संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
गर्भ न-रहनेके कारण ।
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१८. पेसी योनि-वीर्य-ग्रहण नहीं करती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
१९. अतिचरणा योनिसे ।
१. अत्यन्त मैथुनसे वायु विगड़कर योनि दूषित होनेसे वीर्य ग्रहण नहीं करती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
२. प्राक्चरणा योनिसे ।
१. थोड़ी अवस्थामें पुरुष-संयोग होने के कारण वायु योनिको विगाड़ देती है, अतएव वीर्य ग्रहण नहीं करती, इससे गर्भ नहीं रहता ।
३०. उपलुप्ता योनिसे ।
१०. कफ उत्पन्न करनेवाले आहारसे, कै और स्वासादिकों रोकनेसे वायु और कफ दूषित होकर योनिको दूषित कर देने हैं, अतएव योनि वीर्य ग्रहण नहीं करती । इससे गर्भ नहीं रहता ।
३१. परिप्लुता योनिसे ।
१. पिच्छ-प्रहृतिवाली खीके छीक और डकारके रोकनेसे पिच्छके साथ वायु विगड़कर योनि दूषित हो जाती है, अतएव पेसी योनि वीर्य ग्रहण नहीं कर सकती । इससे गर्भ नहीं रहता ।
३२. उदावृत्ता योनिसे ।
१. नीचेकी वायुको रोकनेसे योनिका वेग ऊपरको होता है, इस कारण योनि वीर्य ग्रहण नहीं करती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
३३. कर्णिका योनिसे ।
१. छोटी अवस्थामें गर्भ रहनेसे योनिमें एक तरहकी कर्णिका उत्पन्न हो जाती है । उससे योनि दूषित हो
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सन्तति-शास्त्र ।
जाती है और फिर वीर्य ग्रहण नहीं करती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
१४. उडावर्तिनी योनिसे ।
१. जिस योनिमें रक्त निकलनेसे तुरन्त चैन पड जावे, ऐसी दशामें योनि दूषित होकर वीर्य ग्रहण नहीं करती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
१५. अन्तर्मुखी योनिसे ।
१. खूब भोजन करके उलटे टेढ़े रीतिसे संयोग करने पर वायु योनि-मुखको टेढ़ा कर देती है, ऐसी योनि वीर्य ग्रहण नहीं करती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
१६. सूचीसुखी योनिसे ।
१. माताके दोपसे गर्भस्थ कन्याकी योनि दूषित होनेसे योनि-मुख छोटा हो जाता है । ऐसी योनि वीर्य ग्रहण नहीं करती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
१७. शुष्की योनिसे ।
१. जब मैथुनके समयमें स्त्री पाखाना पेशावके वेगको रोक ले, तो मालमूत्र रुककर योनि सूखी हो जाती है । ऐसी योनि वीर्य ग्रहण नहीं करती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
१८. वामिनी योनिसे ।
गर्भाशयमें गया हुआ वीर्य बारह निकल आता है और योनि वीर्य नहीं ग्रहण कर सकती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
१९. महायोनिसे ।
१. उलटे रीतिसे संयोग होनेपर वायुसे गर्भाशय और योनि-मुख बिगड जाता है, ऐसी योनि वीर्य ग्रहण नहीं करती, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
गर्भ न रहनेके कारण ।
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२० वाहरी योनिकी सामूही सूजनसे ।
१. इस रोगमें मैथुन कष्टके साथ होता है, बड़े हुए रोगमें मवाद् पड जाता है । इस कारण गर्भ नहीं रहता ।
२१. योनिनी सडनसे ।
१. इस रोगमें घाव होकर सडन फैलती है अतएव मैथुन अत्यन्त कष्टसे होता है । इससे योनि दूषित हो जाती है । अतएव गर्भ नहीं रहता ।
२२. योनिकन्द ।
१. इस रोगमें बड़हलके फल समान योनिमें एक गाँठ उत्पन्न हो जाती है, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
२३. योनिके घाव से ।
१. इस रोगमें अन्दर घाव पड जाते हैं, अत्यन्त पीड़ा और जलन होती है । अतएव योनि दूषित हो जाती है और गर्भ धारण नहीं कर सकती ।
२४. योनि-भृशसे ।
१. इस रोगमें योनि आगे या पीछे दल जाती है । इस कारण दूषित होनेसे गर्भ नहीं रहता ।
२५. योनिकी गहरी सूजन ।
१. इस रोगमें योनि-मार्ग बहुत तङ्ग हो जाता है, सूजन फैल जाती है । इस कारण योनि दूषित होकर गर्भ धारण नहीं करती ।
६. सोम रोगसे ।
१. इस रोगमें बहुत सूत्र आता है, मसाने अत्यन्त निर्बल हो जाते हैं और रज विगड़ जाता है, अतएव गर्भ नहीं ठहरता ।
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सन्तति-शास्त्र ।
१०. फलवाहिनी नलीके रोगोंसे ।
(इस विषयमें इसी पुस्तकका "फलवाहिनी नली" प्रकरण देखो ।)
१ फलवाहिनी नलीका शोथ ।
१. इस रोगमें नली सूज जाती है अतएव थ्रएड और गर्भाशय दूषित हो जाते हैं, इसलिये गर्भ नहीं रहता ।
२ फलवाहिनी नलीका देहा हो जाना ।
१. इस रोगमें नली टेढ़ी हो जाती है, अतएव गर्भ-थ्रएड और गर्भाशयमें विकार उत्पन्न हो जाता है, इसलिये गर्भ नहीं रहता ।
३ फलवाहिनी नलीमें रक्त जम जाना ।
१. उस रोगमें रक्त जमकर गर्भ-थ्रएड और गर्भाशय दोनोंमें विकार उत्पन्न हो जाता है, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
११ उपद्रुश्यसे ।
(इस विषयमें इसी पुस्तकका 'उपद्रुश्य' प्रकरण देखो ।)
१ यह वृत्तदार रोग है, इसमें योनि और गर्भाशय इत्यादि नष्ट हो जाते हैं । रजजंतु निकम्मे पड़ जाते हैं, अतएव थोड़े हुए रोगमें गर्भ नहीं रहता ।
१२. रजकीयके निकम्मे होनेसे ।
१ जब रजका क्रीडा निकम्मा हो जाती है, तो गर्भ नहीं रहता ।
(२) पुरुषोंमें होनेवाले कारण ।
१३. लिंगेन्द्रियके छोटे होनेसे ।
१. छोटी लिंगेन्द्रिय ठीक रीतिसे वीर्ये अंग्रह नहीं पहुंचा सकती, अतएव ऐसा होनेपर गर्भ नहीं रहता । (श० क०)
गर्भ न रहनेके कारणों ।
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१४. वीर्य कीट उत्तम न होनेसे ।
१. जब वीर्य-कीट अर्थात् वीर्य-जन्तु अच्छे नहीं होते और उनमें कुदनेकी शक्ति नहीं होती, तो संयोग होने पर भी गर्भ नहीं रहता ।
१५. फोतेका न होना या अधूरा होना ।
१. प्रायः ऐसा होता है कि पुरुषके फोते अच्छी तरह नहीं उतरते । ऐसा होनेपर इस प्रकारके पुरुषसे गर्भ नहीं रहता ।
२. फोतेका अधूरा खिलना । इसका अर्थ यह है कि फोते का अधूरा बना होना है । ऐसी दशा में इस प्रकार के पुरुष के संयोगसे गर्भ नहीं रहता ।
३६. हस्तमैथुन करनेसे ।
१. वह पुरुष कि जो प्रसादके कारण एकान्तमें अपना वीर्य हाथसे मैथुनके तरीकेपर गिरा देते हैं उनकी लिंग-न्द्रिय स्थित्य पड़ जाती है, और वीर्य दूषित हो जाता है । अतएव उनसे गर्भ नहीं रहता । (रतिशास्त्र)
१७. फोतेकी नसोंका शोथ ।
१. फोतेमें एक प्रकारका शोथ हो जाता है । मांस और पनी बढ़ जाता है । इस प्रकारके बड़े रोग से फोते संयोग कालमें अपना काम ठीक ठीक नहीं कर सकते, अतएव गर्भ नहीं रहता । (शोक)
१८. गरमी और सूजाकसे ।
१. इन रोगोंसे वीर्य नष्ट हो जाता है और उसके वीर्य-जन्तु निकलने हो जाते हैं, अतएव बड़े हुए रोगमें गर्भ नहीं रहता ।
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सन्निविशाल ।
१८. प्रेमहू रोगसे ।
१. इस रोगमें वीर्यमें दमका करता है, यह वीर्य प्रकारका होता है। वीर्यमें शीघ्र होनेके कारण उसके जन्म निकलने होता है, अतएव ऐसे बड़े हुए रोगमें गर्भ नहीं रहता।
२०. वीर्यमें जन्मओंका न होना ।
१. यह अविनैयुत से होता है । जिनका अविनैयुत है, किंवा जन्मका वीर्यमें जन्मओं को उठती ही क्ली होती है। ऐसे दूषित जन्ममें नैयुत करनेसे गर्भ नहीं रहता ।
२१. शिगमिन्मिका बीड़ा पड़ जाना ।
१. यह जैग वीर्यमें दोष लादेवाजी और हस्तमैयुत इत्यादि हुए क्ली से होता है । अतएव ऐसे दूषित जन्ममें गर्भ नहीं रहता ।
२२. नामदी से ।
१. जिनके वरुद्धे नामदे होते हैं, वे सब क्ली से गर्भ पाए नहीं कर सकते । अतएव ऐसे क्ली संयोग से गर्भ नहीं रहता ।
२३. त्रनेक प्रकारके दूषित वीर्यसे ।
(इस विषयमें इसी पुस्तकका "सूत्र और दूषित रज वीर्य" प्रकार देखो ।)
१. बहुत हागई जन्म वीर्यसे ।
१. ऐसे वीर्यका सूक्ष्मतासे काला सिरे दूषित होता है, अतएव गर्भ धारण के उपयोगों नहीं होता ।
१. निरुद्धे दूषित वीर्यसे ।
१. इस रोगमें वीर्यमें नीचे पीने सूक्ष्मता दूषित होता है । इसदिने इससे गर्भ नहीं रहता ।
गर्भ न रहनेके कारण ।
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कफके दूषित वीर्यसे ।
१. ऐसे वीर्यका रक्त सफेदी में पीलापन लिये होता है, अतएव इससे गर्भ नहीं रहता ।
४. खूनके दूषित वीर्यसे ।
१. इस रोग में वीर्य का रंग लाल होता है, अतएव ऐसे दूषित वीर्य से गर्भ नहीं रहता ।
५. कफ और वायुके दूषित वीर्यसे ।
१. ऐसे वीर्य में गांठ पड़ जाती हैं, अतएव दूषित हो जाता है और गर्भ नहीं रहता ।
६. पित्त और कफके दूषित वीर्यसे ।
१. ऐसे वीर्यमें बदबू आती है और वीर्य पीप के समान हो जाता है । अतएव इससे गर्भ नहीं रहता ।
७. पित्तऔर वायुके दूषित वीर्यसे ।
१. ऐसा वीर्य कमज़ोर रहता है । अतएव इससे गर्भ नहीं रहता ।
८. वात, पित्त और कफके दूषित वीर्य से ।
१. ऐसे वीर्यमें मलमूत्रकी बदबू सी आती है, अतएव दूषित होने से गर्भ नहीं रहता ।
२४-लिंगके अत्यन्त मोटे और टेढ़े होनेसे ।
१. ऐसी दशामें वीर्य उस स्थान पर नहीं पहुँच सकता जहाँ पर कि वीर्य को पहुँचना चाहिये । अतएव गर्भ नहीं रहता । (रत्नशिखर)
(३) स्त्री और पुरुषके मिले हुए दोषोंसे ।
२५. स्त्री पुरुष दोनोंके एक साथ स्वलिप्त न होनेसे ।
१. गर्भ तभी रहता है जब कि स्त्री और पुरुष दोनों एक
सन्तति-शास्त्र ।
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( ४ )
स्त्री-सम्भोगके बाद पुरुषको चाहिये कि वह अपने लिंगको साफ़ करे और पेशाब करे जिससे कि वीर्यका अंश जो मूत्रमार्गमें रह गया हो, वह बाहर निकल जाय ।
इसके बाद पुरुषको हाथ-मुँह धोकर या स्नान करके (यदि रातको सम्भोग किया गया हो तो) सो जाना चाहिये ।
रातको सम्भोगके बाद यदि प्यास लगे तो थोड़ा-सा ठण्डा पानी पीना चाहिये, गरम दूध या चाय आदि नहीं पीना चाहिये ।
प्रातःकाल उठकर एक गिलास ताजा पानी पीना और शौचादिसे निवृत्त होकर थोड़ा व्यायाम करना चाहिये ।
स्त्रीको चाहिये कि वह सम्भोगके बाद थोड़ी देर चित्त पड़ी रहे, जिससे कि गर्भाधानमें सहायता मिले । यदि सन्तान न चाहना हो तो तुरन्त उठकर गर्म पानीसे योनि-मार्गको धो डालना चाहिये ।
सम्भोगके बाद स्त्रीको भी पेशाब करना और हाथ-मुँह धोना चाहिये ।
सम्भोगके समय दोनोंको प्रसन्नचित्त और शान्त रहना चाहिये । किसी प्रकारका भय, चिन्ता या क्रोध मनमें नहीं होना चाहिये ।
गर्भाधानमें स्त्री और पुरुषकी अवस्था ।
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स्वलिप्त होनेसे अवश्व दोनोंके कीटोंका मिश्रण होता है । अतएव आगे पीछे स्वलिप्त होनेसे गर्भ नहीं रहता ।
३१. गर्भाशयमें मिले हुए रज-बीज्यके बाहर निकल आनेसे
१. ऐसा उस समय होता है जब कि गर्भाधानके समयमें या प्रदर-रोगमें गर्भाशयका मुख आवश्यक्तासे अधिक खुल जाता है । ऐसी अवस्थामें गर्भ नहीं रहता ।
३२. प्रकृतिके विरुद्ध संयोगसे ।
१. उलटे, टेढ़े, करवट इत्यादि होकर संयोग करनेपर गर्भाशयमें विकार उत्पन्न हो जाता है, अतएव गर्भ नहीं रहता । (श० क०)
३४. अधुरा मैथुन होनेसे ।
१. यह दशा उस समय होती है कि जब स्त्रीकी इच्छा देर तक संयोग करनेकी हो और पुरुष उसके पहले ही स्वलिप्त हो जाय । ऐसी अवस्थामें भी गर्भ नहीं रहता ।
(श० क०)
इस प्रकार अनेक कारणोंसे रोगी और नारीग स्त्रियाँ गर्भ धारण नहीं करती । इसमें पुरुष और स्त्री दोनोंको सावधान रहना चाहिये ।
(२४) गर्भाधानमें स्त्री और पुरुष की अवस्था ।
लोग यह समझते हैं कि रजस्वला होनेके साथ ही साथ स्त्रियोंमें गर्भ धारण करनेकी योग्यता भी आ जाती है और चौदह पन्द्रह वर्ष की अवस्थाका पुरुष गर्भाधान कर सकता है । इसमें सन्देह नहीं कि ऐसा हो सकता है, क्योंकि हमारे देशमें कन्याएँ जल्द सयानी बना ली जाती हैं और ब्रह्मचर्य
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सन्तति-शास्त्र ।
का महत्व न जानते हुए बच्चे उठते हुए कामवेगको रोक नहीं सकते। ऐसी दशामें कच्चे रजचीर्यसे उत्पन्न हुई सन्तान कहैँ-तक योग्य हो सकती है ? जिस प्रकार कच्चे फलका वीर्य अच्चे खेतमें बोनेसे और अच्छा वीर्य बिना कमाये हुए ऐत-में बोनेसे नहीं जमता या जमनेपर किसी योग्य नहीं होता, उसी प्रकार कम अवस्थाके गर्भाधानको सम्भक्ता चाहिये। रज वीर्य अवस्थाके अनुसार पक्ता है और उसी समयकी सन्तान उत्तम होती है। इस विषय में कई मत हैं।
१. स्त्री और पुरुषकी अवस्था ।
१ वैद्यका मत ।
१. पर्चास वर्षकी अवस्थामें पुरुषका वीर्य और सोलह वर्षकी अवस्थामें स्त्रीका रज बराबर अच्छी तरह पक जाता है। (श० क०)
२ सोलह वर्षसे कम उम्रकी स्त्री और पचीस वर्षसे कम अवस्थवाले पुरुष हों और ऐसी अवस्थामें यदि गर्भा-धान हो जाय, तो गर्भ कुक्षिमें विकारसे नष्टित हो जाता है। यदि बच्चा हो भी जाय तो जीता नहीं। यदि जीवे भी तो अत्यन्त दुर्बल होता है। इस कारण अत्यन्त छोटी अवस्थामें गर्भाधान न करना चाहिये।
( सु० श० अ० १० श्लो० ६७—६८ )
३. सोलह वर्षकी स्त्रीका बीस वर्षके पुरुषसे संयोग हो और साथ ही गर्भाशय शुद्ध और हृदय दोषसे संतप्त न हो, तो वीर्यवान पुत्र उत्पन्न होता है। यदि इससे कम अवस्था हो, तो रोगी और अल्पायु सन्तान उत्पन्न होती है, या गर्भ ही नहीं रहता। ( वा० श० अ० १५ श्लो० ८—९ )
गर्भाधानका समय ।
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स्त्रीकी अवस्थाके विषयमें मतभेद नहीं है । सब सोलह वर्षकी अवस्थाका निर्णय बतलाते हैं; परंतु पुरुषोंके लिये दो मत हैं । एक आचार्यकी राय है कि २५ और दूसरेका मत है कि २० वर्षकी अवस्था गर्भाधान करने योग्य है । अतएव गर्भाधानके लिये ज्यादासे ज्यादा पुरुषकी अवस्था पच्चीस और कमसे कम बीस होना ज़रूरी है ।
(२५) गर्भाधानका समय ।
समय बड़ा चलवान है । सबको इसके सामने सर भुकाना पड़ता है । बिना इसके कोई बात नहीं होती । यदि समयके विपरीत कोई बात की भी जाय, तो उसका फल उलटा होता है । जिस प्रकार वर्षाके समयमें नये वृक्षलगाये जाते हैं, तरह तरहकी वेलें चढ़ाई जाती हैं, इसी प्रकार स्त्रियोंमें रजोधर्मके पीछे गर्भाधानका समय समझना चाहिये । इस विषयमें अनेक मत हैं ।
१. गर्भाधानका समय ।
१. धर्मशास्त्रका मत ।
१. रजस्वला होनेके चार दिन सहित स्त्रियोंके लिये सोलह दिन-रात्रि स्वाभाविक ऋतु-काल होता है । इनमेंसे आदिमें रजोधर्मकी चार, ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि निषिद्ध हैं, बाकी १० उत्तम हैं । (मनु० अ० ३ श्लो० ४६-२७)
२. सोलह रात्रियोंमें रजोधर्मकी चार रात्रि निकालकर बाकी रात्रि अच्छी हैं । (व्या० अ० १)
३. स्त्रियोंमें ऋतु रजोदर्शनसे सोलह रात्रि रहता है, उनमें सम रात्रियोंमें गमन करे और आदिकी चार रात्रियोंको छोड़ दे, तो वह ब्रह्मचारी होता है । (या० वि० प्र० ७९)
24. गर्माधानमें स्त्री और पुरुषकी अवस्था
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सन्तति-शास्त्र ।
२ वैचकका मत
१. रजस्वला होनेके दिनसे सोलह रात्रियोंमें पहिलेकी तीन और एक तेरहवीं रात्रि कुल चार रात्रि निर्दिष्ट हैं। बारह रात्रि उत्तम हैं।
(सु० श० अ० २ श्लो० ३१ और अ० ३ श्लो० ५)
२. रजोदर्शनके तीन दिन पीछे जब रज न निकले, तो तेरह दिन गर्भाधान योग्य हैं। (शु० श० अ० २ श्लो० २)
३. सोलह दिनोंमें पहिलकी चार रात्रियोंको छोड़कर बारह रात्रियां गर्भाधान करते योग्य हैं। (श० ६०)
अब धर्मशास्त्र और वैचकमें कई मत भेद हैं। मनुमहाराजि पहिलकी चार रात्रियां, ब्यारहवीं और तेरहवीं छोड़कर इस रात्रि उत्तम मानते हैं, परंतु याज्ञवल्क्य और व्यास केवल चार रात्रि निकाल कर बारह उत्तम मानते हैं। इसी प्रकार वैचकमें सुश्रुत महाराज आदिकी तीन और तेरहवीं निर्दिष्ट मानकर बारह रात्रि शुभ और गर्भाधान योग्य मानते हैं। महात्मा चरकके मतसे जब रज न निकले उसके बाद सव रात्रियां उत्तम हैं। इसी प्रकार शरीर-कल्पद्रुमके लेखक भेडाचार्य आरुम्मकी चार रात्रियां छोड़कर बारह रात्रि उत्तम मानते हैं। अतएव इन भेदोंका निर्णय होना ज़रूरी है।
२. आदिकी चार रात्रियां क्यों वर्णित हैं ?
इसके अनेक कारण हैं।
१. पहली रात्रि—वैचकका मत
१. रजस्वला होनेके पहले दिन संयोग करनेसे पुरुषकी उमर कम होती है और यदि गर्भाधान हो भी जाय तो जन्म होते ही बालककी मृत्यु होती है।
(सु० श० अ० २ श्लो० २२)
गर्भाधानका समय ।
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२. रजवती के साथ पहले दिन गमन करने से पुरुषको कुछ रोग होनेका भय रहता है। यदि गर्भ रह जाय, तो बालक गर्भमें या पैदा होते ही मर जाता है। ( १० क० )
२. दूसरी रात्रि—वैद्यका मत।
१. रजस्वला होनेके दूसरे दिन संयोग करने से पुरुष की उमर कम होती है। यदि गर्भ रह जाय तो जन्म लेने ही वा सौरीहीमें बालक १० दिनमें मर जाता है।
( सु० १० अ० ३ अ० ३३ )
२ दूसरे दिन गमन करने से उपदंश ( गरमी ) और रक्त विकार हो जाता है और स्त्रियों को गर्भाशय के रोग हो जाते हैं। ( १० क० )
३. तीसरी रात्रि—वैद्यका मत।
१. रजस्वलाके साथ तीसरे दिन संयोग करने से पुरुषकी उमर कम होती है। यदि गर्भ रह जाय तो अधूरे अंगकी और थोडे दिन जीनेवाली सन्तान उत्पन्न होती है।
( सु० १० अ० ११ अ० ३२ )
२. तीसरे दिन गमन करने से पुरुषके आँखों की रोशनी जाती रहती है और गर्भ रह जाने पर बालक अंगहीन उत्पन्न होता है। ( १० क० )
४. चौथी रात्रि—वैद्यका मत
१. रजस्वला के चौथे दिन गमन करनेसे बालक सब अंगों से पूर्ण बहुत दिनोंतक जीनेवाला होता है।
( सु० १० अ० २१ अ० ३२ )
२. चौथे दिन गर्भमें आया हुआ बालक उत्तम और वीर्यायु होता है, परन्तु इस दिनके संयोगसे गर्भाशय को हानि पहुँचती है। ( १० क० )
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सन्तति-शास्त्र ।
५. चारों राजियोंके मयोंगपर विचार—वैधक कामतं ।
१. तीन राजियों में रजवती स्त्री से संयोग करने से अनेक प्रकारके रोग हो जाते हैं । जैसे, कुण्ड गरमी, भ्रूचक्रुच्छ, रक्त-विकार और चौथी रात्रि में गमन करने से गर्भाशय को बहुत बड़ी हानि पहुँचती है । कारण यह है कि रज निकलने से उसमें कुछ परिवर्तन हो जाता है । अतएव संयोग की रपाड से हानि पहुँचती है । (रतिशास्त्र )
२. जब तक रज निकलता है, उस समयतक गमन करने-से पुरुषके वीर्य का नाश हो जाता है । (श० क०)
२. धर्मशास्त्रका मत
१. रजवती स्त्री के साथ गमन करने से पुरुष की बुद्धि, तेज, बल नेत्र की ज्योति और उमर घट जाती है ।
(मनु० अ० ४० श्लो० ४१)
२. रजस्वला होने पर आरम्भ की चार राजियों में गमन न करना चाहिये, क्यों कि इनमें स्त्री पुरुष दोनों को रोग उत्पन्न हो सकता है । (१० मनु०)
३. चौथी रात्रिमें गमन करने से थोड़े दिनों जीने वाला और दण्डित पुत्र उत्पन्न होता है । (नि० सिद्ध०)
अद्युत समय में जब कि चार दिन रज निकलता है या चौथे दिन जब कि रज न निकलता हो, संयोग करना चाहिये या नहीं ? पहलेके तीन दिन में संयोग या गर्भाधानके लिये तो सर्वसम्पति है—कि न करना चाहिये । परन्तु चौथे दिनके ावपय में मतभेद है वैधकके आचार्य लोग दोनों बात मानते हैं । धर्मशास्त्र में भी दोनों बातें मानी हैं । क्यों कि मनुने रजवती के गमनसे पुरुषकी बुद्धि इत्यादिका ह्रास माना है । केवल रजवती कहने से यह पता नहीं चलता कि तीन दिनके लिये
गर्भाधानका समय ।
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कहा गया है या चार दिनके लिये । इससे तो यही मालूम होता है कि जबतक रज निकला करे तबतक संयोग न करना चाहिये ।
चौथे दिन संयोगके लिये सुश्रुतकी भी आज्ञा है, परन्तु चरकने यह नहीं माना है । इनका मत है कि जब रज न निकलता हो तो चौथे दिन संयोग करे ।
शरीर कल्पद्रुम ( वैद्यक ) के मतसे चौथे दिन संयोग न करना चाहिये, क्योंकि इस दिनके संयोग से स्त्रीको रोग उत्पन्न होता है ।
धर्मशास्त्र ( वृ० मनु० ) से भी ऐसा ही मालूम होता है और निर्णय-सिन्धुका मत भी है कि चौथे दिन गर्भाधान होने से अल्पायु और दरिद्र सन्तान उत्पन्न होती है । इसलिये यह विचार निश्चय किया गया कि अल्पायु और दरिद्र सन्तानको लेकर ही मनुष्य क्या करेगा, जिसके उत्पन्न होनेसे स्त्रीको भी रोगी बनना पड़े । अतएव चौथे दिन संयोग न करना चाहिये यही सार सम्मति है ?
४. ग्यारहवीं रात्रि क्यों वर्जित है ?
इसमें अनेक मत हैं ।
१ धर्मशास्त्रका मत ।
१. मनुने इस बातको कहा है कि ग्यारहवीं रात्रिमें गर्भाधान न करना चाहिये, परन्तु कोई कारण नहीं बताया । दूसरे ग्रन्थोंसे पता चलता है कि—
ग्यारहवें दिनके गर्भाधानसे धर्महीन कन्या उत्पन्न होती है ( नि० सिन्धु )
है ।
६
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सन्तति-शास्त्र ।
२. वैद्यकका मत ।
१. ग्यारहवीं रात्रिके गर्भाधानसे त्रेक्ष्या या गुप्त व्यभिचार करानेवाली कन्या उत्पन्न होती है । (रतिशास्त्र)
३. हिन्दुओंका प्राचीन मत ।
१ एक बार भोजने कालिदाससे पूछा कि—“कर्मका बुरा फल कैसे होता है ?” कालिदासने उत्तर दिया कि—जिस प्रकार ग्यारहवीं रात्रिके गर्भसे दुष्ट सन्तान है। (भो०का०प०)
४. तेरहवीं रात्रि क्यों वर्जित है।
१ धर्मशास्त्रका मत ।
१. इस बातको कि तेरहवीं रात्रिमें गर्भाधान न करना चाहिये मनु और सुश्रुतने माना है । परन्तु फारण नहीं लिखा । केवल इतना ही लिखा है कि यह निन्दित रात्रि है । दूसरे ग्रन्थोंसे पता चलता है कि—
तेरहवीं रात्रिमें गर्भाधान होनेसे पापिनी और वर्षासंकर करनेवाली अर्थात् व्यभिचारिणी, अन्य पुत्रोंसे संयोग करनेवाली, कन्या उत्पन्न होती है । (नि० विन्दु)
२ वैद्यकका मत ।
१. नेरहवीं रात्रिको गर्भाधान होनेसे कुरुपा और कुलटा कन्या उत्पन्न होती है । (रतिशास्त्र)
चारों रात्रि पहलेकी और ग्यारहवीं व तेरहवीं रात्रियों का निर्णय, जहाँ तक प्रमाण मिले हैं, किया गया है । सोलह रात्रियोंमें ये छ रात्रियाँ जो निषिद्ध मानी गई हैं, निकास कर दस रात्रि बचीं । श्रव इनका विचार करना भी जरूरी है ।
५. गर्भधारण योग्य दस रात्रियाँ ।
१ धर्मशास्त्रका मत ॥
१. इन रात्रियोंके निर्णयका सम्बन्ध धर्मशास्त्रसे विशेष है;
गर्भाधानका समय ।
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क्योंकि मनु महाराजने इन्होंको अंग माना है। इनमें पर्व, तिथि, दिन और समयका विचार आवश्यक है।
६. पर्व और तिथिपर विचार ।
१. धर्मशास्त्रका मत ।
१. अमावस्या, अष्टमी, पूर्णिमा और चतुर्दशीको खीसे संयोग न करना चाहिये । ( मनु० ॐ २ श्लो० १२८ )
२. ऊपर कहे हुए मनुको प्रमाणके अनुसार गौतम स्मृति अ० ५ श्लो० १ और वृ० पा० अ० ४ श्लो० ६६ और विष्णु स्मृति अ० ६८ में भी पाया गया है ।
३. छठ, अष्टमी, चौथ, दोनों पक्षोंकी चतुर्दशी और अमावस्या तथा पूर्णिमा इनमें संयोग व गर्भाधान न करना चाहिये । ( नि० विष्णु )
४. श्राद्ध तिथियोंमें संयोग न करना चाहिये । ( वृ० नारद )
७. पर्व दिनका विचार ।
१. धर्मशास्त्रका मत ।
१. खियोंसे संयोग करनेमें मनुष्यको पर्व दिन छोड़ देना चाहिये । ( मनु० ॐ ४ श्लो० ८५ )
२. ऊपर कहे हुए प्रमाणके अनुसार वसिष्ठ स्मृति अ० १२ श्लो० १८ और वृ० पा० अ० ४ श्लो० ६६ में भी पाया गया है ।
पर्व दिनमें व्यतीपात, प्रदोष, एकादशी, संकान्ति, ग्रहण, रामनवमी, जन्माष्टमी इत्यादि हैं ।
८. पर्व समयपर विचार ।
१. धर्मशास्त्रका मत ।
१. पर्व समयमें खी-संयोग न होना चाहिये । ( वृ० पा० अ० ४ )
१३२
सन्तति-शास्त्र ।
१. दिन, सन्ध्या और रात्रिपर विचार ।
१. प्रमोक्षसूत्रका नव ।
२. संन्यासे समय गर्भाधान या स्त्री-श्रतद्रु नही होना चाहिये । ( ३० पा० ॥ ३० २ श्लो० ६६ )
२. रात्रिका गर्भाधान उत्तम है । ( ज्ञान० ॥ २ श्लो० ३३ )
= वैदिकका मत ।
१. दिनों गमन करनेसे मनुष्यकी आयु, बुद्धि और आर्त्तिका ज्योति कम होती है । ( २० ॥ ३० )
२. दिनों गमन करनेसे सूर्यमुखी वातक उत्पन्न होनेका भय रहता है । ( रनिगात्र )
३. प्रातःकाल और आधी रातके समय संयोग करनेसे वायु ऊषित होती है । ( २० ॥ ३० )
४. गुणका नव ।
१. सायङ्कालके समय गमन करनेसे कल्प और आदिति ऐसे सुयोग्य मातापिताके होते हुए भी हिरण्यकशिपुका जन्म हुआ । ( नाव )
२. आधी रातके पश्चात् गमन करनेसे पुत्रका अनेक रोग उत्पन्न होने हैं । ( न० भा० )
इससे सिद्ध है कि दिनमें, सन्ध्याको और रात्रिमें आधी रातके बाद संयोग न करना चाहिये ।
इस विषयके पुरे विचारसे भातृम होता है कि रजस्वता होनेके दिनों चार रात्रि, न्यारहवीं और वेरहवीं रात्रिकों छोड़ कर दश रात्रि संयोग और गर्भाधान करने योग्य हैं । इन दश रात्रियोंमें पर्वतिथि, पर्वदिन, पर्वसमय, आद्वितीथि, दिन-सन्ध्या और आधी रातके बादका समय इत्यादि छोड़
बिना रजस्वला हुए भी गर्भ स्थित हो जाता है। १३३
देना चाहिये। परन्तु यह विचार रहे कि जो समय प्रायः आठ बजेसे ग्यारह बजे तक का मिलता है इसमें भोजन करनेके नीन घण्टे वाद संयोग किया जाय। जो जो बातें निषिद्ध मानी गई हैं, उनको छोड़कर रात्रिमें ६ बजेसे ११ बजे तकका समय संयोगके लिये उत्तम है।
(२६) बिना रजस्वला हुए भी गर्भ स्थित हो जाता है।
लोग यह कहा करते हैं कि बिना रजस्वला हुए भी गर्भ रहता है, यह बात असम्भव नहीं है। ईश्वर सब कुछ कर सकता है। उसकी माया बड़ी विचित्र है कि जिसको समझने वाला अकेला वही है। इस विषयमें आचार्योंका मत यों है।
१. वैयकका मत।
१. रजस्वला न होनेपर भी ऋतुकाल अर्थात् गर्भ स्थितिका समय कभी कभी हो जाता है। (सु० श० अ० २ श्ल० ५)
१. ऐसा ऋतुकाल स्त्रियोंको ऐसे समयमें होता है जब कि बालक दूध पीता हो और छोड़ दे या दूध पीते हुए बालककी मृत्यु हो जाय या बालक गोदमें हो और बहुत दिनोंसे पतिकी इच्छा हो। यदि ऐसे समयपर संयोग हो जाय तो गर्भ रह जाता है। इसको इनामका गर्भ कहते हैं। (श० क०)
३. इस प्रकारसे जो स्त्री ऋतुमती होती है उसका मुख पुष्ट और प्रसन्न होता है। शरीर, मुख, और मस्तिष्क गल-गलाये हुए से होते हैं। स्त्रीको पुरुषकी इच्छा होती है, मीठी, प्यारी बातें करती है; कुक्षि, नेत्र और बाल ढीले हो जाते हैं; हाथ, छाती, कमर, नाभि, जानु और जाँघें
25. गर्माधानका समय
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सन्तति-शास्त्र ।
फड़कने लगती हैं। हर्ष और आनन्दमें स्त्री मग्न हो जाती है। जब ऐसे लक्षण हों, तो बिना रजस्वला हुए भी स्त्रीको अतुमती समझना चाहिये।
(सु० शा० अ० ६ श्लो० ६ व०)
२. जब कि रजस्वला होनेको दो चार दिन बाकी हों और पुरुषकी प्रबल इच्छा हो तो ऐसे समयमें भी पुरुष-संयोगसे गर्भ रह जाता है। (रति शास्त्र)
इस प्रकार बिना रजवती हुए भी स्त्रियाँ गर्भवती हो जाती हैं।
(२७) कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके आधीन है।
हम लोगोंमें बहुतसे लोग ऐसे हैं कि कर्तव्यको न समझ कर अपनी सारी बातें भाग्यपर ही छोड़ देते हैं। हम कोई बात ऐसी नहीं देखते जो कर्तव्यके आधीन न हो। कुछ पढ़े लिये लोग प्रकृति (कुदरत) को प्रधान मानकर उसीके भरोसे रहते हैं। ऐसे लोगोंका कहना है कि प्रकृति आप ही आप कार्य कर लेती है; परन्तु इसके साथ ही साथ यह भी जानना पड़ेगा कि प्रकृतिके गुप्त भेदोंका पता लगा कर उसको सहायता देना हमारा परम कर्तव्य है। यह बात तो सब जानते हैं कि संयोग करनेपर पुत्र या कन्या होती है। इसी अन्य-विश्वासपर रहते हुए प्रकृतिके गुप्त भेदोंका पता नहीं लगता। इन बातोंके न जाननेसे देशकी जो हानि हो रही है, वह विचार-सूत्रसे कहीं बाहर है। यही कारण है कि कहीं लड़के ही लड़के और कहीं लड़कियाँ ही लड़कियाँ दिखाई पड़ती हैं। लोग इसको ईश्वरकी देन समझते हैं। हाँ, यह देन अवश्य है; परन्तु ईश्वर देता कैसे है? घर आकर तो दे नहीं जाता? उसका