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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

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सन्तति-शास्त्र ।

नहाना अत्यंत बुरा है, परन्तु जाति और समाज में प्रायः कुछ दिन नहाने का रिवाज है। सरदीके दिनोंमें इसी नहानेकी बदौलत कितनी ही स्त्रियां कालके मुखमें पहुँचती हैं। अतएव इस दिनतक नहाने, चलने, उठने, बैठने इत्यादिसे बहुत बड़ी हानि पहुँचती है। अतएव देसी देशओंमें स्त्रियाँको सावधानी से काम लेना चाहिये।

(६०) जन्म लेनेपर बच्चेको दूध

कब पिलाना चाहिये ?

इस विषयमें अनेक रवाज और विचार हैं। सब अपने रवाज और विचारोंको उत्तम समझते हैं। कोई तुरन्त कोई कुछ देर में दूध पिलाना पसन्द करती हैं। कोई आठ आठ घण्टेतक खबर ही नहीं लेतीं। अनेक श्रुतुभवशील विद्वानोंकी राय है कि प्रसूताके साफ़ होने और चारपाई पर लेटनेके पीछे तुरन्त बच्चेको स्तनोंमें लगा देना चाहिये। परन्तु यह याद रहे कि तीन घण्टेसे अधिक इस काममें न लगें जब बच्चा स्तनोंसे लगेगा तो उसे दूध पीनेसे की वान्त पड़ेगी। स्तनोंमें जल्दी लगानेका कारण यह है कि बच्चेको यह बतलानेकी जरूरत है कि उसका आहार स्तनोंमें है। बच्चेके पेटमें जो गन्दी भरी रहती है वह दूध पीनेपर साफ़ हो जाती है। पहले पहलका दूध बच्चेके लिये उद्योगका काम करता है।

वैद्यकका मत है कि स्त्रियाँमें दूध पुत्रके छूने, देखने और स्पर्श करने तथा बालकके स्तन पकड़नेसे चीर्थकी तरह उत्तरता है। इसमें मुख्य हेतु माताका स्नेह है। (आ० वा० प्र० ९)

जिन स्त्रियाँके पहले पहल बच्चा होता है उनका तीसरे दिन अच्छी तरह दूध उतरने लगता है, परन्तु जो कई बच्चोंकी

60. जन्म लेनेपर वचको दूध कब पिलाना चाहिये ?

जन्म लेनेपर वच्चको दूध कव पिलाना चाहिये ? २४६

मातापैँ हो चुकी हैं, उनके प्रायः उसी दिनसे उत्तर आता है। जब दूध न उत्तरे तो गाय या बकरीका दूध पिलाना चाहिये। परन्तु दूध न उत्तरनेपर भी वच्चको चार बार स्तनोंमें लगाना जरूरी है। इसलिये कि बच्चा अपने दूधका स्थान न भूले और दूधके प्रवाहकी उत्तेजना होती रहे। प्रायः देखा गया है कि स्तनोंमें भरपूर दूध भरा रहनेपर भी बच्चा दूध नहीं पिता। धरके लोग माताकी असावधानी और भूत प्रेतका अनुमान करते हैं, परन्तु कारण कुछ और ही होता है। प्रायः मुँहके अंदर भाग इत्यादिकी सफाई न होनेसे बच्चा छाती नहीं दवा सकता। किसी किसीके जीभके नीचे एक प्रकारकी भिल्ली लगी होती है, उससे बच्चा दूध नहीं खाँच सकता। ऐसी दशामें इन बातों को देख लेना जरूरी है। ऐसी भिल्ली काट देनेसे बच्चा दूध पीने लगता है। जिन स्त्रियोंमें छोटी भिटनी होती है उनसे बच्चे ठीक तौरसे दूध नहीं खाँच सकते। भिटनी छोटी पड़ जानेका कारण यह है कि जो स्त्रियां स्तनोंको खूब कस कर रखती हैं तो दवाव के कारण भिटनी छोटी पड़ जाती है। ऐसी दशाओंमें बच्चको दूध पीना कठिन पड़ जाता है। बहुत सी मातापैँ बच्चको लगातार देरतक दूध पिलाती हैं। ऐसा न होना चाहिये। इससे बच्चा अधिक दूध पी जाता है। ज्यादासे ज्यादा एक बारमें दस मिनटसे अधिक दूध न पिलाना चाहिये।

प्रायः विलासप्रिय मातापैँ अपना दूध नहीं पिलाती, उनके स्तनोंमें दूध सूख जाता है, नसँ कड़ी पड़ जाती हैं। यदि दूसरा बच्चा होनेपर वे पिलाना चाहें तो दूध उत्तरनेमें बड़ी कठिनाई पड़ती है। जिन माताओंके बच्चे बार बार मर जाते हैं, उनके दूधमें एक प्रकारका विष होता है। ऐसी माताओंके

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सन्तति-शास्त्र ।

बच्चे धायके यहां पाले जाने उचित है। परन्तु पैदा होनेके साथ ही धायका दूध पिलाना ठीक नहीं। कमसे कम एक मास गाय या बकरीका दूध पिलाकर जब कि बच्चेकी पाचन-शक्ति ठीक हो जाय, तब धायका दूध पिलवाना चाहिये। सब से उत्तम तो यह है कि धायका दूध न पिलाया जाय। गाय और बकरी के दूधपर बच्चा अच्छी तरह पाला जा सकता है।

(६१) बच्चोंकी तौल ।

हमारे देशमें इस बातको अशुभ मानते हैं कि पैदा होते ही बच्चेको तौला जावे। परन्तु इसके अतिरिक्त और कोई रीति तौल जाननेकी नहीं है। तौलनेसे बच्चेके स्वास्थ्यका पता ठीक लग सकता है। जो बालक जितना हलका होगा उसको उतना ही रोगी समझना चाहिये। पैदा हुए बच्चेको तौल ३ सेरसे ५सेर तक जरूर होना चाहिये। कहीं कहीं इससे कुछ अधिक तौलके भी उत्पन्न होते हैं। बच्चा जब पैदा होता है उसमें जितनी तौल उस समय होती है वह दो तीन दिन पीछे नहीं रह जाती। प्रायः ३ सेरकी कमी अवश्य हो जाती है। इसके दो कारण हैं—पक तो यह कि पैदा होनेके बाद बच्चा पाखाना पेशाब करता है, दूसरा यह कि दो तीन दिन ठीक ठीक दध नहीं मिलता। यहाँपर यह शंका होती है कि गर्भमें दध कहीं मिलता था कि जिससे उसका पालन होता? इस विषय में आचार्योंका मत है कि गर्भमें बच्चेका पालन माताके भोजन किये हुए रससे होता है और पैदा होनेके बाद दधसे पलता है। इसलिये तीसरे दिन बच्चेको तौलना चाहिये। जब बच्चेको दध मिलने लगता है तो उसको तौलव दूने लगती है। हमारे देश की अपेक्षा यूरोपमें बच्चोंकी तौल अधिक होती है।

61. वच्चोंकी तौल

वच्चोंकी तौल ।

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कारण यह है कि गर्भावस्थामे यहाँ माताएँ भोजनपर किञ्चित् विचार नहीं रखतीं, परन्तु यूरोपकी माताएँ गर्भावस्थामे अच्छे से अच्छा, पुष्ट, बलकारी भोजन करती हैं । उत्पन्न होनेके दिन से बारह वर्षतक वच्चोंकी तौलपर ध्यान रखना चाहिये, क्योंकि प्रारम्भसे ही शरीरकी उन्नति होना आवश्यक है । इस विषयमें विद्वानोंकी रायके अनुसार एक सूची नीचे दी जाती है ।

उत्पन्न होनेपर वच्चोंकी तौल कमसे कम आयुके अनुसार निम्नलिखित क्रोकेके अनुसार होनी चाहिये ।

वच्चोंकी आयुतौलवच्चोंकी आयुतौल
पैदा होते ही३ सेर६ मास१० सेर
१५ दिन३½ " "१० "१०½ "
१ मास४ " "११ "१०¾ "
१½ " "४½ " "१२ "११ " "
२ " "५ " "१ वर्ष१२ " "
२½ " "५½ " "१½ " "१२½ " "
३ " "५¾ " "१ " "१३ " "
३½ " "६ " "२ " "१४½ " "
४ " "६½ " "३ " "१६ " "
४½ " "७ " "४ " "१७½ " "
५ " "७½ " "५ " "१८½ " "
५½ " "८ " "६ " "२० " "
६ " "८½ " "७ " "२२ " "
६½ " "९ " "८ " "२५ " "
७ " "९½ " "९ " "२८ " "
७½ " "१० " "१० " "३२ " "
८ " "१०½ " "११ " "३६ " "
८½ " "११ " "१२ " "

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सन्तति-शास्त्र ।

कमसे कम इतना वजन बच्चोंमें होना आवश्यक है । यदि इससे कम हो तो वे निरोग नहीं कहे जा सकते ।

इन दिनोंमें माताओंको अनेक पुरुष पदार्थ खाने चाहियें; क्योंकि जो माताएँ खाने पीनेपर ध्यान नहीं रखतीं उनके बच्चे डुबले पतले और कम वजनके बने रहते हैं । बच्चा जब तक दूधके ही आसरे रहता है उस समयतक माताके आहारपर ही उसका जीवन होता है । इसलिये माता जैसा भोजन करेगी उसीके अनुसार बच्चेका वजन बढ़ेगा । जब बचपनमें वजनकी कमी रह जाती है तो वह पूरी नहीं होती । यदि होती भी है तो वर्षों लगते हैं । इसलिये बच्चोंको प्रारम्भसे ही चलवाना चनाना हमारा कर्तव्य है ।

(६२) धाय कैसी होनी चाहिये ?

बच्चोंकी जीवन-यात्राके लिये यह एक बड़ा प्रश्न है कि धाय कैसी हो ? प्रायः माताएँ स्तनोंमें दूध न होने या बच्चा पैदा होकर बारम्बार मर जाने या अपने स्तनोंको सुन्दर सुडौल बनाए रखनेके कारण दूध नहीं पिलातीं । ऐसी दशामें बच्चे गाय, भैंस और बकरियों या धायोंके दूधपर पाले जाते हैं । धाय कैसी होनी चाहिये ? यह एक बड़े महत्वका प्रश्न है ।

वैद्यकशास्त्रके एक विद्वान्ने कहा है कि धायको माताके समान होना चाहिये । ( १० क० )

इसका तात्पर्य यह है कि जो कार्य माताका बालकके प्रति है वही धायका भी है । अतएव धायका सर्व-गुण-संपन्न होना आवश्यक है । विद्वानोंने इस विषयका अनेक प्रकारसे प्रतिपादन किया है ।

62. धाय कैसी होनी चाहिये ?

धाय कैसी होनी चाहिये ?

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वैयक्तिक मत ।

१. धाय अपने जातिकी जवान हो, उदंड रोगी न हो, सब अंगोंसे युक्त हो, कुरूप न हो, किसी प्रकारका न्यसन न रखती हुई खोटी न हो, अपने देशकी हो, तुच्छ स्वभाववाली न हो, नीच कामोंके करनेवाली नीच जातिकी न हो, जिसके सन्तान हो और निरोग रहती हो, गोदमें पुत्र हो, बहुत दूधवाली बिना समयके न सोनेवाली, जो जातिके बाहर न हो, अच्छे कामोंकी करनेवाली, पवित्र हो अपवित्रतासे घृणा करनेवाली, जिसके स्तन अच्छे और उत्तम हो, स्तन न बहुत ऊँचे न बहुत लम्बे, न बहुत छोटे हों न पीपलके पत्तेके समान, स्तनोंका अगला हिस्सा पतला हो और बिना परिश्रमके पीनेमें दूध आ जावे । ऐसे स्तनोंकी गुणयुक्त धाय होनी चाहिये । (च० श० अ० ८ श्ल० १०५ व १०६)

२. धाय अपने वर्णके अनुसार जैसे ब्राह्मणको ब्राह्मणी क्षत्रियको क्षत्रिया, वैश्यको वैश्या और शुद्रको शुद्धी होनी चाहिये । वर्ण शब्दसे यह बात भी कही जा सकती है कि धाय माताके रंगके अनुसार हो, ओसत दर्जेके डील-डौल की, न बहुत लम्बी न तिनगी, मध्यम अवस्थावाली अर्थात् सोलह वर्षसे ३५ वर्षतककी निरोग, शीलस्वभाववाली चपल और लोलुप अर्थात् जिसका चित्त रुक न सके, अत्यन्त डुबली या अत्यन्त मोटी न हो, जिसका शुद्ध दूध हो, जिसके हाँठ, लम्बे न हों, स्तन ऊँचे और लम्बे न हों, जिसका शरीर कम बेसी न हो, जैसे ऊ अंगुली होना या एक ही आँख इत्यादि, जिसमें कोई दुर्ब्यसन (दिव) न हो, बालकपर प्रेम रखनेवाली,

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सन्तति-शास्त्र ।

जिसके बालक जीते रहते हों, दग्धवाली, नीच कर्म न करनेवाली, अच्छे कुलकी, बहुतेर गुणोंसे युक्त श्यामा अथवा सुन्दर रूपवती होनी चाहिये। ऐसी धाय बालकको निरोग रखती हुई बलको बढ़ाती है।

(सु० श० अ० ५० श्ल० ३८ व ३९)

३ जवान, सुन्दर, सुगौल, मधुरभाषिणी, निरोग जिसमें सुहृदयताका प्राकृतिक गुण हो, चतुर, श्रद्धाप्रिय, सुडौल गरीरवाली और उत्तम विचारकी पढी लिखी धाय होनी चाहिये। (श० क०)

ऐसे गुणोंसे युक्त धाय के होनेका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार मानाके दग्धका अस्तर बालकोंपर होता है इसी प्रकार धायके दूधका भी होता है। क्रोध करने, बुरे कामोंमें फँसिरहने और निन्दनीय बातोंके विचार करनेसे दूध भ्रष्ट हो जाता है। अन्नपत्र मूत्र परीक्षा करके धाय रखनी चाहिये।

( ६३ ) वच्चा उत्पन्न होनेके कितने दिन बाद संयोग करना चाहिये ?

यह बड़े महत्वका पक्ष है। लोग इसपर बहुत कम ध्यान देते हैं। जिनको स्त्री और वस्त्रके जीवनका विचार है वे तो कुछ ध्यान भी देते हैं। परन्तु जो विषय-वासनाके प्रेमी हैं, उन्हें कुछ विचार नहीं। इसमें कई मत हैं।

१. वैधकका मत।

१ वच्चा होनेके ऐसे समयतक जब तक कि वह दूध पीता रहे, संयोग न करना चाहिये। (श० क०)

63. वच्चा उत्पन्न होनेके कितने दिन बाद संयोग करना चाहिये ?

बच्चोंका मल मूत्र और नींद ?

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२ जब तक बच्चा अच्छी तरह अन्न न खाने लगे संयोग न करना चाहिये। ( रविशास्त्र )

२. धर्मशास्त्रका मत ।

१. दांत निकलनेके बाद संयोग करना चाहिये। ( शक्तिगृति १६२ )

२. बच्चेके दूध पीनेके समयतक संयोगा न होना चाहिये। ( प्रा० ४० )

इस विषयमें प्रायः सबका मत एक ही सा है। बच्चा प्रायः दो साल दूध पीता है। इसके बाद अन्न खाने लगता है। यदि बच्चेके दूध पीनेके समय संयोग किया जाय तो दूध विगड़ जानेका भय रहता है। एक विद्वान की राय है कि बच्चा पैदा होनेके एक सालतक भीतरी अवयव पुष्ट होते हैं ( श० ६० )

इसलिये दो वर्ष बच्चेको दूध पिलाकर जब वह अन्न खाने लागे इसके बाद संयोग होना चाहिये, नहीं तो बच्चे और माता दोनोंको बहुत बड़ी हानि होनी है।

( ६४ ) बच्चोंका मल मूत्र और नींद ।

बच्चोंकी स्वास्थ्य-परीक्षा करनेके लिये तीन बातें देखनी आवश्यक हैं। मल, मूत्र और नींद। जब ये बातें ठीक हों, तो बच्चोंको निरोग समझना चाहिये। इन बातोंपर पैदा होते समयसे ही ध्यान रखना आवश्यक है। सबसे पहले बच्चे के पेशाबको देखना जरूरी है। प्रायः दूध पीनेके बाद पेशाब होता है। जब पेशाबके मुकासपर मैल लगा हो, तो बड़ा कष्ट होता है। उस समय उसको पेशाबका वेग सहना पड़ता है। इस-

64. वच्चोंका मल-भूत्र और नींद

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सन्ताति-शास्त्र ।

लिये यदि मूत्र न हो तो सबसे पहले मैल देरपना चाहिये । यदि मैल न लगा हो और पेशाब न हो, तो पेशाबके स्थानको गरम पानीसे धोना चाहिये, इसलिये, कि थोड़ी गरमी पहुँचे । यदि चौबीस घंटेतक पेशाब न हो, तो रोग समझना चाहिये । पेशाब होते ही यह देखना चाहिये कि वह कैसा होता है । पहला पेशाब कुछ रंगतदार होगा, दूध पीनेपर कुछ सफेदी आ जावेगी । इसके साथ ही साथ इसपर भी ध्यान देना जरूरी है कि पेशाब करते समयमें अच्छा काँयता तो नहीं और कष्टके साथ तो पेशाब नहीं होता । यदि ऐसा है तो अवश्य रोग है और वह रोग अच्छेको उसके माता-पितासे मिला है ।

पेशाबकी भाँति पाखानेको भी देखना आवश्यक है । पैदा होनेके दिन ही अच्छेको पाखाना होना चाहिये । पहले और दूसरे दिन पाखना काले रंगका होता है । दूध पीने पर रंगत बदल जाती है । यदि पाखना न हो तो धीरे धीरे पेट मसलना उत्तम है । यदि पाखानेमें फुटकी सी हों, तो अवश्य दूधका विकार है कि जो ठीक ठीक नहीं पचता । प्रायः चबोको पैदा होते ही कच्चा भी होता है और यह रोग माता-पितासे मिलता है ऐसी दशामें गायका दूध देना हितकारी है । चबोको समयपर पाखाना जानेकी वान डालनी चाहिये । माताओंको यह विचार रहता है कि जितनी बार चबो पाखाना जायगा उतना ही पेट साफ रहेगा । इस कारण वह बारबार पाखाना बैठाया करती हैं, यह ठीक नहीं । दिन रातमें तीन बार प्रातःकाल, दोपहर और शामको पाखाना जानेकी वान डालनी चाहिये । यदि इन समयोंपर अच्छा पाखाने न भी जाय तो चैदा देना चाहिये । ऐसा करनेसे वान पड़ जायगी । जब अच्छा

65. वच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ?

बच्चोंका मल, मूत्र और नींद ।

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साल भरका हो जाय तो दोपहरको पाखाना जानेकी वान बुड़ा देनी चाहिये । बहुत सी अज्ञान माताएँ दूध पिला कर पाखाना कराती हैं, पर यह अनुचित है । इससे कुछ खा कर पाखाना जानेकी वान पड़ जाती है कि जिससे मेदा खराब हो जाता है । इसलिये पाखाना होनेके पीछे दूध देना चाहिये ।

पैदा होनेके बाद बच्चोंको एक, खास तरहकी नींद आती है । पहलेके चार दिनोंमें वह खूब सोता है । इसमें दो भेद हैं । जो बच्चा बहुत कष्टके साथ उत्पन्न होता है वह अचेत होकर सोता है । और वे बच्चे कि जो साधारण रीतिसे उत्पन्न होते हैं अचेत होकर नहीं सोते । इसका कारण यह है कि जो बच्चा कष्टके साथ पैदा होता है उसको बड़ी थकावट आजाती है । जब कि बच्चा अचेत होकर सोता है, माताएँ तरह तरहके विचार उत्पन्न करती हैं । सबसे पहले इनको भूत प्रेतका खयाल आता है ।

जो बच्चा दस मासतक कोठरीमें बन्द रह कर पैदा हुआ है, वह तुरन्त ही कैसे खेल सकता है । पैदा होते समयमें जिसके शरीरको अनेक प्रकारकी असावधानियोंसे कष्ट सहना पड़ा है, वह तुरन्त ही माताके गोदका खिलौना कैसे बन सकता है ? उसका तो भूख प्यासके समय ही जागना बहुत है । जो बच्चे स्वास्थ्य हैं वे कम रोते और बहुत सोते हैं, परन्तु रोगी बच्चे बहुत रोते और कम सोते हैं । नीचेकी सूचीसे ज्ञान होगा कि बच्चोंको कितना सोना चाहिये ।

१७

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सन्तति-शास्त्र ।

अवस्थाचाँबीस घटे मेंदिन में कितनारात में कितना
पहला दिन२० से २२ घंटे तक
एक मप्ताहतक२० से २१ ,,
एक मासतक१८ से २० ,,८ मे १० घटे तक१० घटे
चार मासतक१६ से १८ ,,६ से ८ घंटे तक१० घटे
छ मासतक१४ से १७ ,,४ से ७ ,,१० ,,
नौ मासतक१४ मे १६ ,,४ से ६ ,,१० ,,
मूक वर्षतक१३ से १४ ,,३ से ६ ,,९ ,,
मया वर्षतक१२ से १४ ,,३ से ५ ,,९ ,,
देड वर्षतक११ से १३ ,,२ से ३ ,,९ ,,
ठो वर्षतक१० से १२ ,,१ से ३ ,,९ ,,
तीन वर्षतक१० से ११ ,,१ से २ ,,९ ,,
चारसे पांच वर्षतक१० घटे१० ,,
छमे आठ वर्षतक६ १/२ ,,६ १/२ ,,
आठमे ढम वर्षतक८ १/२ ,,८ १/२ ,,
ग्यारहसे पन्द्रह वर्षतक८ ,,८ ,,

रोगकी बुशामें बच्चे बहुत कम सोते हैं। परन्तु अपने आरामके वास्ते माताएँ अफीम इत्यादि खिला देती हैं। यह बड़ा अनुचित व्यवहार है। इससे कच्चा सरौखे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। अतएव बच्चोंको कोई भी। मादक पदार्थ कभी न देना चाहिये।

बच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ? २५६

( ६५ ) बच्चोंको किस तरह और कितना

दूध पिलाना चाहिये ?

बच्चोंको दूध पिलाना कोई सरल काम नहीं है। वे माताएँ कि जिनको पहले पहल बच्चा होता है, उनको दूध पिलानेका ढंग ही नहीं होता। इनकी तो बात ही क्या ? वे ख़ियाँ कि जो कई बच्चों की माता हो चुकी हैं, उन्हें भी प्रायः यह ज्ञान नहीं होता। ऐसी माताएँ बड़ी असावधानी करती हैं। जब ये दूध पिलाती हैं तो बच्चे के मुखमें स्तनका अगला भाग ठीकरीतिसे नहीं जाता। प्रायः नाकपर जा लगता है। इससे श्वांस घुटने लगती है और बच्चा स्तन छोड़ देता है। ऐसी दशामें स्तनोंमें दूध होनेसे माताको कष्ट होता है। प्रायः माताएँ अपने वदनको सुडौल रखनेके लिये बच्चोंको थोड़ा दूध पिलाती हैं और यह बहाना करती हैं जि दूध उतरता ही नहीं। ऐसे बच्चोंको गाय और वकरीका दूध पिलाया जाता है। परन्तु ऐसा बहाना बड़ी हानी चहुँचाता है। इसमें सन्देह नहीं कि माताओंको अपने स्तनोंकी रक्षा जरूर करनी चाहिये, परन्तु ऐसी रक्षा किस काम की कि जिसमें हानि हो ? प्रायः ऐसा भी होता है कि सर मार मार कर गाय मैसोंके बच्चोंकी तरहसे बालक दूध पीते हैं। ऐसी दशामें छातीकी नसोंमें बड़ा थक्का पहुँचता है। अतएव ऐसी वान छुड़ा देनी चाहिये। मारने और चिल्लानेसे वान नहीं छूटती। जब ऐसा होता बच्चेको स्तनोंसे अलगकरके थोड़ी देर दूध नहीं पिलाना चाहिये। इस प्रकार वान छूट जायगी। दूध पिलानेमें ढीली छतियोंवाली माताको कुछ दुःख होता है पानीमें फिटकरी घोलकर दिनमें चार पाँच बार धो डालनेसे छाती कड़ी बनी रहती है।

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सन्तति-शास्त्र

प्रायः देखा गया है कि बच्चा दूध पी चुका है। ज्ञातियोंमें दूध लंगा है। मक्खियाँ भिन्न भिन्न करके ज्ञातियोंसे चिपटी जाती हैं। बच्चा आया और फिर पीने लगा। 'इस' कारण बच्चोंमें अनेक रोग हो जाते हैं। अतएव प्रत्येक माताको चाहिये कि दूध पिलानेके पहले और पीछे वह जरूर स्तनोंको धो डाले।

प्रायः माताओंको एक ही ज्ञाती पिलानेकी वान पड़ जाती है। ऐसा न होना चाहिये वरावर दोनों ज्ञातियों पिलाना चाहिये। ऐसा करनेसे एक ज्ञाती बड़ी और एक छोटी हो जाती है एकसे अधिक दूध आता है और दूसरेसे कम। कभी कभी ऐसा भी होता है कि एक ज्ञाती से दूधका आना विलकुल बन्द हो जाता है। ऐसा भी देखा गया है कि जो स्तन बच्चा अधिक पीता है सिंचावके कारण उसमें सूजन आ जाती है और एक भी जाता है अतएव दोनों स्तन वरावर पिलाना चाहिये।

जिस प्रकार अन्न खानेवालोंको बार बारका भोजन हानि पहुँचाता है इसी प्रकार बच्चोंको बार बारका पीया हुआ दूध नुकसान करता है। अतएव बचपनसे ही नियम के अनुसार दूध पीनेकी वान डालनी चाहिये। प्रायः माताएँ बिना भूख भी बच्चोंको दूध पिला देती हैं, जब जरा बच्चा रोया फौरन दूध पिला दिया। यह इस बातपर पूरा विश्वास रखती हैं कि बच्चा उसी समय रोता है जब कि वह भूखा होता है। इस अंधपरम्पराको माननेवाली सौमें अढ़ानेसे स्त्रियाँ हमारे देशमें मौजूद हैं। कैसे दूध पिलाना चाहिये? हमारे देशमें इसका कोई नियम नहीं है। खड़े होकर, लेट कर, करवट लेकर, चित्त लेट कर, चलते फिरते जैसा मौका लगा पिला दिया। इनको तो बच्चेके पेटमें दूध पहुँचानेसे काम है !

बच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ? २६१

एक विद्वानकी राय है कि बच्चेको करबट सुला कर दूध पिलानेसे बच्चेके कानमें दूध आ जाता है। इसी कारण प्रायः बच्चे बहुरे हो जाते हैं। कान बहा करता है। अतएव माताओंको चाहिये कि दूध पिलाती समय पैर पसार कर या कुरसी मोढ़ेपर बैठकर बच्चेका सर हाथमें ले और मुँह ठीक स्तनके सामने लावें और दूसरे हाथसे स्तनका अगला हिस्सा मुँहमें लगा दें। बच्चा आरामसे दूध पी लेगा और उसको किसी प्रकारकी बाधा न होगी। माताओंको यह अन्दाज नहीं आता कि हमने कितना दूध पिलाया। जबतक बच्चा छाती नहीं छोड़ता पिलाए चली जाती हैं। बच्चेको भी इतना ज्ञान नहीं कि मैंने कितना दूध पीया। न माताको अन्दाज न बच्चेको ज्ञान, यही रोगका कारण है। सबल और निर्बल बच्चे होते ही हैं। इनके साथ एकसा ज्यहार नहीं होना चाहिये। जितना दूध सबल बच्चा पी सकता है उतना निर्बल नहीं पी सकता। इसलिये सबल बच्चेको दस मिनिट और निर्बलको आठ मिनिट हर बार दूध पिलाना चाहिये। सबल और निर्बल बच्चोंको दिन रातमें कै बार दूध पिलाना चाहिये यह एक बड़ा गंभीर प्रश्न है। इस विषयमें विद्वानोंके मातानुसार एक सूची नीचे दी जाती है। (यह माताके दूध की सूची है)

— २६१ —

२७२

सन्तति-शाखा ।

श्रवण्यादिन रातमें कितने बार पिलाना चाहिएदिन रातमें सबलको के बार पिलाना चा°दिन रातमें निर्बलको के बार पिलाना चा°
सबलनिर्बलसबलनिर्बल
पहला दिन४ बार३ बार३ बार
दूसरा दिन६ "५ "५ "
३ दिनसे २० दिन तक१० "८ "५ "
तीसरे सप्ताहसे १२ मास तक८ "७ "७ "
३ माससे ५ मास तक७ "६ "६ "
६ माससे १२ मास तक६ "५ "५ "
१३ माससे १८ मास तक५ "५ "४ "

वच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ? २६३

डेढ़ वर्षके पीछे वच्चोंको माताका दूध पिलाना ही नहीं चाहिये । प्रायः वे वच्चे कि जिनको जन्मसे ही माताका दूध नहीं मिलता उनका पोषण गाय अथवा बकरीके दूध से होता है । इसमें भी स्त्रियाँ अनेक असावधानी करती हैं । इनका यह खयाल होता है कि जितना अधिक बच्चा दूध पीयेगा उतनाही पुष्ट होगा । यह एक भ्रम है । पैसा करनेसे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । गाय अथवा बकरीका दूध कितना और कै बार पिलाना चाहिये, विद्वानोंके मतानुसार इसकी भी एक सूची नीचे दी जाती है । यहाँ सूर्य निकलने से अस्त होने तक दिन और शामसे आगे रातका समय जानना चाहिये ।

अवस्थासबल वच्चोंको २४ घंटोंमें कै बार और कितना दूध पिलाना चाहिये
दिनमें कै बाररातमें कै बार
पहला दिन
दूसरा दिन
३ दिनसे १० दिनतक
११ दिनसे २० दिनतक
२१ दिनसे ३० दिनतक
१ माससे ११ मासतक
११ माससे २ मासतक
तीसरे महीनेसे पाँचवेंतक
छठे और सातवें मासमें
आठवें और नवें मासमें
दसवें और ग्यारहवें मासमें
बारहवें महीनेमें
तेरहवेंसे १८ मासतक

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सन्तति-शास्त्र ।

श्रवस्था | निर्वल बच्चेको २४ घंटैमै कै वार और कितना दूध पिलाना चाहिये ---|--- दिनमै कै वार | रातमै कै वार | कितना दूध दिन रातमै पहला दिन | २ | वार | १ | वार | ३ | छटांक दूसरा दिन | २ | " | १ | " | ३ | " ३ दिनसे १० दिनतक | ३ | " | २ | " | ५ | " ११ दिनसे २० दिनतक | ५ | " | २ | " | ७ | " २१ दिनसे ३० दिनतक | ५ | " | ३ | " | ८ | " १ माससे ११ मासतक | ६ | " | ३ | " | १० | " ११ माससे २ मासतक | ६ | " | ३ | " | १२ | " तीससे महीनेसे पांचवैँतक | ७ | " | ३ | " | ११ | सेर छठे और सातवैँ मासमै | ७ | " | ३ | " | ११ | " आठवैँ और सातवैँ मासमै | ७ | " | ३ | " | ११ | " दसवैँ और ग्यारहवैँ मासमै | ७ | " | ३ | " | २१ | " बारहवैँ महीनेमै | ७ | " | ३ | " | २१ | " बारहवैँसे १८ मासतक | ७ | " | ३ | " | २१ | "

सबल और निर्वलसे यह मतलब नहीं है कि अत्यन्त सबल और अत्यन्त निर्वल, इससे यह अर्थ लेना चाहिये कि अच्छे शरीरवाला और निर्वल वह कि जो अच्छेसे कुछ निर्वल हो। जो बच्चे अत्यन्त दुर्बल हों उनकी योग्यता के अनुसार व्यवहार करना चाहिये। छ मासके बाद बच्चोंको कुछ थोड़ा थोड़ा अन्न देना चाहिये। इस प्रकार बच्चेका पोषण करना भविष्यके लिये अच्छा है।

बच्चोंकी ज्ञानेन्द्रिय ।

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(६६) बच्चोंकी ज्ञानेन्द्रिय ।

जिस प्रकार हमारी ज्ञानेन्द्रिय प्रबल होती है, इस प्रकार तुरन्तके पैदा हुए बच्चेकी नहीं होती । पैदा होनेसे चौबीस घंटेतक बच्चोंको कुछ नहीं सुनाई देता । इसके बाद थोडाथोड़ा सुनने लगते हैं । कारण यह कि बच्चेका मस्तक अत्यन्त कोमल होता है, इसलिये वह धीरे २ अपना काम करता है । इसीसे भारी शब्द होनेपर बच्चेचौंक उठते हैं । चार महीनेके बालकमें मामूली आवाज सुननेकी ताकत आ जाती है । इसी तरह बोलनेके भी अनेक भेद हैं । कोई देरमें और कोई जल्द बोलने लगता है । लड़कोंसे लड़कियाँ जल्द बोलती हैं । प्रायः दो वर्षकी अवस्थातक अच्छी तरह पता नहीं लग सकता कि बच्चा कैसा बोलेगा ? यदि दो वर्षके बाद बच्चा बोलनेमें उन्नति नकरे तो समझना चाहिये कि इसके मस्तकमें कुछ दोष है । होशियार बच्चोंका मस्तक कुछ बड़ा होता है । पैदा होनेपर सर १३ और १४ इञ्च गोल होना चाहिये, यदि छोटा हो तो बच्चेको बुद्धि-हीन समझना चाहिये; क्योंकि बुद्धि मस्तकपर ही निर्भर है । इसलिये मस्तकका वह भाग जहाँ बुद्धिका स्थान है ऐसेबच्चोंमें बहुत छोटा होता है । इसी प्रकार रस उत्पन्न होते ही बच्चेको रसका ज्ञान होता है और स्वादको पहचानने लगता है । सृष्टिनेका ज्ञान भी उसी समय होता है जबकि प्राणेन्द्रिय कुछ प्रबल पड़ती है । यह प्रायः डेढ़ सालके बाद होता है । इसी प्रकार और इन्द्रियाँ अपने समयपर विकास पाती हैं ।

(६७) स्त्री और पशुओंके दूधका अन्तर ।

जबतक बच्चा अन्न न खाने लगे उस समयतक उसका जीवन दूधपर ही निर्भर रहता है । इसलिये ईश्वरने स्त्री, गाय,

66. वच्चोंकी शानेन्डिय

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सन्तति-शास्त्र ।

मैंस और वकरीके दूधको आहारके सारे अंशोंसे युक्त बनाया है, इस कारण माताका दूध न मिलनेपर नाय मैंस और वकरीका दूध बनाकर पिलानेमें बच्चोंको कुछ हानि नहीं होती ।

दूधके पृथक् पृथक् अंशोंकी सूची ।

अंश१००भाग दूध१००भाग दूध१००भाग दूध१००भाग दूध
स्त्रीका दूधनायका दूधमैंसका दूधवकरीका दूध
श्रीका अंशभाग ७भाग ४
मर्दान या निष्ठास्तेका अंश
मांसका अंश१३३३३३
नामकका अंश
पानीका अंश८७८७८४८७
भागभागभागभाग
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दूध कैसे बिगड़ता है ?

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यह मामूली तौरसे रहनेवाली खियों और गाय भैंसों की सूची है। उत्तम और मध्यम आहार होनेपर अंशोंके प्रमाणमें कम व বেশ समझना चाहिये।

  1. (१) घीका अंश। इससे चरबी बनती है—गरमी उत्पन्न होती है। वदन मोटा होता है वजन और दिमागकी ताकत बढ़ती है। हड्डियाँ पुष्ट होती हैं। शरीर मुलायम और चिकना होता है।
  2. (२) मेदा ( निशास्ते ) का अंश। इससे गरमी उत्पन्न होती है। शरीर मोटा होता है। बल उत्पन्न होता है। मांस और चरबीके काममें सहायता पहुँचती है।
  3. (३) मांसका अंश। इससे मांस बनता है—बदन मोटा पड़ता है और तौल बढ़ती है।
  4. (४) नमकका अंश। इससे खून और हड्डियाँ बनती हैं। जो अंश नमकका खूनमें मिलनेसे रह जाता है वह पेशाबमें मिलकर निकल जाता है। इसी कारण पेशाब खारी होता है।
  5. (५) पानीका अंश। इसका काम यह है कि यह सबको पचाकर अपना अपना काम करनेमें सहायता दे और हर एकको उसके स्थानमें पहुँचावे। बहुतेरे यह मानते हैं कि माता और गायोंका दूध दूषित होता ही नहीं, यह एक खासी भूल है। अनेक कारणोंसे दूध दूषित होकर हाँनि पहुँचती है। अतएव भोजन इत्यादिमें माताओंको अत्यन्त सावधानी रखनी चाहिये, क्योंकि दूध दूषित होनेका मूल कारण आहार-विहारकी असावधानी ही है।

(६८) दूध कैसे बिगड़ता है ?

दूध वह पदार्थ है कि जिसपर बच्चेका जीवन निर्भर है यह