सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२० सात्वतसंहिता अब हे सङ्कर्षण! पुत्रक शिष्य में जो विशेषता है, उसे सुनिये। जिसके विनियोग (क्रिया संकल्प) से स्वल्प, मध्य, उत्तम प्रकार के द्वारा शिक्षित आगम से गुरु जिसकी कृतार्थता जान लेता है उस पर अनुग्रहदृष्टि रख कर उसे विष्णु- मन्दिर में बुलावे और पुनः उसका अवलोकन करे। फिर उसे देवधाम (मण्डल) में रखे। उस पर सन्तुष्ट होकर उसकी अञ्जलि में अर्घ्य, पुष्प एवं अक्षत से पूर्णकर मण्डल में पुष्प प्रक्षेप कराकर मन्त्र प्रदान करे। किन्तु ध्यान एवं न्यास का उपदेश न करे। अग्नि के तर्पण (होम मन्त्र) के बिना मन्त्र मात्र के पूजन का उपदेश करे। उसकी योग्यता की सिद्धि के लिये गुरु सामान्य विधि से उपदेश करे कि आप बिम्ब के जल में अथवा स्थल में अच्युत का अर्चन कीजिये। फिर गुरु द्वारा उपदिष्ट होने पर प्रसन्नचित्त हो शिष्य 'तथास्तु' कहे। फिर स्वमुद्रा से मुद्रित शास्त्रार्थ का परिशीलन करे। अपनी शक्ति के अनुसार गुरु के योग-क्षेमादि का निरीक्षण करता रहे। उनकी आराधना में तत्पर रहकर तच्चित्त एवं तत्परायण रहे ॥ ३२-३८ ॥ समाक्षिप्तस्तदादेशान्मन्त्रमुद्राद्वयं विना। कीर्त्यर्थं स्वगुरोर्ब्रूयात् ज्ञातं शास्त्रार्थमुत्तमम्॥ ३९ ॥ उनकी आज्ञा होने पर मन्त्र एवं मुद्रा दोनों के बिना अपनी कीर्ति के लिये गुरु के द्वारा उपदिष्ट उत्तम शास्त्रार्थ उन्हें सुना देवे ॥ ३९ ॥ विचार्य स्वधिया सम्यग् वैष्णवानां हि संसदि। यथा नैति जनानां च मध्ये मात्सर्यभूमिताम्॥ ४० ॥ वैष्णवों की सभा में तथा सामान्य जनों की सभा में जिस प्रकार वह मात्सर्य की भूमि (ईर्ष्या का स्थान) न बने, वैसा अपनी बुद्धि से विचार करता रहे ॥४०॥ स शिष्यः पुत्रको नाम स्वपुत्रादधिकः सदा। ऐसा शिष्य 'पुत्रक' कहा जाता है। वह अपने पुत्र से भी अधिक प्रिय होता है ॥ ४१ ॥ ३. साधकलक्षणकथनम् साधकाख्ये विशेषो यस्तमिदानीं निबोध मे॥ ४१ ॥ पूर्ववल्लब्धदीक्षस्तु मन्त्राराधनतत्परः। स्नानादिनाऽखिलेनैव देवभूतेन कर्मणा॥ ४२ ॥ सिद्धये स्वात्मनश्चैव न लोकाराधनाय च। वने वायतनोद्देशे स्वगृहे वा मनोरमे॥ ४३ ॥ मन्त्रसेवार्घ्यदानं च कुर्यान्मन्त्रव्रतं महत्।