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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

गर्भाशयके रोग ।

२६

१. वच्चा पैदा होते समयकी असावधानियोंसे गर्भाशय में चोट, रगड़ और दबाव पहुंचना ।

२. गर्भाशय के ऊपर बाहर से किसी प्रकार की चोट पहुंचना ।

३. कम अवस्थावाली स्त्री का पूरे जवान पुरुषके साथ संयोग होने पर इन्द्रिय द्वारा भीतरी चोट पहुंचना ।

४. अति मैथुनसे ।

५. संयोगकी कठोरतासे ।

६. रजवन्द हो जानेसे ।

७. वच्चा पैदा होनेमें देर लगनेसे, जब कि गर्भाशय में दबाव हो जाय ।

८. गर्भाशय में सरदी पहुंचनेसे ।

९. प्रदरके बढ़ जानेसे ।

सृजन दो प्रकारकी होती है—हलकी और भारी । हलकी सृजनमें मामूली लक्षण होते हैं । यह प्रायः अच्छी भी हो जाती है, परन्तु भारी सृजन स्वयं अच्छी नहीं होती और उस में अनेक लक्षण होते हैं ।

१. जाड़े से ज्वर का आना ।

२. पेड़ में बोफ जलन और दर्द ।

३. जाँघ, कमर और रीढ़में पीड़ा ।

४. सारे शरीरमें रह रह कर दर्द होना ।

५. चलने फिरने उठने बैठने में कठिन पीड़ा ।

६. जी मचलना, घुमनी, कै और दस्त/का होना ।

७. गर्भाशय का कड़ा और बड़ा हो जाना ।

८. सरदर्द, सूत्रका सूकना और पाखाना कठिनतासे होना ।

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नन्दानि-शास्त्र ।

१. जब क्रम में दृढ़ हो तो गमांगय के पिछले भागमें सूजन समझनी चाहिये ।

२०. जब पंद्रह में दृढ़ हो और चवकी चने तो गमांगय के मुख पर सूजन समझना चाहिये ।

२१. जब कोखमें दृढ़ हो तो गमांगयकी दीवारोंमें सूजन जाननी चाहिये । जब दहिने कोख में दृढ़ हो तो दहिने और बाँए में दृढ़ हो तो बाँए और । जब दहिने बाँए दोनों और दृढ़ हो तो दोनों और सूजन जाननी चाहिये ।

ये तक्षण और क्रारा गमांगयके थंडकी सूजन, गरदन की सूजन और दीवारों की सूजन के कहे गये हैं । गमांगय की सीनगी सूजन का विदर नीचे लिखा जाता है ।

गमांगयकी सीनगी सूजन दो प्रकारकी होती हैं—एक हल्की दूसरी भारी । पहले हल्की सूजन होती है । जब इसका इतना जोर और तौरमें नहीं होता है तो वह भारी हो जानी है इसके अनेक कारण हैं ।

१. विषम स्वर के होनेसे ।

२. गमांगय के हृंग पहुँचनेसे ।

३. किसी नष्ट हिन जाननेसे ।

४. फेफड़े, गुदके और पालडुगेन के प्रकोपसे ।

५. बच्चा पैदा होने समय की कठिनाईसे ।

६. बच्चा पैदा होनेके बाद गमांगयमें रक्तके जम जानेसे ।

७. बेड़ीका टुकड़ा अन्दर रह जानेसे ।

८. बेड़ी टूटने निकलनेसे ।

९. किसी आँजुलके चोट लगनेसे ।

१०. स्त्रु समयमें सरनी लग जानेसे ।

११. अति मधुन और मधुनमें चोट लग जानेसे ।

गर्भाशयके रोग ।

३१

१२. गर्भपात कराये जाने से ।

१३. स्त्री को गर्मी सुजाक होने या पैंस रोधी पुरुष के सयोग से ।

१४. प्रदर और ऋतु धर्म के बिगड़ से ।

१५. योनि से लसदार चीज रक्त सहित गिरने से ।

१६. गर्भाशय के दूसरे प्रकारों की सूजन से ।

इस प्रकार की सूजन में अनेक लक्षण होते हैं ।

१. योनि में खुजली का होना ।

२. पेट में दोभ और जलन ।

३. ऋतु समय में रज अधिक निकलना ।

४. सांथलों और पीठ में कठिन पीड़ा ।

५. जाँघ और कमर में रह रह कर दर्द होना ।

६. पाखाना पेशाब के समय बहुत पीड़ा होना ।

७. कमर के वासं और छातियों में चिशेष पीड़ा ।

८. हर समय कुछ न कुछ ज्वर का रहना ।

९. हाथ पैरों में जलन और गलेका सूखना ।

१०. पैंसली, सर और पाखाने के स्थान में दर्द ।

११. पीठ में चक्कियों का चलना (यह एक खास लक्षण है)

इस प्रकार गर्भाशय की भीतरी सूजन के कारण और लक्षण होते हैं। जब सूजन प्रारम्भ होती है तो कुछ नहीं गलूह होता। ज्यों ज्यों सूजन बढ़ती जाती है, चाहे वह कैसे ही क्यों न हो, उसी के साथ कष्ट भी बढ़ता जाता है। इसका उपचार शीघ्र करना चाहिये ।

३. गर्भाशय का कट जाना ।

१. यह रोग प्रायः दो अवस्थाओं में देखा गया है (१) जब

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सनाति-शास्त्र ।

किं वक्त्रा पैंदा होयने का समय निकट हो (२) जब कि वक्त्रा पैंदा होयनेका समय हो-इसके अनेक कारण हैं ।

१. गन्धर्ग्य पर एक बार साधे चोट पहुँचला ।

२. अन्न होवे समय हाथ पैंट मुँह, नात और चूबड़ का पहने निकलना ।

४. वातके अंगोंका वे डोल होना ।

पेनी ग्रहमें अनेक लक्षण होवे हैं ।

३. गन्धर्ग्य सिंहुकुंडके समय कठिन पांडुका होना ।

२. एकदम रक्तका अधिक निकलना ।

५. प्रत्यक्की वेदना का एक बारका बन्द हो जाना ।

४. देहोयाँ और सँन का अस्ती अस्ती चलना ।

७. जब गन्धर्ग्य कट कर वक्त्रा पैंदमें आ जाता है तब गन्धर्ग्य सिंहुकुंड कर गंताकार होजाता है ।

इंकर न करे कि किसीके यह रोग हो । मौत के मुँहमें चना जाना अच्छा परन्तु यह रोग बुरा है—गन्धर्ग्य हर जगह से फट सकता है, परन्तु उसका नाग कम फटता है, बहति वापे अधिक फटता है । जब कसी साँतरी नाग के ऊपर का हिस्सा फटता है, तो बड़ी कठिनाई पड़ती है । इसका परिणाम अच्छा नहीं होता । माता और वक्त्रा दोनोंकी जान जानके उल्लेख रहता है । बहुत बड़ी कठिनाई तो उस समय होती है जब कि वक्त्रा गन्धर्ग्यके फटे हुये रहने से निकल कर पैंट में आ जाता है ।

४. गन्धर्ग्य का फूल जाना ।

यह साधारण रोग नहीं है इसके अनेक कारण होवे हैं ।

१. बंधनों के डोल पड़नेसे गन्धर्ग्यके बंद का कम होजाता ।

गर्भाशयके रोग ।

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२. सर्दीके कारण गर्भाशयकी ताकतका कम हो जाना । ३. बदनमें गर्मी कम हो जानेपर सर्दी पहुँचनेसे, या चोट लगनेपर सर्दी लग जानेसे, रगोंमें हवाकी रुका- वट हो जानेसे ।

ऐसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।

१. पेटपर सूजन जिस और गर्भाशय फूला हो ।

२. पेड़पर सूजन ।

३. पेड़, कसर, पड़ों, आसपास और पसलियोंमें दर्दका होना । जहाँतक देखा गया है यह रोग प्रायः पैंतीस वर्षके बाद होता है, विशेष कर उन स्त्रियोंमें जो निर्बल हैं या जिसके बार बार बच्चा होता है या बार बार गर्भ गिरा करता हैं ।

[५] गर्भाशयका जुकाम ।

इसको यूटराइन कटार कहते हैं—वैद्य लोग इसे गर्भाशय- का श्वेत प्रदर कहते हैं । इस रोगमें बड़ी कठिनाई पड़ती है । इसके अनेक कारण होते हैं ।

१. आतशक और सूजाक इत्यादि छूतदार रोगों के होने या ऐसे रोगोंके रोगी पुरुषोंके संयोगसे ।

२. बारबार गर्भापात होनेसे ।

३. गर्भाशयमें किसी तरह की खराँच हो जानेसे ।

४. अतिमैथुन करनेसे ।

५. गर्भाशयमें छूतदार रोगोंका असर पहुँचनेसे ।

ऐसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।

१- पेड़ और जाँघोंमें दर्द होता है ।

२. दस्तोंका आना व रोग बढ़ जानेपर कब्ज हो जाना

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सन्तति-शास्त्र ।

३ पेटका फूल जाना और जी मचलाना, जब कि गर्भा शयके पैंठेमें सूजन हो ।

४ कुछ कुछ ज्वर का हर समय रहना ।

५- गर्भाशयमें वोभ, जलन और पीड़ा होना ।

६ दवानेपर गर्भाशयमें दर्द होना ।

७. खूनका शरीरमें कम बनना ।

८. निर्वलता अधिक हो जाना, मुख सूज जाना ।

९. अतु धर्म कष्टके साथ होना ।

१० गर्भाशयका मुख खुल जाता है, जब कि गर्भाशयकी गर्दनमें सूजन हो ।

११: गर्भाशयके मुखपर घाव होकर पीप पड़ जाना । अतुर्थमें समयपर न होना, या अधिक होना, पैंठमें वोभ मालूम होना और कभी कभी खूनका गिरना । गुरदा फेफड़ा और जिरगके रोग उत्पन्न हो जाना । जब कि रोग पुराना हो जावे ।

यह रोग गर्भाशयके पैंठे, धड और गरदनमें होता है । इसमें सूजन आ जाती है और लसदार चिपचिपा मवाद निकला करता है । ठाने पड़नेके कारण जब गर्दनमें संकीर्णता आ जाती है, तब खी बन्ध्या हो जानी है ।

[६] गर्भाशयके मुखकी सूजन ।

ऐसो सूजन दो प्रकारकी होती है । ( १ ) मामूली, ( २ ) फैली हुई । इन दोनोंमें अन्तर इतना ही होता है कि मामूली सूजन थोड़ी होती है, और फैली हुई लम्बी और कुछ चौड़ी होती है । इन दोनोंके कारण प्रायः एक ही होते हैं ।

१. विषम ज्वर या प्रसूतिके वाद या बच्चा पैदा होने समय गर्भाशयमें हूतका असर या कुंश पहुँचनेसे ।

गर्भाशयके रोग ।

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  1. २. प्रदरके बढ जानेसे ।
  2. ३. वच्चा पैदा होते समय सरदी लगने और अनेक असावधानियोंसे ।
  3. ४. गर्भाशयके मुखपर दवाव पड़ने पर चोट लगने और तेज़ाव पेसी जलन उत्पन्न करनेवाली बस्तुओंके लगानेसे ।
  4. ५. योनिके भीतर विकार उत्पन्न करनेवाली दवा लगानेसे ।
  5. ६. अतिमैथुन और दीर्घ लिंगसे एकवारगी गर्भाशय के मुखपर दवाव पड़ने और गर्भाशयके मुखके समीप जखम होनेसे ।
  6. ७. वच्चा पैदा होते समयकी चोट या छिल जानेसे ।
  7. ८. वच्चा पैदा होनेपर गर्भाशयके न सिकुड़नेसे ।
  8. ९. वच्चा पैदा होते समयमें किसी औजार या दाईके नखुन लगनेसे ।
  9. १०. वच्चा पैदा होनेके बाद घूमने फिरने और मेहनत करनेसे ।
  10. ११. वच्चा पैदा होते समयमें गर्भाशयका मुख फट जानेसे ।
  11. १२. गरमी, सूजाकके होने या इससे योगी पुरुषके संयोगसे ।
  12. १३. गर्भाशयके मुखपर अनेक प्रकारकी वृत्त पहुंचनेसे । पेसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
  13. १. गर्भाशयके मुखपर तनाव हो जाना और पैंड्रम बौंफका मालूम होना ।
  14. २. गर्भाशयके मुखपर घाव और छोटे छोटे दाने पड़ जाना ।
  15. ३. योनिसे एक तरहका पतला पदार्थ गिरा करना और मूत्रमें रूकावट ।

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सन्तति-शास्त्र ।

३. निर्वृत्तता, गरीरका पीला पड़ जाना, उठने बैठनेमें कष्ट, संसका उखड़ आना और थोड़े परिश्रमसे थक जाना।

५. मैथुनमें कष्ट और पीड़ा, कै और पाचनशक्तिका कम होना।

६. हाथ पैरके जोड़ोंमें दर्द और पाचनशक्तिमें कमी होना।

७. पेट्ट, पीठ, मायल्लों, सर और पसलियोंमें दर्द।

सबसे पहले गर्भाशयके मुखपर जरा सी सूजन होती है, फिर यही सूजन धीरे धीरे फैल जाती है। इसीसे दाग गोंय हो जाता है। ऐसी दशामें खास कारण प्रदर समझना चाहिये। जब तक यह अच्छा न होगा इसका नर्वंधी कोई रोग अच्छा नहीं हो सकता। ऐसी दशामें चिकना बहनेवाला पदार्थ निकला करता है, परन्तु जब किसी तरहकी रुकावट हो जाती है, तो अन्दर ही मरा रह जाता है।

७. गर्भाशयकी जलन।

इसके अनेक कारण हैं।

  1. १. रजो-दूशनके समयमें सर्दीका लगना, गरम चीज़ोंका खाना और अतिमैथुन।
  2. २. बच्चा पैदा होने समयमें किसी प्रकारकी गन्दगी गर्भाशयमें पहुँचना।
  3. ३. बच्चा पैदा होने समयमें चोट लगना और गर्भाशयका ठीक ठीक न सिकुड़ना।
  4. ४. नाल खोंचनेमें खेड़ीका टुकड़ा अन्दर रह जाना।
  5. ऐसी दशा में अनेक लक्षण होते हैं।
  6. १. पेटका भारीपन और दर्द, कमर छाती पेट्टमें कठिन पीड़ा
  7. २. पहिले रज-स्त्राव होना और पीछे रुक जाना। मैथुनमें कष्ट।

गर्भाशयके रोग ।

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कभी कभी हिस्टीरियाकासा दौरा हो जाता है । गरम खट्टी चरपरी और बादी चीजोंके खानेसे यह रोग खूब बढ़ता है । बड़े हुए रोगमें हिस्टीरिया अवश्य होता है ।

८. गर्भाशयका मोटा हो जाना ।

यह कठिन रोग है और इसके अनेक कारण हैं ।

१. बच्चा पैदा होनेपर गर्भाशयमें जखम हो जाना या अच्छी तरहसे न सिकुड़ना ।

२. बारंबार बच्चा होने या गर्भपात होनेसे गर्भाशयका निर्बल होकर न सिकुड़ना ।

३. बच्चा पैदा होने समयमें खेड़ीका कुछ टुकड़ा भीतर रह जाना ।

४. गर्भाशयमें रक्तके इकट्ठा हो जाने और न निकलनेसे ।

५. गर्भाशयमें प्रसवके समय चोट लगनेसे ।

६. प्रसवके बाद ही चलने फिरने और परिश्रम करनेसे ।

७. प्रसवके कुछ दिन बाद ही पुरुष संयोगसे ।

ऐसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।

१. साँथलों और कमरमें दर्द ।

२. मैथुनमें पीड़ा और पेहूका भारीपन ।

३. पैरपर कुछ सूजन और गर्भअण्डोंमें दर्द ।

गर्भाशय दो तरह से मोटा होता है । एक—जब केवल गर्भाशयका मुख ही मोटा पड़ जाय; दूसरे—जब पूरा या अन्दर-का भाग मोटा पड़ जाय । ऐसी दशामें स्त्री बँध्या हो जाती है ।

३८

सन्तति-शान्त ।

६. गर्भाशयमें जलका भर जाना ।

इसका निश्च कारण है ।

१. किसी कारण गर्भाशयका मुख बन्द हो जानेसे गर्भाशय-को ढके रहनेवाली फिल्लीसे जल या रक्त मिला हुआ जल गर्भाशयमें इकट्ठा हो जाता है । ऐसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।

१. पेट फूल जाता है । हाथ पैरोंसे गर्भके चिन्ह मालूम होने हैं । कै, जो मचलाना, घुमनी, बदनमें सुस्ती इत्यादि मालूम होती हैं ।

ऐसी दशा में स्त्रियाँ प्रायः गर्भका तन्देह करती हैं । बड़े हुए रोगमें बड़ी कठिनाई पड़ती है ।

१०. गर्भाशयकी गाँठ ।

यह दो प्रकारकी होती है ( १ ) मामूली ( २ ) मिली हुई ।

१. गर्भाशयकी मामूली गाँठ ।

यह ठोस होती है । देखनेमें आकार गोल होता है । किसी किसीकी लम्बी और कुछ देढ़ी भी होती है । जब यह गर्भाशयके मुखपर होती है तो स्त्री बंध्या हो जाती है और यदि गर्भाधान होनेके बाद ऐसी गाँठ पड़ जाय, तो प्रसवमें बड़ी-कठिनाई पड़ती है ।

२. गर्भाशयकी मिली हुई गाँठ ।

इसकी बनावट गोल मांस के रेशों से बनी होती है । इसमें कुछ चोफसों जान पड़ता है और गर्भ सरीसा प्रतीत होता है । ज्यों ज्यों गाँठ बढ़ती जाती है, त्यों त्यों भारीपन आता जाता है । रजका भाव एकाएक बन्द हो जाता है । दर्द, बरदघुमती, हाथ पाँवमें जलन, कमज़ोरी, चेहरेकी रंगत पीली और स्त्रीमें सुस्ती आ जानी है ।

गर्भाशयके रोग ।

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११. गर्भाशयके मुखका बन्द हो जाना ।

इसके अनेक कारण हैं ।

१. गर्भाशयके मुखपर चोट लगनेसे उसमें सूजन आ जाती है । इस कारण दोनों किनारे चिपट जाते हैं और सूजन हलकी पड़ कर मुख मोटा पड़ जाता है तथा चिपका रहता है ।

२. गर्भाशयके मुखके दोनों किनारोंमें सवाद पड़कर आपसमें चिपट जानेसे ।

३. गर्भाशयके मुखपर चोट लगनेसे, जब कि सूजन आ जाने पेसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।

१. पेड़का भारीपन और उसमें पीड़ा ।

२. हाथ, पाँच, पीठ और साथैलामें दर्द ।

३. गर्भाशयमें सफेद, चिकना और बहनेवाला पदार्थ भरा रहता जब कि गर्भाशयका मुख जन्मसे बन्द न हो ।

गर्भाशयका मुख दो प्रकारसे बन्द होता है । एक तो वह कि जो जन्मसे ही बन्द हो, दूसरा वह जो किसी रोग के होनेसे बन्द हो । जब रोगसे बन्द होता है तब गर्भाशयके मुखके आगे एक परदासा पड़ जाता है । पेसी दशामें रज नहीं निकलता ज्यों ज्यों रोग बढ़ता जाता है, कष्ट भी उसीके साथ बढ़ता जाता है । अधिक रज इकट्ठा हो जानेपर जरा जरासा गिरता है ।

१२. गर्भाशयका अर्बुद ।

इसके कई कारण हैं ।

१. जन्महीसे होना ।

२. जिस जगहसे गर्भाशय मुड़ जाना है वहाँ दवाब पड़नेके कारण पोषण न होनेसे ।

सन्तति-शास्त्र ।

  1. ३. संकामक रोगोंके संसर्गसे ।
  2. १. ऐसी दशामें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
  3. १. योनिसे दुर्गंधका आना ।
  4. २. एक प्रकारका गाढा पानी निकलना ।
  5. ३. पेड़के सामने अत्यन्त कठिन पीडा ।
  6. ४. कै और प्रायः दस्तोंका आना ।
  7. ५. घावके कारण समागममें पीडा होना ।
  8. ६. समयपर रजस्वला न होना ।
  9. ७. गर्भाशयके आगेका मुख सिक्कुड जाना ।
  10. ८. गर्भाशय और योनिमें दर्द, शोथ और दाहका होना ।
  11. ९. कभी कभी एक चारगी रज-स्त्राव हो जाना ।
  12. १०. घावमें खुजलाहट मालूम होना ।
  13. ११. मन्दाग्नि हो जाना और पेटका अफार ।
  14. १२. रज कम निकलना ।
  15. १३. रजका अत्यन्त पीडासे निकलना ।
  16. १४. रजका गर्भाशयमें जम जाना और कञ्जियत ।
  17. १५. गर्भाशयका दग्ध हो जाना ।
  18. १६. सूत्र बन्द हो जाना, या बूंद बूंद गिरना ।
  19. १७. गर्भाशय और उसके आस पास शोथ होना ।
  20. १८. जाँघ, पेड़, रीढ़, कमर, नाभी तंत्रों और सरमें दर्द होना ।
  21. १९. अण्ड और रजवाही नलियोंमें शोथ ।
  22. २०. गर्भाशयका नीचे उतर आना ।
  23. २१. पेटपर सूजन हो जाना ।

यह रोग पहले पहल गर्भाशयके मुखपर होता है, और बढ़ते तेबढ आस पास फैल जाता है । घाव जब फैलता है, तो

गर्भाशयके रोग ।

४९

गर्भाशयका कुछ भाग सड़ जाता है । जब रोग बढ़ जाता है, तो स्त्री बन्ध्या हो जाती है ।

१३. गर्भाशयमें दाने पड़ जाना ।

इसके कई कारण हैं ।

१. रक्त-विकारसे ।

२. रज अशूद्ध होनेसे ।

३. बच्चा पैदा होते समयमें गन्धगी पहुँचनेसे ।

ऐसी दशामें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।

१. पेट्टु दवानेसे दर्द होना ।

२. कभी रक्त और कभी मवाद मिले हुए रक्तका निकलना ।

३. रक्तमें बदबू आना ।

इस रोगमें गर्भाशयकी श्रीवापर छोटे छोटे दाने पड़ जाते हैं और एक दूसरे सम्बन्धसे बढ़ते जाते हैं ।

१४. गर्भाशयके धाव ।

ये दो प्रकारके होते हैं । ( १ ) बाहरी और ( २ ) भीतरी ।

१. बाहरी धाव—इसके अनेक कारण हैं ।

१. गर्भाशयमें बाहरसे चोट लगनेपर ।

२. रज और फिल्लीके फट जानेपर ।

३. गर्भाशयमें धमक पहुँचनेपर ।

२. गर्भाशयके भीतरी धाव—इसके अनेक कारण हैं ।

१. मरे हुए बालकके खोंचनेमें रंगड़ लगने या चोट लगनेसे ।

२. रज वा किसी फिल्लीके फट जानेसे ।

३. जनन समयमें दर्दकी अधिकतासे ।

४. गर्भाशयमें सूजन और फुसियोंके उत्पन्न होनेसे ।

५. बच्चा कठिनाईसे पैदा होना ।

४२

सन्तति-शास्त्र ।

६. बच्चा पैदा होनेपर फिल्लीके खाँचनेकी असावधानीसे ।

७. गर्भाशयमें गंदगी आ जानेसे ।

ऐसी दशामें अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।

१. हर समय दर्द व जलनका रहना और मैथुनम कष्ट ।

२. यदि मवाद जलनके साथ आवे, तो जानना चाहिये कि घाव शुद्ध होकर छूट रहा है ।

३. यदि खून और मवाद आवे तो जानना चाहिये कि कोई रग फट गई है ।

४. यदि गाड़ी पदार्थ निकले, तो जानना चाहिये कि सजन समयके पहले ही फट गई है ।

५. यदि काला चट्कुदार रक्त आवे और मवाद न पड़ी हो और दर्द हो, तो जानना चाहिये कि मांस गल रहा है ।

६. यदि मांस पतला और जलजुक्त निकल रहा हो, तो जानना चाहिये कि घाव सड़ गया है और मांस गल रहा है ।

१५. गर्भाशयकी रसौली ।

इसका कारण ।

एकमात्र रजोधर्मका विवाद और प्रदर है ।

इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।

१ जब यह रसौली भीतरको बढ़ती है, तब गर्भाशय बढ़ता है ।

२ जब यह रसौली गर्भाशयके बाहरके भागमें बढ़ती है, तो गर्भाशय नहीं बढ़ता, किंतु दवाव पढ़नेसे सूख जाता है ।

३. ज्यों ज्यों रसौली बढ़ती जाती है रजोधर्ममें रुकावट पड़ती जाती है ।

४. जांघ कमर और रीढ़में दर्द होता है ।

गर्भाशयके रोग ।

४३

५. पेड़ में घोंफ सरीखा जान पड़ता है और जी मचला ता है ।

६. भोजन नहीं पचता ।

यह रसौली गर्भाशय में होती है और रस से भरी रहती है यह गर्भाशय की परत के भीतरी हिस्से में बढ़ती है और कभी अगले हिस्से में भी सुपारी से लेकर नारियल के आकार तक देखी गई है । यह एक से अधिक भी होती है । प्रारम्भ में कुछ जान नहीं पड़ता—परन्तु विकार उत्पन्न होते ही रजो धर्म में खराबी आ जाती है । ज्यों ज्यों यह बढ़ती है आस पास के गर्भस्थानों पर दबाव पड़ता है । इसमें गर्भ नहीं रहता यदि रोग के प्रारम्भ होते समय में गर्भ रह जाय, तो पात हो जाता है । प्रारम्भ में रजचिकार का मामूली रोग सम्भकर बहुत कम ध्यान दिया जाता है ।

१६. गर्भाशयका नासूर ।

१. पुराने जखम से नासूर हो जाता है । जब गर्भाशय में फुन्सी बगीरह हो जाय और वह पके या फूटकर अथवा चहा करे, तो उसको नासूर कहते हैं । इस में से पतली मवाद या पानी सा निकला करता है । दर्द रहता है और खाज मालूम होती है ।

१७. गर्भाशयका टेढ़ा हो जाना ।

यह आगे और पीछे से टेढ़ा होता है ।

इसके कई कारण हैं ।

१. जब मूत्राशय खाली है, तो पाखाना जाते समय अधिक जोर पड़ने से ।

२. तीक्ष्ण मरोड़े होने और बन्धनों के ढीले पड़ जानेसे ।

४४

सन्तति-शास्त्र ।

३ ठोकर लगकर आँधे गिर पड़ने से ।

जब ऐसा होता है, तो अनेक लक्षण प्रकट होने हैं ।

१ आगे को बोफ और गर्भश्राद्ध तथा नली में शोय ।

२ ऋतुवर्ष में रक्तावट और कष्ट से नाव होता है ।

३ मुखाशय पर दवाव पड़ता है ।

४ सूत्र प्रायः एक एक एक वृद्ध आता है ।

५ पेट्टू के सामने उर्द्ध होता है ।

जब यह रोग होता है, तो स्त्री बन्ध्या हो जाती है और गर्भाशय का मुख कुछ छोटा पड़ जाता है । यह जन्म से भी होता है । ऐसी दुशा में गर्भाशय का मुख चपटा और संकुचित होता है ।

६ गर्भाशयका पीछेमें देहा होना—इसके कई कारण हैं ।

१ मरण बालक पैदा होने पर मिल्ली के विच जाने से ।

२ नितर्वा के बल विच गिर पड़ने से ।

३ भारी बोफ उठाने से ।

४ गर्भाशय के बन्धनों के ढीले पड़ जाने से ।

जब ऐसा होता है तो अनेक लक्षण प्रकट होने हैं ।

१ पेट्टू और नितर्वा के बीच में उर्द्ध होना ।

२ पीठ में उर्द्ध और जाड़ा लगकर रोमांच हो जाना ।

३ गर्भाशय से लुवावदार पदार्थ बहना ।

४ एक एक वृद्ध सूत्र गिरना ।

५ कन्च और गर्भाशय के आस पास के म्यालों में सुजन जाना ।

६ पेट के अन्दर दूसरे म्यालों में रक्त इकट्ठा होना ।

७ चलने के समय जाँच, पेट्टू, कमर और नाभी में उर्द्ध होना ।

८ गरीर में भड़कन और उर्द्ध होना ।

९ गर्भश्राद्ध और नली में शोय होना ।

गर्भाशयके रोग ।

४५

जब यह रोग होता है, तो गर्भ रह जाता है; परन्तु गिर जानेका भी भय रहता है। जब वरावर गर्भ-पात हो जाता हो, तो इस रोगका होना बहुत सम्भव है। इसका जन्मसे ही पीछेसे देढ़ा होना स्त्रीको अवश्य वन्ध्या कर देता है।

१८. गर्भाशयका टल जाना—

यह चार प्रकारसे टलता है। (१) आगे (२) पीछे (३) दहिने और (४) बाएँ।

१. गर्भाशयका आगे टलना—इसके अनेक कारण हैं—

१ गर्भाशय पर पीछे से किसीप्रकार का दबाव पड़नेसे।

२ औंधे झुँह गिर पड़ने से।

३ मैथुन की असावधानी से।

४ गर्भाशय के वन्धनोंके ढीलेपड़ जाने से।

५ रजविकार के अनेक उपद्रवों से।

ऐसी दशा में अनेक लक्षण प्रकट होते हैं।

१ सूत्राशय पर दबाव के कारण वाधा पहुँचता।

२ सूत्र का एक एक वृद्ध निकलना।

३ पेंड्रूके सामने दर्द और बोभ जान पड़ना।

४ रजका ठीक तीरसे न निकलना।

५ रजका अत्यन्त कष्ट के साथ निकलना।

६ गर्भाशय में रज इकट्ठा हो जाना।

गर्भाशय के मुखका छोटा हो जाना।

जब यह रोग होता है तो स्त्री वन्ध्या हो जाती है। गर्भाशय का मुख छोटा पड़ जाता है। बहुत सी स्त्रियों में जन्मसे ही गर्भाशय आगे को टला हुआ रहता है।

२. गर्भाशयका पीछेकी ओर टलना—इसके कई कारण हैं।

१. मैथुन के समय की असावधानी से।

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सन्तति-शास्त्र ।

  1. २. नितर्वां के बल चित्त गिर पड़ने से ।
  2. ३. भारी बोभ उठाने से ।
  3. ४. गर्भाशय के बन्धनों के ढीले पड़ जाने से ।
  4. ५. किसी प्रकार की चोट कि जिसमें आगे से धक्का लगे । ऐसी दशा में अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
  5. ६. मूत्रमार्ग में जलन होना ।
  6. २ मूत्र का टपक टपक कर निकलना ।
  7. ३ मलाशय पर बोभ सा मालूम होना ।
  8. ४ पेट्टू और नितर्वां के बीच में दर्द ।
  9. ५ पीठ और रीढ़ में दर्द का होना ।
  10. ६ कञ्ज और गर्भाशय के आस पास सूजन ।
  11. ७ रज में रुकावट और जलन ।

जब यह रोग होता है, तो स्त्रीके गर्भ रहता अवश्य है, परन्तु प्रायः उसका पात हो जाता है । बराबर गर्भपात होनेसे इस रोगकी संभावना होती है । जब जन्मसे ही यह रोग हो, तो स्त्री अवश्य बन्ध्या होती है ।

३—४. दहिने और बाएँ गर्भाशयका टलना—

इसके कई कारण हैं ।

१ मैथुन की असावधानी ।

२ दहिने बल गिरने से बाईं और बाएँ बल गिरने से दहिनी और दल जाता है ।

३ भारी बोभ उठाने से । जिस और बोभ पड़ जावे उस और का गर्भाशय दल जाता है यदि दहिने और पड़े, तो बाईं और दल जायगा और यदि बाईं और पड़े तो दहिनी और दल जायगा ।

४ यदि दहिनी बन्धन ढीला पड़ गया है, तो बाईं और

गर्भाशयके रोग ।

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और यदि बायाँ वन्धन डीला पड़े गया है तो दहिने ओर दल जायगा ।

५-दहिनी ओर चोट लगनेसे बाईं ओर और बाईं ओर चोट लगनेसे दहिनी ओर दल जाता है ।

जब ऐसा होता है, तो अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।

१. गर्भाशय चाहे जिस ओर दले, दोनों ओर के गर्भ-श्रएड और फलवाहिनी नलौमें खिंचाव और तनावके कारण सूजन होगी ।

२. रजका समयपर ठीक ठीक न निकलना ।

३. जिस ओर गर्भाशय दला हो उस ओर कुछ भारीपन मालूम होना ।

यह भी दो प्रकारसे होता है । जब यह रोग जन्मसे होता है, तो स्त्री वन्ध्या होती है । ऐसी दसामें गर्भ रह जाता है, परन्तु पात होने का भय रहता है । अतएव ऐसे रोगोंमें उचित उपचार करना चाहिये ।

१६. गर्भाशयका उलट जाना ।

१. गर्भाशयके वन्धनोंके अत्यन्त ढीले पड़ जानेसे ।

२. अत्यन्त निर्बलता और गर्भाशयमें एकदम किसीप्रकारकी चोटसे ।

३. अपने स्थानसे दलते समयके गर्भाशयकी भटकसे । इसके अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।

१. स्त्रीके हृदयपर कठिन आघात पहुँचता है ।

२. स्त्री एक दम बेहोश हो जाती है ।

३. हाथ पैर ठंडे पड़ जाते हैं और कै होने लगती है ।

४. योनिसे रक्त निकलता है । निर्बलोंमें कम और बलवती स्त्रियोंमें अधिक ।

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सन्तति-शास्त्र ।

५. पेड़ और पीठमें कठिन पीड़ा होती है ।

६. धीरे धीरे नाड़ीकी चाल कम पड़ती जाती है ।

यह बड़ा ही भयंकर रोग है । कुशल इतनी ही है कि यह रोग आम तौरसे नहीं होता । इस रोगमें गर्भाशय इस प्रकार उलट जाता है कि उसका रूप ही बदल जाता है । नीचेका भाग ऊपर और ऊपरका नीचे हो जाता है । इसका कोई समय नहीं है । बच्चा पेटमें आनेके पहले गर्भ-समयमें और बच्चा पैदा हो जानेके बाद भी उलटता है । उस समय इसकी तीन दशाएँ होती हैं ।

१. पैंदेका भीतरकी ओर दक्कड़ घुसना और वहाँ गड़्दा पड़ जाना ।

२. दवे हुए पैंदेके भागका मुखमें आ जाना या पैंदेका मुखकी ओर गहरा घुस जाना ।

३. गर्भाशयका उलट जाना ।

जब पेसी दशा होती है, तो बड़ी कठिनाई पड़ती है । यदि शीघ्र यत्न न किया जाय तो अनेक उपद्रव खड़े हो जाते हैं; खासकर गर्भावस्थामें बहुत बड़ी कठिनाई होती है ।

२०. गर्भाशयके मुखका अधिक खुल जाना ।

१. जन्मसे ही अधिक खुला रहना ।

२. निर्बलता और वन्यनाके ढीले पड़ जानेसे ।

३. श्रुतिमंथन और गर्भाशयके मुखपर पेसी दवा लगाने से कि जिससे जलन इत्यादि हो ।

४. गिर पड़ने या पेट मसलने इत्यादिसे ।

५. गर्भाशयका मुख किसी यंत्रके द्वारा फैलानेसे जब कि वह पुनः सिकुड़ न सके ।