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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

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सन्तति-शास्त्र ।

कमसे कम इतना वजन बच्चोंमें होना आवश्यक है । यदि इससे कम हो तो वे निरोग नहीं कहे जा सकते ।

इन दिनोंमें माताओंको अनेक पुरुष पदार्थ खाने चाहियें; क्योंकि जो माताएँ खाने पीनेपर ध्यान नहीं रखतीं उनके बच्चे डुबले पतले और कम वजनके बने रहते हैं । बच्चा जब तक दूधके ही आसरे रहता है उस समयतक माताके आहारपर ही उसका जीवन होता है । इसलिये माता जैसा भोजन करेगी उसीके अनुसार बच्चेका वजन बढ़ेगा । जब बचपनमें वजनकी कमी रह जाती है तो वह पूरी नहीं होती । यदि होती भी है तो वर्षों लगते हैं । इसलिये बच्चोंको प्रारम्भसे ही चलवाना चनाना हमारा कर्तव्य है ।

(६२) धाय कैसी होनी चाहिये ?

बच्चोंकी जीवन-यात्राके लिये यह एक बड़ा प्रश्न है कि धाय कैसी हो ? प्रायः माताएँ स्तनोंमें दूध न होने या बच्चा पैदा होकर बारम्बार मर जाने या अपने स्तनोंको सुन्दर सुडौल बनाए रखनेके कारण दूध नहीं पिलातीं । ऐसी दशामें बच्चे गाय, भैंस और बकरियों या धायोंके दूधपर पाले जाते हैं । धाय कैसी होनी चाहिये ? यह एक बड़े महत्वका प्रश्न है ।

वैद्यकशास्त्रके एक विद्वान्ने कहा है कि धायको माताके समान होना चाहिये । ( १० क० )

इसका तात्पर्य यह है कि जो कार्य माताका बालकके प्रति है वही धायका भी है । अतएव धायका सर्व-गुण-संपन्न होना आवश्यक है । विद्वानोंने इस विषयका अनेक प्रकारसे प्रतिपादन किया है ।

62. धाय कैसी होनी चाहिये ?

धाय कैसी होनी चाहिये ?

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वैयक्तिक मत ।

१. धाय अपने जातिकी जवान हो, उदंड रोगी न हो, सब अंगोंसे युक्त हो, कुरूप न हो, किसी प्रकारका न्यसन न रखती हुई खोटी न हो, अपने देशकी हो, तुच्छ स्वभाववाली न हो, नीच कामोंके करनेवाली नीच जातिकी न हो, जिसके सन्तान हो और निरोग रहती हो, गोदमें पुत्र हो, बहुत दूधवाली बिना समयके न सोनेवाली, जो जातिके बाहर न हो, अच्छे कामोंकी करनेवाली, पवित्र हो अपवित्रतासे घृणा करनेवाली, जिसके स्तन अच्छे और उत्तम हो, स्तन न बहुत ऊँचे न बहुत लम्बे, न बहुत छोटे हों न पीपलके पत्तेके समान, स्तनोंका अगला हिस्सा पतला हो और बिना परिश्रमके पीनेमें दूध आ जावे । ऐसे स्तनोंकी गुणयुक्त धाय होनी चाहिये । (च० श० अ० ८ श्ल० १०५ व १०६)

२. धाय अपने वर्णके अनुसार जैसे ब्राह्मणको ब्राह्मणी क्षत्रियको क्षत्रिया, वैश्यको वैश्या और शुद्रको शुद्धी होनी चाहिये । वर्ण शब्दसे यह बात भी कही जा सकती है कि धाय माताके रंगके अनुसार हो, ओसत दर्जेके डील-डौल की, न बहुत लम्बी न तिनगी, मध्यम अवस्थावाली अर्थात् सोलह वर्षसे ३५ वर्षतककी निरोग, शीलस्वभाववाली चपल और लोलुप अर्थात् जिसका चित्त रुक न सके, अत्यन्त डुबली या अत्यन्त मोटी न हो, जिसका शुद्ध दूध हो, जिसके हाँठ, लम्बे न हों, स्तन ऊँचे और लम्बे न हों, जिसका शरीर कम बेसी न हो, जैसे ऊ अंगुली होना या एक ही आँख इत्यादि, जिसमें कोई दुर्ब्यसन (दिव) न हो, बालकपर प्रेम रखनेवाली,

२५४

सन्तति-शास्त्र ।

जिसके बालक जीते रहते हों, दग्धवाली, नीच कर्म न करनेवाली, अच्छे कुलकी, बहुतेर गुणोंसे युक्त श्यामा अथवा सुन्दर रूपवती होनी चाहिये। ऐसी धाय बालकको निरोग रखती हुई बलको बढ़ाती है।

(सु० श० अ० ५० श्ल० ३८ व ३९)

३ जवान, सुन्दर, सुगौल, मधुरभाषिणी, निरोग जिसमें सुहृदयताका प्राकृतिक गुण हो, चतुर, श्रद्धाप्रिय, सुडौल गरीरवाली और उत्तम विचारकी पढी लिखी धाय होनी चाहिये। (श० क०)

ऐसे गुणोंसे युक्त धाय के होनेका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार मानाके दग्धका अस्तर बालकोंपर होता है इसी प्रकार धायके दूधका भी होता है। क्रोध करने, बुरे कामोंमें फँसिरहने और निन्दनीय बातोंके विचार करनेसे दूध भ्रष्ट हो जाता है। अन्नपत्र मूत्र परीक्षा करके धाय रखनी चाहिये।

( ६३ ) वच्चा उत्पन्न होनेके कितने दिन बाद संयोग करना चाहिये ?

यह बड़े महत्वका पक्ष है। लोग इसपर बहुत कम ध्यान देते हैं। जिनको स्त्री और वस्त्रके जीवनका विचार है वे तो कुछ ध्यान भी देते हैं। परन्तु जो विषय-वासनाके प्रेमी हैं, उन्हें कुछ विचार नहीं। इसमें कई मत हैं।

१. वैधकका मत।

१ वच्चा होनेके ऐसे समयतक जब तक कि वह दूध पीता रहे, संयोग न करना चाहिये। (श० क०)

63. वच्चा उत्पन्न होनेके कितने दिन बाद संयोग करना चाहिये ?

बच्चोंका मल मूत्र और नींद ?

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२ जब तक बच्चा अच्छी तरह अन्न न खाने लगे संयोग न करना चाहिये। ( रविशास्त्र )

२. धर्मशास्त्रका मत ।

१. दांत निकलनेके बाद संयोग करना चाहिये। ( शक्तिगृति १६२ )

२. बच्चेके दूध पीनेके समयतक संयोगा न होना चाहिये। ( प्रा० ४० )

इस विषयमें प्रायः सबका मत एक ही सा है। बच्चा प्रायः दो साल दूध पीता है। इसके बाद अन्न खाने लगता है। यदि बच्चेके दूध पीनेके समय संयोग किया जाय तो दूध विगड़ जानेका भय रहता है। एक विद्वान की राय है कि बच्चा पैदा होनेके एक सालतक भीतरी अवयव पुष्ट होते हैं ( श० ६० )

इसलिये दो वर्ष बच्चेको दूध पिलाकर जब वह अन्न खाने लागे इसके बाद संयोग होना चाहिये, नहीं तो बच्चे और माता दोनोंको बहुत बड़ी हानि होनी है।

( ६४ ) बच्चोंका मल मूत्र और नींद ।

बच्चोंकी स्वास्थ्य-परीक्षा करनेके लिये तीन बातें देखनी आवश्यक हैं। मल, मूत्र और नींद। जब ये बातें ठीक हों, तो बच्चोंको निरोग समझना चाहिये। इन बातोंपर पैदा होते समयसे ही ध्यान रखना आवश्यक है। सबसे पहले बच्चे के पेशाबको देखना जरूरी है। प्रायः दूध पीनेके बाद पेशाब होता है। जब पेशाबके मुकासपर मैल लगा हो, तो बड़ा कष्ट होता है। उस समय उसको पेशाबका वेग सहना पड़ता है। इस-

64. वच्चोंका मल-भूत्र और नींद

२५६

सन्ताति-शास्त्र ।

लिये यदि मूत्र न हो तो सबसे पहले मैल देरपना चाहिये । यदि मैल न लगा हो और पेशाब न हो, तो पेशाबके स्थानको गरम पानीसे धोना चाहिये, इसलिये, कि थोड़ी गरमी पहुँचे । यदि चौबीस घंटेतक पेशाब न हो, तो रोग समझना चाहिये । पेशाब होते ही यह देखना चाहिये कि वह कैसा होता है । पहला पेशाब कुछ रंगतदार होगा, दूध पीनेपर कुछ सफेदी आ जावेगी । इसके साथ ही साथ इसपर भी ध्यान देना जरूरी है कि पेशाब करते समयमें अच्छा काँयता तो नहीं और कष्टके साथ तो पेशाब नहीं होता । यदि ऐसा है तो अवश्य रोग है और वह रोग अच्छेको उसके माता-पितासे मिला है ।

पेशाबकी भाँति पाखानेको भी देखना आवश्यक है । पैदा होनेके दिन ही अच्छेको पाखाना होना चाहिये । पहले और दूसरे दिन पाखना काले रंगका होता है । दूध पीने पर रंगत बदल जाती है । यदि पाखना न हो तो धीरे धीरे पेट मसलना उत्तम है । यदि पाखानेमें फुटकी सी हों, तो अवश्य दूधका विकार है कि जो ठीक ठीक नहीं पचता । प्रायः चबोको पैदा होते ही कच्चा भी होता है और यह रोग माता-पितासे मिलता है ऐसी दशामें गायका दूध देना हितकारी है । चबोको समयपर पाखाना जानेकी वान डालनी चाहिये । माताओंको यह विचार रहता है कि जितनी बार चबो पाखाना जायगा उतना ही पेट साफ रहेगा । इस कारण वह बारबार पाखाना बैठाया करती हैं, यह ठीक नहीं । दिन रातमें तीन बार प्रातःकाल, दोपहर और शामको पाखाना जानेकी वान डालनी चाहिये । यदि इन समयोंपर अच्छा पाखाने न भी जाय तो चैदा देना चाहिये । ऐसा करनेसे वान पड़ जायगी । जब अच्छा

65. वच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ?

बच्चोंका मल, मूत्र और नींद ।

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साल भरका हो जाय तो दोपहरको पाखाना जानेकी वान बुड़ा देनी चाहिये । बहुत सी अज्ञान माताएँ दूध पिला कर पाखाना कराती हैं, पर यह अनुचित है । इससे कुछ खा कर पाखाना जानेकी वान पड़ जाती है कि जिससे मेदा खराब हो जाता है । इसलिये पाखाना होनेके पीछे दूध देना चाहिये ।

पैदा होनेके बाद बच्चोंको एक, खास तरहकी नींद आती है । पहलेके चार दिनोंमें वह खूब सोता है । इसमें दो भेद हैं । जो बच्चा बहुत कष्टके साथ उत्पन्न होता है वह अचेत होकर सोता है । और वे बच्चे कि जो साधारण रीतिसे उत्पन्न होते हैं अचेत होकर नहीं सोते । इसका कारण यह है कि जो बच्चा कष्टके साथ पैदा होता है उसको बड़ी थकावट आजाती है । जब कि बच्चा अचेत होकर सोता है, माताएँ तरह तरहके विचार उत्पन्न करती हैं । सबसे पहले इनको भूत प्रेतका खयाल आता है ।

जो बच्चा दस मासतक कोठरीमें बन्द रह कर पैदा हुआ है, वह तुरन्त ही कैसे खेल सकता है । पैदा होते समयमें जिसके शरीरको अनेक प्रकारकी असावधानियोंसे कष्ट सहना पड़ा है, वह तुरन्त ही माताके गोदका खिलौना कैसे बन सकता है ? उसका तो भूख प्यासके समय ही जागना बहुत है । जो बच्चे स्वास्थ्य हैं वे कम रोते और बहुत सोते हैं, परन्तु रोगी बच्चे बहुत रोते और कम सोते हैं । नीचेकी सूचीसे ज्ञान होगा कि बच्चोंको कितना सोना चाहिये ।

१७

२५८

सन्तति-शास्त्र ।

अवस्थाचाँबीस घटे मेंदिन में कितनारात में कितना
पहला दिन२० से २२ घंटे तक
एक मप्ताहतक२० से २१ ,,
एक मासतक१८ से २० ,,८ मे १० घटे तक१० घटे
चार मासतक१६ से १८ ,,६ से ८ घंटे तक१० घटे
छ मासतक१४ से १७ ,,४ से ७ ,,१० ,,
नौ मासतक१४ मे १६ ,,४ से ६ ,,१० ,,
मूक वर्षतक१३ से १४ ,,३ से ६ ,,९ ,,
मया वर्षतक१२ से १४ ,,३ से ५ ,,९ ,,
देड वर्षतक११ से १३ ,,२ से ३ ,,९ ,,
ठो वर्षतक१० से १२ ,,१ से ३ ,,९ ,,
तीन वर्षतक१० से ११ ,,१ से २ ,,९ ,,
चारसे पांच वर्षतक१० घटे१० ,,
छमे आठ वर्षतक६ १/२ ,,६ १/२ ,,
आठमे ढम वर्षतक८ १/२ ,,८ १/२ ,,
ग्यारहसे पन्द्रह वर्षतक८ ,,८ ,,

रोगकी बुशामें बच्चे बहुत कम सोते हैं। परन्तु अपने आरामके वास्ते माताएँ अफीम इत्यादि खिला देती हैं। यह बड़ा अनुचित व्यवहार है। इससे कच्चा सरौखे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। अतएव बच्चोंको कोई भी। मादक पदार्थ कभी न देना चाहिये।

बच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ? २५६

( ६५ ) बच्चोंको किस तरह और कितना

दूध पिलाना चाहिये ?

बच्चोंको दूध पिलाना कोई सरल काम नहीं है। वे माताएँ कि जिनको पहले पहल बच्चा होता है, उनको दूध पिलानेका ढंग ही नहीं होता। इनकी तो बात ही क्या ? वे ख़ियाँ कि जो कई बच्चों की माता हो चुकी हैं, उन्हें भी प्रायः यह ज्ञान नहीं होता। ऐसी माताएँ बड़ी असावधानी करती हैं। जब ये दूध पिलाती हैं तो बच्चे के मुखमें स्तनका अगला भाग ठीकरीतिसे नहीं जाता। प्रायः नाकपर जा लगता है। इससे श्वांस घुटने लगती है और बच्चा स्तन छोड़ देता है। ऐसी दशामें स्तनोंमें दूध होनेसे माताको कष्ट होता है। प्रायः माताएँ अपने वदनको सुडौल रखनेके लिये बच्चोंको थोड़ा दूध पिलाती हैं और यह बहाना करती हैं जि दूध उतरता ही नहीं। ऐसे बच्चोंको गाय और वकरीका दूध पिलाया जाता है। परन्तु ऐसा बहाना बड़ी हानी चहुँचाता है। इसमें सन्देह नहीं कि माताओंको अपने स्तनोंकी रक्षा जरूर करनी चाहिये, परन्तु ऐसी रक्षा किस काम की कि जिसमें हानि हो ? प्रायः ऐसा भी होता है कि सर मार मार कर गाय मैसोंके बच्चोंकी तरहसे बालक दूध पीते हैं। ऐसी दशामें छातीकी नसोंमें बड़ा थक्का पहुँचता है। अतएव ऐसी वान छुड़ा देनी चाहिये। मारने और चिल्लानेसे वान नहीं छूटती। जब ऐसा होता बच्चेको स्तनोंसे अलगकरके थोड़ी देर दूध नहीं पिलाना चाहिये। इस प्रकार वान छूट जायगी। दूध पिलानेमें ढीली छतियोंवाली माताको कुछ दुःख होता है पानीमें फिटकरी घोलकर दिनमें चार पाँच बार धो डालनेसे छाती कड़ी बनी रहती है।

२६०

सन्तति-शास्त्र

प्रायः देखा गया है कि बच्चा दूध पी चुका है। ज्ञातियोंमें दूध लंगा है। मक्खियाँ भिन्न भिन्न करके ज्ञातियोंसे चिपटी जाती हैं। बच्चा आया और फिर पीने लगा। 'इस' कारण बच्चोंमें अनेक रोग हो जाते हैं। अतएव प्रत्येक माताको चाहिये कि दूध पिलानेके पहले और पीछे वह जरूर स्तनोंको धो डाले।

प्रायः माताओंको एक ही ज्ञाती पिलानेकी वान पड़ जाती है। ऐसा न होना चाहिये वरावर दोनों ज्ञातियों पिलाना चाहिये। ऐसा करनेसे एक ज्ञाती बड़ी और एक छोटी हो जाती है एकसे अधिक दूध आता है और दूसरेसे कम। कभी कभी ऐसा भी होता है कि एक ज्ञाती से दूधका आना विलकुल बन्द हो जाता है। ऐसा भी देखा गया है कि जो स्तन बच्चा अधिक पीता है सिंचावके कारण उसमें सूजन आ जाती है और एक भी जाता है अतएव दोनों स्तन वरावर पिलाना चाहिये।

जिस प्रकार अन्न खानेवालोंको बार बारका भोजन हानि पहुँचाता है इसी प्रकार बच्चोंको बार बारका पीया हुआ दूध नुकसान करता है। अतएव बचपनसे ही नियम के अनुसार दूध पीनेकी वान डालनी चाहिये। प्रायः माताएँ बिना भूख भी बच्चोंको दूध पिला देती हैं, जब जरा बच्चा रोया फौरन दूध पिला दिया। यह इस बातपर पूरा विश्वास रखती हैं कि बच्चा उसी समय रोता है जब कि वह भूखा होता है। इस अंधपरम्पराको माननेवाली सौमें अढ़ानेसे स्त्रियाँ हमारे देशमें मौजूद हैं। कैसे दूध पिलाना चाहिये? हमारे देशमें इसका कोई नियम नहीं है। खड़े होकर, लेट कर, करवट लेकर, चित्त लेट कर, चलते फिरते जैसा मौका लगा पिला दिया। इनको तो बच्चेके पेटमें दूध पहुँचानेसे काम है !

बच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ? २६१

एक विद्वानकी राय है कि बच्चेको करबट सुला कर दूध पिलानेसे बच्चेके कानमें दूध आ जाता है। इसी कारण प्रायः बच्चे बहुरे हो जाते हैं। कान बहा करता है। अतएव माताओंको चाहिये कि दूध पिलाती समय पैर पसार कर या कुरसी मोढ़ेपर बैठकर बच्चेका सर हाथमें ले और मुँह ठीक स्तनके सामने लावें और दूसरे हाथसे स्तनका अगला हिस्सा मुँहमें लगा दें। बच्चा आरामसे दूध पी लेगा और उसको किसी प्रकारकी बाधा न होगी। माताओंको यह अन्दाज नहीं आता कि हमने कितना दूध पिलाया। जबतक बच्चा छाती नहीं छोड़ता पिलाए चली जाती हैं। बच्चेको भी इतना ज्ञान नहीं कि मैंने कितना दूध पीया। न माताको अन्दाज न बच्चेको ज्ञान, यही रोगका कारण है। सबल और निर्बल बच्चे होते ही हैं। इनके साथ एकसा ज्यहार नहीं होना चाहिये। जितना दूध सबल बच्चा पी सकता है उतना निर्बल नहीं पी सकता। इसलिये सबल बच्चेको दस मिनिट और निर्बलको आठ मिनिट हर बार दूध पिलाना चाहिये। सबल और निर्बल बच्चोंको दिन रातमें कै बार दूध पिलाना चाहिये यह एक बड़ा गंभीर प्रश्न है। इस विषयमें विद्वानोंके मातानुसार एक सूची नीचे दी जाती है। (यह माताके दूध की सूची है)

— २६१ —

२७२

सन्तति-शाखा ।

श्रवण्यादिन रातमें कितने बार पिलाना चाहिएदिन रातमें सबलको के बार पिलाना चा°दिन रातमें निर्बलको के बार पिलाना चा°
सबलनिर्बलसबलनिर्बल
पहला दिन४ बार३ बार३ बार
दूसरा दिन६ "५ "५ "
३ दिनसे २० दिन तक१० "८ "५ "
तीसरे सप्ताहसे १२ मास तक८ "७ "७ "
३ माससे ५ मास तक७ "६ "६ "
६ माससे १२ मास तक६ "५ "५ "
१३ माससे १८ मास तक५ "५ "४ "

वच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ? २६३

डेढ़ वर्षके पीछे वच्चोंको माताका दूध पिलाना ही नहीं चाहिये । प्रायः वे वच्चे कि जिनको जन्मसे ही माताका दूध नहीं मिलता उनका पोषण गाय अथवा बकरीके दूध से होता है । इसमें भी स्त्रियाँ अनेक असावधानी करती हैं । इनका यह खयाल होता है कि जितना अधिक बच्चा दूध पीयेगा उतनाही पुष्ट होगा । यह एक भ्रम है । पैसा करनेसे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । गाय अथवा बकरीका दूध कितना और कै बार पिलाना चाहिये, विद्वानोंके मतानुसार इसकी भी एक सूची नीचे दी जाती है । यहाँ सूर्य निकलने से अस्त होने तक दिन और शामसे आगे रातका समय जानना चाहिये ।

अवस्थासबल वच्चोंको २४ घंटोंमें कै बार और कितना दूध पिलाना चाहिये
दिनमें कै बाररातमें कै बार
पहला दिन
दूसरा दिन
३ दिनसे १० दिनतक
११ दिनसे २० दिनतक
२१ दिनसे ३० दिनतक
१ माससे ११ मासतक
११ माससे २ मासतक
तीसरे महीनेसे पाँचवेंतक
छठे और सातवें मासमें
आठवें और नवें मासमें
दसवें और ग्यारहवें मासमें
बारहवें महीनेमें
तेरहवेंसे १८ मासतक

२६४

सन्तति-शास्त्र ।

श्रवस्था | निर्वल बच्चेको २४ घंटैमै कै वार और कितना दूध पिलाना चाहिये ---|--- दिनमै कै वार | रातमै कै वार | कितना दूध दिन रातमै पहला दिन | २ | वार | १ | वार | ३ | छटांक दूसरा दिन | २ | " | १ | " | ३ | " ३ दिनसे १० दिनतक | ३ | " | २ | " | ५ | " ११ दिनसे २० दिनतक | ५ | " | २ | " | ७ | " २१ दिनसे ३० दिनतक | ५ | " | ३ | " | ८ | " १ माससे ११ मासतक | ६ | " | ३ | " | १० | " ११ माससे २ मासतक | ६ | " | ३ | " | १२ | " तीससे महीनेसे पांचवैँतक | ७ | " | ३ | " | ११ | सेर छठे और सातवैँ मासमै | ७ | " | ३ | " | ११ | " आठवैँ और सातवैँ मासमै | ७ | " | ३ | " | ११ | " दसवैँ और ग्यारहवैँ मासमै | ७ | " | ३ | " | २१ | " बारहवैँ महीनेमै | ७ | " | ३ | " | २१ | " बारहवैँसे १८ मासतक | ७ | " | ३ | " | २१ | "

सबल और निर्वलसे यह मतलब नहीं है कि अत्यन्त सबल और अत्यन्त निर्वल, इससे यह अर्थ लेना चाहिये कि अच्छे शरीरवाला और निर्वल वह कि जो अच्छेसे कुछ निर्वल हो। जो बच्चे अत्यन्त दुर्बल हों उनकी योग्यता के अनुसार व्यवहार करना चाहिये। छ मासके बाद बच्चोंको कुछ थोड़ा थोड़ा अन्न देना चाहिये। इस प्रकार बच्चेका पोषण करना भविष्यके लिये अच्छा है।

बच्चोंकी ज्ञानेन्द्रिय ।

२६५

(६६) बच्चोंकी ज्ञानेन्द्रिय ।

जिस प्रकार हमारी ज्ञानेन्द्रिय प्रबल होती है, इस प्रकार तुरन्तके पैदा हुए बच्चेकी नहीं होती । पैदा होनेसे चौबीस घंटेतक बच्चोंको कुछ नहीं सुनाई देता । इसके बाद थोडाथोड़ा सुनने लगते हैं । कारण यह कि बच्चेका मस्तक अत्यन्त कोमल होता है, इसलिये वह धीरे २ अपना काम करता है । इसीसे भारी शब्द होनेपर बच्चेचौंक उठते हैं । चार महीनेके बालकमें मामूली आवाज सुननेकी ताकत आ जाती है । इसी तरह बोलनेके भी अनेक भेद हैं । कोई देरमें और कोई जल्द बोलने लगता है । लड़कोंसे लड़कियाँ जल्द बोलती हैं । प्रायः दो वर्षकी अवस्थातक अच्छी तरह पता नहीं लग सकता कि बच्चा कैसा बोलेगा ? यदि दो वर्षके बाद बच्चा बोलनेमें उन्नति नकरे तो समझना चाहिये कि इसके मस्तकमें कुछ दोष है । होशियार बच्चोंका मस्तक कुछ बड़ा होता है । पैदा होनेपर सर १३ और १४ इञ्च गोल होना चाहिये, यदि छोटा हो तो बच्चेको बुद्धि-हीन समझना चाहिये; क्योंकि बुद्धि मस्तकपर ही निर्भर है । इसलिये मस्तकका वह भाग जहाँ बुद्धिका स्थान है ऐसेबच्चोंमें बहुत छोटा होता है । इसी प्रकार रस उत्पन्न होते ही बच्चेको रसका ज्ञान होता है और स्वादको पहचानने लगता है । सृष्टिनेका ज्ञान भी उसी समय होता है जबकि प्राणेन्द्रिय कुछ प्रबल पड़ती है । यह प्रायः डेढ़ सालके बाद होता है । इसी प्रकार और इन्द्रियाँ अपने समयपर विकास पाती हैं ।

(६७) स्त्री और पशुओंके दूधका अन्तर ।

जबतक बच्चा अन्न न खाने लगे उस समयतक उसका जीवन दूधपर ही निर्भर रहता है । इसलिये ईश्वरने स्त्री, गाय,

66. वच्चोंकी शानेन्डिय

२६६

सन्तति-शास्त्र ।

मैंस और वकरीके दूधको आहारके सारे अंशोंसे युक्त बनाया है, इस कारण माताका दूध न मिलनेपर नाय मैंस और वकरीका दूध बनाकर पिलानेमें बच्चोंको कुछ हानि नहीं होती ।

दूधके पृथक् पृथक् अंशोंकी सूची ।

अंश१००भाग दूध१००भाग दूध१००भाग दूध१००भाग दूध
स्त्रीका दूधनायका दूधमैंसका दूधवकरीका दूध
श्रीका अंशभाग ७भाग ४
मर्दान या निष्ठास्तेका अंश
मांसका अंश१३३३३३
नामकका अंश
पानीका अंश८७८७८४८७
भागभागभागभाग
""""
""""
""""
""""

दूध कैसे बिगड़ता है ?

२६७

यह मामूली तौरसे रहनेवाली खियों और गाय भैंसों की सूची है। उत्तम और मध्यम आहार होनेपर अंशोंके प्रमाणमें कम व বেশ समझना चाहिये।

  1. (१) घीका अंश। इससे चरबी बनती है—गरमी उत्पन्न होती है। वदन मोटा होता है वजन और दिमागकी ताकत बढ़ती है। हड्डियाँ पुष्ट होती हैं। शरीर मुलायम और चिकना होता है।
  2. (२) मेदा ( निशास्ते ) का अंश। इससे गरमी उत्पन्न होती है। शरीर मोटा होता है। बल उत्पन्न होता है। मांस और चरबीके काममें सहायता पहुँचती है।
  3. (३) मांसका अंश। इससे मांस बनता है—बदन मोटा पड़ता है और तौल बढ़ती है।
  4. (४) नमकका अंश। इससे खून और हड्डियाँ बनती हैं। जो अंश नमकका खूनमें मिलनेसे रह जाता है वह पेशाबमें मिलकर निकल जाता है। इसी कारण पेशाब खारी होता है।
  5. (५) पानीका अंश। इसका काम यह है कि यह सबको पचाकर अपना अपना काम करनेमें सहायता दे और हर एकको उसके स्थानमें पहुँचावे। बहुतेरे यह मानते हैं कि माता और गायोंका दूध दूषित होता ही नहीं, यह एक खासी भूल है। अनेक कारणोंसे दूध दूषित होकर हाँनि पहुँचती है। अतएव भोजन इत्यादिमें माताओंको अत्यन्त सावधानी रखनी चाहिये, क्योंकि दूध दूषित होनेका मूल कारण आहार-विहारकी असावधानी ही है।

(६८) दूध कैसे बिगड़ता है ?

दूध वह पदार्थ है कि जिसपर बच्चेका जीवन निर्भर है यह

68. दूध कैसे विगडता है ?

२८८

सन्तति-शास्त्र ।

अनेक प्रकारकी असावधानियोंने दूषित हो जाना है और माताओंको जरा भी पता नहीं चलता। बच्चोंके रोगी होनेपर चिकित्सकोंकी जरा भी दृष्टि दूषपर नहीं जाती। अनेक विद्वानोंकी राय है कि दूषके विगड़नेसे ही बच्चोंमें अधिकांग रोग उत्पन्न होते हैं, जिसके अनेक कारण हैं।

१. वैयक्तिका मत।

  1. १. माता श्रववा धावके भारी आहार और दूषित व्यवहार से शरीरमें दोष उत्पन्न होकर दूष विगाड़ देते हैं। ( श० क० )
  2. २. अनिर्भयुत, शोक, चिन्ता, भय और क्रोधसे । ( श० क० )
  3. ३. माताके अनेक प्रकारके रोगोंसे । ( श० क० )
  4. ४. दूधमें, घी, खाड़, मांस और नमकका अंश कम हो जानेसे। ऐसा उस समयमें होता है जब कि स्त्री की दूध इत्यादि पौष्टिक पदार्थ न खावे। ( रतिशास्त्र )
  5. ५. पैंतीस वर्षकी श्रवस्थाके ऊपरवाली माताका दूष हलका पड़ जाता है। गर्भवती स्त्रीका दूष तीन मानके बाद विगड़ जाता है। ( श० क० )
  6. ६. अधिक मेहनत करनेसे दूधमें मांसका अंश कम हो जाता है। ( रतिशास्त्र )
  7. ८. बुरी शौपधियोंके बानेसे दूषके सारे अंश दूषित हो जाने हैं।
  8. ९. आहार और विहारसे वात, पित्त और कफ अलग अलग या एक साथ विगड़ कर दोष उत्पन्न कर देते हैं। ( श० क० )

इस प्रकारसे विगड़े हुए दूधमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं।

दूध कैसे विगाड़ता है ?

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१. यदि दूधका रंग काला अथवा लाल रंगका कसैला जिसमें कुछ वास आती है, अत्यंत रुखा, तरल, भागदार हलका जिसमें बच्चों को रुस करनेकी शक्ति न हो, दुबला करनेवाला, जिसके पीनेसे वायु उत्पन्न हो इस प्रकारका दूध वात-दोषसे दूषित होता है।

(च० श० अ० ८ श्लो० १०८)

२. यदि दूधका रंग काला, नीला, पीला और तांबेके रंगका कड़ुआ खड़ा या चरपरा हो और गंध मुग्दे या क्षधिर-किसी हो, अत्यन्त गरम पित्त-योग उत्पन्न करनेवाला, ऐसा दूध पित्त-दोषसे दूषित होता है।

(च० श० अ० ८ श्लो० १०९)

३. यदि दूधका रंग अत्यन्त सफेद अत्यन्त मीठा और नमकीन हो जिसमें घी, तेल, वसा और मजाके समान गंध तंतु युक्त अथवा पानीमें डालनेसे झूब जावे जिससे कफ पैदा हो, ऐसा दूध कफसे दूषित होता है।

(च० श० अ० ८ श्लो० ११०)

४. यदि वात, पित्त और कफ तीनों दोषके लक्षण मिले तो सन्निपातसे दूषित और यदि दो प्रकारके दूषित लक्षण मिले तो द्विदोषसे दूषित जानना चाहिये। (भा० वा०)

इस प्रकारके दूषित दूध पीनेसे बच्चोंमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं।

१. शरीरकी तौलका कम होना नींद कम आना, उल्टी होना, शरीरका दुबलापन, बलगम पैदा होना, भागदार हरे दस्त आना, आंतोंमें विगाड़, अतिसार, दस्तमें फटा दूध निकलना, पाचन-शक्तिका विगाड़, बराबर कै दस्त और हिचकीका होना इत्यादि।

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सम्बन्धित-शाल ।

पैसे लक्ष्योंसे बच्चोंको उंगी समझना चाहिये। बच्चोंका वजन कम होनेकी जांच नौलसे हो सकती है। जब विगड़े हुए दूधका अस्तर वजन पर पड़ता है तब दूध थोड़ा सा ज्वर जल्द रहता है। मोटी वाजी खियामें प्रायः गाढ़ा दूध होता है। इससे स्पष्ट अचानक बड़े और दूधसे भरे रहते हैं। दूध गाढ़ा क्यों हो जाता है? इसका कारण तमदार चर्बी बढ़ानेवाले पुष्ट पदार्थोंका संचय है। इसी प्रकार कम और पतले दूधका विकार भी होता है। गाढ़े दूध होनेपर मावोंका हलका भोजन करना चाहिये। पौष्टिक पदार्थ बढ़ा देना चाहिये। बहुत दिनो तक पिलानेसे भी पौष्टिक पदार्थ बढ़ा देना चाहिये। ज्यादा दिन दूध पिलानेसे अनेक रोग हो जाते हैं। इन्सानिये ज्यादा दिन दूध पिलानेसे बड़े बंधनेके पिलाता उचम माना है। जितने दिनों दूध पीनेवाले पीनेवा उतनी ही देर रजस्वला होनेमें होगी। इस कारण कि वह अथ रज दनमें सहाय होता है। यही कारण है कि दूध पिलावेवाली मावोंको रज कुछ कम निकलता है। खियोंको हर समय यह विचार रखना चाहिये कि वे ऐसी असावधानियोंसे बचे कि जिनसे दूध दूधित हो जाता है। अपना दूध निकाल कर क्षय परीक्षा कर लेनी चाहिये !

जो दूध पानमें डालनेसे मिल जावे, जिसका रंग कुल्हे पीलापन लिये हो, जो जलमें धारोंको न छोड़े हलका और न जमनेवाला ऐसा दूध शुद्ध होता है।

पैनी दशामें बड़ी कठिनाई पड़ती है, जब कि गोदिका बच्चा दूध पीता हो और गर्म रह जावे, ऐसे समयका दूध हानि पहुँचाता है केवल गोदके ही बच्चोंको नहीं, गर्मके बालक

सन्तति-शास्त्र ।

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बच्चोंके दाँत निकलते समयकी सावधानियाँ

बच्चोंके दाँत प्रायः छठे-सातवें महीनेसे निकलने आरम्भ होते हैं । इस समय बच्चोंको कई प्रकारके कष्ट होते हैं, जैसे—

१. मसूढ़ोंमें सूजन और दर्द होना ।

२. लारका अधिक बहना ।

३. हल्का ज्वर (बुखार) आना ।

४. दस्त (पतले पाखाने) लगना ।

५. चिड़चिड़ापन और बेचैनी होना ।

उपाय और सावधानियाँ :

१. मसूढ़ोंपर दिनमें दो-तीन बार शहद या सुहागेका फूला शहदमें मिलाकर धीरे-धीरे मलना चाहिये ।

२. बच्चेको चबानेके लिये साफ और कड़ा खिलौना या गाजर आदि देनी चाहिये ।

३. यदि दस्त अधिक हों तो सौंफ और अतीसका काढ़ा या घुट्टी देनी चाहिये ।

४. बच्चेके पेटको साफ रखना चाहिये और सुपाच्य भोजन देना चाहिये ।

५. दूध स्वच्छ और ताजा ही देना चाहिये ।