संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 50, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंगर्भाशयके रोग ।
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१. वच्चा पैदा होते समयकी असावधानियोंसे गर्भाशय में चोट, रगड़ और दबाव पहुंचना ।
२. गर्भाशय के ऊपर बाहर से किसी प्रकार की चोट पहुंचना ।
३. कम अवस्थावाली स्त्री का पूरे जवान पुरुषके साथ संयोग होने पर इन्द्रिय द्वारा भीतरी चोट पहुंचना ।
४. अति मैथुनसे ।
५. संयोगकी कठोरतासे ।
६. रजवन्द हो जानेसे ।
७. वच्चा पैदा होनेमें देर लगनेसे, जब कि गर्भाशय में दबाव हो जाय ।
८. गर्भाशय में सरदी पहुंचनेसे ।
९. प्रदरके बढ़ जानेसे ।
सृजन दो प्रकारकी होती है—हलकी और भारी । हलकी सृजनमें मामूली लक्षण होते हैं । यह प्रायः अच्छी भी हो जाती है, परन्तु भारी सृजन स्वयं अच्छी नहीं होती और उस में अनेक लक्षण होते हैं ।
१. जाड़े से ज्वर का आना ।
२. पेड़ में बोफ जलन और दर्द ।
३. जाँघ, कमर और रीढ़में पीड़ा ।
४. सारे शरीरमें रह रह कर दर्द होना ।
५. चलने फिरने उठने बैठने में कठिन पीड़ा ।
६. जी मचलना, घुमनी, कै और दस्त/का होना ।
७. गर्भाशय का कड़ा और बड़ा हो जाना ।
८. सरदर्द, सूत्रका सूकना और पाखाना कठिनतासे होना ।