शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
रोगपरक-सूची 311 सूचिकाभरण रस 197 धूमपान-विधि 252 ( शिरःस्फोट रोग ) सर्पविपनाशक अञ्जन 288 ( दुष्टव्रण रोग ) कासीसादि घृत 149 83. विसंज्ञ-मूर्च्छा रोग दशांग लेप 258 89. शुक्ररोग प्रधमन नस्य 246 शोधन-रोपण लेप 266 रास्नासप्तक क्वाथ 97 विरेचन नस्य 245 87. शर्कराश्मरी-पथरी रोग चन्द्रप्रभा बटी 133 84. विसर्प रोग वीरतर्वादिक क्वाथ 98 योगराज गुग्गुलु 135 पानीयकल्याणक घृत 148 एलादि क्वाथ 99 गोक्षुरादि गुग्गुलु 137 महापञ्चतिक्त घृत 148 दशमूलारिष्ट 171 च्यवनप्राशावलेह 140 कासीसादि घृत 149 88. शिरोरोग बलादि तैल 154 गौराद्य घृत 150 त्रिफला मोदक 137 कुमार्यासव 167 पञ्चतिक्त घृत 152 मयूर घृत 151 स्नेह-सेवन 213 कनकसुन्दर रस 205 विरेचन 225-229 90. शूक रोग वमन 221-224 विरेचन नस्य 245 कासीसादि घृत 149 दशांग लेप 258 बृंहण नस्य 247 91. शूल रोग रक्त निर्हरण 272 रक्तचन्दनादि लेप 259 निदिग्धिकादि क्वाथ 94 वातविसर्पहर लेप 263 रक्त निर्हरण 272 पुनर्नवादि क्वाथ 100 पित्तविसर्पहर लेप 263 ( अकालपलित रोग ) दशमूल क्वाथ 93, 98 कफविसर्पहर लेप 263 निम्बबीज तैल 158 कट्फलादिचूर्ण 120 85. विसूचिका-हैजा रोग नीलिकादि तैल 158 बृहत्कट्फलादि चूर्ण 120 महाखांडव चूर्ण 123 भृंगराज तैल 159 पञ्चसम चूर्ण 124 संजीवनी बटी 132 अभ्रक भस्म 181 तुम्ब्रुवादि चूर्ण 125 अजीर्णकटक रस 204 लोह रसायन 208 यवानीखाण्डव चूर्ण 126 विरेचन 225-229 अभयादि मोदक 227 लवणभास्कर चूर्ण 127 अग्निदाह-विधि 275 बृंहण नस्य 247 चन्द्रप्रभा वटी 133 86. व्रण-फोड़ा रोग प्रतिमर्श नस्य 248 कांकायन वटी 134 गाङ्गेरुकी-स्वरस 87 पलितनाशक लेप 260 षड्बिन्दु घृत 149 न्यग्रोधादि क्वाथ 99 ( अर्धशिरो रोग ) दशमूलारिष्ट 171 पञ्चवल्कल क्वाथ 103 पथ्यादि क्वाथ 100 लोकनाथ रस 192 निम्बपत्र कल्क 112 ( अर्धावभेदक रोग ) नाराच रस 198 कैशोर गुग्गुलु 136 बृंहण नस्य 247 स्वच्छन्दभैरव रस 200 काञ्चनार गुग्गुलु 137 आधाशीशी पर लेप 264 गजकेसरी रस 204 कासीसादि घृत 149 सभी शिरोरोगों पर लेप 264 विरेचन 225-229 जात्यादि घृत 149 ( शिरोग्रह रोग ) निरूहण वस्ति 237 गौराद्य घृत 150 नारायण तैल 153 ( अंगशूल रोग ) त्रिफलादि तैल 158 ( दारुण रोग ) शतावरी तैल 156 जात्यादि तैल 159 नीलिकादि तैल 158 ( आमशूल रोग ) स्नेह-सेवन 213 ( सूर्यावर्त रोग ) धान्यपञ्चक क्वाथ 95 विरेचन 225-229 बृंहण नस्य 247 ह्रीबेरादि क्वाथ 96 अभयादि मोदक 227 क्षीरपाक-विधि 105
312 शार्ङ्गधरसंहिता (उदरशूल रोग) त्रिफलादि क्वाथ ९८ कुटजावलेह १४२ उदरशूलहर लेप २६६ नारायण चूर्ण १२३ कासीसादि घृत १४९ (कटिशूल रोग) (पृष्ठशूल रोग) षड्बिन्दु घृत १४९ सुदर्शन चूर्ण ११९ सुदर्शन चूर्ण ११९ उशीरासव १६७ लवणत्रितयादि चूर्ण १२४ (वस्तिशूल रोग) लोहासव १६८ चन्द्रप्रभा बटी १३३ बीजपूर स्वरस ८६ रोहीतकारिष्ट १७१ पानीयकल्याणक घृत १४८ हिंग्वादि चूर्ण १२६ विरेचन २२५-२२९ (कफज शूल रोग) (योनिशूल रोग) विरेचन नस्य २४५ एरण्डादि क्वाथ ९८ हिंग्वादि चूर्ण १२६ शोथनाशक लेप २५८ (कर्णशूल रोग) फल घृत १५१ दशांग लेप २५८ पथ्यादि क्वाथ १००, १०२ शतावरी तैल १५६ रक्त निर्हरण २७२ हिंग्वादि तैल १२६ (रक्तशूल रोग) (वृषणशोथ रोग) कर्णरोगहर योग २६९ वत्सकादि क्वाथ ९५ फलत्रिक क्वाथ ९९, १०० कर्णशूल में दीपिका तैल २७० (वातज शूल रोग) ९३. शोष रोग श्योनाक तैल २७० नागरादि क्वाथ ९५, ९८ जीवनीयगण चूर्ण ११८- (गुदशूल रोग) (शिरःशूल रोग) अष्टवर्ग चूर्ण ११८ हिंग्वादि चूर्ण १२६ वरुणादि क्वाथ १०१ कूष्माण्डावलेह १४१ (जानुशूल रोग) पथ्यादि क्वाथ १००, १०२ (मुखशोष रोग) सुदर्शन चूर्ण ११९ शतावरी तैल १५६ आमलक्यादि गुटिका १३१ (त्रिकशूल रोग) विरेचन नस्य २४५ बृंहण नस्य २४७ सुदर्शन चूर्ण ११९ (हृदयशूल रोग) प्रतिमर्श नस्य २४८ (नाभिशूल रोग) बीजपूर स्वरस ८६ (व्यवायशोष रोग) योगराज गुग्गुलु १३५ मृगशृंग पुटपाक ८९ च्यवनप्राशावलेह १४० (नेत्रशूल रोग) एरण्डादि क्वाथ ९८ (व्यायामशोष रोग) नेत्रशूलनाशक योग २७९ हिंग्वादि चूर्ण १२६ वसा पान २१३ (पक्तिशूल रोग) ९२. शोथरोग ९४. श्लीपद-फीलपाँव रोग कुमार्यासव १६७ पुनर्नवादि क्वाथ १०० रास्नापञ्चक क्वाथ ९७ त्रिनेत्र रस २०४ पञ्चवल्कल क्वाथ १०३ रास्नासप्तक क्वाथ ९७ (पार्श्वशूल रोग) त्रिफला चूर्ण ११७ शाखोटक क्वाथ १०१ बीजपूर स्वरस ८६ हपुषादि चूर्ण १२४ लघुमंजिष्ठादि क्वाथ १०२ एरण्डादि क्वाथ ९८ अजमोदादि चूर्ण १२५ बृहन्मंजिष्ठादि क्वाथ १०२ पञ्चमूलपक्वक्षीर १०५ चित्रकादि चूर्ण १२५ सूरण बटक १३२ सुदर्शन चूर्ण ११९ लवणभास्कर चूर्ण १२७ वमन २२१-२२४ सितोपलादि चूर्ण १२७ सूरण बटक १३२ श्लीपदहर लेप २६७ कामदेव घृत १४७ त्रिफला मोदक १३७ रक्त निर्हरण २७२ नारायण तैल १५३ योगराज गुग्गुलु १३५ ९५. श्वास-दमा रोग (पित्तशूल रोग) कैशोर गुग्गुल १३६ आर्द्रक स्वरस ८६ शतावरी स्वरस ८६ त्रिफला गुग्गुलु १३७ बिभीतक पुटपाक ८८
रोगपरक-सूची | 313
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| निदिग्धिकादि क्वाथ — 94 | लाक्षादि तैल — 152 | कामदेव घृत — 147 |
| पुनर्नवादि क्वाथ — 96, 100 | लोहासव — 168 | विरेचन नस्य — 245 |
| वासादि क्वाथ — 96 | खदिरारिष्ट — 170 | 100. हिक्का रोग |
| क्षुद्रादि क्वाथ — 97 | बब्बूलारिष्ट — 170 | रेणुकादि क्वाथ — 97 |
| दशमूल क्वाथ — 93 | द्राक्षारिष्ट — 171 | लवंगादि चूर्ण — 122 |
| वासादि क्वाथ — 102 | दशमूलारिष्ट — 171 | लवणत्रितयादि चूर्ण — 124 |
| उष्णोदक विधि — 105 | लोकनाथ रस — 192 | हिंग्वादि चूर्ण — 126 |
| पञ्चमूलपक्व-क्षीर — 105 | मृगांकपोट्टली रस — 194 | सूरण बटक — 132 |
| वर्धमानपिप्पली कल्क — 112 | हेमगर्भपोट्टली रस — 195 | कण्टकारी अवलेह — 140 |
| सुदर्शन चूर्ण — 119 | दूसरा हेमगर्भपोट्टली रस — 195 | अगस्तहरीतकी अवलेह — 142 |
| कट्फलादि चूर्ण — 120 | लोह रसायन — 208 | लोकनाथ रस — 192 |
| बृहत्कट्फलादि चूर्ण — 120 | वमन — 221-224 | 101. हृद्रोग |
| तृतीय कट्फलादि चूर्ण — 120 | (तमक रोग) | एरण्डादि क्वाथ — 98 |
| पिप्पल्यादि चूर्ण — 122 | लवंगादि चूर्ण — 122 | दशमूल क्वाथ — 93, 98 |
| लवंगादि चूर्ण — 122 | 96. सूतिका रोग | सुदर्शन चूर्ण — 119 |
| जातीफलादि चूर्ण — 122 | देवदार्वादि क्वाथ — 94 | लवंगादि चूर्ण — 122 |
| नाराच चूर्ण — 124 | बलादि तैल — 154 | महाखाण्डव चूर्ण — 123 |
| लवणत्रितयादि चूर्ण — 124 | 97. सोम रोग | नारायण चूर्ण — 123 |
| शुण्ठ्यादि चूर्ण — 126 | सोमरोग-चिकित्सा — 87 | लवणत्रितयादि चूर्ण — 124 |
| हिंग्वादि चूर्ण — 126 | 98. स्तन रोग | चित्रकादि चूर्ण — 125 |
| तालीसादि चूर्ण — 127 | रक्त निर्हरण — 272 | शुण्ठ्यादि चूर्ण — 126 |
| सितोपलादि चूर्ण — 127 | (स्तन्य रोग) | यवानीखाण्डव चूर्ण — 126 |
| लवणभास्कर चूर्ण — 127 | वमन — 221-224 | लवणभास्कर चूर्ण — 127 |
| व्योषादि बटी — 132 | (स्तन्यनाश रोग) | कांसायन बटी — 134 |
| सूरण-पिण्डी — 132 | जीवनीयगण चूर्ण — 118 | च्यवनप्राशावलेह — 140 |
| पिप्पली-मोदक — 133 | 99. स्वरभंग रोग | महापञ्चतिक्त घृत — 148 |
| चन्द्रप्रभा बटी — 133 | बिभीतक पुटपाक — 88 | लोहासव — 168 |
| योगराज गुग्गुलु — 135 | वासादि क्वाथ — 96, 102 | खदिरारिष्ट — 170 |
| कण्टकारी अवलेह — 140 | कट्फलादि चूर्ण — 120 | रोहीतकारिष्ट — 171 |
| च्यवनप्राशावलेह — 140 | दाडिमाष्टक चूर्ण — 121 | वमन — 221-224 |
| कूष्माण्डावलेह — 141 | व्योषादि बटी — 132 | विरेचन — 225-229 |
| अगस्त्यहरीतकी अवलेह — 142 | च्यवनप्राशावलेह — 140 | निरूहण वस्ति — 237 |
कतिपय रोगों के प्रमुख कार्य
स्तम्भ १
१. अरतिनाशक बृहत् मधूकपुष्पादि फाण्ट — १०८ लघुमधूकपुष्पादि फाण्ट — १०८
२. आयुर्वर्धक चन्दनादि तैल — १६१
३. कान्तिकारक कैशोर गुग्गुलु — १३६
४. केशनाशन कारवीरादि तैल — १६१ रोमनाशक लेप (१-२) — २६१
५. केशश्यामीकरण लेप पलितनाशक लेप (१-५) — २६०-२६१
६. केशोत्पादक यष्टीमधुक तैल — १५८ नीलिकादि तैल — १५८ इन्द्रलुप्तहर लेप — २६० केशवर्धक लेप — २६० रोमोत्पादक लेप — २६० इन्द्रलुप्तहर लेप — २६० रोमसंजनन लेप — २६०
७. गर्भकारक योगराज गुग्गुलु — १३५ कामदेव घृत — १४७ त्रिफला घृत — १५० फल घृत — १५१ लाक्षादि तैल — १५२ नारायण तैल — १५३ बलादि तैल — १५४ दशमूलारिष्ट — १७१
स्तम्भ २
८. तर्पणकारक आम्रादि यवागू — १०४ विलेपी-विधि — १०६ लवंगादि चूर्ण — १२२
९. त्रिदोषनाशक अष्टगुण मण्ड — १०७ अभयादि कल्क — ११४ सुदर्शन चूर्ण — ११९ लवंगादि चूर्ण — १२२ चन्द्रप्रभा बटी — १३३ त्रिफला मोदक — १३७
१०. दीपन धान्यपञ्चक क्वाथ — ९५ धान्यनागर क्वाथ — ९५ गुडूच्यादि क्वाथ — ९१, ९५ उष्णोदक-विधि — १०५ मण्ड-निर्माण-विधि — १०६ यवमण्ड — १०७ शुण्ठ्यादि कल्क — ११३ आमलकादि चूर्ण — ११७ त्रिफला चूर्ण — ११७ त्र्यूषण चूर्ण — ११७ पञ्चकोल चूर्ण — ११७ लवणपञ्चक चूर्ण — ११८ दाडिमाष्टक चूर्ण — १२१ लवणभास्कर चूर्ण — १२७ ग्रहणीकपाट रस — २०६ माधुतैलिक वस्ति — २४०
११. पाचन धान्यपञ्चक क्वाथ — ९५ धान्यनागर क्वाथ — ९५ ह्रीबेरादि क्वाथ — ९६ गुडूच्यादि क्वाथ — ९१, ९५ मण्ड-निर्माण-विधि — १०६ अभयादि कल्क — ११४ आमलकादि चूर्ण — ११७ पञ्चकोल चूर्ण — ११७ तालीसादि चूर्ण — १२७ लवणभास्कर चूर्ण — १२७
स्तम्भ ३
१२. पुष्टिकारक अष्टगुण मण्ड — १०७ चन्दनादि तैल — १६१ प्रतिमर्श नस्य — २४८
१३. बलवर्धक यवागू — १०४ लवंगादि चूर्ण — १२२ चन्द्रप्रभा बटी — १३३ कूष्माण्डावलेह — १४१ अगस्त्यहरीतकी अवलेह — १४२ कामदेव घृत — १४७ चन्दनादि तैल — १६१ कुमार्यासव — १६७ द्राक्षारिष्ट — १७१ दशमूलारिष्ट — १७१ मृगांकपोट्टली रस — १९४ लोह रसायन — २०८ माधुतैलिक वस्ति — २४० बृंहण नस्य — २४७ प्रतिमर्श नस्य — २४८
कतिपय रोगों के प्रमुख कार्य ३१५ 14. बुद्धिवर्धक | अगस्त्यहरीतकी अवलेह 142 | कूष्माण्डावलेह 141 सूरण बटक 132 | कामदेव घृत 147 | फल घृत 151 च्यवनप्राशावलेह 140 | अभयादि मोदक 227 | शतावरी तैल 156 नारायण तैल 153 | सुवर्ण भस्म 173-175 | कुमार्यासव 167 स्वर्णभस्म 173-175 | 19. वर्णकारक | लोह रसायन 208 घृतपान के योग्य व्यक्ति 212 | त्रिग्रन्थ चतुर्जात चूर्ण 118 | माधुतैलिक वस्ति 240 15. बृंहण | च्यवनप्राशावलेह 140 | 23. व्रणरोपण विलेपी 106 | अगस्त्यहरीतकी अवलेह 142 | कासीसादि घृत 149 जीवनीयगण चूर्ण 118 | कामदेव घृत 147 | 24. शुक्रवर्धक कूष्माण्डावलेह 141 | कासीसादि घृत 149 | आकारकरभादि चूर्ण 129 कुमार्यासव 167 | कुमार्यासव 167 | मुसल्यादि चूर्ण 129 16. मलभेदक | लोह रसायन 208 | कामदेव घृत 147 आमलकादि चूर्ण 117 | माधुतैलिक वस्ति 240 | दशमूलारिष्ट 171 त्रिफला चूर्ण 117 | सिद्धार्थकादि लेप 259 | 25. शोधनकारक नाराच चूर्ण 124 | रक्त निर्हरण 272 | सप्तमुष्टिक यूष 104 17. मलरोधक | 20. वशीकरण | उष्णोदक विधि 105 गुडूच्यादि क्वाथ 91, 95 | चन्दनादि तैल 161 | अष्टगुण मण्ड 107 न्यग्रोधादि क्वाथ 99 | वशीकरण लेप 268 | धान्यकादि हिम 110 यवागू 104 | 21. वाजीकरण | कासीसादि घृत 149 हरीतक्यादि चूर्ण 121 | शतावर्यादि चूर्ण 128 | द्राक्षारिष्ट 171 लघुगंगाधर चूर्ण 121 | माषादि मोदक 138 | 26. सर्वरोगनाशक दाडिमाष्टक चूर्ण 121 | च्यवनप्राशावलेह 140 | सुदर्शन चूर्ण 119 18. रसायन | मदनकामदेव रस 207 | चन्द्रप्रभा बंटी 133 त्रिफला चूर्ण 117 | कन्दर्पसुन्दर रस 208 | कैशोर गुग्गुलु 136 पञ्चनिम्ब चूर्ण 128 | 22. वीर्यवर्धक | 27. हृद्य योग बाहुशाल गुड़ 130 | जीवनीयगण चूर्ण 118 | विलेपी 106 सूरण बटक 132 | लवंगादि चूर्ण 122 | मरिचादि चूर्ण 121 चन्द्रप्रभा बटी 133 | सूरण बटक 132 | खर्जूरादि मन्थ 109 च्यवनप्राशावलेह 140 | चन्द्रप्रभा बटी 133 | कामदेव घृत 147 CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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भेलसंहिता 'विनोदिनी 'हिन्दीव्याख्या-विमर्श- परिशिष्टादि संवलित श्री अभय कात्यायन भेलसंहिता का प्रस्तुत संस्करण वर्तमान में उपलब्ध विभिन्न संस्करणों के व्यावहारिक पाठ के आधार पर प्रथमतः 'विनोदिनी' हिन्दी व्याख्या एवं विमर्श सहित लिखा गया है। इस ग्रन्थ की प्रमुख विशेषताएँ- मनुष्यों में 'ज्वर' कहे जाने वाले रोग के लिये मनुष्येतर प्राणियों में अन्य संज्ञाओं का प्रयोग है (सूत्रस्थान)। यह विषय चरक तथा सुश्रुत में नहीं है। भेल अपने गुरु पुनर्वसु आत्रेय का नामो-ल्लेख भी कई स्थानों पर करते हैं—'गुरुमेव ब्रवीरूच्यहम' (सूत्र. 5.10), 'यथात्रेयस्य शासनम्' (सिद्धि. 4.28); परन्तु वहीं उन्हें यदि अपने अनुभव में नई जानकारी मिली है तो उन्होंने निःसङ्कोच स्फुट रूप से वह बात भी कह दी है—'सन्निपातोद्भवं ह्येतदहं वक्ष्यामि हेतुभिः' (चि.2.3) 'इति मे निश्चिता मतिः'। (सिद्धि. 1.9)। भेल ने औषधियों के मिश्रणों की मात्रादि के सम्बन्ध में कहा है—'अभुक्त्वामलकं खादेत् भुक्त्वा चापि हरीतकीम्'। परिणामे च भक्तस्य खादेच्चैव विभीतकम्।।' (चि. सू.)। यह बात चरक में नहीं है। भेल ने 'किस समय किस द्रव्य को खाया जाय' इसका कारण भी वहाँ दिया है। इसी प्रकार से भेल ने शा. अ. 4 में आलोचक पित्त के बुद्धि-वैशेषिक तथा चक्षुर्वैशेषिक-ये दो अवान्तर भेद किये हैं; जिनका उल्लेख चरक, काश्यप तथा सुश्रुत में नहीं है। जाठराग्नि के सम्बन्ध में भेल ने जो विवरण दिया है, उसमें नाभि में सूर्यमण्डल का सोममण्डल में होना योगशास्त्र तथा तन्त्र का एक अद्भुत विषय है, वह अन्य संहिताओं में नहीं मिलता है। वहाँ उन्होंने भगवान् पुनर्वसु आत्रेय की सोमसूर्यात्मक जगत् की आवधारणा को विस्तार दिया है। भेल ने विसूची रोगी की चिकित्सा का विस्तार से वर्णन किया है और उसमें उष्ण लवणाम्बु पिलाकर वमन कराने का निर्देश किया है, यह विषय सर्वथा नया है। (चि. 10.63-64) आज से सहस्रों वर्ष पूर्व भेल ने (चि. 8.2) मन (मस्तिष्क) का स्थान शिर में तालु के अन्तर्गत लिखा है— 'शिरस्ताल्वन्तर्गतं सर्वेन्द्रिपरं मनः'। इस प्रकार प्राचीन संहिता ग्रन्थों में भेल संहिता का स्थान महत्त्वपूर्ण है। आशा है यह संस्करण अध्ययन-अध्यापन के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध होगा। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation US
'सिद्धिप्रदा'-हिन्दीव्याख्योपेता
↠ महत्त्वपूर्ण प्रकाशन ↞ कविराज श्रीगोविन्ददाससेनविरचिता भैषज्यरत्नावली 'सिद्धिप्रदा'-हिन्दीव्याख्योपेता प्रो. सिद्धिनन्दन मिश्र भैषज्यरत्नावली आयुर्वेदीय औषध निर्माण-हेतु सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है, जिसे इतना बड़ा सम्मान सम्पूर्ण भारत में प्राप्त हुआ है । रसशास्त्र एवं भैषज्यकल्पना के क्षेत्र में 50 वर्षों से अधिक अनुभवी विद्वान् प्रोफेसर सिद्धिनन्दन मिश्रकृत 'सिद्धिप्रदा' हिन्दी व्याख्या द्वारा 'भैषज्य-रत्नावली' की उपयोगिता और भी अधिक हो गई है । प्रोफेसर मिश्र ने इसमें वर्णित प्रायः सभी योगों का मूल स्रोत ढूँढ निकाला है तथा तत्तद् योगों को किन-किन आचार्यों ने पहली बार उद्धृत किया है-इसका उल्लेख भी मिश्र जी ने अपनी व्याख्या में किया है । इस व्याख्या में औषधि-निर्माण की सरल प्रक्रिया का वर्णन तथा आदेशात्मक भाषा का प्रयोग किया गया है, जिससे औषधि-निर्माता उस प्रक्रिया को आसानी से समझ सके । इसके अतिरिक्त सभी स्तरों पर सर्वत्र नये मानों (Metric Method Measurement जैसे-किलोग्राम, मिलीलीटर, मिलीमीटर आदि) का प्रयोग किया गया है तथा औषधि-सेवन की मात्रा, अनुपान, औषधि-ग्रन्थ, औषधि- स्वाद, महत्त्वपूर्ण रोगों में उपयोग आदि का भी उल्लेख सभी योगों के साथ दिया गया है । चरकसंहिता 'चरक-चन्द्रिका'-हिन्दीव्याख्या-विशेष वक्तव्य आदि से संवलित व्याख्याकार डॉ. ब्रह्मानन्द त्रिपाठी प्राक्कथन लेखक डॉ. गङ्गासहाय पाण्डेय एवं डॉ. जनार्दन देशपाण्डे सम्प्रति उपलब्ध चरक-संहिता 8 स्थानों तथा 120 अध्यायों में विभक्त है । प्रस्तुत संहिता काय-चिकित्सा का सर्वमान्य ग्रन्थ है । जैसे समस्त संस्कृत-वाङ्मय का आधार वैदिक साहित्य है, ठीक वैसे ही काय-चिकित्सा के क्षेत्र में जितना भी परवर्ती साहित्य लिखा गया है, उन सब का उपजीव्य चरक है । चरकसंहिता के अन्त में ग्रन्थकार की प्रतिज्ञा है—'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्' । इसका अभिप्राय यह है कि काय-चिकित्सा के सम्बन्ध में जो साहित्य व्याख्यान रूप में अथवा सूत्र रूप में इसमें उपलब्ध है, वह अन्यत्र भी प्राप्त हो सकता है, और जो इसमें नहीं हैं, वह अन्यत्र भी सुलभ नहीं है । चरक का यह डिण्डिमघोष तुलनात्मक दृष्टि से सर्वदा देखा जा सकता है । दूसरी विशेषता महर्षि चरक की यह रही है—'पराधिकारे न तु विस्तरोक्तिः' । इन्होंने अपने तन्त्र के अतिरिक्त दूसरे विषय के आचार्यों के क्षेत्र में टाँग अड़ाना पसन्द नहीं किया, अतएव उन्होंने कहा है—'अत्र धान्वन्तरीयाणाम् अधिकारः क्रियाविधौ' । इस प्रकार के आदर्श ग्रन्थ पर भट्टारहरिचन्द्र आदि अनेक स्वनामधन्य मनीषियों ने टीकाएँ लिखकर इसके सहस्रों का उद्घाटन समय-समय पर किया है । इसके पूर्व भी चरक की कतिपय व्याख्याएँ लिखी गयी हैं, वे विषय का बोध भी कराती हैं । चरकसंहिता की चरक-चन्द्रिका टीका के रूप में लेखक का इस दिशा में यह स्तुत्य प्रयास है । इसमें यथासम्भव चरक के रहस्यमय गूढ़ स्थलों का सरस भाषा में आशय स्पष्ट किया गया है । स्थल विशेष पर पर पारिभाषिक शब्दों के अंग्रेजी नाम भी दे दिये गये हैं । आवश्यकतानुसार प्रकरण विशेष पर आधुनिक चिकित्सा-सिद्धान्तों का तुलनात्मक दृष्टि से भी समावेश कर दिया गया है, जिससे पाठकों को विषय को समझने में सुविधा हो । साथ ही कठिन स्थलों को विशेष वक्तव्य तथा टिप्पणियों द्वारा प्राञ्जल किया गया है । प्रथम भाग - ( सूत्र-निदान-विमान-शारीर-इन्द्रियस्थान ) द्वितीय भाग - ( चिकित्सा-कल्प सिद्धिस्थान ) चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन-वाराणसी