संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 302 में से
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१८. पेसी योनि-वीर्य-ग्रहण नहीं करती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
१९. अतिचरणा योनिसे ।
१. अत्यन्त मैथुनसे वायु विगड़कर योनि दूषित होनेसे वीर्य ग्रहण नहीं करती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
२. प्राक्चरणा योनिसे ।
१. थोड़ी अवस्थामें पुरुष-संयोग होने के कारण वायु योनिको विगाड़ देती है, अतएव वीर्य ग्रहण नहीं करती, इससे गर्भ नहीं रहता ।
३०. उपलुप्ता योनिसे ।
१०. कफ उत्पन्न करनेवाले आहारसे, कै और स्वासादिकों रोकनेसे वायु और कफ दूषित होकर योनिको दूषित कर देने हैं, अतएव योनि वीर्य ग्रहण नहीं करती । इससे गर्भ नहीं रहता ।
३१. परिप्लुता योनिसे ।
१. पिच्छ-प्रहृतिवाली खीके छीक और डकारके रोकनेसे पिच्छके साथ वायु विगड़कर योनि दूषित हो जाती है, अतएव पेसी योनि वीर्य ग्रहण नहीं कर सकती । इससे गर्भ नहीं रहता ।
३२. उदावृत्ता योनिसे ।
१. नीचेकी वायुको रोकनेसे योनिका वेग ऊपरको होता है, इस कारण योनि वीर्य ग्रहण नहीं करती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
३३. कर्णिका योनिसे ।
१. छोटी अवस्थामें गर्भ रहनेसे योनिमें एक तरहकी कर्णिका उत्पन्न हो जाती है । उससे योनि दूषित हो