सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेत्यर्थः । चतुस्त्रिर्देवतान्तानां महिमान्तानामित्यर्थः । एवमाद्यं कमलादित्रयमेव पौनः- पुन्येन ध्यायेदित्यर्थः ॥ ६६-७०॥ अब इन द्वादश देवियों के रूप एवं लाञ्छन चिह्नों को कहता हूँ—ये सभी द्वादश देवियाँ पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान मुख वाली हैं और सभी सर्वर्तु पुष्पों से शोभित हैं ॥ ६६ ॥ ये सभी सर्व लक्षण सम्पन्ना हैं और सर्वाभरणों से भूषित हैं । इनमें से आदि की तीन विद्रुम के समान आभा वाली हैं । इसके बाद दूसरी त्रिक वाली देवियाँ चम्पा के समान आभा वाली हैं । तृतीय देवी त्रय प्रियङ्गु की मञ्जरी के समान श्याम वर्ण वाली हैं । चौथी त्रितय देवियाँ जाती पुष्प के समान प्रभा वाली हैं । इस प्रकार इन बारह देवियों का ध्यान करे ॥ ६७-६८ ॥ आदि त्रिक वाली देवियों के हाथ में कमल है । अन्य दूसरी त्रिक वाली देवियों के हाथ में चक्र है, तीसरी त्रिक वाली देवयों के हाथ में शङ्ख है । इस प्रकार तीन त्रिक वाली देवियों के हाथ में तीन त्रिक का ध्यान करे । चौथे त्रिक वाली देवियों के हाथ में आद्य त्रिक के समान कमल है । एकादशी के दिन साधक इन देवियों का ध्यान कर जागरण समन्वित पूजन करे ॥ ६९-७० ॥ स्तोत्रैः कथानकैर्वाद्यैर्गीतकैः क्षपयेन्निशाम् । रात्रिक्षये ततः स्नायात् सिताम्बरधरः शुचिः ॥ ७१ ॥ एवं ध्यानपूर्वकमेकादश्यां कालत्रयार्चनं कृत्वा जागरणं कुर्यादित्याह— स्मृत्वेति ॥ ७०-७१ ॥ मासेशमन्त्रसन्नद्धं कृत्वा देवं स्मरेत् तथा । पूजापनयनं कृत्वा स्नानकर्म समाचरेत् ॥ ७२ ॥ द्वादश्यां प्रातः स्वनित्यकर्मानुष्ठानपूर्वकं तन्मासेशकेशवध्यानं रात्रौ तदर्पित- पूजाद्रव्यापनयनादिकं कृत्वाऽर्चनकाले वक्ष्यमाणं स्नपनं कुर्यादित्याह—रात्रिक्षय इति सार्धेन ॥ ७१-७२ ॥ स्तोत्र पाठ, कथानक, वाद्य और गीतों से साधक रात बितावें । रात्रि बीतने पर स्नान करे और श्वेत वस्त्र पहनकर शुद्ध होए । साधक द्वादशी के दिन स्वकर्मानुष्ठानपूर्वक तन्मासेश का ध्यान कर रात्रि में तदर्पित पूजा द्रव्यों का अपनयन करे और अर्चन काल होने पर स्नान कर्म करे ॥ ७१-७२ ॥ मध्यतः केशवस्यादौ केवलस्य महात्मनः । वासुदेवस्वरूपस्य चक्रस्थस्य त्वनन्तरम् ॥ ७३ ॥ प्रागरेऽभिनिविष्टस्य सकलस्याव्ययस्य च । तदादिद्वादशानां च दद्यात् स्नानादिकं क्रमात् ॥ ७४ ॥