भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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गर्भाशयके रोग ।

२६

१. वच्चा पैदा होते समयकी असावधानियोंसे गर्भाशय में चोट, रगड़ और दबाव पहुंचना ।

२. गर्भाशय के ऊपर बाहर से किसी प्रकार की चोट पहुंचना ।

३. कम अवस्थावाली स्त्री का पूरे जवान पुरुषके साथ संयोग होने पर इन्द्रिय द्वारा भीतरी चोट पहुंचना ।

४. अति मैथुनसे ।

५. संयोगकी कठोरतासे ।

६. रजवन्द हो जानेसे ।

७. वच्चा पैदा होनेमें देर लगनेसे, जब कि गर्भाशय में दबाव हो जाय ।

८. गर्भाशय में सरदी पहुंचनेसे ।

९. प्रदरके बढ़ जानेसे ।

सृजन दो प्रकारकी होती है—हलकी और भारी । हलकी सृजनमें मामूली लक्षण होते हैं । यह प्रायः अच्छी भी हो जाती है, परन्तु भारी सृजन स्वयं अच्छी नहीं होती और उस में अनेक लक्षण होते हैं ।

१. जाड़े से ज्वर का आना ।

२. पेड़ में बोफ जलन और दर्द ।

३. जाँघ, कमर और रीढ़में पीड़ा ।

४. सारे शरीरमें रह रह कर दर्द होना ।

५. चलने फिरने उठने बैठने में कठिन पीड़ा ।

६. जी मचलना, घुमनी, कै और दस्त/का होना ।

७. गर्भाशय का कड़ा और बड़ा हो जाना ।

८. सरदर्द, सूत्रका सूकना और पाखाना कठिनतासे होना ।