी के छत पर से खपरेल का टुकड़ा गिरे और लग जाए, फिर भी कुछ नहीं बोलते हो। क्योंकि वहाँ मन कहेगा कि 'कैसे कई अब?' वह तो जैसा उसका मन सिखाता है, उसी

१५६

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

अनुसार वह बोलता है। अपने पास अभी जो सिद्धांत है, मन उसी के अनुसार चलना चाहिए। मन का कहा नहीं मानना है।

सामायिक में चलन, मन का

प्रश्नकर्ता : सामायिक में बैठना अच्छा नहीं लगता। गुल्ली मारने का मन करता है।

दादाश्री : मन भले ही चिल्लाता रहे लेकिन तुझे क्या लेना देना? तरे सिद्धांत से विरुद्ध चल रहा है? चल रहा है, तो चलन उसी का है अभी भी। वह मना करे तो तुम्हें क्या? वह तो सामायिक ही नहीं करने देगा।

प्रश्नकर्ता : पहले शुरुआत में मैं एक-दो साल रेग्युलर सामायिक करता था। वह मुझे अच्छा लगता था, तब।

दादाश्री : तो तू, 'पसंद-नापसंद' वही मार्ग पर है न? ऊपर से कह रहा है कि मुझे अच्छा लगता था! मन की सुने वह ईमान ही नहीं कहलाएगा, वह मशीनरी नहीं कहलाएगा तो और क्या कहलाएगा? खुद का चलन नहीं है? तुम लोग पुरुष बने हो न?

मन अगर सत्संग में आने के लिए मना करे तो क्या करोगे? वहाँ मन की मानते हो? ऐसे मानोगे तो फिर भटक जाओगे न! रहा ही क्या फिर? जानवर भी उसकी सुनते हैं और तुम भी उसकी सुनते हो। कई बार मन के विरुद्ध करते हो या नहीं?

प्रश्नकर्ता : कई बार।

दादाश्री : अच्छा है। जो मन के चलाने से चले, वह तो मिकेनिकल कहलाता है। अंदर पेट्रोल भर दे तो मशीन चलती रहती है। क्या तुझे भी ऐसा होता है? तब तो तुझे शादी नहीं करनी होगी, फिर भी शादी करवा देगा!

प्रश्नकर्ता : इसमें ऐसा नहीं होगा।

नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार (खं-2-५)

१५७

दादाश्री : कैसे इंसान हो? अपनी इच्छा अनुसार नहीं चलने दे। तो फिर खुद का चलन ही नहीं है।

प्रश्नकर्ता : सामायिक करने की इच्छा इतनी स्ट्रोंग नहीं है।

दादाश्री : ओहो, तब तो यह सारा धर्म करने की इच्छा भी नहीं है। इसमें भी स्ट्रोंग नहीं है न फिर!

सामायिक मतलब अड़तालीस मिनट की चीज है। अड़तालीस मिनट तक ठिकाने नहीं रह सकते, तो ब्रह्मचर्य का पालन कैसे कर सकेगा? उसके बजाय तो चुपचाप शादी कर ले तो अच्छा।

यह ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, तो उसमें ब्रह्मचर्य यानी खुद का निश्चयबल। कोई डिगा न सके, ऐसा। जो किसी के कहे अनुसार चले, वह ब्रह्मचर्यपालन कैसे कर सकेगा?

ब्रह्मचर्यवाला इंसान तो कैसा होता है? अरे!! स्ट्रोंग पुरुष! उच्च मनोबलवाला! वे कहीं ऐसे होते होंगे? इसीलिए तो मैं बार-बार कहता हूँ कि, 'तुम चले जाओगे, शादी कर लोगे।' तब तुम कहते हो कि 'आप ऐसे आशीर्वाद मत दीजिए।' मैंने कहा, 'मैं आशीर्वाद नहीं दे रहा हूँ। तुम्हारा भेस दिखा रहा हूँ।' अभी से यदि सावधान नहीं हो जाओगे और खुद के हाथ में लगाम नहीं ले लोगे तो खत्म! गाड़ी कहाँ ले जा रहे हो? तब कहता है, 'बैल जहाँ ले जाए वहाँ।' बैल जिस दिशा में जाए, उस दिशा में गाड़ी जाने देगा कोई? बैल इस ओर जा रहा हो तो मार-ठोककर, कैसे भी करके, इस ओर मोड़ लेता है। खुद के तय किए रास्ते पर ही ले जाएगा न?

प्रश्नकर्ता : तय किए रास्ते पर ही ले जाएगा।

दादाश्री : जबकि तुम लोग तो बैल की इच्छानुसार गाड़ी चलाते हो। 'वह इस ओर जा रहा है तो मैं क्या करूँ?' कहते हैं! उससे अच्छा तो शादी कर लो न शांति से! गाड़ी इस ओर

१५८

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

जा रही हो तो अर्थ ही नहीं है न! निश्चयबल है नहीं। खुद का कुछ है नहीं। खुद की कोई कार्बिलियत है नहीं। तुझे क्या लगता है? गाड़ी जाने देनी चाहिए?

प्रश्नकर्ता : नहीं जाने देनी चाहिए।

दादाश्री : तो क्यों ये गाड़ियाँ जा रही हैं?

प्रश्नकर्ता : आप बताते हैं न तब पता चलता है कि यह मन के कहे अनुसार किया था। वर्ना पता ही नहीं चलता।

दादाश्री : हाँ, लेकिन पता चलने के बाद समझ जाएगा या नहीं?

प्रश्नकर्ता : समझ जाता है।

दादाश्री : अब वापस परसों आप ऐसा कहोगे कि, 'मुझे भीतर से ऐसा लगा, इसलिए उठ गया सामायिक करते करते!'

प्रश्नकर्ता : सामायिक करने बैठते हैं तो मजा नहीं आता।

दादाश्री : मजा नहीं आ रहा हो तो उसमें हर्ज नहीं। लेकिन मन के कहे अनुसार करे तो, वह नहीं चला सकते।

प्रश्नकर्ता : लेकिन मजा नहीं आता, इसलिए ऐसा लगता है कि अब नहीं बैठना है।

दादाश्री : लेकिन यों 'मन के कहे अनुसार चलना है' ऐसी इच्छा नहीं है न तेरी?

प्रश्नकर्ता : ऐसा तो अब पता चला न!

दादाश्री : मजा नहीं आता, वह अलग बात है। मजा तो, हम समझते हैं कि इसे इन्टरेस्ट(रस) कहीं और है, इसमें इन्टरेस्ट कम है। इन्टरेस्ट तो हम ला देंगे।

प्रश्नकर्ता : मजा नहीं आता इसलिए मन बताता है कि 'अब जाना है।'