भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

१९८ सात्वतसंहिता संयुक्त है और वह प्रसन्नचित्त वाला है । वह लीला करने के लिये ही समस्त अस्त्रों को धारण करता है । उसका मुख सौम्य तथा आकुलता से रहित है । वह मात्र अपनी बुद्धि से समस्त मुमुक्षुओं के पापों को नष्ट करता रहता है ॥ ७-९ ॥ उसका स्वरूप स्वप्नसुषुप्ति पद में सुव्यक्त रहता है तथा तुर्य पद में शान्त रहता है । इस प्रकार एक होते हुए भी वह अनन्त रूप वाला है । उसका तेजोमय जो रूप है वही वैभव शान्तसंज्ञक है और वही समाधि निरत भक्तों में सन्मार्ग प्रकाशित करता है । उसके सभी वैभवीय रूप अपने उपासकों को सब प्रकार का फल प्रदान करते हैं ॥ १०-११ ॥ आमोक्षान्निर्विचारेण एकैकस्य महामते । आराधनार्थं विहितो वाचको हि चतुर्विधः ॥ १२ ॥ संज्ञानानापदमयः पिण्डाख्यो बीजलक्षणः । एभ्यो मध्यात् त्वथैकेन वाच्यमामन्त्र्य भक्तितः ॥ १३ ॥ अथ संज्ञापदपिण्डबीजभेदेन मन्त्राणां चातुर्विध्यं तेष्वेकतमेन भगवदावाहनाद्य- र्चनं चाह—एकैकस्य महामते इत्यादिना सार्धेन । वाच्यं भगवन्तमामन्त्र्य समावाह्य, अर्चयेदिति शेषः ॥ १२-१३ ॥ हे महामते ! उसके एक-एक स्वरूप मोक्ष पर्यन्त आराधन के लिये विहित हैं, वह उसके वाचक संज्ञा, पद, पिण्ड और बीज भेद से चार प्रकार के कहे गये हैं । अतः साधक बीज एवं पिण्ड इन दोनों मन्त्रों में से एक, अथवा संज्ञा एवं पद इन दोनों के मध्य में से एक, अथवा दोनों प्रकार के मन्त्रों में उभयात्मना दोनों मन्त्रों से अभिन्न एक भगवान् का अर्चन करे ॥ १२-१३ ॥ यत्रैकपिण्डवाक्योत्थमन्त्रेणाथोभयात्मना । अभिन्नलक्षणो वाच्य एक एवोपचर्यते ॥ १४ ॥ तत्र वै विधिनानेन कुर्यात्ताभ्यां हि कल्पनाम् । कृत्वादौ नाममन्त्रस्य बीजपिण्डाक्षरं तु वा ॥ १५ ॥ नयेत् तेनाभिमुख्यं च वाच्यमाद्यन्तकेन वा । सन्तन्त्य पदमन्त्रं तु विधिनानेन वै ततः ॥ १६ ॥ कुर्यात् प्रणवपीठस्थं नमस्कारध्वजान्वितम् । आभ्यां शान्तस्वरूपत्वादेकत्वमत एव हि ॥ १७ ॥ संज्ञाख्यं पदमन्त्रं च विद्धि संसिद्धिलक्षणम् । बीजपिण्डमन्त्रयोरन्यतरेण संज्ञापदमन्त्रयोरन्यतरेण चोभयेनाप्यभिन्नरूपस्यैक- स्यैव भगवतोऽर्चनं यत्र कार्यम्, तत्र तन्मन्त्रद्वयस्यापि संमेलनप्रकारम्, तदाद्यन्तयोः प्रणवनमःसंयोजनमन्त्रं चाह—यत्रेति सार्धैश्चतुर्भिः । आद्यन्तकेन वा आदिबीजमन्ते