सम्पूर्ण चिकित्सा
Sampoorna Chikitsa
राजीव दीक्षित / रोबिन बसराना (ऋषि वाग्भट्ट अष्टांगह्रदयम् आधारित) द्वारा
स्रोत: Hindi Ayurvedic Chikitsa based on Ashtanga Hridayam · Swadeshi Robin Basrana · 2018 (उद्गम)
बिगड़ जाये तो मृत्यु तक हो सकती है, बीमार होने के कारण निम्नलिखित हैं।
- 1. भोजन व पानी का सेवन प्राकृतिक नियमों के अनुसार न करना। इस गलती के कारण शरीर में 80 प्रकार के वात रोग, 40 प्रकार के पित्त रोग व 20 प्रकार के कफ रोग उत्पन्न होते हैं।
- 2. भोजन दिनचर्या व ऋतुचर्या के अनुसार ना करना
- 3. विरुद्ध आहार का सेवन
- 4. रिफाईंड तेल, रिफाईंड नमक, चीनी व मैदा आदि का सेवन
- 5. मिलावटी दूध, घी, मसाले, तेल इत्यादि का सेवन।
- 6. अनाज, दालें, फल, सब्जी इत्यादि में छिड़के गये रासायनिक खाद, कीटनाशक व जंतुनाशक इत्यादि का शरीर में पहुँचना।
- 7. प्राकृतिक/नैसर्गिक वेगों को (भूख, प्यास, मलमूत्र निष्कासन आदि) रोकना।
- 8. विकारों(क्रोध, द्वेष, अहंकार) आदि को पनपने देना।
➤ यदि हम 24 घंटे का निरीक्षण करें तो यह पायेंगे कि 24 घंटों में नैसर्गिक भूख दिन में केवल 2 बार लगती है। सूर्योदय से 2 घंटे तक और दूसरी सूर्यास्त के पहले। पेट(जठर) सबसे 7 बजे से 9 बजे तक अधिक कार्य क्षमता से काम करता है। उसी तरह सूर्यास्त से पहले हमारे पेट की जठर अग्नि तीव्र होती है। इसलिये भोजन सूर्यास्त के पहले समाप्त कर लेना चाहिए।
➤ हमारे पूर्वज बहुत वैज्ञानिक थे, वे अच्छी तरह से उपवास के वैज्ञानिक महत्व को समझ चुके थे इसलिए उन्होंने समय-समय पर व विशेष रूप से बारिश के मौसम में धर्म को आधार बनाकर अधिक से अधिक उपवास करने की परंपरा स्थापित की। क्योंकि बारिश के तीन-चार महीने सूर्योदय ठीक से नहीं होता और सूर्योदय तथा भूख का गहरा नाता है। उपवास करने से यदि पेट घंटे बिना भोजन के कण के रखा जाये तो पेट साफ-सफाई
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की क्रिया प्रारंभ कर देता है। उपवास के दिन शरीर का तापमान 2 से 3 डिग्री सेण्टीग्रेड कम हो जाता है जिसके कारण हानिकारक जीवाणुओं की वृद्धि में बहुत कमी आ जाती है।
- ➤ जन्म से लेकर 14 वर्ष की आयु तक हमारे शरीर में कफ की प्रधानता रहती है व कफ का स्थान शरीर में हृदय से सिर तक है, इस प्रधानता के अंतर्गत बहुत भूख लगती है व अधिक नींद भी आती है। आयु के 14 वर्ष से लेकर पचास वर्ष तक पित्त की प्रधानता रहती है व पित्त का स्थान हमारे शरीर में हृदय से नाभि तक है, इसी प्रकार आयु के 50 वर्ष से लेकर मृत्यु तक वात की प्रधानता रहती है व वात का स्थान शरीर में नाभि से नीचे पैरों तक है।
- ➤ हमारी पाचन संस्था में दो चक्कियाँ हैं जो भोजन को पीसकर इतना महीन बना देती है कि जिससे भोजन का प्रत्येक कण पाचक रस से संपूर्ण लिप्त होकर पूरी तरह से पच जाये। हली चक्की दाँतें हैं जो भोजन को 80% तक पीसते हैं व दूसरी चक्की पेट का ऊपरी भाग है जिसे फंडस कहते हैं जो भोजन को केवल 20% ही पीस सकता है। यदि भोजन दाँतों की सहायता से ठीक से न चबाया जाये तो भोजन का काफी बड़ा भाग वैसे ही बिना पीसे रह जायेगा, ऐसे भोजन का पाचन ठीक से नहीं हो पायेगा। परिणामस्वरूप, कब्ज व बड़ी आँत से संबंधित अनेक बीमारियाँ पैदा होती हैं।
- ➤ महर्षि वाग्भट्ट के नियमानुसार जिस भोजन को पकाते समय सूर्य का प्रकाश व पवन का स्पर्श ना मिले वह भोजन विष के समान है। प्रेशर कुकर में भोजन पकाते समय सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता। भोजन पकते सूर्य का प्रकाश मिलने के लिए बर्तन को बिना ढके भोजन पकाना होगा और बिना ढके पकाने से हवा का
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दबाव सामान्य रहता है परिणामस्वरूप प्रोटीन खराब नहीं होते। प्रेशर कुकर के अंदर भोजन पकाते समय हवा का दबाव वातावरण से दुगुना हो जाता है व तापमान 120 डिग्री सेण्टीग्रेड तक पहुँच जाता है जिसके फलस्वरूप दाल और सब्जी के प्रोटीन हानिकारक प्रोटीन हो जाते हैं। 'राजीव भाई' ने प्रेशर कुकर में पकाई दाल का जब परीक्षण करायातो यह पाया कि 87% प्रोटीन नष्ट हो जाते हैं व आरोग्य के लिए हानिकारक हो जाते हैं।
- ➤ मिट्टी ऊष्णता की कुचालक है अतः मिट्टी के बर्तन में भोजन पकाने से भोजन को धीरे-धीरे ऊष्णता प्राप्त होती है व परिणामस्वरूप भोजन के तत्व जैसे दाल-सब्जी आदि का प्रोटीन नहीं होने पाता व 100% प्रोटीन सुरक्षित रहते हैं। यदि कॉसे के बर्तन में पकाया जाये तो कुछ प्रोटीन नष्ट हो जायेंगे व एल्युमीनियम के बर्तन में पकाने से 87% प्रोटीन आरोग्य के लिए हानिकारक हो जायेंगे और भोजन में कुछ एल्युमीनियम की मात्रा भी चली जायेगी जो अनेक बीमारियाँ भी उदाहरणार्थ- पार्किन्सन्स, एल्जाईमर आदि को उत्पन्न करेगी। मिट्टी के अंदर शरीर को आवश्यक सारे खनिज तत्व हैं। मिट्टी के बर्तन में भोजन पकाने से मिट्टी का कुछ अंश भोजन में चला जाता है व यह मिट्टी पेट में जाने के बाद घुल जाती है व मिट्टी में उपस्थित सारे तत्व भोजन पचने के बाद रस में मिल जाते हैं व रक्त में पहुँच जाते हैं इस प्रकार मल-मूत्र द्वारा होने वाला खनिजों के क्षति की पूर्ति रोज हो जाया करती है व शरीर निरोगी रहता है। मुख्यतः खनिजों की पूर्ति भोज्य पदार्थ(अनाज, दालें, फल, सब्जियाँ) आदि के द्वारा होती है।
- ➤ सुबह उठते ही, पेशाब करने के बाद बिना मुँह धोए अपनी संतुष्टि तक पानी पियें। रात भर में हमारे मुख में Lysozyme
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नामक एक Antibiotic तैयार होता है शायद भगवान ने हमारी जीवाणुओं से रक्षा करने के लिए यह विधान बनाया हो। यह पानी पेट में जाकर पूरे पाचन संस्था को रोग के जीवाणु रहित कर देता है, दूसरे यह पूरे पाचन तंत्र को थोकर स्वच्छ कर देता है। कम से कम एक से दो ग्लास गुनगुना पानी पीना ही चाहिए। कई लोगों की धारणा है कि कम से कम आधे से एक लीटर पानी पिये पर अनुभव यह कहता है कि पानी की कोई मात्रा ना बांधी जाये। आपका अंतःकरण सबसे अच्छा डॉक्टर है और वह पानी की मात्रा मौसम व शारीरिक अवस्था के अनुसार निर्धारित करता है।
- ➤ पानी खाना खाने के डेढ़ से दो घंटे के बाद ही अवश्य पीना चाहिए, क्योंकि खाना पचने के बाद वह एक रस में रुपान्तरित होता है। यह रस छोटी आँत में पहुँचने के बाद इसका रक्त में शोषण होता है और इस रस का शोषण यदि पानी वहाँ न हो तो हो ही नहीं सकता। भोजन के तुरन्त बाद और भोजन से तुरन्त पहले पानी पीना विष के समान है।
- ➤ पानी गुनगुना ही पिये क्योंकि हमारे पाचन तंत्र का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस रहता है। यदि हम ठंडा पानी पी लें तो हमारे पेट को व पाचन तंत्र को फिर से 37 डिग्री सेल्सियस तक गर्म करने के लिए आस-पास के किसी भी अवयव से अतिरिक्त रक्त लेना पड़ेगा। परिणाम स्वरूप जो अवयव अधिक बार रक्त भेजेगा वह अवयव (हार्ट,आंत,किडनी आदि) कमजोर हो जायेगा व उससे संबंधित रोग हो जायेंगे। गर्मियों में आप मिट्टी के घड़े का पानी अवश्य पी सकते हैं।
- ➤ पानी खड़े हो कर ना पिये, बैठकर ही पिये व घूँट-घूँट पिये-क्योंकि जब हम ठोस पदार्थ निगलते हैं तो उसको मुख से पेट तक धीरे-धीरे एक क्रमांकुचन मूवमेंट द्वारा ही पेट तक पहुँचाया
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जाता है। वह मुख से पेट में धड़ाम से नहीं गिरता। लेकिन पानी जब मुख से पेट की ओर जाता है तो उसे रोकने वाला कोई नहीं, वह तो पहाड़ पर से जमीन पर गिरने वालों झरने की तरह गिरता है। उसी प्रकार यदि हम खड़े होकर पानी पीयें तो उसके धक्के को झेलने के लिए पेट डायफ्राम को कड़ा कर देता है। यदि हम बार-बार ऐसे ही पानी पीते रहें तो हमें हानिया, पार्प्लस, प्रोस्टेट, अर्थरायटिस जैसी बीमारियाँ अवश्य होंगी।
- ➤ हमारे शरीर में, नींद आना, भूख, प्यास, छींक, मल निष्कासन, मूत्र निष्कासन, पादना, खाँसी, हँसना, रोना, हिचकी आना, डकार आना, जम्हाई लेना इत्यादि चौदह प्रकार के वेग हैं। यदि इन वेगों को रोका गया तो अनेक प्रकार की बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। हमारी समझ में यह डाल दिया गया है (पाश्चात्य संस्कृति के द्वारा) कि जोर से इन वेगों का निकालना जंगलीपन या असभ्यता की निशानी हैं। इसीलिए आज कल खास करके लड़कियाँ/स्त्री वर्ग व कुछ आधुनिक कहलाने वाले युवक, कर्मचारी वर्ग छींकते, खाँसते इत्यादि समय कम से कम आवाज में व मुख पर रूमाल रखकर ही छींकते, खाँसते हैं, इस प्रकार के वेग शरीर की किसी नाड़ी तंत्र को दुरुस्त करने के लिए हैं और ये लोग उसके लाभ को 75% नष्ट कर देते हैं।
- ➤ यह समस्या मल्टीनेशनल की देन हैं आज से कुछ दशकों पूर्व, जब यह मल्टीनेशनल का कल्चर भारत तक नहीं पहुँचा था, लोग सबेरे 10 बजे भरपेट खाना खाकर ऑफिस, स्कूल, कॉलेज आदि जाते थे व शाम को 6 बजे तक घर लौट कर भोजन कर लेते थे। उनका कार्यकाल अधिक से अधिक 8 घंटे हुआ करता था अतः वे निरोगी व दीर्घायु थे। आजकल मल्टीनेशनल ने अपने कार्यकाल को 8 घंटों से बढ़ाकर तेरह-चौदह घंटों तक कर दिया है और उनकी देखा-देखी भारत के सभी छोटे-बड़े उद्योग करने
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वालों ने भी कार्यकाल बढ़ा दिये, इसके अलावा खास करके शहरों में ऑफिस, स्कूल, कॉलेज, आने-जाने में दो से तीन घंटे अलग लग जाते हैं। जिसके कारण स्वस्थ मनुष्य के पास नींद, भोजन, स्नान, आदि के लिए लगभग 8 ही घंटे बचते हैं। अब ऐसे व्यक्तियों का स्वास्थ्य कैसा रहता है खुद ही सोच लो।। इसी कारण वह आरोग्य से काफी दूर होता जायेगा व दीर्घकालीन असाध्य रोग का शिकार हो जायेगा।
- ➤ नमक बदल दो, रिफाइन्ड नमक कभी न खाए। बाजार में मिलने वाले नमक को रिफाइन्ड करने पर उसमें से पोषक तत्व निकल जाते हैं। आयोडिन नमक हमेशा ब्लड प्रेशर बढ़ाता है और नपुंसक बनाता है। वीर्य की ताकत कम करता है। खाने में सदैव काला नमक या सेंधा नमक ले, इसमें सोडियम की मात्रा कम होती है। मैग्नीशियम, कैल्शियम, पोटैशियम आदि का अनुपात बराबर होता है। सेंधा नमक शरीर के अंदर के विष को कम करता है और थाइराइड, लकवा एवं मिरगी जैसे रोगों को दूर रखता है।
- ➤ चीनी ना खाये, चीनी बनते ही फोस्फोरस खत्म हो जाता है और एसिड बनता है। एसिड पचता नहीं, चीनी खून को गाढ़ा करती है और कोलेस्ट्रॉल बढ़ाती है। बिना सल्फर के चीनी नहीं बनती और पटाखों में भी सल्फर का इस्तेमाल होता है। अगर खाने के बाद चीनी खायी तो आपका भोजन पचने नहीं देगी और आपको 103 बीमारियाँ होने का खतरा बढ़ेगा।
- ➤ रिफाईंड और डबल रिफाईंड तेल का उपयोग बिल्कुल ना करें, तेल को रिफाईंड करने के लिए उसमें से सारे प्रोटीन निकाल लिए जाते हैं। इसलिए आप शुद्ध चीज नहीं पर कचरा खाते हैं। रिफाइन्ड तेल काफी रोगों का कारण बनता है। इस तेल में पाम
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तेल भी डाला जाता है जो खतरनाक है। खाने में हमेशा शुद्ध तेल का इस्तेमाल करें। घाणी का तेल खाने में श्रेष्ठ है। शुद्ध तेल वायु को शांत करने में मदद करता है।
- ➤ मैदा से बनी वस्तुओं का सेवन कभी ना करें, मैदा गेहूँ से ही बनता है पर मैदे में से सारे आवश्यक फाइबर निकाल लिए जाते हैं। नूडल्स, पिज्जा, बर्गर, पाँव रोटी, डबल रोटी, बिस्कुट वगैरह कभी ना खाये, जो सड़े हुए मैदे से बनते हैं। मैदे की रोटी रबर जैसी होती है जो खाने के बाद आँतों में चिपक जाती है। जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है।
❖ स्वस्थ रहने की कुंजी
जीवन शैली व खान-पान में बदलाव से कई रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है। घेरलू वस्तुओं के उपयोग से शरीर तो स्वस्थ रहेगा ही बीमारी पर होने वाला खर्च भी बचेगा।
- ➤ फलों का रस, अत्याधिक तेल की चीजें, मट्टा, खट्टी चीजें रात में नहीं खानी चाहिए।
- ➤ घी या तेल की चीजें खाने के बाद तुरंत पानी नहीं पीना चाहिए बल्कि एक-डेढ़ घण्टे के बाद पानी पीना चाहिए।
- ➤ भोजन के तुरंत बाद अधिक तेज चलना या दौड़ना हानिकारक है। इसलिए कुछ देर आराम करके ही जाना चाहिए।
- ➤ शाम को भोजन के बाद शुद्ध हवा में टहलना चाहिए खाने के तुरंत बाद सो जाने से पेट की गड़बड़ियाँ हो जाती हैं।
- ➤ प्रातःकाल जल्दी उठना चाहिए और खुली हवा में व्यायाम या शरीर श्रम अवश्य करना चाहिए।
- ➤ तेज धूप में चलने के बाद, शारीरिक मेहनत करने के बाद या शौच जाने के तुरंत बाद पानी कदापि नहीं पीना चाहिए।
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- ➤ केवल शहद और घी बराबर मात्रा में मिलाकर नहीं खाना चाहिए वह विष हो जाता है।
- ➤ खाने पीने में विरोधी पदार्थों को एक साथ नहीं लेना चाहिए जैसे दूध और कटहल, दूध और दही, मछली और दूध आदि चीजें एक साथ नहीं लेनी चाहिए।
- ➤ सिर पर कपड़ा बांधकर या मोजे पहनकर कभी नहीं सोना चाहिए।
- ➤ बहुत तेज या धीमी रोशनी में पढ़ना, अत्याधिक टीवी या सिनेमा देखना गर्म-ठंडी चीजों का सेवन करना, अधिक मिर्च मसालों का प्रयोग करना, तेज धूप में चलना इन सबसे बचना चाहिए। यदि तेज धूप में चलाना भी हो तो सर और कान पर कपड़ा बांधकर चलना चाहिए।
- ➤ रोगी को हमेशा गर्म अथवा गुनगुना पानी ही पिलाना चाहिए और रोगी को ठंडी हवा, परिश्रम, तथा क्रोध से बचना चाहिए।
- ➤ कान में दर्द होने पर यदि पत्तों का रस कान में डालना हो तो सूर्योदय के पहले या सूर्यास्त के बाद ही डालना चाहिए।
- ➤ आयुर्वेद में लिखा है कि निद्रा से पित्त शांत होता है, मालिश से वायु कम होती है, उल्टी से कफ कम होता है और लंघन करने से बुखार शांत होता है। इसलिए घरेलू चिकित्सा करते समय इन बातों का अवश्य ध्यान रखना चाहिए।
- ➤ आग या किसी गर्म चीज से जल जाने पर जले भाग को ठंडे पानी में डालकर रखना चाहिए।
- ➤ किसी भी रोगी को तेल, घी या अधिक चिकने पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए।
- ➤ अजीर्ण तथा मंदाग्नि दूर करने वाली दवाएँ हमेशा भोजन के बाद ही लेनी चाहिए।
- ➤ मल रुकने या कब्ज होने की स्थिति में यदि दस्त कराने हों तो प्रातःकाल ही कराने चाहिए, रात्रि में नहीं।
- ➤ यदि घर में किशोरी या युवती को मिर्गी के दौरे पड़ते हों तो उसे उल्टी, दस्त या लंघन नहीं कराना चाहिए।
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- ➤ यदि किसी दवा को पतले पदार्थ में मिलाना हों तो चाय, कॉफी या दूध में न मिलाकर छाछ, नारियल पानी या सादे पानी में मिलाना चाहिए।
- ➤ हींग को सदैव देशी घी में भून कर ही उपयोग में लाना चाहिए। लेप में कच्ची हींग लगानी चाहिए।
त्रिदोष सिद्धान्त
आयुर्वेद में 'त्रिदोष सिद्धान्त' की विस्तृत व्याख्या है, वात, पित्त, कफ-दोषों के शरीर में बढ़ जाने या प्रकृपित होने पर उनको शांत करने के उपायों का विशद वर्णन है। आहार के प्रत्येक द्रव्य के गुण-दोष का सूक्ष्म विश्लेषण है, ऋतुचर्या-दिनचर्या, आदि के माध्यम में स्वास्थ्य-रक्षक उपायों का सुन्दर विवेचन है तथा रोगों से बचने व रोगों की चिरस्थायी चिकित्सा के लिए पथ्य-अपथ्य पालन के लिए उचित मार्ग दर्शन है। आयुर्वेद में परहेज-पालन के महत्व को आजकल आधुनिक डॉक्टर भी समझने लग गए हैं और आवश्यक परहेज-पालन पर जोर देने लग गए हैं।
वात-पित्त-कफ रोग लक्षण
पित्त रोग लक्षण - पेट फूलना दर्द दस्त मरोड़ गैस, खट्टी डकारें, ऐसीडीटी, अल्सर, पेशाब जलन, रूक रूक कर बूंद-बूंद बार बार पेशाब, पथरी, शीघ्रपतन, स्वप्रदोष, लार जैसी घात घात गिरना, शुक्राणु की कमी, बांझपन, खून जाना, ल्यूकोरिया, गर्भाशय ओवरी में छाले, अण्डकोश बढ़ना, एलर्जी खुजली शरीर में दाने शीत निकलना कैसा भी सिर दर्द मधुमेह से उत्पन्न शीघ्रपतन कमजोरी, इंसुलिन की कमी, पीलिया, खून की कमी बवासीर, सफेद दाग, महावारी कम ज्यादा आदि।
वात रोग लक्षण - अस्सी प्रकार के वात, सात प्रकार के बुखार, घुटना कमर जोड़ों में दर्द संधिवात सवाईकल स्पांडिलाइटडिस, लकवा, गठिया, हाथ पैर शरीर कांपना, पूरे शरीर में सूजन कही भी दबाने से
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गढ़ा हो जाना, लिंग दोष, नामर्दी, इन्द्री में लूजपन, नसों में टेढ़ापन, छोटापन, उत्तेजना की कमी, मंदबुद्धि वीर्य की कमी, बुढ़ापे की कमजोरी, मिर्गी चक्कर, एकांत में रहना आदि।
कफ रोग लक्षण – बार-बार सर्दी, खांसी, छींक आना, एलर्जी, ईयोसिनोफिलिया, नजला, टी.बी., सीने में दर्द, घबराहट, मृत्यु भय, हार्ट अटैक के लक्षण, स्वास फूलना, गले में दर्द गांठ, सूजन, टॉन्सिल, कैंसर के लक्षण, थायराइड, ब्लड प्रेशर, बिस्तर में पेशाब करना, शरीर मुंह से बदबू, लीवर किडनी, का दर्द सूजन, सेक्स इच्छा कमी, चेहरे का कालापन, मोटापा, जांघों का आपस में जुड़ना, गुप्तांग में खुजली, घाव, सुजाक, कान बहना, शरीर फूल जाना, गर्भ नली का चोक होना, कमजोर अण्डाणु आदि।
दिनचर्या
- ➤ रात को दाँत साफ करके सोये। सुबह उठ कर गुनगुना पानी बिना कुल्ला किए बैठकर, घूंट-घूंट करके पीये। एक दो गिलास जितना आप सुविधा से पी सकें उतने से शुरूआत करके, धीरे-धीरे बढ़ा कर सवा लीटर तक पीना है।
- ➤ भोजनान्ते विषमबारी अर्थात् भोजन के अंत में पानी पीना विष पीने के समान है। इस लिए खाना खाने से आधा घंटा पहले और डेढ़ घंटा बाद तक पानी नहीं पीना। डेढ़ घंटे बाद पानी जरूर पीना।
- ➤ पानी के विकल्प में आप सुबह के भोजन के बाद मौसमी फलों का ताजा रस पी सकते हैं, दोपहर के भोजन के बाद छाछ और अगर आप हृदय रोगी नहीं हैं तो आप दही की लस्सी भी पी
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सकते हैं। शाम के भोजन के बाद गर्म दूध। यह आवश्यक है कि इन चीजों का क्रम उलट-पलट मत करें।
- ➤ पानी जब भी पीये बैठ कर पीयें और घूंट-घूंट करके पीये फ्रीजर का पानी कभी ना पीये। गर्मी के दिनों में मिट्टी के घड़े का पानी पी सकते हैं।
- ➤ सुबह का भोजन सूर्योदय के दो से तीन घंटे के अन्दर खा लेना चाहिए। आप अपने शहर में सूर्योदय का समय देख लें और फिर भोजन का समय निश्चित कर लें। सुबह का भोजन पेट भर कर खाएं। अपना मनपसंद खाना सुबह पेट भर कर खाएं।
- ➤ दोपहर का भोजन सुबह के भोजन से एक तिहाई कम करके खाएं, जैसे सुबह अगर तीन रोटी खाते हैं तो दोपहर को दो खाएं। दोपहर का भोजन करने के तुरंत बाद बाईं करवट लेट जाए, चाहे तो नींद भी ले सकते हैं, मगर कम से कम 20 मिनट अधिक से अधिक 40 मिनट। 40 मिनट से ज्यादा नहीं।
- ➤ इसके विपरीत शाम को भोजन के तुरंत बाद नहीं सोना। भोजन के बाद कम से कम 500 कदम जरूर सैर करें। संभव हो तो रात का खाना सूर्यास्त से पहले खा लें। भोजन बनाने में फ्रीजर, माइक्रोवेव ओवन, प्रेशर कूकर तथा एल्युमीनियम के बर्तनों का प्रयोग ना करें।
- ➤ खाने में रिफाइन्ड तेल का इस्तेमाल ना करें। आप जिस क्षेत्र में रहते हैं वहाँ जो तेल के बीज उगाये जाते हैं उसका शुद्ध तेल प्रयोग करें, जैसे यदि आपके क्षेत्र में सरसों ज्यादा होती है तो सरसों का तेल, मूंगफली होती है तो मूंगफली का तेल, नारियल है तो नारियल का तेल। तेल सीधे सीधे घानी से निकला हुआ होना चाहिए।
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- ➤ खाने में हमेशा सेंधा नमक का ही प्रयोग करना चाहिए, ना कि आयोडिन युक्त नमक का। चीनी की जगह गुड़, शक्कर, देसी खाण्ड या धागे वाली मिश्री का प्रयोग कर सकते हैं।
- ➤ कोई भी नशा ना करें, चाय, काफी, मांसाहार, मैदा, बेकरी उत्पादों का उपयोग नहीं करना चाहिए।
- ➤ रात को सोने से पहले हल्दी वाला दूध दाँत साफ करने के बाद पीये।
- ➤ सोने के समय सिर पूर्व दिशा की तरफ तथा संबंध बनाते समय सिर दक्षिण दिशा की तरफ करना चाहिए।
❖ गौ चिकित्सा
देशी गाय घी के दिन रात काम आने वाले उपयोग
हम यदि गोरस का बखान करते करते मर जाए तो भी कुछ अंग्रेजी सभ्यता वाले हमारी बात नहीं मानेंगे क्योंकि वे लोग तो हम लोगों को पिछड़ा, साम्प्रदायिक और गँवार जो समझते हैं। उनके लिए तो वही सही हैं जो पश्चिमी कहे तो हम उन्ही के वैज्ञानिक शिरोविच की गोरस पर खोज लाये हैं जो रूसी वैज्ञानिक हैं। गाय का घी और चावल की आहुति डालने से महत्वपूर्ण गैसे जैसे – एथिलीन ऑक्साइड, प्रोपिलीन ऑक्साइड, फॉर्मल डीहाइड आदि उत्पन्न होती हैं। इथिलीन ऑक्साइड गैस आजकल सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाली जीवाणुरोधक गैस है, जो शल्य-चिकित्सा से लेकर जीवनरक्षक औषधियाँ बनाने तक में उपयोगी है। वैज्ञानिक प्रोपिलीन ऑक्साइड गैस को कृत्रिम वर्षा का आधार मानते हैं।
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गौघृत में मनुष्य
शरीर में पहुँचे रोडियोधर्मी विकिरण का दुष्प्रभाव नष्ट करने की असीम क्षमता है। अग्नि में गाय का घी कि आहुति देने से उसका धुआँ जहाँ तक फैलता है, वहाँ तक का सारा वातावरण प्रदूषण और आण्विक विकरणों से मुक्त हो जाता है। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि एक चम्मच गौघृत को अग्नि में डालने से एक टन प्राण वायु (ऑक्सीजन) बनती है जो अन्य किसी भी उपाय से संभव नहीं है।
देसी गाय के घी को रसायन कहा गया है। जो जवानी को कायम रखते हुए, बुढ़ापे को दूर रखता है। काली गाय का घी खाने से बुढ़ा व्यक्ति भी जवान जैसा हो जाता है। गाय के घी में स्वर्ण छार पाए जाते हैं जिसमें अद्भुत औषधीय गुण होते हैं, जो कि गाय के घी के अलावा अन्य घी में नहीं मिलते। गाय के घी में वैक्सीन एसिड, ब्यूट्रिक एसिड, बीटा-कैरोटीन जैसे माइक्रोन्यूट्री मौजूद होते हैं। जिस के सेवन करने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचा जा सकता है। गाय के घी से उत्पन्न शरीर के माइक्रोन्यूट्री में कैंसर युक्त तत्वों से लड़ने की क्षमता होती है। यदि आप गाय के 10 ग्राम घी से हवन अनुष्ठान (यज्ञ) करते हैं तो इसके परिणाम स्वरूप वातावरण में लगभग 1 टन ताजा ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकते हैं। यही कारण है कि मंदिरों में गाय के घी का दीपक जलाने कि तथा, धार्मिक समारोह में यज्ञ करने कि प्रथा प्रचलित है। इससे वातावरण में फैले परमाणु विकिरणों को हटाने की अद्भुत क्षमता होती है।
गाय के घी के अन्य महत्वपूर्ण उपयोग -
- ➤ मासिक साव में किसी भी तरह की गड़बड़ी में 250 ग्राम गर्म पानी में (घी पिघला हो तो 3 चम्मच जमा हुआ हो तो 1 चम्मच) डालकर पीने से लाभ होगा। यह पानी मासिक साव वाले दिनों के दौरान ही पीना है।
- ➤ गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है, ये दुनिया की सारी दवाइयों से तेज असर दिखाता है।
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- ➤ गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना आपरेशन के ठीक हो जाता है।
- ➤ नाक में घी डालने से नाक की खुशकी दूर होती है और दिमाग तरों ताजा हो जाता है।
- ➤ गाय का घी नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है।
- ➤ गर्भवती माँ को गौ माँ का घी अवश्य खाना चाहिए, इससे गर्भ में पल रहा शिशु बलवान, पुष्ट और बुद्धिमान होता है।
- ➤ दो बूँद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ठीक होती है।
- ➤ जिस व्यक्ति को बहुत हार्ट ब्लेकेज की तकलीफ है और चिकनाई खाने की मना किया गया हो, तो गाय का घी खाएं, हार्ट ब्लेकेज दूर होता है।
- ➤ देशी घी के प्रयोग से नाक से पानी बहना, नाक की हड्डी बढ़ना तथा खरटि बूँद हो जाते हैं।
- ➤ सर्दी जुकाम होने पर गाय का घी थोड़ा गर्म कर 2-2 बूँद दोनों नाम में डाल कर सोयें।
- ➤ अच्छी नींद के लिए, माइग्रेन और खरटि से निजात पाने के लिए भी उपरोक्त विधि अपनाएँ।
- ➤ गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है।
- ➤ गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है।
- ➤ गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है।
- ➤ 20-25 ग्राम घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांझे का नशा कम हो जाता है।
- ➤ गाय का घी नामक में डालने से कान का पर्दा बिना ऑपरेशन के ही ठीक हो जाता है।
- ➤ नाक में घी डालने से नाक की खुशकी दूर होती है और दिमाग तारो ताजा हो जाता है।
- ➤ गाय का घी नाक में डालने से बाल झड़ना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते हैं।
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- ➤ गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है।
- ➤ हाथ पाव में जलन होने पर गाय के घी को तलवों में मालिश करें जलन ठीक होता है।
- ➤ हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी।
- ➤ गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है।
- ➤ गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है।
- ➤ गाय के पुराने घी बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है।
- ➤ अगर अधिक कमजोरी लगे, तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें।
- ➤ हथेली और पांव के तलवों में जलन होने पर गाय के घी की मालिश करने से जलन में आराम आयेगा।
- ➤ गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है।
- ➤ जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाई खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, हृदय मजबूत होता है।
- ➤ देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है।
- ➤ संभोग के बाद कमजोरी आने पर एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच देसी गाय का घी मिलाकर पी लें। इससे थकान बिल्कुल कम हो जाएगी।
- ➤ फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है। गाय के घी की छाती पर मालिश करने से बच्चों के बलगम को बाहर निकालने में सहायक होता है।
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- ➤ सांप के काटने पर 100-150 ग्राम घी पिलायें ऊपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उल्टी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा।
- ➤ दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ठीक होता है। सिर दर्द होने पर शरीर में गर्मी लगती हो, तो गाय के घी की पैरो के तलवे पर मालिश करें, सर दर्द ठीक हो जाएगा।
- ➤ यह स्मरण रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन भी नहीं बढ़ता, बल्कि वजन को संतुलित करता है। यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा कम होता है।
- ➤ एक चम्मच गाय का शुद्ध घी में एक चम्मच बुरा और ¼ चम्मच पिप्सी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है।
- ➤ गाय के घी को ठंडे जल में फेट ले और फिर घी को पानी से अलग कर लें यह प्रक्रिया लगभग सौ बात करें और इसमें थोड़ा सा कपूर डालकर मिला दें। इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असर कारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे जिसे त्वचा संबंधी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक मरहम कि तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं। यह सौराइशिस के लिए भी कारगर है।
- ➤ गाय का घी एक अच्छा (LDC) केलेस्ट्रॉल है। उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है। अगर आप गाय के घी की कुछ बूँदे दिन में तीन बार, नाक में प्रयोग करेंगे तो यह त्रिदोष (वात पित्त और कफ) को संतुलित करता है।
- ➤ घी, छिलका सहित पिंसा हुआ काला चना और पिप्सी शक्कर(बूरा) तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड़ड़ बाँध लें। प्रातः खाली पेट एक लड़ड़ खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा कुनकुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों के
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प्रदर रोग में आराम होता है, पुरुषों का शरीर मोटा ताजा यानी सुडौल और बलवान बनता है।
गोमूत्र-घृत-दुग्ध के गुण
- ➤ गोमूत्र माने देशी गाय (जर्सी नहीं) के शरीर से निकला हुआ सीधा साधा मूत्र जिसे सती के आठ परत की कपड़ों से छान कर लिया गया हो।
- ➤ गोमूत्र वात और कफ को अकेला ही नियंत्रित कर लेता है। पित्त के रोगों के लिए इसमें कुछ औषधियाँ मिलायी जाती हैं।
- ➤ आधा कप देशी गाय का गोमूत्र सुबह पीने से दमा अस्थमा, ब्रोन्कियल अस्थमा सब ठीक होता है और गोमूत्र पीने से टीबी भी ठीक हो जाता है, लगातार पांच छह महीने पीना पड़ता है।
- ➤ गोमूत्र में पानी के अलावा कैल्शियम, सल्फर की कमी से होता है। घुटने दुखना, खाँसी, जुकाम, टीबी के रोग आदि सब गोमूत्र के सेवन से ठीक हो जाते हैं क्योंकि यह सल्फर का भंडार हैं।
- ➤ टीबी के लिए डोट्स का जो इलाज है, गोमूत्र के साथ उसका असर 20-40 गुणा तक बढ़ जाता है।
- ➤ शरीर में एक रसायन होता है, इसकी कमी से कैंसर रोग होता है। जब इसकी कमी होती है तो शरीर के सेल बेकाबू हो जाते हैं और ट्यूमर का रूप ले लेते हैं। गोमूत्र और हल्दी में यह रसायन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
- ➤ आँख के रोग कफ से होते हैं। आँखों के कई गंभीर रोग हैं जैसे ग्लूकोमा (जिसका कोई इलाज नहीं है एलोपैथी में), मोतियाबिंदू आदि सब आँखों के रोग गोमूत्र से ठीक हो जाते हैं। ठीक होने
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का मतलब कंट्रोल नहीं, जड़ से ठीक हो जाते हैं। आपको करना बस इतना है कि ताजे गोमूत्र को कपड़े से छानकर आँखों में डालना है।
- ➤ बाल झड़ते हैं तो ताम्बे के बर्तन में गाय के दूध से दही को 5-6 दिन के लिए रख दें। जब इसका रंग बदल जाए तो इसे सिर पर लगा कर 1 घंटे तक रखें। ऐसा सप्ताह में 4 बार कर सकते हैं। कई लोगों को तो एक ही बार से लाभ हो जाता है।
- ➤ गाय के मूत्र में पानी मिलाकर बाल धोने से गजब की कंडशनिंग होती है।
- ➤ छोटे बच्चों को बहुत जल्दी सर्दी जुकाम हो जाता है। 1 चम्मच गोमूत्र पिला दीजिए सारी बलगम साफ हो जाएगी।
- ➤ किडनी तथा मूत्र से संबंधित कोई समस्या हो जैसे पेशाब रुक कर आना, लाल आना आदि तो आधा कप (50 मिली) गोमूत्र सुबह-सुबह खाली पेट पी लें। इसको दो बार पीएँ यानी पहले आधा पीएँ फिर कुछ मिनट बाद बाकी पी लें। कुछ ही दिनों में लाभ का अनुभव होगा।
- ➤ बहुत कब्ज हो तो कुछ दिन तक आधा कप गोमूत्र पीने से कब्ज खत्म हो जाती है।
- ➤ गोमूत्र की मालिश से त्वचा पर सफेद धब्बे और डार्कसर्कल कुछ ही दिनों में खत्म हो जाते हैं।
- ➤ गोमूत्र को सुबह खाली पेट पीना सर्वोत्तम होता है। जो लोग बहुत बीमार हैं, उन्हें 100 मिली से अधिक सेवन नहीं करना चाहिए। यह TEA CUP का आधे से अधिक भाग होता है। इसे कुछ मिनट का अंतराल देकर दो किशतों में पीना चाहिए। निरोगी
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व्यक्ति को 50 मिली से अधिक नहीं पीना चाहिए। गोमूत्र केवल उन्हीं गोमाता का पीएँ जो चलती हों क्योंकि उन्हीं का मूत्र उपयोगी होता है। बैठी हुई गोमाता का मूत्र किसी काम का नहीं होता। जैसे – जर्सी गाय कभी नहीं घूमती और उसके मूत्र में केवल 3 ही पोषक तत्व पाए जाते हैं। वही देसी गाय के मूत्र में 18 पोषक तत्व पाये जाते हैं।
आयुर्वेदिक चिकित्सा
❖ कब्ज
हमारे द्वारा भोजन ग्रहण करने के बाद उसका पाचन संस्थान द्वारा पाचन होता है। इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की रूकावट होती है, तो फिर भोजन सही ढंग से नहीं पचता तथा अपच होती है और फिर कब्ज होती है। सही ढंग से मल का न निकलना कब्ज कहलाता है।
- • सौंठ+काली मिर्च+पीपल को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनायें, सुबह-शाम एक-एक चम्मच लें। कब्ज दूर होगी।
- • रात में दूध के साथ दो चम्मच ईसबगोल खाने से कब्ज में आराम मिलता है।
- • रात को गर्म दूध के साथ एक चम्मच त्रिफला लेने से कब्ज दूर होगा।
- • भोजन के साथ सुबह शाम पपीता खाने से कब्ज दूर होता है।
- • सौंठ + हरड + अजवायन को समान मात्रा में पानी में उबालें तथा वह पानी लेने से कब्ज दूर होगा।
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❖ पेट दर्द, एसिडिटी (अम्लपित्त)
पेट में कब्ज के दौरान अम्लपित्त बनने लगता है। खट्टी डकारें आती हैं। पेट में भारीपन लगता है। कुछ भी खाने की इच्छा नहीं होती।
- • 1. अजवायन का चूर्ण शहद में मिलाकर लेने से बदहजमी दूर होती है।
- • 2. अजवायन और नमक की फंकी गर्म पानी के साथ लें।
- • 3. एक ग्राम सौंठ के चूर्ण में चुटकी भर हींग और सेंधा नमक मिलाकर सुबह शाम पानी के साथ सेवन करें।
❖ अतिसार एवं संग्रहणी
यह आंतों का रोग है। पतले और बदबूदार दस्त होना अतिसार कहलाता है। यह अधिकांशतः दूषित जल के कारण होता है या दूषित भोजन के कारण। इसमें पेट में दर्द, मरौड़, एंठन होती है और कभी गाढ़ा या पतला दस्त होता है।
- • भुने हुए जीरे का चूर्ण दही के साथ खायें।
- • थोड़ी सी सौंफ तवे पर भूनकर उसका पावडर बनाकर मठे के साथ लें।
- • तेजपात के पत्ते + दालचीनी + ¼ मात्रा कल्पा का काढ़ा बनाकर पिलाने से दस्त तुरन्त बंद होते हैं।
- • चावलों का मांड तथा थोड़ा काला नमक और जरा सी भुनी हींग मिलाकर पीने से दस्त में लाभ मिलता है।
- • 5.10 दाने तुलसी के बीज पीसकर गाय के दूध के साथ लें।
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