भारतकोश
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

तितिक्षा के तप से गढ़ो मन-देह (खंड-२-१२)

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मुँह चलता रहना चाहिए। यानी कभी भी ऐसे खाते रहना, वह तो बहुत गलत है। बीच में नहीं खाना चाहिए। खाने के बाद कुछ भी नहीं डालना चाहिए।

उणोदरी मतलब हमें भोजन की मात्रा समझ में आ जाती है कि आज बहुत भूख लगी है, इसलिए तीन लड्डू खा सकेंगे तो एक लड्डू कम कर देना। कभी दो लड्डू खा सकेंगे, ऐसा लग रहा हो तो तब सवा लड्डू खाना। जितनी हमें समझ में आए, मात्रा उससे कुछ न्यून कर देनी चाहिए। कम कर देनी चाहिए। नहीं तो पूरे दिन डोजिंग रहेगी। मूलतः जगत् के लोग, एक तो खुली आँखों से सोते हैं और ऊपर से वापस ऐसे डोजिंग हो जाता है। जागृति और इसका, इन दोनों का मेल कैसे बैठ सकता है? अतः उणोदरी जैसा अन्य कोई तप नहीं है। भगवान ने बहुत ही सुंदर रास्ता बताया है कि कम रखना। कोई आठ लड्डू खाता हो तो उसे पाँच लड्डू खाने चाहिए। रोज एक लड्डू खाता हो तो वह कहेगा, 'मैं तो एक ही लड्डू खाता हूँ' वह भी नहीं चलेगा। उसे पौना लड्डू खाना चाहिए। वीतरागों ने एक-एक वाक्य बड़ी समझदारी से कहा है जो कि जगत् के लिए हितकारी रहे!

आहार जागृति से रक्षा करना व्रत की

प्रश्नकर्ता : भोजन और ज्ञान का क्या लेना देना है?

दादाश्री : भोजन कम होगा तो जागृति रहेगी, वरना जागृति रहेगी ही नहीं न!

प्रश्नकर्ता : भोजन से ज्ञान में कितनी बाधा आती है?

दादाश्री : बहुत बाधा आती है। आहार बहुत बाधक है। क्योंकि यह भोजन जो कि पेट में जाता है, उससे फिर दारू बनता है और पूरे दिन फिर शराब का नशा चढ़ता ही जाता है। वरना मैंने जो ये पाँच आज्ञाएँ दी हैं, उनकी जागृति क्यों नहीं रह पाती? उसमें कौन सी बड़ी बात है? और जागृति भी सभी

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

को दी ही है न?! लेकिन इस भोजन का बहुत असर होता है। हमने अब भोजन का त्याग करने को नहीं कहा है। अपने आप यदि त्याग हो जाए तो अच्छा। जिसे संयम लेना है, संयम यानी ब्रह्मचर्य पालन करना है, वह अगर अधिक भोजन लेगा तो उसे खुद को उल्टा 'इफेक्ट' होगा। फिर उसे उस उल्टे 'इफेक्ट' के रिजल्ट भुगतने पड़ेंगे। जिसे ब्रह्मचर्य पालन करना है, उसे ख्याल में रखना है कि कुछ प्रकार के आहार से उत्तेजना बढ़ जाती है। वह आहार कम कर देना चाहिए। चरबीवाले आहार जैसे कि घी-तेल वगैरह नहीं लेने चाहिए, दूध भी कुछ कम लेना चाहिए, लेकिन दाल-चावल-सब्जी-रोटी वगैरह आराम से खाओ और उस आहार की मात्रा कम रखना। जबरदस्ती मत खाना। यानी आहार कितना लेना चाहिए कि नशा न चढ़े और रात को तीन-चार घंटे ही नींद आए, उतना आहार लेना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : ये साइन्टिस्ट कहते हैं कि छः घंटे की नींद होनी चाहिए।

दादाश्री : तो इन गाय-भैंसों से पूछ आओ कि तुम कितनी देर सोते हो? मुर्गे से पूछ आओ कि कितनी देर सोता है? निद्रा ब्रह्मचारी के लिए नहीं है! निद्रा तो कहीं होती होगी? निद्रा तो ये जो मेहनत करनेवाले हैं, वे छः घंटे सोते हैं। उन्हें गहरी नींद आ भी जाती है! नींद तो कैसी होनी चाहिए कि जब ट्रेन में बैठकर जाते हैं, तब पाँच-दस झोंके आ जाएँ कि बस हो गया, फिर सुबह हो जाती है। यह तो आहार का पूरा नशा चढ़ता है, फिर सोता भी है!

आहार में घी-शक्कर करवाते हैं विषयकांड

आहार भी बहुत कम मत कर देना। क्योंकि आहार कम खाओगे तो ज्ञानरस जो कि आँखों को लाइट देता है, वह ज्ञानरस जो इन तंतुओं में से जाता है, वह रस फिर अंदर नहीं जाता और नसें सारी सूख जाती है। जवानी है, इसलिए यों घबरकर

तितिक्षा के तप से गढ़ो मन-देह (खं-2-१२)

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आहार एकदम बंद मत कर देना। दाल-चावल वगैरह खाओ, वह तो ऐसा आहार है कि जो जल्दी पाचन हो जाए! और पचने के बाद जो खून बनता है, वही खून इस्तेमाल होता है। हररोज काम आए इतना ही खून बनता रहता है। आगे का (इससे ज्यादा/अतिरिक्त) प्रोडक्शन जो था न, वह कम हो जाएगा!

प्रश्नकर्ता : शुद्ध घी हो तो उसमें क्या गलत है?

दादाश्री : घी हमेशा मांस बढ़ानेवाला होता है और मांस बढ़े तो वीर्य बढ़ता है, वह ब्रह्मचारियों की लाइन ही नहीं है न! यानी आप जो भी भोजन खाओ, सिर्फ दाल-चावल-कढ़ी खाओ, फिर भी भोजन का स्वभाव ऐसा है कि घी के बिना भी उसका खून बन जाता है और वह हेलिंग होता है। कुदरत ने ऐसा नियम रखा है क्योंकि जो गरीब इंसान है, वह ये सब कैसे खा पाएगा? तो गरीब इंसान जो खाता है, उससे भी उसे पूरी शक्ति मिल जाती है न! उसी तरह हमें इस सादे भोजन से पूरी शक्ति मिल जाती है! लेकिन जो विकारी है, वैसा भोजन नहीं होना चाहिए।

ये जो होटल का खाते हैं, उससे शरीर में खराब परमाणु घुस जाते हैं। फिर उनका असर हुए बिना रहता ही नहीं है। उसके लिए फिर उपवास करना पड़ेगा और जागृति रखनी पड़ेगी। फिर भी संयोग वश अगर बाहर का खाना पड़े तो खा लेना, लेकिन उसमें फिर लाभालाभ देखना। तले हुए पकोड़े खाने के बजाय दूध पी लेना अच्छा। बाहर की पूरी-सब्जी के बजाय घर की खिचड़ी पसंद करना!

इतने छोटे-छोटे बच्चों को घी गोद की मिठाइयों वगैरह खिलाते हैं, लेकिन बाद में उसका बहुत खराब असर होता है, वे बहुत विकारी हो जाते हैं। इसलिए छोटे बच्चे को ज्यादा नहीं देना चाहिए, उसकी मात्रा संभालनी चाहिए। ये माल-मलीदा खाना, वह सब संसारियों के लिए हैं जिन्हें कि ब्रह्मचर्य की कुछ पड़ी नहीं है।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

जिसे ब्रह्मचर्य पालन करना है, उसे माल-मलीदा नहीं खाना चाहिए। अगर खाना ही हो तो थोड़ा खाना कि भूख ही उसे खा जाए। माल-मलीदा खाते हैं तो वापस साथ में दाल-चावल चाहिए, सब्जी चाहिए तब फिर भूख उसे नहीं खाती। खराब विकारों के आने का कारण यही है। उससे विकारी भाव उत्पन्न होते हैं। भूख खा जाए, तब तक विकारी भाव उत्पन्न नहीं होते। भूख न खाए, तब प्रमाद होता है। प्रमाद होता है इसलिए विकार होता है। प्रमाद यानी आलस नहीं, लेकिन विकार!

पुद्गल ऐसी चीज है जो परेशान करती है, वह अपना पड़ोसी है। पुद्गल अगर वीर्यवान हो, तब परेशान नहीं करता या फिर अगर बिल्कुल ही कम आहार लें, जीने लायक ही आहार लें, तब पुद्गल परेशान नहीं करता। आहार की वजह से तो ब्रह्मचर्य अटका हुआ है। आहार के बारे में जागृत रहना चाहिए। दिया जलता रहे, उतना ही खाना चाहिए। भोजन तो ऐसा लेना चाहिए कि नशा न चढ़े और नींद ऐसी होनी चाहिए कि भीड़ में बैठे हों और इधर नहीं खिसक सकें, उधर नहीं खिसक सकें, ऐसी भीड़ में बैठे-बैठे भी नींद आ जाए। वास्तव में नींद वही है। यह तो भोजन का नशा चढ़ता है, उससे फिर नींद आती है। खाना खाने के बाद विधि करके देखना, सामायिक करके देखना। होती है? ठीक से नहीं हो पाती।

नहाना भी है, निर्मंत्रण नुकसान को

नहाने से सभी विषय जागृत हो जाते हैं। ये नहाना-धोना किसके लिए है? विषयी लोगों के लिए ही नहाने की जरूरत है, बाकी तो जरा कपड़ा गीला करके यों पोंछ लेना चाहिए। जो अन्य आहार नहीं खाते, उसके शरीर से बिल्कुल दुर्गंध नहीं आती।

महीने से सिकनेस हो तो फिर विकार रहता है?

प्रश्नकर्ता : तो नहीं रहता।

तितिक्षा के तप से गढ़ो मन-देह (खंड-2-१२)

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दादाश्री : तो वैसी सिकनेस लाना।

प्रश्नकर्ता : लाना अपने बस की बात नहीं है न?

दादाश्री : तब अपने बस की बात क्या है? अगर चार दिन भूखे रहें तो अपने आप बीस दिन की सिकनेस आ जाएगी! चार दिन भूखा रहने के बाद विकार नहीं रहता।

आहार कम लिया कि चला। जीने के लिए खाए, खाने के लिए नहीं जीए। पहले रात को नहीं खाता था, तब अच्छा रहता था या अब अच्छा रहता है?

प्रश्नकर्ता : पहले बहुत अच्छा रहता था।

दादाश्री : तो जान-बूझकर बिगाड़ा क्यों?

प्रश्नकर्ता : खाने के दो-चार घंटे बाद भूख लगे तो और कुछ माँगता है।

दादाश्री : लेकिन आहार ऐसा लेना है कि भूख लगे ही नहीं, ऐसा शुष्क आहार कि जिसमें दूध-घी-तेल ऐसा बहुत पुष्टिकारक आहार न आए। ये दाल-चावल-कढ़ी खाना, वह ज्यादा पुष्टिकारक नहीं होता।

इस काल में तो कंट्रोल किए जा सकें, ऐसे संयोग ही नहीं है! दबाने जाए तो बल्कि मन और ज्यादा उछल-कूद करता है। इसलिए आहारी आहार करता है, ऐसे चलने देना। लेकिन वापस वह ब्रह्मचर्य को नुकसान नहीं करे, इतना जरा देखना! आहार के लिए आपको कंट्रोल या कंट्रोल नहीं, हमें ऐसा कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है। सिर्फ यदि कभी विषय परेशान कर रहा हो, उदयकर्म का धक्का ज्यादा लग रहा हो, तो उसे आहार पर कंट्रोल करना चाहिए। पुरुषार्थ और तो क्या है लेकिन तुम्हें चंद्रेश से कहना पड़ेगा। चंद्रेश के साथ जुदापन रखकर तुम्हारी बातचीत हो, वही। क्योंकि आत्मा तो कुछ बोलता ही नहीं है,

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्व)

लेकिन भीतर जो प्रज्ञा नाम की शक्ति है, वह कहती है कि भोजन जरा कम लोगे तो तुम्हें ठीक रहेगा। क्योंकि अगर अहंकार करने जाए तो अहंकार जीवित हो जाएगा। यह जो ज्ञान दिया है, उससे अहंकार निर्जीव हो गया है। 'जरूरत से ज्यादा नहीं खाना है', ऐसा तय करने के बाद अगर गलती से खा लिया जाए, तो उसके लिए कहना 'व्यवस्थित है'।

जीना है, ध्येय अनुसार

प्रश्नकर्ता : हर एक कार्य में तय करना पड़ता है। ज्यादा नहीं खाना है, ऐसा तय किया और उसके लिए जागृति रखी, ऐसे हर एक कार्य में जागृति रखनी पड़ेगी?

दादाश्री : वह जो उपयोग रखा, वही जागृति! प्रमाद यानी खाना खाते रहना। इसलिए फिर कहीं भी ठिकाना ही नहीं रहता। पूरे दिन जो कुछ भी आए, वह खाता ही रहता है। मैं तो कितने ही सालों से मजबूरन खा रहा हूँ।

और अगर कोई इंसान बीमार हो, तीन दिन से और उसे विषय के लिए कहा जाए कि 'पचार हजार रुपये दूँगा,' तो करेगा?

प्रश्नकर्ता : नहीं करेगा, शक्ति ही नहीं रहेगी न!

दादाश्री : यह सब शक्ति करती है, आहार ही करता है यह सब।

प्रश्नकर्ता : पौद्गलिक शक्ति।

दादाश्री : हं। हमें दो-तीन दिन खाए बगैर ही बिता देने चाहिए। साधु, ऐसे ही बिताते हैं न? यह उपाय! शक्ति होगी तभी विषय में पड़ेगा न? उपाय तो करना पड़ेगा न?

मतलब महीने में दो बार भूखे रहना चाहिए। दो-दो दिन।

तितिक्षा के तप से गद्गो मन-देह (खं-2-१२)

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इतना तप करने से वह (ब्रह्मचर्य का) तप हो ही जाएगा। महावीर भगवान ने यही किया था न! सभी ने यही किया था न!

प्रश्नकर्ता : इस निश्चय को टिकाकर रखने के लिए कोई उपाय नहीं हो पाते।

दादाश्री : यही उपाय है।

प्रश्नकर्ता : आप कहते हैं, फिर भी मानसिक तैयारी नहीं हो पाती अंदर से।

दादाश्री : तो फिर हमने कहाँ मना किया है, शादी करने को?

प्रश्नकर्ता : आपने तो नहीं कहा लेकिन हमने तो देखा है न! ऐसा प्राप्त होने के बाद, अब तो गलती कर ही नहीं सकते।

दादाश्री : तो फिर डिसाइड करने के बाद कुछ नहीं छू सकता! डिसीजन लेने के बाद अगर ऐसे ढीला बोलोगे तो बल्कि चढ़ बैठोगे। ‘गेट आउट’ कहने से थोड़ा-बहुत बाहर भाग जाएगा। जब वापस आए तो वापस ‘गेट आउट’ कहना।

कंदमूल पोषण दें विषय को

देखा देखीवाला ब्रह्मचर्य व्रत नहीं टिकता। इसलिए फिर जो करना हो, वह करे। लेकिन मैं तो चेतावनी देता हूँ कि ब्रह्मचर्य पालन करना हो तो कंदमूल नहीं खाने चाहिए।

प्रश्नकर्ता : कंदमूल नहीं खाने चाहिए?

दादाश्री : कंदमूल खाना और ब्रह्मचर्य पालन करना, यह रोग फिलॉसॉफि है, विरोधी है?

प्रश्नकर्ता : कंदमूल नहीं खाना, वह जीव हिंसा की वजह से है या दूसरा कोई कारण है?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : कंदमूल तो अब्रह्मचर्य को जबरदस्त पुष्टि देनेवाले हैं। ऐसे नियम रखने पड़ते हैं ताकि उसका ब्रह्मचर्य रह पाए-टिक पाए। और जिससे ब्रह्मचर्य टिक सके, उसका भोजन इतना सुंदर होना चाहिए। अब्रह्मचर्य से सारी रमणीयता चली जाती है और जो ब्रह्मचर्य का पालन करे, वह रमणीय बनता है। इसान प्रभावशाली दिखता है।

प्रश्नकर्ता : अभी तक हम कंदमूल नहीं खाते थे। ज्ञान लेने के बाद खाना शुरू किया, तो बाधक नहीं रहेगा? दोष नहीं लगेगा?

दादाश्री : किसे दोष लगेगा इसमें? इस डिस्चार्ज में कैसा दोष? हम इन ब्रह्मचारियों को दोष लगने के लिए नहीं, उन्हें तो अगर यह सब नहीं खाएँगे न, तो विषय का जोर कम हो जाएगा। उन्हें तो ऐसा रक्षण के लिए करना होता है। दोष का और इसका लेनादेना नहीं है।

प्रश्नकर्ता : यह जो वर्णन किया है कि सुई की नोक पर आलू का, उस नाप का एक पीस आए, तो उसमें अनंत जीव होते हैं, उन जीवों को...

दादाश्री : वह सब किसके लिए है? जिसे बुद्धि बढ़ानी हो न, उसके लिए है। उसके आग्रही बन जाएँ तो कब पार आएगा? और यह मोक्ष का मार्ग निराग्रही है। इसे जानना जरूर है और हो सके, उतना कम कर देना है।

[ १३ ]

न हो असार, पुद्गलसार

पुद्गलसार है, ब्रह्मचर्य

ब्रह्मचर्य, वह क्या है? वह पुद्गलसार है। हम जो खाना खाते हैं, पीते हैं, इन सबका सार क्या रहा? 'ब्रह्मचर्य'! यदि आपका यह सार चला जाए तो उसे जो आत्मा का आधार है, वह आधार 'लूज' हो जाएगा! इसलिए ब्रह्मचर्य मुख्य चीज़ है। एक ओर ज्ञान हो और दूसरी ओर ब्रह्मचर्य हो तो सुख का अंत ही नहीं रहेगा न! फिर ऐसा चेन्ज आता है कि बात ही मत पूछो! क्योंकि ब्रह्मचर्य, वह पुद्गलसार है न?

यह सब जो खाते हैं, पीते हैं, उसका क्या होता होगा पेट में?

प्रश्नकर्ता : खून बनता है।

दादाश्री : और संडास नहीं बनती होगी?

प्रश्नकर्ता : बनती है न! कुछ आहार से खून और कुछ संडास के माध्यम से सारा कचरे के रूप में निकल जाता है।

दादाश्री : हाँ, और कुछ पानी के माध्यम से निकल जाता है। इस खून से फिर क्या बनता है?

प्रश्नकर्ता : खून से वीर्य बनता है।

दादाश्री : ऐसा! वीर्य को समझता है? खून से वीर्य बनता है, उस वीर्य से फिर क्या बनता है? खून की सात धातु कहते

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

हैं न? उनमें से एक में से हिड्डियाँ बनती हैं, एक में से मांस बनता है, उनमें से फिर अंत में सबसे आखिरी में वीर्य बनता है। अंतिम दशा में वीर्य बनता है। वीर्य, वह तो पुद्गलसार कहलाता है। दूध का सार घी कहलाता है, उसी तरह भोजन करने का सार वीर्य कहलाता है। अब इस सार को क्या मुफ्त में ही दे देना चाहिए या मंहगे दाम पर बेचना चाहिए?

प्रश्नकर्ता : मंहगे दाम पर बेचना चाहिए।

दादाश्री : ऐसा? लोग तो पैसा खर्च करके बेचते हैं और तू कहता है कि मंहगे दाम पर बेचना चाहिए, तो मंहगे दाम पर तुझ से कौन लेगा?

लोकसार, वह मोक्ष है और पुद्गलसार, वह वीर्य है। जगत् की सभी चीजें अधोगामी हैं। यदि ठान ले तो सिर्फ वीर्य ही ऊर्ध्वगामी बन सकता है इसलिए ऐसे भाव करने चाहिए कि वीर्य ऊर्ध्वगामी हो। वीर्य के दो गमन हैं। एक अधोगमन और दूसरा ऊर्ध्वगमन। जब तक अधोगमन है, तब तक पाशवता है।

प्रश्नकर्ता : इस ज्ञान में रहने पर तो अपने आप ऊर्ध्वगमन होगा ही न?

दादाश्री : हाँ, और यह ज्ञान ही ऐसा है कि अपने ज्ञान में रहो तो कोई दिक्कत नहीं आएगी, लेकिन जब अज्ञान उत्पन्न होता है तब अंदर यह रोग उत्पन्न हो जाता है। उस समय जागृति रखनी पड़ेगी। विषय में तो अपार हिंसा है, खाने-पीने में ऐसी कोई हिंसा नहीं होती।

इस जगत् में साइन्टिस्ट और सभी लोग कहते हैं कि वीर्य-रज अधोगामी है। लेकिन अज्ञानता है, इस वजह से अधोगामी है। ज्ञान में तो ऊर्ध्वगामी बन जाता है। क्योंकि ज्ञान का प्रताप है न! ज्ञान हो तो कोई विकार ही नहीं होगा, फिर भले ही कैसी भी बाँडी हो, भले ही कितना भी खाता हो। अतः मुख्य चीज ज्ञान है।

न हो असार, पुदुगलसार (खं-2-१३)

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प्रश्नकर्ता : ऊर्ध्वगामी और अधोगामी, ये दोनों 'रिलेटिव' शब्द नहीं हुए?

दादाश्री : हाँ, 'रिलेटिव' ही कहलाएगा। लेकिन 'रिलेटिव' में यों बदलाव हो जाए तो हमें लाभ मिलेगा! अपने 'ज्ञान' से बदलाव हो सकता है। हम क्या कहते हैं कि हम ज्ञान प्रकट रखेंगे तो सारा बदलाव अपने आप होता रहेगा। अपना ज्ञान प्रकट नहीं रखने से बदलाव नहीं होगा। रिलेटिव में तो हम कुछ भी नहीं कर सकते, लेकिन हम अपने में कर सकते हैं और उसका फोटो 'रिलेटिव' पर पड़ता है। इसलिए हमें सिर्फ जागृति ही रखनी है। वीर्य के परमाणु सूक्ष्मरूप से ओजस में परिणामित होते हैं, उसे फिर नीचे उतरना, अधोगामी होना नहीं रहता, यह मेरा अनुभव है। वे शक्तियाँ जो डाऊन हो रही थीं, वे ऊपर चढ़ती हैं। जो संसार में ख़ाया-पीया, वे सारी शक्तियाँ दो तरह से परिणामित होती हैं। एक संसार के रूप में और दूसरी ऐश्वर्य के रूप में!

अहो, अहो! उन आत्मवीर्यवालों की

प्रश्नकर्ता : यह जागृति बढ़ते-बढ़ते कुछ लिमिट तक आई यानी यहाँ तक आकर अटक जाती है। लेकिन दूसरे किसी भी प्रकार के, यों व्यवहार में रिबोल्यूशन खुलने चाहिए, वह नहीं हो पाता।

दादाश्री : तुझे व्यवहारिक ज्यादा नहीं है न! लेकिन अभी तो वह शक्ति खड़ी होगी। आत्मवीर्य ही नहीं है न! आत्मवीर्य प्रकट नहीं हो रहा है। ऐसा है न, तेरे मन में व्यवहार सहन करने की इतनी सी भी शक्ति नहीं है, इसलिए भागता है, भागकर एकांत में चले जाने की कोशिश करता है। लेकिन यह दर्शन प्रकट हुआ, इसलिए तुझे 'खुद की' गुफा में घुसना आ गया, वर्ना परेशानी हो जाती!

प्रश्नकर्ता : आपने जो कहा कि आत्मवीर्य प्रकट नहीं हुआ है। तो आत्मवीर्य कैसे प्रकट होता है?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : आत्मवीर्य प्रकट हो जाए, तो उसकी तो बात ही अलग है न!

प्रश्नकर्ता : वह क्या कहलाता है? जब आत्मवीर्य प्रकट होता है तो उसमें क्या होता है?

दादाश्री : आत्मा की शक्ति बहुत बढ़ जाती है।

प्रश्नकर्ता : तो यह जो दर्शन है, जागृति है। यह और आत्मवीर्य इन दोनों का कनेक्शन क्या है?

दादाश्री : जागृति, वह आत्मवीर्य में आती है। आत्मवीर्य का अभाव है इसलिए व्यवहार का सोल्यूशन नहीं कर पाता, लेकिन व्यवहार धकेलकर एक तरफ रख देता है। आत्मवीर्यवाला तो कहेगा, भले ही कोई भी हो, आओ न! उसे उलझन नहीं होती। लेकिन अब वे सभी शक्तियाँ उत्पन्न होंगी!

प्रश्नकर्ता : वे शक्तियाँ ब्रह्मचर्य से उत्पन्न होती हैं?

दादाश्री : हाँ, ब्रह्मचर्य का अच्छी तरह से पालन हो, तब और जरा सा भी लीकेज नहीं होना चाहिए। यह तो क्या हुआ है कि व्यवहार सीखे नहीं और यों ही यह सब हाथ में आ गया है!

बरते वीर्य, जहाँ जहाँ रुचि

जहाँ रुचि होती है, वहाँ आत्मा का वीर्य बरतता है। इन लोगों को रुचि किस में है? आइस्क्रिम में है, लेकिन आत्मा में नहीं। आत्मा के लिए यहाँ आना है या आइस्क्रिम के लिए? तो कहेंगे ‘आइस्क्रिम खाने!’। कितने निवीर्य जीव हैं! तुझे समझ में आ रही है यह बात?

आत्मवीर्यवाला तो बहुत मजबूत इंसान! किसी भी लालच की चीज़ से नहीं ललचाता। इस दुनिया में उसे कोई चीज़ ललचा नहीं सकती, और इसे तो आइस्क्रिम ललचा जाती है कभी-कभी!

न हो असार, पुदगलसार (खं-2-१३)

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उसे यह संसार अच्छा नहीं लगता, अत्यंत सुंदर से सुंदर चीज़ भी बिल्कुल अच्छी नहीं लगती। वही, आत्मा की तरफ का ही अच्छा लगता है, पसंद बदल जाती है। जब देहवीर्य प्रकट होता है, तब आत्मा का अच्छा नहीं लगता।

प्रश्नकर्ता : आत्मवीर्य कैसे प्रकट हो सकता है ?

दादाश्री : निश्चय किया हो और हमारी आज्ञा का पालन करे तभी से ऊर्ध्वगति में जाता है। दो आँखों से आँखें मिलीं, वहाँ आकर्षण हुआ, उसका प्रतिक्रमण करते रहना है। ऐसे पच्चीस या पचास होंगे, ज्यादा नहीं होंगे। उन सबका प्रतिक्रमण करके छोड़ देना है। वह अतिक्रमण से खड़ा हुआ है और प्रतिक्रमण से बंद हो जाएगा।

वीर्य को ऐसी आदत नहीं है, कि अधोगति में जाना है। वह तो खुद का निश्चय नहीं है, इसलिए अधोगति में जाता है। निश्चय किया कि दूसरी ओर मुड़ जाता है, और फिर चेहरे पर दूसरों को भी तेज दिखने लगता है और ब्रह्मचर्य पालन करनेवाले के चेहरे पर कोई असर नहीं दिखे, तो 'ब्रह्मचर्य का पूर्णतः पालन नहीं किया' ऐसा कहलाएगा।

प्रश्नकर्ता : वीर्य का ऊर्ध्वगमन शुरू होना हो तो उसके लक्षण क्या हैं ?

दादाश्री : नूर आने लगता है, मनोबल बढ़ता जाता है, वाणी फर्स्ट क्लास निकलती है। वाणी मिठासवाली होती है। वर्तन मिठासवाला होता है। ये सब उसके लक्षण होते हैं। उसमें तो बहुत देर लगती है, वह अभी यों ही नहीं हो सकेगा। अभी एकदम नहीं हो जाएगा।

उपाय करना, स्वजदोष टालने के लिए

प्रश्नकर्ता : स्त्री के बारे में जो सपने आते हैं, वे हमें

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

इस ब्रह्मचर्य की भावना की वजह से अच्छे नहीं लगते तो उसका कोई उपाय है?

दादाश्री : सपने, वह तो अलग चीज है। आपको अच्छे लगे तो नुकसान करेंगे और अच्छे नहीं लगे तो कोई नुकसान नहीं करेंगे। भले ही वे कैसे भी आए, अच्छे लगे तो आपको वैसा होगा और अच्छे नहीं लगे तो कोई झंझट ही नहीं।

प्रश्नकर्ता : स्वप्नदोष क्यों होते होंगे?

दादाश्री : ऊपर पानी की टंकी हो, वह पानी नीचे गिरने लगे तो नहीं समझ जाते कि छलककर उभर गई है! स्वप्नदोष मतलब उभरना। टंकी छलककर उभर रही हो तो काँक नहीं रखना चाहिए?

यदि आहार पर कंट्रोल करे तो स्वप्नदोष नहीं होगा। इसलिए ये महाराज एक ही बार आहार करते हैं न, वहाँ! और कुछ भी नहीं लेते, चाय-वाय कुछ भी नहीं लेते।

प्रश्नकर्ता : उसमें रात का आहार महत्वपूर्ण है। रात का कम कर देना चाहिए।

दादाश्री : रात को खाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। महाराज, एक ही बार आहार लेते हैं। लेकिन चार रोटी खा जाते हैं, उनकी उम्र तो है न। बाकी चाय नहीं, और कोई झंझट ही नहीं। पूरे दिन के लिए टंकी भर ली। टंकी भर ली तो वह पेट्रोल चलता रहता है।

अतः डिस्चार्ज तो, यह खाना यदि कंट्रोल में हो तो और कुछ भी नहीं होगा। ये तो भर-भरके खाते हैं। जो हो वह और कोई विचित्र आहार हो, तब क्या होगा? जैन तो कैसे समझदार! ऐसा आहार नहीं। ऐसा वैसा कुछ नहीं होता। फिर भी डिस्चार्ज हो जाए तो, उसमें हर्ज नहीं है। भगवान ने कहा है 'उसमें तो हर्ज नहीं।' वह जब भर जाए तो फिर ढकन खुल जाता है। जब तक ब्रह्मचर्य ऊर्ध्वगमन नहीं हुआ है, तब तक अधोगमन ही

न हो असार, पुद्गलसार (खं-2-१३)

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होता है। ऊर्ध्वगमन तो जब ब्रह्मचर्यव्रत लेना तय किया तभी से शुरुआत हो जाती है।

सावधानी से चलना अच्छा। महीने में चार बार हो जाए, फिर भी हर्ज नहीं है। हमें जान-बूझकर डिस्चार्ज नहीं करना चाहिए। वह गुनाह है। अपने आप हो जाए तो उसमें हर्ज नहीं। ये सब तो उल्टा-सीधा खाने का परिणाम है। जान-बूझकर डिस्चार्ज करना, वह भयंकर गुनाह है। आत्महत्या कहलाएगा। ऐसे डिस्चार्ज की छूट कौन देगा? वह भाई कह रहे हैं कि डिस्चार्ज भी नहीं होना चाहिए। ‘तब क्या मर जाऊँ? कुएँ में पड़ जाऊँ?’

प्रश्नकर्ता : डिस्चार्ज हो जाए तो वह गुनहगार बन जाता है, उसे मन में क्षोभ होता है। क्योंकि ये सब ऐसा ही कहते हैं न कि डिस्चार्ज नहीं होना चाहिए।

दादाश्री : वे लोग विषय करते हैं, उसके बजाय तो यह डिस्चार्ज बहुत अच्छा। वह दो लोगों को बिगाड़ता है, कुत्ते जैसा तो शोभा नहीं देता!

वीर्यशक्ति का ऊर्ध्वगमन कब?

प्रश्नकर्ता : वीर्य का गलन होता है, वह पुद्गल स्वभाव में होता है या फिर कहीं पर हमारा लीकेज हो तब होता है?

दादाश्री : किसी को देखकर तुम्हारी दृष्टि बिगड़ जाए, तब वीर्य का कुछ हिस्सा एकजॉस्ट हो जाता है।

प्रश्नकर्ता : वह तो विचारों से भी हो जाता है।

दादाश्री : विचारों से भी एकजॉस्ट होता है, दृष्टि से भी एकजॉस्ट होता है। वह एकजॉस्ट हुआ माल फिर डिस्चार्ज होता रहता है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन ये जो ब्रह्मचारी हैं, उन्हें तो ऐसे कुछ संयोग नहीं मिलते, वे स्त्रियों से दूर रहते हैं, फोटो नहीं रखते,

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

कैलेन्डर नहीं रखते, फिर भी उन्हें डिस्चार्ज हो जाता है। तो उनका डिस्चार्ज स्वाभाविक नहीं कहलाएगा?

दादाश्री : फिर भी उन्हें मन में यह सब दिखता है। दूसरा, अगर वह भोजन बहुत खाता हो और उसका वीर्य बहुत बने तो फिर वह प्रवाह बह जाता है, ऐसा भी हो सकता है।

प्रश्नकर्ता : रात को ज्यादा खा लिया तो खत्म...

दादाश्री : रात को ज्यादा खाना ही नहीं चाहिए, खाना हो तो दोपहर में खाना। रात को यदि ज्यादा खा लिया तब तो वीर्य का स्खलन हुए बिना रहेगा ही नहीं। वीर्य का स्खलन किसे नहीं होता है? जिसका वीर्य बहुत मजबूत हो गया हो, बहुत गाढ़ा हो गया हो, उन्हें नहीं होता। ये सब तो पतले हो चुके वीर्य कहलाते हैं।

प्रश्नकर्ता : मनोबल से भी उसे रोका जा सकता है न?

दादाश्री : मनोबल तो बहुत काम करता है! मनोबल ही काम करता है न! लेकिन वह ज्ञानपूर्वक चाहिए। यों ही मनोबल नहीं रह पाता न!

प्रश्नकर्ता : सपने में जो डिस्चार्ज होता है, वे क्या पिछली खामियाँ हैं?

दादाश्री : उसमें कोई शंका नहीं है। वे सभी पिछली खामियाँ स्वप्नावस्था में चली जाती हैं। स्वप्नावस्था के लिए हम गुनहगार नहीं माने जाएँगे। हम जागृत अवस्था को गुनहगार मानेंगे। खुली आँखों से जागृत अवस्था! फिर भी सपने आते हैं। अतः उन्हें बिल्कुल निकाल देने जैसा नहीं है, वहाँ सावधान रहना। स्वप्नावस्था के बाद सुबह पश्चाताप करना पड़ेगा, उसका प्रतिक्रमण करना पड़ेगा कि ऐसा नहीं होना चाहिए। हमारी पाँच आज्ञा का पालन करे तो उसमें कभी भी विषय विकार हो सकें, ऐसा है ही नहीं।

न हो असार, पुद्गलसार (खं-2-१३)

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जोखिम, हृष्ट-पुष्ट शरीर के

यह पढ़, इसमें क्या लिखा है?

प्रश्नकर्ता : मैथुन संज्ञा चार प्रकार से जागृत होती है।

१) वेद मोहनीय के उदय से।

२) हड्डी, मांस, खून वगैरह से शरीर पुष्ट होने से।

३) स्त्री को देखने से।

४) स्त्री का चिंतवन करने से।

वेद मोहनीय उदय से, यानी?

दादाश्री : स्त्री को स्त्री वेद होता है, पुरुष को पुरुष वेद होता है, वह वेद जब उदय में आता है, तब वह विचलित कर देता है।

खास सावधानी कहाँ पर रखनी है कि 'खून और मांस से शरीर हृष्ट-पुष्ट होने से', वहाँ सावधान रहना है। तुम कहते हो कि हमें डिस्चार्ज हो जाता है तो उसमें यह कारण बाधक है। एक ओर श्रीखंड, पकोड़े, जलेबियाँ वगैरह खाते हो और फिर वीर्य को रोके रखना चाहते हो, वह कैसे हो सकेगा? शरीर को तो पोषण के लिए ही आहार देना चाहिए और वह भी भारी माल-मलीदेवाला भोजन नहीं। इस किताब में स्पष्ट लिखा हुआ है। इसीलिए तो मैंने यह किताब तुम्हें पढ़ने के लिए दी है। कई जैन साधु आर्यबिल (जैनों में किया जानेवाला व्रत, जब भोजन में एक ही प्रकार का धान खाया जाता है) करते हैं। आर्यबिल में कोई भी एक ही चीज़ खाते हैं हमेशा के लिए। पानी में रोटी डूबोकर खाते हैं, तब जाकर वे साधु ब्रह्मचर्य पालन कर सकते हैं। सदी के दिनों में ठंड में शरीर कस जाता है, गर्मी में धूप में कस जाता है। हमें तो ठंड-वंड सहन ही नहीं करनी है न! रजाई लाकर ओढ़ दी कि चला! इसीलिए सावधान रहना। यदि तुम्हें ब्रह्मचर्य

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

पालन करना हो तो सावधान रहना पड़ेगा। वीर्य ऊर्ध्वगामी होने के बाद अपने आप चलता रहेगा। अभी तक वीर्य ऊर्ध्वगामी नहीं हुआ है। अभी भी इसका स्वभाव अधोगामी है। वीर्य ऊर्ध्वगामी हो जाए, तब सबकुछ ऊँचे चढ़ता है। फिर तो वाणी-बाणी बढ़िया निकलती है, भीतर दर्शन भी उच्च प्रकार का खिला हुआ रहता है। वीर्य के ऊर्ध्वगामी होने के बाद दिक्कत नहीं आएगी, तब तक तो खाने-पीने में बहुत नियम रखना पड़ता है। वीर्य को ऊर्ध्वगामी होने में तुम्हें मदद तो करनी पड़ेगी या यों ही चलता रहेगा?

प्रश्नकर्ता : मदद करनी पड़ेगी। आहार में क्या क्या बंद कर देना है? तला हुआ, घी, तेल वगैरह बंद कर देना पड़ेगा न?

दादाश्री : कुछ भी बंद नहीं करना है, उसकी मात्रा कम कर देनी है।

प्रश्नकर्ता : चावल, यह ब्रह्मचर्य के लिए बिल्कुल अंतिम आहार है, सही है न?

दादाश्री : नहीं, सिर्फ चावल पर नहीं। वह तो सिर्फ रोटी होगी, कुछ भी होगा फिर भी चलेगा। बाकी कुछ खास प्रकार का फूड नहीं लेने चाहिए। चरबीवाला और ऐसा वैसा आहार नहीं लो तो अच्छा रहेगा।

प्रश्नकर्ता : और, मीठा आहार?

दादाश्री : मिठाई भी नहीं। खट्टा चलेगा लेकिन वह भी हिसाब से, ज्यादा खट्टा नहीं खाना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : मिर्च?

दादाश्री : थोड़ी थोड़ी खा सकते हैं। मिर्च से अच्छी तो कालीमिर्च। ब्रह्मचर्य पालन के लिए सबसे अच्छी, सौंठ। अपने इन

न हो असार, पुदुगलसार (खं-2-१३)

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ब्रह्मचारियों के लिए ही झंझट है न? बाकी सभी को तो अपने इस विज्ञान में तो कोई झंझट ही नहीं है न? अपने इस विज्ञान में तो धीरे से निकाल कर लेना है। ये तो ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, इसलिए सब कहना पड़ता है। अतः यदि यों कुछ सालों तक ब्रह्मचर्य संभल गया, कंट्रोलपूर्वक, तो फिर वीर्य ऊर्ध्वगामी हो जाएगा और तब ये शास्त्र-पुस्तकें ये सब दिमाग में धारण कर सकेंगे। धारण करना, कोई आसान चीज नहीं है, वर्ना पढ़ता है और फिर भूलता जाता है।

प्रश्नकर्ता : हाँ, ऐसा ही होता है अभी।

दादाश्री : अब यदि वीर्य ऊर्ध्वगामी हो चुका हो तभी वह धारण कर सकता है, नहीं तो धारण नहीं कर सकता।

प्रश्नकर्ता : ये जो प्राणायाम करते हैं, योग करते हैं, वे ब्रह्मचर्य के लिए कुछ हेल्पफुल हो सकते हैं?

दादाश्री : वैसा अगर ब्रह्मचर्य के भाव से करे तो हेल्पिंग हो सकता है। ब्रह्मचर्य का भाव होना चाहिए और आपको शरीर स्वस्थ रखने के लिए करना हो तो उससे शरीर स्वस्थ रहेगा। यानी भाव पर ही सारा आधार है लेकिन इन सब में आप मत पड़ना, वर्ना अपना आत्मा रह जाएगा।

प्रश्नकर्ता : जहाँ स्त्री बैठी हो, उस बैठक पर ब्रह्मचारी को नहीं बैठना चाहिए?

दादाश्री : यह तो पुराने जमाने की बात हुई। अभी इस काल में यह माफिक नहीं आया। वह सब मैंने निकाल दिया है। क्योंकि अगर बस में कोई स्त्री उठे और आप नहीं बैठे तो कहाँ बैठोगे? तो क्या खड़े रहोगे? और अगर वह स्त्री उठ जाए और आप ऐसा कहो कि 'मैं नहीं बैठ सकता' तो लोग तुम्हें ऐसा कहेंगे कि 'घनचक्कर है।' तुम मूर्ख नहीं दिखो इसलिए मैंने पहले से ही सबकुछ निकाल दिया है। ऐसी तो बहुत सी बातें हैं। यहाँ स्त्री की फोटो भी नहीं

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

लटका सकते। फिर गाय को भी नहीं देख सकते, गाय स्त्री है इसलिए। अब इसका अंत कब आएगा? शास्त्रकारों ने तो बहुत बारीक बुना है जबकि हमें तो दरियाँ बनानी हैं। इसलिए अब मोटा-मोटा बुनो न! फिर भी हमें कैसा आनंद-आनंद रहता है! वहाँ तो कभी भी आनंद ही नहीं रहता और ऐसा बारीक बुनने में बेचारा उलझ जाता है। हाँ, नहाने की उन लोगों की बात मैं एक्सेप्ट करता हूँ। नहाना नहीं, खाना, ब्रश नहीं करना, वह सब एक्सेप्ट करता हूँ। नहाना नहीं चाहिए क्योंकि नहाने से शरीर की सभी इन्द्रियाँ सतेज हो जाती हैं। जीभ साफ की कि ये सब जलेबी-पकोड़े भाएँ और नहीं की हो तो स्वाद में ‘राम तेरी माया!’ स्वाद कम पता चलता है।

प्रश्नकर्ता : ये साधु गीले कपड़े से शरीर पोंछ लेते हैं।

दादाश्री : वह तो करना ही पड़ेगा न!

प्रश्नकर्ता : उससे इन्द्रिय सतेज नहीं होती?

दादाश्री : नहीं।

प्रश्नकर्ता : गरम या ठंडा पानी हो तो क्या उससे फर्क पड़ता है?

दादाश्री : उसमें कुछ खास फर्क नहीं पड़ता। गरम पानी अंदर ठंडक करता है और ठंडा पानी अंदर गर्मी करता है। उसका स्वभाव अंदर बदलाव लाने का, बाकी सब एक सा ही है।

निरोगी से भागें विषय

आप परिणाम को बाहर दूँढ रहे हो, लेकिन जो निरोगी होता है, उसका परिणाम हमेशा ही जल्दी पता चलता है। ये सब प्रमाण हैं! शरीर निरोगी हो तो ब्रह्मचर्य अच्छा रहता है। अब्रह्मचर्य शरीर के रोगों की वजह से ही रहता है। जितना रोग कम, उतना विषय कम। दुबले इंसान में विषय अधिक होता है और मोटे इंसान में विषय कम होता है।