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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

* रुद्रसंहिता * १११

सम्बोधित करके इस प्रकार बोले— 'भूपाल! आपकी यह पुत्री समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न है, परम सौभाग्यवती है। अपने महान् भाग्यके कारण यह धन्य है और साक्षात् लक्ष्मीकी भाँति समस्त गुणोंकी आगार है। इसका भावी पति निश्चय ही भगवान् शंकरके समान वैभव-शाली, सर्वेश्वर, किसीसे पराजित न होनेवाला, वीर, कामविजयी तथा सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ होगा।'

ऐसा कहकर राजासे विदा ले इच्छानुसार विचरनेवाले नारदमुनि वहाँसे चल दिये। वे कामके वशीभूत हो गये थे। शिवकी मायाने उन्हें विशेष मोहमें डाल दिया था। वे मुनि मन-ही-मन सोचने लगे कि 'मैं इस राजकुमारीको कैसे प्राप्त करूँ? स्वयंवरमें आये हुए नरेशोंमेंसे सबको छोड़कर यह एकमात्र मेरा ही वरण करे, यह कैसे सम्भव हो सकता है? समस्त नारियोंको सौन्दर्य सर्वथा प्रिय होता है। सौन्दर्यको देखकर ही वह प्रसन्नतापूर्वक मेरे अधीन हो सकती है, इसमें संशय नहीं है।'

ऐसा विचारकर कामसे विह्वल हुए मुनिवर नारद भगवान् विष्णुका रूप ग्रहण करनेके लिये तत्काल उनके लोकमें जा पहुँचे। वहाँ भगवान् विष्णुको प्रणाम करके वे इस प्रकार बोले— 'भगवन्! मैं एकान्तमें आपसे अपना सारा वृत्तान्त कहूँगा।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मीपति श्रीहरि नारदजीके साथ एकान्तमें जा बैठे और बोले— 'मुने! अब आप अपनी बात कहिये।'

तब नारदजीने कहा— भगवन् ! आपके भक्त जो राजा शीलनिधि हैं, वे सदा धर्म-पालनमें तत्पर रहते हैं। उनकी एक विशाललोचना कन्या है, जो बहुत ही सुन्दरी है। उसका नाम श्रीमती है। वह विश्वमोहिनीके रूपमें विख्यात है और तीनों लोकोंमें सबसे अधिक सुन्दरी है। प्रभो! आज मैं शीघ्र ही उस कन्यासे विवाह करना चाहता हूँ। राजा शीलनिधिने अपनी पुत्रीकी इच्छासे स्वयंवर रचाया है। इसलिये चारों दिशाओंसे वहाँ सहस्रों राजकुमार पधारे हैं। नाथ! मैं आपका प्रिय सेवक हूँ। अतः आप मुझे अपना स्वरूप दे दीजिये, जिससे राजकुमारी श्रीमती निश्चय ही मुझे वर ले।

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! नारदमुनिकी ऐसी बात सुनकर भगवान् मधुसूदन हँस पड़े और भगवान् शंकरके प्रभावका अनुभव करके उन दयालु प्रभुने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—

भगवान् विष्णु बोले—मुने! तुम अपने अभीष्ट स्थानको जाओ। मैं उसी तरह तुम्हारा हितसाधन करूँगा, जैसे श्रेष्ठ वैद्य अत्यन्त पीड़ित रोगीका करता है; क्योंकि तुम मुझे विशेष प्रिय हो।

ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने नारदमुनिको मुख तो वानरका दे दिया और शेष अंगोंमें अपने-जैसा स्वरूप देकर वे वहाँसे अन्तर्धान हो गये। भगवान्‌की पूर्वोक्त बात सुनकर और उनका मनोहर रूप प्राप्त हो गया समझकर नारदमुनिको बड़ा हर्ष हुआ। वे अपनेको कृतकृत्य मानने लगे। भगवान्‌ने क्या प्रयत्न किया है, इसको वे समझ न सके। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ नारद शीघ्र ही उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ राजा शीलनिधिने राजकुमारोंसे भरी हुई स्वयंवर-सभाका आयोजन किया था। विप्रवरो!

११२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

राजपुत्रोंसे घिरी हुई वह दिव्य स्वयंवर-सभा दूसरी इन्द्रसभाके समान अत्यन्त शोभा पा रही थी। नारदजी उस राजसभामें जा बैठे और वहाँ बैठकर प्रसन्न मनसे बार-बार यही सोचने लगे कि 'मैं भगवान् विष्णुके समान रूप धारण किये हुए हूँ। अतः वह राजकुमारी अवश्य मेरा ही वरण करेगी, दूसरेका नहीं।' मुनिश्रेष्ठ नारदको यह ज्ञात नहीं था कि मेरा मुँह कितना कुरूप है। उस सभामें बैठे हुए सब मनुष्योंने मुनिको उनके पूर्वरूपमें ही देखा। राजकुमार आदि कोई भी उनके रूप-परिवर्तनके रहस्यको न जान सके। वहाँ नारदजीकी रक्षाके लिये भगवान् रुद्रके दो पार्षद आये थे, जो ब्राह्मणका रूप धारण करके गूढ़भावसे वहाँ बैठे थे। वे ही नारदजीके रूप-परिवर्तनके उत्तम भेदको जानते थे। मुनिको कामावेशसे मूढ़ हुआ जान वे दोनों पार्षद उनके निकट गये और आपसमें बातचीत करते हुए उनकी हँसी उड़ाने लगे। परंतु मुनि तो कामसे विह्वल हो रहे थे। अतः उन्होंने उनकी यथार्थ बात भी अनसुनी कर दी। वे मोहित हो श्रीमतीको प्राप्त करनेकी इच्छासे उसके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगे।

इसी बीचमें वह सुन्दरी राजकन्या स्त्रियोंसे घिरी हुई अन्तःपुरसे वहाँ आयी। उसने अपने हाथमें सोनेकी एक सुन्दर माला ले रखी थी। वह शुभलक्षणा राजकुमारी स्वयंवरके मध्यभागमें लक्ष्मीके समान खड़ी हुई अपूर्व शोभा पा रही थी। उत्तम व्रतका पालन करनेवाली वह भूपकन्या माला हाथमें लेकर अपने मनके अनुरूप वरका अन्वेषण करती हुई सारी सभामें भ्रमण करने लगी। नारदमुनिका भगवान् विष्णुके समान शरीर और वानर-जैसा मुँह देखकर वह कुपित हो गयी और उनकी ओरसे दृष्टि हटाकर प्रसन्न मनसे दूसरी ओर चली गयी। स्वयंवर-सभामें अपने मनोवांछित वरको न देखकर वह भयभीत हो गयी। राजकुमारी उस सभाके भीतर चुपचाप खड़ी रह गयी। उसने किसीके गलेमें जयमाला नहीं डाली। इतनेमें ही राजाके समान वेश-भूषा धारण किये भगवान् विष्णु वहाँ आ पहुँचे। किन्हीं दूसरे लोगोंने उनको वहाँ नहीं देखा। केवल उस कन्याकी ही दृष्टि उनपर पड़ी। भगवान्‌को देखते ही उस परमसुन्दरी राजकुमारीका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उसने तत्काल ही उनके कण्ठमें वह माला पहना दी। राजाका रूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णु उस राजकुमारीको साथ लेकर तुरंत अदृश्य हो गये और अपने

* रुद्रसंहिता * ११३

धाममें जा पहुँचे। इधर सब राजकुमार श्रीमतीकी ओरसे निराश हो गये। नारदमुनि तो कामवेदनासे आतुर हो रहे थे। इसलिये वे अत्यन्त विह्वल हो उठे। तब वे दोनों विप्ररूपधारी ज्ञानविशारद रुद्रगण काम-विह्वल नारदजीसे उसी क्षण बोले—

रुद्रगणोंने कहा—हे नारद! हे मुने! तुम व्यर्थ ही कामसे मोहित हो रहे हो और सौन्दर्यके बलसे राजकुमारीको पाना चाहते हो। अपना वानरके समान घृणित मुँह तो देख लो।

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! उन रुद्रगणोंका यह वचन सुनकर नारदजीको बड़ा विस्मय हुआ। वे शिवकी मायासे मोहित थे। उन्होंने दर्पणमें अपना मुँह देखा। वानरके समान अपना मुँह देख वे तुरंत ही क्रोधसे जल उठे और मायासे मोहित होनेके कारण उन दोनों शिवगणोंको वहाँ शाप देते हुए बोले—‘अरे! तुम दोनोंने मुझ ब्राह्मणका उपहास किया है। अतः तुम ब्राह्मणके वीर्यसे उत्पन्न राक्षस हो जाओ। ब्राह्मणकी संतान होनेपर भी तुम्हारे आकार राक्षसके समान ही होंगे।' इस प्रकार अपने लिये शाप सुनकर वे दोनों ज्ञानिशिरोमणि शिवगण मुनिको मोहित जानकर कुछ नहीं बोले। ब्राह्मणो! वे सदा सब घटनाओंमें भगवान् शिवकी ही इच्छा मानते थे। अतः उदासीनभावसे अपने स्थानको चले गये और भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे।

(अध्याय ३)


नारदजीका भगवान् विष्णुको क्रोधपूर्वक फटकारना और शाप देना; फिर मायाके दूर हो जानेपर पश्चात्तापपूर्वक भगवान्‌के चरणोंमें गिरना और शुद्धिका उपाय पूछना तथा भगवान् विष्णुका उन्हें समझा-बुझाकर शिवका माहात्म्य जाननेके लिये ब्रह्माजीके पास जानेका आदेश और शिवके भजनका उपदेश देना

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! माया-मोहित नारदमुनि उन दोनों शिवगणोंको यथोचित शाप देकर भी भगवान् शिवके इच्छावश मोहनिद्रासे जाग न सके। वे भगवान् विष्णुके किये हुए कपटको याद करके मनमें दुस्सह क्रोध लिये

११४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

विष्णुलोकको गये और समिधा पाकर प्रज्वलित हुए अग्निदेवकी भाँति क्रोधसे जलते हुए बोले—उनका ज्ञान नष्ट हो गया था। इसलिये वे दुर्वचनपूर्ण व्यंग सुनाने लगे।

नारदजीने कहा—हरे! तुम बड़े दुष्ट हो, कपटी हो और समस्त विश्वको मोहमें डाले रहते हो। दूसरोंका उत्साह या उत्कर्ष तुमसे सहा नहीं जाता। तुम मायावी हो, तुम्हारा अन्तःकरण मलिन है। पूर्वकालमें तुम्हींने मोहिनीरूप धारण करके कपट किया, असुरोंको वारुणी मदिरा पिलायी, उन्हें अमृत नहीं पीने दिया। छल-कपटमें ही अनुराग रखनेवाले हरे! यदि महेश्वर रुद्र दया करके विष न पी लेते तो तुम्हारी सारी माया उसी दिन समाप्त हो जाती। विष्णुदेव! कपटपूर्ण चाल तुम्हें अधिक प्रिय है। तुम्हारा स्वभाव अच्छा नहीं है, तो भी भगवान् शंकरने तुम्हें स्वतन्त्र बना दिया है। तुम्हारी इस चाल-ढालको समझकर अब वे (भगवान् शिव) भी पश्चात्ताप करते होंगे। अपनी वाणीरूप वेदकी प्रामाणिकता स्थापित करनेवाले महादेवजीने ब्राह्मणको सर्वोपरि बताया है। हरे! इस बातको जानकर आज मैं बलपूर्वक तुम्हें ऐसी सीख दूँगा, जिससे तुम फिर कभी कहीं भी ऐसा कर्म नहीं कर सकोगे। अबतक तुम्हें किसी शक्तिशाली या तेजस्वी पुरुषसे पाला नहीं पड़ा था। इसलिये आजतक तुम निडर बने हुए हो। परंतु विष्णो! अब तुम्हें अपनी करनीका पूरा-पूरा फल मिलेगा!

भगवान् विष्णुसे ऐसा कहकर माया-मोहित नारदमुनि अपने ब्रह्मतेजका प्रदर्शन करते हुए क्रोधसे खिन्न हो उठे और शाप देते हुए बोले—'विष्णो! तुमने स्त्रीके लिये मुझे व्याकुल किया है। तुम इसी तरह सबको मोहमें डालते रहते हो। यह कपटपूर्ण कार्य करते हुए तुमने जिस स्वरूपसे मुझे संयुक्त किया था, उसी स्वरूपसे तुम मनुष्य हो जाओ और स्त्रीके वियोगका दुःख भोगो। तुमने जिन वानरोंके समान मेरा मुँह बनाया था, वे ही उस समय तुम्हारे सहायक हों। तुम दूसरोंको (स्त्री-विरहका) दुःख देनेवाले हो, अतः स्वयं भी तुम्हें स्त्रीके वियोगका दुःख प्राप्त हो। अज्ञानसे मोहित मनुष्योंके समान तुम्हारी स्थिति हो।'

अज्ञानसे मोहित हुए नारदजीने मोहवश श्रीहरिको जब इस तरह शाप दिया, तब उन्होंने शम्भुकी मायाकी प्रशंसा करते हुए उस शापको स्वीकार कर लिया। तदनन्तर महालीला करनेवाले शम्भुने अपनी उस विश्वमोहिनी मायाको, जिसके कारण ज्ञानी नारदमुनि भी मोहित हो गये थे, खींच लिया। उस मायाके तिरोहित होते ही

* रुद्रसंहिता * ११५

नारदजी पूर्ववत् शुद्ध बुद्धिसे युक्त हो गये। उन्हें पूर्ववत् ज्ञान प्राप्त हो गया और उनकी सारी व्याकुलता जाती रही। इससे उनके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। वे अधिकाधिक पश्चात्ताप करते हुए बारंबार अपनी निन्दा करने लगे। उस समय उन्होंने ज्ञानीको भी मोहमें डालनेवाली भगवान् शम्भुकी मायाकी सराहना की। तदनन्तर यह जानकर कि मायाके कारण ही मैं भ्रममें पड़ गया था—यह सब कुछ मेरा मायाजनित भ्रम ही था, वैष्णवशिरोमणि नारदजी भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिर पड़े। भगवान् श्रीहरिने उन्हें उठाकर खड़ा कर दिया। उस समय अपनी दुर्बुद्धि नष्ट हो जानेके कारण वे यों बोले 'नाथ! मायासे मोहित होनेके कारण मेरी बुद्धि बिगड़ गयी थी। इसलिये मैंने आपके प्रति बहुत दुर्वचन कहे हैं, आपको शापतक दे डाला है। प्रभो! उस शापको आप मिथ्या कर दीजिये। हाय! मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। अब मैं निश्चय ही नरकमें पड़ूँगा। हरे! मैं आपका दास हूँ। बताइये, मैं क्या उपाय—कौन-सा प्रायश्चित्त करूँ, जिससे मेरा पाप-समूह नष्ट हो जाय और मुझे नरकमें न गिरना पड़े।' ऐसा कहकर शुद्ध बुद्धिवाले मुनिशिरोमणि नारदजी पुनः भक्तिभावसे भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिर पड़े। उस समय उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हो रहा था। तब श्रीविष्णुने उन्हें उठाकर मधुर वाणीमें कहा—

भगवान् विष्णु बोले—तात! खेद न करो। तुम मेरे श्रेष्ठ भक्त हो, इसमें संशय नहीं है। मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ, सुनो। उससे निश्चय ही तुम्हारा परम हित होगा, तुम्हें नरकमें नहीं जाना पड़ेगा। भगवान् शिव तुम्हारा कल्याण करेंगे। तुमने मदसे मोहित होकर जो भगवान् शिवकी बात नहीं मानी थी—उसकी अवहेलना कर दी थी, उसी अपराधका भगवान् शिवने तुम्हें ऐसा फल दिया है; क्योंकि वे ही कर्मफलके दाता हैं। तुम अपने मनमें यह दृढ़ निश्चय कर लो कि भगवान् शिवकी इच्छासे ही यह सब कुछ हुआ है। सबके स्वामी परमेश्वर शंकर ही गर्वको दूर करनेवाले हैं। वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं। उन्हींका सच्चिदानन्दरूपसे बोध होता है। वे निर्गुण और निर्विकार हैं। सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे परे हैं। वे ही अपनी मायाको लेकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीन रूपोंमें प्रकट होते हैं। निर्गुण और सगुण भी वे ही हैं। निर्गुण अवस्थामें उन्हींका नाम शिव है। वे ही परमात्मा, महेश्वर, परब्रह्म, अविनाशी, अनन्त और महादेव आदि नामोंसे कहे जाते हैं। उन्हींकी सेवासे ब्रह्माजी जगत्के स्रष्टा हुए हैं और मैं तीनों लोकोंका पालन करता हूँ। वे स्वयं ही रुद्ररूपसे सदा सबका संहार करते हैं। वे शिवस्वरूपसे सबके साक्षी हैं, मायासे भिन्न और निर्गुण हैं। स्वतन्त्र होनेके कारण वे अपनी इच्छाके अनुसार चलते हैं। उनका विहार—आचार-व्यवहार उत्तम है और वे भक्तोंपर दया करनेवाले हैं। नारदमुने! मैं तुम्हें एक सुन्दर उपाय बताता हूँ, जो सुखद, समस्त पापोंका नाशक और सदा भोग एवं मोक्ष देनेवाला है। तुम उसे सुनो। अपने सारे संशयोंको त्यागकर तुम भगवान् शंकरके सुयशका गान करो और सदा अनन्यभावसे शिवके शतनामस्तोत्रका पाठ करो। मुने! तुम निरन्तर उन्हींकी उपासना और उन्हींका भजन करो। उन्हींके यशको सुनो और गाओ

११६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

तथा प्रतिदिन उन्हींकी पूजा-अर्चा करते रहो। नारद ! जो शरीर, मन और वाणीद्वारा भगवान् शंकरकी उपासना करता है, उसे पण्डित या ज्ञानी जानना चाहिये। वह जीवन्मुक्त कहलाता है। 'शिव' इस नामरूपी दावानलसे बड़े-बड़े पातकोंके असंख्य पर्वत अनायास भस्म हो जाते हैं—यह सत्य है, सत्य है। इसमें संशय नहीं है।$^१$ जो भगवान् शिवके नामरूपी नौकाका आश्रय लेते हैं, वे संसार-सागरसे पार हो जाते हैं। संसारके मूलभूत उनके सारे पाप निस्संदेह नष्ट हो जाते हैं। महामुने! संसारके मूलभूत जो पातकरूपी वृक्ष हैं, उनका शिवनामरूपी कुठारसे निश्चय ही नाश हो जाता है।$^२$

जो लोग पापरूपी दावानलसे पीड़ित हैं, उन्हें शिवनामरूपी अमृतका पान करना चाहिये। पापदावाग्निसे दग्ध होनेवाले प्राणियोंको उस (शिवनामामृत)-के बिना शान्ति नहीं मिल सकती। सम्पूर्ण वेदोंका अवलोकन करके पूर्ववर्ती विद्वानोंने यही निश्चय किया है कि भगवान् शिवकी पूजा ही उत्कृष्ट साधन तथा जन्म-मरणरूपी संसारबन्धनके नाशका उपाय है। आजसे यत्नपूर्वक सावधान रहकर विधि-विधानके साथ भक्तिभावसे नित्य-निरन्तर जगदम्बा पार्वतीसहित महेश्वर सदाशिवका भजन करो, नित्य शिवकी ही कथा सुनो और कहो तथा अत्यन्त यत्न करके बारंबार शिवभक्तोंका पूजन किया करो। मुनिश्रेष्ठ! अपने हृदयमें भगवान् शिवके उज्ज्वल चरणारविन्दोंकी स्थापना करके पहले शिवके तीर्थोंमें विचरो। मुने! इस प्रकार परमात्मा शंकरके अनुपम माहात्म्यका दर्शन करते हुए अन्तमें आनन्दवन (काशी)-को जाओ, वह स्थान भगवान् शिवको बहुत ही प्रिय है। वहाँ भक्तिपूर्वक विश्वनाथजीका दर्शन-पूजन करो। विशेषतः उनकी स्तुति-वन्दना करके तुम निर्विकल्प (संशयरहित) हो जाओगे, नारदजी! इसके बाद तुम्हें मेरी आज्ञासे भक्तिपूर्वक अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये निश्चय ही ब्रह्मलोकमें जाना चाहिये। वहाँ अपने पिता ब्रह्माजीकी विशेषरूपसे स्तुति-वन्दना करके तुम्हें प्रसन्नतापूर्ण हृदयसे बारंबार शिव-महिमाके विषयमें प्रश्न करना चाहिये। ब्रह्माजी शिव-भक्तोंमें श्रेष्ठ हैं। वे तुम्हें बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान् शंकरका माहात्म्य और शतनामस्तोत्र सुनायेंगे। मुने! आजसे तुम शिवाराधनमें तत्पर रहनेवाले शिवभक्त हो जाओ और विशेषरूपसे मोक्षके भागी बनो। भगवान् शिव तुम्हारा कल्याण करेंगे। इस प्रकार प्रसन्नचित्त हुए भगवान् विष्णु नारदमुनिको प्रेमपूर्वक उपदेश देकर श्रीशिवका स्मरण, वन्दन और स्तवन करके वहाँसे अन्तर्धान हो गये। (अध्याय ४)


$\sim\sim\circ\sim\sim$

१-शिवेतिनामदावाग्नेर्महापातकपर्वताः । भस्मीभवन्त्यनायासात् सत्यं सत्यं न संशयः॥
(शि० पु० रु० सृ० ४। ४५)
२-शिवनामतरीं प्राप्य संसाराब्धिं तरन्ति ते। संसारमूलपापानि तेषां नश्यन्त्यसंशयम्॥
संसारमूलभूतानां पातकानां महामुने। शिवनामकुठारेण विनाशो जायते ध्रुवम्॥
(शि० पु० रु० सृ० ४। ५१-५२)

* रुद्रसंहिता * ११७

नारदजीका शिवतीर्थोंमें भ्रमण, शिवगणोंको शापोद्धारकी बात बताना तथा ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीसे शिवतत्त्वके विषयमें प्रश्न करना

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! भगवान् श्रीहरिके अन्तर्धान हो जानेपर मुनिश्रेष्ठ नारद शिवलिंगोंका भक्तिपूर्वक दर्शन करते हुए पृथ्वीपर विचरने लगे। ब्राह्मणो! भूमण्डलपर घूम-फिरकर उन्होंने भोग और मोक्ष देनेवाले बहुत-से शिवलिंगोंका प्रेमपूर्वक दर्शन किया। दिव्यदर्शी नारदजी भूतलके तीर्थोंमें विचर रहे हैं और इस समय उनका चित्त शुद्ध है—यह जानकर वे दोनों शिवगण उनके पास गये। वे उनके दिये हुए शापसे उद्धारकी इच्छा रखकर वहाँ गये थे। उन्होंने आदरपूर्वक मुनिके दोनों पैर पकड़ लिये और मस्तक झुकाकर भलीभाँति प्रणाम करके शीघ्र ही इस प्रकार कहा—

शिवगण बोले—ब्रह्मन्! हम दोनों शिवके गण हैं। मुने! हमने ही आपका अपराध किया है। राजकुमारी श्रीमतीके स्वयंवरमें आपका चित्त मायासे मोहित हो रहा था। उस समय परमेश्वरकी प्रेरणासे आपने हम दोनोंको शाप दे दिया। वहाँ कुसमय जानकर हमने चुप रह जाना ही अपनी जीवन-रक्षाका उपाय समझा। इसमें किसीका दोष नहीं है। हमें अपने कर्मका ही फल प्राप्त हुआ है। प्रभो! अब आप प्रसन्न होइये और हम दोनोंपर अनुग्रह कीजिये।

नारदजीने कहा—आप दोनों महादेवजीके गण हैं और सत्पुरुषोंके लिये परम सम्माननीय हैं। अतः मेरे मोहरहित एवं सुखदायक यथार्थ वचनको सुनिये। पहले निश्चय ही मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी, बिगड़ गयी थी और मैं सर्वथा मोहके वशीभूत हो गया था। इसीलिये आप दोनोंको मैंने शाप दे दिया। शिवगणो ! मैंने जो कुछ कहा है, वह वैसा ही होगा, तथापि मेरी बात सुनिये। मैं आपके लिये शापोद्धारकी बात बता रहा हूँ। आपलोग आज मेरे अपराधको क्षमा कर दें। मुनिवर विश्रवाके वीर्यसे जन्म ग्रहण करके आप सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रसिद्ध (कुम्भकर्ण-रावण) राक्षसराजका पद प्राप्त करेंगे और बलवान्, वैभवसे युक्त तथा परम प्रतापी होंगे। समस्त ब्रह्माण्डके राजा होकर शिवभक्त एवं जितेन्द्रिय होंगे और शिवके ही दूसरे स्वरूप श्रीविष्णुके हाथों मृत्यु पाकर फिर अपने पदपर प्रतिष्ठित हो जायेंगे।

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! महात्मा नारदमुनिकी यह बात सुनकर वे दोनों

११८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

शिवगण प्रसन्न हो सानन्द अपने स्थानको लौट गये। श्रीनारदजी भी अत्यन्त आनन्दित हो अनन्यभावसे भगवान् शिवका ध्यान तथा शिवतीर्थोंका दर्शन करते हुए बारंबार भूमण्डलमें विचरने लगे। अन्तमें वे सबके ऊपर विराजमान शिवप्रिया काशीपुरीमें गये, जो शिवस्वरूपिणी एवं शिवको सुख देनेवाली है। काशीपुरीका दर्शन करके नारदजी कृतार्थ हो गये। उन्होंने भगवान् काशीनाथका दर्शन किया और परम प्रेम एवं परमानन्दसे युक्त हो उनकी पूजा की। काशीका सानन्द सेवन करके वे मुनिश्रेष्ठ कृतार्थताका अनुभव करने लगे और प्रेमसे विह्वल हो उसका नमन, वर्णन तथा स्मरण करते हुए ब्रह्मलोकको गये। निरन्तर शिवका स्मरण करनेसे उनकी बुद्धि शुद्ध हो गयी थी। वहाँ पहुँचकर शिवतत्त्वका विशेषरूपसे ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे नारदजीने ब्रह्माजीको भक्तिपूर्वक नमस्कार किया और नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करके उनसे शिवतत्त्वके विषयमें पूछा। उस समय नारदजीका हृदय भगवान् शंकरके प्रति भक्तिभावनासे परिपूर्ण था।

नारदजी बोले—ब्रह्मन्! परब्रह्म परमात्माके स्वरूपको जाननेवाले पितामह ! जगत्प्रभो ! आपके कृपाप्रसादसे मैंने भगवान् विष्णुके उत्तम माहात्म्यका पूर्णतया ज्ञान प्राप्त किया है। भक्तिमार्ग, ज्ञानमार्ग, अत्यन्त दुस्तर तपोमार्ग, दानमार्ग तथा तीर्थमार्गका भी वर्णन सुना है। परंतु शिवतत्त्वका ज्ञान मुझे अभीतक नहीं हुआ है। मैं भगवान् शंकरकी पूजा-विधिको भी नहीं जानता। अतः प्रभो! आप क्रमशः इन विषयोंको तथा भगवान् शिवके विविध चरित्रोंको तथा उनके स्वरूप-तत्त्व, प्राकट्य, विवाह, गार्हस्थ्य धर्म—सब मुझे बताइये। निष्पाप पितामह ! ये सब बातें तथा और भी जो आवश्यक बातें हों, उन सबका आपको वर्णन करना चाहिये। प्रजानाथ! शिव और शिवाके आविर्भाव एवं विवाहका प्रसंग विशेष-रूपसे कहिये—तथा कार्तिकेयके जन्मकी कथा भी मुझे सुनाइये। प्रभो! पहले बहुत लोगोंसे मैंने ये बातें सुनी हैं, किंतु तृप्त नहीं हो सका हूँ। इसीलिये आपकी शरणमें आया हूँ। आप मुझपर कृपा कीजिये।

अपने पुत्र नारदकी यह बात सुनकर लोक-पितामह ब्रह्मा वहाँ इस प्रकार बोले— (अध्याय ५)

* रुद्रसंहिता * १११९

महाप्रलयकालमें केवल सद्ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन, उस निर्गुण-निराकार ब्रह्मसे ईश्वरमूर्ति (सदाशिव)-का प्राकट्य, सदाशिवद्वारा स्वरूपभूता शक्ति (अम्बिका)-का प्रकटीकरण, उन दोनोंके द्वारा उत्तम क्षेत्र (काशी या आनन्दवन)-का प्रादुर्भाव, शिवके वामांगसे परम पुरुष (विष्णु)-का आविर्भाव तथा उनके सकाशसे प्राकृत तत्त्वोंकी क्रमशः उत्पत्तिका वर्णन

ब्रह्माजीने कहा—ब्रह्मन्! देवशिरोमणे! तुम सदा समस्त जगत्के उपकारमें ही लगे रहते हो। तुमने लोगोंके हितकी कामनासे यह बहुत उत्तम बात पूछी है। जिसके सुननेसे सम्पूर्ण लोकोंके समस्त पापोंका क्षय हो जाता है, उस अनामय शिवतत्त्वका मैं तुमसे वर्णन करता हूँ। शिवतत्त्वका स्वरूप बड़ा ही उत्कृष्ट और अद्भुत है। जिस समय समस्त चराचर जगत् नष्ट हो गया था, सर्वत्र केवल अन्धकार-ही-अन्धकार था। न सूर्य दिखायी देते थे न चन्द्रमा। अन्यान्य ग्रहों और नक्षत्रोंका भी पता नहीं था। न दिन होता था न रात; अग्नि, पृथ्वी, वायु और जलकी भी सत्ता नहीं थी। प्रधान तत्त्व (अव्याकृत प्रकृति)-से रहित सूना आकाशमात्र शेष था, दूसरे किसी तेजकी उपलब्धि नहीं होती थी। अदृष्ट आदिका भी अस्तित्व नहीं था। शब्द और स्पर्श भी साथ छोड़ चुके थे। गन्ध और रूपकी भी अभिव्यक्ति नहीं होती थी। रसका भी अभाव हो गया था। दिशाओंका भी भान नहीं होता था। इस प्रकार सब ओर निरन्तर सूचीभेद्य घोर अन्धकार फैला हुआ था। उस समय 'तत्सद्ब्रह्म' इस श्रुतिमें जो 'सत्' सुना जाता है, एकमात्र वही शेष था। जब 'यह', 'वह', 'ऐसा', 'जो' इत्यादि रूपसे निर्दिष्ट होनेवाला भावाभावात्मक जगत् नहीं था, उस समय एकमात्र वह 'सत्' ही शेष था, जिसे योगीजन अपने हृदयाकाशके भीतर निरन्तर देखते हैं। वह सत्तत्त्व मनका विषय नहीं है। वाणीकी भी वहाँतक कभी

१२० * संक्षिप्त शिवपुराण *


पहुँच नहीं होती। वह नाम तथा रूप-रंगसे भी शून्य है। वह न स्थूल है न कृश, न ह्रस्व है न दीर्घ तथा न लघु है न गुरु। उसमें न कभी वृद्धि होती है न ह्रास। श्रुति भी उसके विषयमें चकितभावसे 'है' इतना ही कहती है, अर्थात् उसकी सत्तामात्रका ही निरूपण कर पाती है, उसका कोई विशेष विवरण देनेमें असमर्थ हो जाती है। वह सत्य, ज्ञानस्वरूप, अनन्त, परमानन्दमय, परम ज्योतिःस्वरूप, अप्रमेय, आधाररहित, निर्विकार, निराकार, निर्गुण, योगिगम्य, सर्वव्यापी, सबका एकमात्र कारण, निर्विकल्प, निरारम्भ, मायाशून्य, उपद्रव-रहित, अद्वितीय, अनादि, अनन्त, संकोच-विकाससे शून्य तथा चिन्मय है।

जिस परब्रह्मके विषयमें ज्ञान और अज्ञानसे पूर्ण उक्तियोंद्वारा इस प्रकार (ऊपर बताये अनुसार) विकल्प किये जाते हैं; उसने कुछ कालके बाद (सृष्टिका समय आनेपर) द्वितीयकी इच्छा प्रकट की—उसके भीतर एकसे अनेक होनेका संकल्प उदित हुआ। तब उस निराकार परमात्माने अपनी लीलाशक्तिसे अपने लिये मूर्ति (आकार-की कल्पना की। वह मूर्ति सम्पूर्ण ऐश्वर्य-गुणोंसे सम्पन्न, सर्वज्ञानमयी, शुभ-स्वरूपा, सर्वव्यापिनी, सर्वरूपा, सर्वदर्शिनी, सर्वकारिणी, सबकी एकमात्र वन्दनीया, सर्वाद्या, सब कुछ देनेवाली और सम्पूर्ण संस्कृतियोंका केन्द्र थी। उस शुद्धरूपिणी ईश्वर-मूर्तिकी कल्पना करके वह अद्वितीय, अनादि, अनन्त, सर्वप्रकाशक, चिन्मय, सर्वव्यापी और अविनाशी परब्रह्म अन्तर्हित हो गया। जो मूर्तिरहित परम ब्रह्म है, उसीकी मूर्ति (चिन्मय आकार) भगवान् सदाशिव हैं। अर्वाचीन और प्राचीन विद्वान् उन्हींको ईश्वर कहते हैं। उस समय एकाकी रहकर स्वेच्छानुसार विहार करनेवाले उन सदाशिवने अपने विग्रहसे स्वयं ही एक स्वरूपभूता शक्तिकी सृष्टि की, जो उनके अपने श्रीअंगसे कभी अलग होनेवाली नहीं थी। उस पराशक्तिको प्रधान, प्रकृति, गुणवती, माया, बुद्धितत्त्वकी जननी तथा विकाररहित बताया गया है। वह शक्ति अम्बिका कही गयी है। उसीको प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेवजननी, नित्या और मूलकारण भी कहते हैं। सदाशिवद्वारा प्रकट की गयी उस शक्तिके आठ भुजाएँ हैं। उस शुभलक्षणा देवीके मुखकी शोभा विचित्र है। वह अकेली ही अपने मुखमण्डलमें सदा एक सहस्र चन्द्रमाओंकी कान्ति धारण करती है। नाना प्रकारके आभूषण उसके श्रीअंगोंकी शोभा बढ़ाते हैं। वह देवी नाना प्रकारकी गतियोंसे सम्पन्न है और अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करती है। उसके खुले हुए नेत्र खिले हुए कमलके समान जान पड़ते हैं। वह अचिन्त्य तेजसे जगमगाती है। वह सबकी योनि है और सदा उद्यमशील रहती है। एकाकिनी होनेपर भी वह माया संयोगवशात् अनेक हो जाती है।

वे जो सदाशिव हैं, उन्हें परमपुरुष, ईश्वर, शिव, शम्भु और महेश्वर कहते हैं। वे अपने मस्तकपर आकाश-गंगाको धारण करते हैं। उनके भालदेशमें चन्द्रमा शोभा पाते हैं। उनके पाँच मुख हैं और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र हैं। उनका चित्त सदा प्रसन्न रहता है। वे दस भुजाओंसे युक्त और त्रिशूलधारी हैं। उनके श्रीअंगोंकी प्रभा

* रुद्रसंहिता * १२१

कर्पूरके समान श्वेत-गौर है। वे अपने सारे अंगोंमें भस्म रमाये रहते हैं। उन कालरूपी ब्रह्मने एक ही समय शक्तिके नाथ 'शिवलोक' नामक क्षेत्रका निर्माण किया था। उस उत्तम क्षेत्रको ही काशी कहते हैं। वह परम निर्वाण या मोक्षका स्थान है, जो सबके ऊपर विराजमान है। वे प्रिया-प्रियतमरूप शक्ति और शिव, जो परमानन्दस्वरूप हैं, उस मनोरम क्षेत्रमें नित्य निवास करते हैं। काशीपुरी परमानन्दरूपिणी है। मुने! शिव और शिवाने प्रलयकालमें भी कभी उस क्षेत्रको अपने सांनिध्यसे मुक्त नहीं किया है। इसलिये विद्वान् पुरुष उसे 'अविमुक्त क्षेत्र' के नामसे भी जानते हैं। वह क्षेत्र आनन्दका हेतु है। इसलिये पिनाकधारी शिवने पहले उसका नाम 'आनन्दवन' रखा था। उसके बाद वह 'अविमुक्त' के नामसे प्रसिद्ध हुआ।

देवर्षे! एक समय उस आनन्दवनमें रमण करते हुए शिवा और शिवके मनमें यह इच्छा हुई कि किसी दूसरे पुरुषकी भी सृष्टि करनी चाहिये, जिसपर यह सृष्टि-संचालनका महान् भार रखकर हम दोनों केवल काशीमें रहकर इच्छानुसार विचरें और निर्वाण धारण करें। वही पुरुष हमारे अनुग्रहसे सदा सबकी सृष्टि करे, पालन करे और वही अन्तमें सबका संहार भी करे। यह चित्त एक समुद्रके समान है। इसमें चिन्ताकी उत्ताल तरंगें उठ-उठकर इसे चंचल बनाये रहती हैं। इसमें सत्त्वगुणरूपी रत्न, तमोगुणरूपी ग्राह और रजोगुणरूपी मूँगे भरे हुए हैं। इस विशाल चित्त-समुद्रको संकुचित करके हम दोनों उस पुरुषके प्रसादसे आनन्दकानन (काशी)-में सुखपूर्वक निवास करें। यह आनन्दवन वह स्थान है, जहाँ हमारी मनोवृत्ति सब ओरसे सिमटकर इसीमें लगी हुई है तथा जिसके बाहरका जगत् चिन्तासे आतुर प्रतीत होता है। ऐसा निश्चय करके शक्तिसहित सर्वव्यापी परमेश्वर शिवने अपने वामभागके दसवें अंगपर अमृत मल दिया। फिर तो वहाँसे एक पुरुष प्रकट हुआ, जो तीनों लोकोंमें सबसे अधिक सुन्दर था। वह शान्त था। उसमें सत्त्वगुणकी अधिकता थी तथा वह गम्भीरताका अथाह सागर था। मुने! क्षमा नामक गुणसे युक्त उस पुरुषके लिये ढूँढ़नेपर भी कहीं कोई उपमा नहीं मिलती

१२२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

थी। उसकी कान्ति इन्द्रनील मणिके समान श्याम थी। उसके अंग-अंगसे दिव्य शोभा छिटक रही थी और नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान शोभा पा रहे थे। श्रीअंगोंपर सुवर्णकी-सी कान्तिवाले दो सुन्दर रेशमी पीताम्बर शोभा दे रहे थे। किसीसे भी पराजित न होनेवाला वह वीर पुरुष अपने प्रचण्ड भुजदण्डोंसे सुशोभित हो रहा था। तदनन्तर उस पुरुषने परमेश्वर शिवको प्रणाम करके कहा—'स्वामिन्! मेरे नाम निश्चित कीजिये और काम बताइये।' उस पुरुषकी यह बात सुनकर महेश्वर भगवान् शंकर हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें उससे बोले—

शिवने कहा—वत्स! व्यापक होनेके कारण तुम्हारा विष्णु नाम विख्यात हुआ। इसके सिवा और भी बहुत-से नाम होंगे, जो भक्तोंको सुख देनेवाले होंगे। तुम सुस्थिर उत्तम तप करो; क्योंकि वही समस्त कार्योंका साधन है।

ऐसा कहकर भगवान् शिवने श्वास-मार्गसे श्रीविष्णुको वेदोंका ज्ञान प्रदान किया। तदनन्तर अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीहरि भगवान् शिवको प्रणाम करके बड़ी भारी तपस्या करने लगे और शक्तिसहित परमेश्वर शिव भी पार्षदगणोंके साथ वहाँसे अदृश्य हो गये। भगवान् विष्णुने सुदीर्घ कालतक बड़ी कठोर तपस्या की। तपस्याके परिश्रमसे युक्त भगवान् विष्णुके अंगोंसे नाना प्रकारकी जलधाराएँ निकलने लगीं। यह सब भगवान् शिवकी मायासे ही सम्भव हुआ। महामुने! उस जलसे सारा सूना आकाश व्याप्त हो गया। वह ब्रह्मरूप जल अपने स्पर्शमात्रसे सब पापोंका नाश करनेवाला सिद्ध हुआ। उस समय थके हुए परम पुरुष विष्णुने स्वयं उस जलमें शयन किया। वे दीर्घकालतक बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें रहे। नार अर्थात् जलमें शयन करनेके कारण ही उनका 'नारायण' यह श्रुतिसम्मत नाम प्रसिद्ध हुआ। उस समय उन परम पुरुष नारायणके सिवा दूसरी कोई प्राकृत वस्तु नहीं थी। उसके बाद ही उन महात्मा नारायणदेवसे यथासमय सभी तत्त्व प्रकट हुए। महामते! विद्वन्! मैं उन तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकार बता रहा हूँ। सुनो, प्रकृतिसे महत्तत्त्व प्रकट हुआ और महत्तत्त्वसे तीनों गुण। इन गुणोंके भेदसे ही त्रिविध अहंकारकी उत्पत्ति हुई। अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ हुईं और उन तन्मात्राओंसे पाँच भूत प्रकट हुए। उसी समय ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियोंका भी प्रादुर्भाव हुआ। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हें तत्त्वोंकी संख्या बतायी है। इनमेंसे पुरुषको छोड़कर शेष सारे तत्त्व प्रकृतिसे प्रकट हुए हैं, इसलिये सब-के-सब जड़ हैं। तत्त्वोंकी संख्या चौबीस है। उस समय एकाकार हुए चौबीस तत्त्वोंको ग्रहण करके वे परम पुरुष नारायण भगवान् शिवकी इच्छासे ब्रह्मरूप जलमें सो गये।

(अध्याय ६)

* रुद्रसंहिता *
१२३

भगवान् विष्णुकी नाभिसे कमलका प्रादुर्भाव, शिवेच्छावश ब्रह्माजीका उससे प्रकट होना, कमलनालके उद्गमका पता लगानेमें असमर्थ ब्रह्माका तप करना, श्रीहरिका उन्हें दर्शन देना, विवादग्रस्त ब्रह्मा-विष्णुके बीचमें अग्नि-स्तम्भका प्रकट होना तथा उसके ओर-छोरका पता न पाकर उन दोनोंका उसे प्रणाम करना

ब्रह्माजी कहते हैं—देवर्षे! जब नारायणदेव जलमें शयन करने लगे, उस समय उनकी नाभिसे भगवान् शंकरके इच्छावश सहसा एक उत्तम कमल प्रकट हुआ, जो बहुत बड़ा था। उसमें असंख्य नालदण्ड थे। उसकी कान्ति कनेरके फूलके समान पीले रंगकी थी तथा उसकी लम्बाई और ऊँचाई भी अनन्त योजन थी। वह कमल करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशित हो रहा था, सुन्दर होनेके साथ ही सम्पूर्ण तत्त्वोंसे युक्त था और अत्यन्त अद्भुत, परम रमणीय, दर्शनके योग्य तथा सबसे उत्तम था। तत्पश्चात् कल्याणकारी परमेश्वर साम्ब सदाशिवने पूर्ववत् प्रयत्न करके मुझे अपने दाहिने अंगसे उत्पन्न किया। मुने! उन महेश्वरने मुझे तुरंत ही अपनी मायासे मोहित करके नारायणदेवके नाभिकमलमें डाल दिया और लीलापूर्वक मुझे वहाँसे प्रकट किया। इस प्रकार उस कमलसे पुत्रके रूपमें मुझ हिरण्यगर्भका जन्म हुआ। मेरे चार मुख हुए और शरीरकी कान्ति लाल हुई। मेरे मस्तक त्रिपुण्ड्रकी रेखासे अंकित थे। तात! भगवान् शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण मेरी ज्ञानशक्ति इतनी दुर्बल हो रही थी कि मैंने उस कमलके सिवा दूसरे किसीको अपने शरीरका जनक या पिता नहीं जाना। मैं कौन हूँ, कहाँसे आया हूँ, मेरा कार्य क्या है, मैं किसका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ हूँ और किसने इस समय मेरा निर्माण किया है—इस प्रकार संशयमें पड़े हुए मेरे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ—'मैं किसलिये मोहमें पड़ा हुआ हूँ? जिसने मुझे उत्पन्न किया है, उसका पता लगाना तो बहुत सरल है। इस कमलपुष्पका जो पत्रयुक्त नाल है, उसका उद्गमस्थान इस जलके भीतर नीचेकी ओर है। जिसने मुझे उत्पन्न किया है, वह पुरुष भी वहीं होगा—इसमें संशय नहीं है।'

ऐसा निश्चय करके मैंने अपनेको कमलसे नीचे उतारा। मुने! मैं उस कमलकी एक-एक नालमें गया और सैकड़ों वर्षोंतक वहाँ भ्रमण करता रहा, किंतु कहीं भी उस कमलके उद्गमका उत्तम स्थान मुझे नहीं मिला। तब पुनः संशयमें पड़कर मैं उस कमलपुष्पपर जानेको उत्सुक हुआ और नालके मार्गसे उस कमलपर चढ़ने लगा। इस तरह बहुत ऊपर जानेपर भी मैं उस कमलके कोशको न पा सका। उस दशामें मैं और भी मोहित हो उठा। मुने! उस समय भगवान् शिवकी इच्छासे परम मंगलमयी उत्तम आकाशवाणी प्रकट हुई, जो मेरे मोहका विध्वंस करनेवाली थी। उस वाणीने कहा—'तप' (तपस्या करो)। उस आकाशवाणीको सुनकर मैंने अपने

१२४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

जन्मदाता पिताका दर्शन करनेके लिये उस समय पुनः प्रयत्नपूर्वक बारह वर्षोंतक घोर तपस्या की। तब मुझपर अनुग्रह करनेके लिये ही चार भुजाओं और सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित भगवान् विष्णु वहाँ सहसा प्रकट हो गये। उन परम पुरुषने अपने हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे। उनके सारे अंग सजल जलधरके समान श्यामकान्तिसे सुशोभित थे। उन परम प्रभुने सुन्दर पीताम्बर पहन रखा था। उनके मस्तक आदि अंगोंमें मुकुट आदि महामूल्यवान् आभूषण शोभा पाते थे। उनका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला हुआ था। मैं उनकी छविपर मोहित हो रहा था। वे मुझे करोड़ों कामदेवोंके समान मनोहर दिखायी दिये। उनका वह अत्यन्त सुन्दर रूप देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। वे साँवली और सुनहरी आभासे उद्भासित हो रहे थे। उस समय उन सदसत्स्वरूप, सर्वात्मा, चार भुजा धारण करनेवाले, महाबाहु नारायणदेवको वहाँ उस रूपमें अपने साथ देखकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ।

तदनन्तर उन नारायणदेवके साथ मेरी बातचीत आरम्भ हुई। भगवान् शिवकी लीलासे वहाँ हम दोनोंमें कुछ विवाद छिड़ गया। इसी समय हमलोगोंके बीचमें एक महान् अग्निस्तम्भ (ज्योतिर्मयलिंग) प्रकट हुआ। मैंने और श्रीविष्णुने क्रमशः ऊपर और नीचे जाकर उसके आदि-अन्तका पता लगानेके लिये बड़ा प्रयत्न किया, परंतु हमें कहीं भी उसका ओर-छोर नहीं मिला। मैं थककर ऊपरसे नीचे लौट आया और भगवान् विष्णु भी उसी तरह नीचेसे ऊपर आकर मुझसे मिले। हम दोनों शिवकी मायासे मोहित थे। श्रीहरिने मेरे साथ आगे-पीछे और अगल-बगलसे परमेश्वर शिवको प्रणाम किया। फिर वे सोचने लगे—‘यह क्या वस्तु है?’ इसके स्वरूपका निर्देश नहीं किया जा सकता; क्योंकि न तो इसका कोई नाम है और न कर्म ही है। लिंगरहित तत्त्व ही यहाँ लिंगभावको प्राप्त हो गया है। ध्यानमार्गमें भी इसके स्वरूपका कुछ पता नहीं चलता। इसके बाद मैं और श्रीहरि दोनोंने अपने चित्तको स्वस्थ करके उस अग्निस्तम्भको प्रणाम करना आरम्भ किया।

हम दोनों बोले—महाप्रभो! हम आपके स्वरूपको नहीं जानते। आप जो कोई भी क्यों न हों, आपको हमारा नमस्कार है। महेशान! आप शीघ्र ही हमें अपने यथार्थ रूपका दर्शन कराइये।

मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार अहंकारसे आविष्ट हुए हम दोनों ही वहाँ नमस्कार करने लगे। ऐसा करते हुए हमारे सौ वर्ष बीत गये। (अध्याय ७)


ब्रह्मा और विष्णुको भगवान् शिवके शब्दमय शरीरका दर्शन

ब्रह्माजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ नारद! इस प्रकार हम दोनों देवता गर्वरहित हो निरन्तर प्रणाम करते रहे। हम दोनोंके मनमें एक ही अभिलाषा थी कि इस ज्योतिर्लिंगके रूपमें प्रकट हुए परमेश्वर प्रत्यक्ष दर्शन दें। भगवान् शंकर दीनोंके प्रतिपालक,

* रुद्रसंहिता * १२५

अहंकारियोंका गर्व चूर्ण करनेवाले तथा सबके अविनाशी प्रभु हैं। वे हम दोनोंपर दयालु हो गये। उस समय वहाँ उन सुरश्रेष्ठसे, 'ओ३म्', 'ओ३म्' ऐसा शब्दरूप नाद प्रकट हुआ, जो स्पष्टरूपसे सुनायी देता था। वह नाद प्लुत स्वरमें अभिव्यक्त हुआ था। जोरसे प्रकट होनेवाले उस शब्दके विषयमें 'यह क्या है' ऐसा सोचते हुए समस्त देवताओंके आराध्य भगवान् विष्णु मेरे साथ संतुष्टचित्तसे खड़े रहे। वे सर्वथा वैरभावसे रहित थे। उन्होंने लिंगके दक्षिणभागमें सनातन आदिवर्ण अकारका दर्शन किया। उत्तरभागमें उकारका, मध्यभागमें मकारका और अन्तमें 'ओ३म्' इस नादका साक्षात् दर्शन एवं अनुभव किया। दक्षिणभागमें प्रकट हुए आदिवर्ण अकारको सूर्यमण्डलके समान तेजोमय देखकर जब उन्होंने उत्तरभागमें दृष्टिपात किया, तब वहाँ उकार वर्ण अग्निके समान दीप्तिशाली दिखायी दिया। मुनिश्रेष्ठ ! इसी तरह उन्होंने मध्यभागमें मकारको चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल कान्तिसे प्रकाशमान देखा। तदनन्तर जब उसके ऊपर दृष्टि डाली, तब शुद्ध स्फटिकमणिके समान निर्मल प्रभासे युक्त, तुरीयातीत, अमल, निष्कल, निरुपद्रव, निर्द्वन्द्व, अद्वितीय, शून्यमय, बाह्य और आभ्यन्तरके भेदसे रहित, बाह्यान्तरभेदसे युक्त, जगत्के भीतर और बाहर स्वयं ही स्थित, आदि, मध्य और अन्तसे रहित, आनन्दके आदिकारण तथा सबके परम आश्रय, सत्य, आनन्द एवं अमृतस्वरूप परब्रह्मका साक्षात्कार किया।

उस समय श्रीहरि यह सोचने लगे कि 'यह अग्निस्तम्भ यहाँ कहाँसे प्रकट हुआ है? हम दोनों फिर इसकी परीक्षा करें। मैं इस अनुपम अनलस्तम्भके नीचे जाऊँगा।' ऐसा विचार करते हुए श्रीहरिने वेद और शब्द दोनोंके आवेशसे युक्त विश्वात्मा शिवका चिन्तन किया। तब वहाँ एक ऋषि प्रकट हुए, जो ऋषि-समूहके परम साररूप माने जाते हैं। उन्हीं ऋषिके द्वारा परमेश्वर श्रीविष्णुने जाना कि इस शब्दब्रह्ममय शरीरवाले परम लिंगके रूपमें साक्षात् परब्रह्मस्वरूप महादेवजी ही यहाँ प्रकट हुए हैं। ये चिन्तारहित (अथवा अचिन्त्य) रुद्र हैं। जहाँ जाकर मनसहित वाणी उसे प्राप्त किये बिना ही लौट आती है, उस परब्रह्म परमात्मा शिवका वाचक एकाक्षर (प्रणव) ही है, वे इसके वाच्यार्थरूप हैं। वह परम कारण, ऋत, सत्य, आनन्द एवं अमृतस्वरूप परात्पर परब्रह्म एकाक्षरका वाच्य है। प्रणवके एक अक्षर अकारसे जगत्के बीजभूत अण्डजन्मा भगवान् ब्रह्माका बोध होता है। उसके दूसरे एक अक्षर उकारसे परम कारणरूप श्रीहरिका बोध होता है और तीसरे एक अक्षर मकारसे भगवान् नील-लोहित शिवका ज्ञान होता है। अकार सृष्टिकर्ता है, उकार मोहमें डालनेवाला है और मकार नित्य अनुग्रह करनेवाला है। मकार-बोध्य सर्वव्यापी शिव बीजी (बीजमात्रके स्वामी) हैं और 'अकार' संज्ञक मुझ ब्रह्माको 'बीज' कहते हैं। 'उकार' नामधारी श्रीहरि योनि हैं। प्रधान और पुरुषके भी ईश्वर जो महेश्वर हैं, वे बीजी, बीज और योनि भी हैं। उन्हींको 'नाद' कहा गया है। (उनके भीतर सबका समावेश है।) बीजी अपनी इच्छासे ही अपने बीजको अनेक रूपोंमें विभक्त करके

१२६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

स्थित हैं। इन बीजी भगवान् महेश्वरके लिंगसे अकाररूप बीज प्रकट हुआ, जो उकाररूप योनिमें स्थापित होकर सब ओर बढ़ने लगा। वह सुवर्णमय अण्डके रूपमें ही बताने योग्य था। उसका और कोई विशेष लक्षण नहीं लक्षित होता था। वह दिव्य अण्ड अनेक वर्षोंतक जलमें ही स्थित रहा। तदनन्तर एक हजार वर्षके बाद उस अण्डके दो टुकड़े हो गये। जलमें स्थित हुआ वह अण्ड अजन्मा ब्रह्माजीकी उत्पत्तिका स्थान था और साक्षात् महेश्वरके आघातसे ही फूटकर दो भागोंमें बँट गया था। उस अवस्थामें उसका ऊपर स्थित हुआ सुवर्णमय कपाल बड़ी शोभा पाने लगा। वही द्युलोकके रूपमें प्रकट हुआ तथा जो उसका दूसरा नीचेवाला कपाल था, वही यह पाँच लक्षणोंसे युक्त पृथिवी है। उस अण्डसे चतुर्मुख ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिनकी 'क' संज्ञा है। वे समस्त लोकोंके स्रष्टा हैं। इस प्रकार वे भगवान् महेश्वर ही 'अ', 'उ' और 'म्' इन त्रिविध रूपोंमें वर्णित हुए हैं। इसी अभिप्रायसे उन ज्योतिर्लिंगस्वरूप सदाशिवने 'ओ३म्', 'ओ३म्' ऐसा कहा— यह बात यजुर्वेदके श्रेष्ठ मन्त्र कहते हैं। यजुर्वेदके श्रेष्ठ मन्त्रोंका यह कथन सुनकर ऋचाओं और साममन्त्रोंने भी हमसे आदरपूर्वक कहा— 'हे हरे! हे ब्रह्मन्! यह बात ऐसी ही है।' इस तरह देवेश्वर शिवको जानकर श्रीहरिने शक्तिसम्भूत मन्त्रोंद्वारा उत्तम एवं महान् अभ्युदयसे शोभित होनेवाले उन महेश्वरदेवका स्तवन किया। इसी बीचमें मेरे साथ विश्वपालक भगवान् विष्णुने एक और भी अद्भुत एवं सुन्दर रूप देखा। मुने! वह रूप पाँच मुखों और दस भुजाओंसे अलंकृत था। उसकी कान्ति कर्पूरके समान गौर थी। वह नाना प्रकारकी छटाओंसे छविमान् और भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित था। उस परम उदार महापराक्रमी और महापुरुषके लक्षणोंसे सम्पन्न अत्यन्त उत्कृष्ट रूपका दर्शन करके मैं और श्रीहरि दोनों कृतार्थ हो गये।

तत्पश्चात् परमेश्वर भगवान् महेश प्रसन्न हो अपने दिव्य शब्दमय रूपको प्रकट करके हँसते हुए खड़े हो गये। अकार उनका मस्तक और आकार ललाट है। इकार दाहिना और ईकार बायाँ नेत्र है। उकारको उनका दाहिना और ऊकारको बायाँ कान बताया जाता है। ऋकार उन परमेश्वरका दायाँ कपोल है और ॠकार बायाँ। लृ और लॄ—ये उनकी नासिकाके दोनों छिद्र हैं। एकार उन सर्वव्यापी प्रभुका ऊपरी ओष्ठ है और ऐकार अधर। ओकार तथा औकार— ये दोनों क्रमशः उनकी ऊपर और नीचेकी दो दन्तपंक्तियाँ हैं। 'अं' और 'अः' उन देवाधिदेव शूलधारी शिवके दोनों तालु हैं। क आदि पाँच अक्षर उनके दाहिने पाँच हाथ हैं और च आदि पाँच अक्षर बायें पाँच हाथ; ट आदि और त आदि पाँच-पाँच अक्षर उनके पैर हैं। पकार पेट है। फकारको दाहिना पार्श्व बताया जाता है और बकारको बायाँ पार्श्व। भकारको कंधा कहते हैं। मकार उन योगी महादेव शम्भुका हृदय है। 'य' से लेकर 'स' तक सात अक्षर सर्वव्यापी शिवके शब्दमय शरीरकी सात धातुएँ हैं। हकार उनकी नाभि है और क्षकारको मेढ़ (मूत्रेन्द्रिय) कहा गया है। इस प्रकार निर्गुण एवं गुणस्वरूप परमात्माके शब्दमय रूपको भगवती उमाके

* रुद्रसंहिता * १२७


साथ देखकर मैं और श्रीहरि दोनों कृतार्थ हो गये। इस तरह शब्द-ब्रह्ममय-शरीरधारी महेश्वर शिवका दर्शन पाकर मेरे साथ श्रीहरिने उन्हें प्रणाम किया और पुनः ऊपरकी ओर देखा। उस समय उन्हें पाँच कलाओंसे युक्त ॐकारजनित मन्त्रका साक्षात्कार हुआ। तत्पश्चात् महादेवजीका ‘ॐ तत्त्वमसि’ यह महावाक्य दृष्टिगोचर हुआ, जो परम उत्तम मन्त्ररूप है तथा शुद्ध स्फटिकके समान निर्मल है। फिर सम्पूर्ण धर्म और अर्थका साधक तथा बुद्धिस्वरूप गायत्री नामक दूसरा महान् मन्त्र लक्षित हुआ, जिसमें चौबीस अक्षर हैं तथा जो चारों पुरुषार्थरूपी फल देनेवाला है। तत्पश्चात् मृत्युंजय-मन्त्र फिर पंचाक्षर-मन्त्र तथा दक्षिणामूर्तिसंज्ञक चिन्तामणि-मन्त्रका साक्षात्कार हुआ। इस प्रकार पाँच मन्त्रोंकी उपलब्धि करके भगवान् श्रीहरि उनका जप करने लगे।

तदनन्तर ऋक्, यजुः और साम—ये जिनके रूप हैं, जो ईशोंके मुकुटमणि ईशान हैं, जो पुरातन पुरुष हैं, जिनका हृदय अघोर अर्थात् सौम्य है, जो हृदयको प्रिय लगनेवाले सर्वगुह्य सदाशिव हैं, जिनके चरण वाम—परम सुन्दर हैं, जो महान् देवता हैं और महान् सर्पराजको आभूषणके रूपमें धारण करते हैं, जिनके सभी ओर पैर और सभी ओर नेत्र हैं, जो मुझ ब्रह्माके भी अधिपति, कल्याणकारी तथा सृष्टि, पालन एवं संहार करनेवाले हैं, उन वरदायक साम्बशिवका मेरे साथ भगवान् विष्णुने प्रिय वचनोंद्वारा संतुष्टचित्तसे स्तवन किया।

(अध्याय ८)


उमासहित भगवान् शिवका प्राकट्य, उनके द्वारा अपने स्वरूपका विवेचन तथा ब्रह्मा आदि तीनों देवताओंकी एकताका प्रतिपादन

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भगवान् विष्णुके द्वारा की हुई अपनी स्तुति सुनकर करुणानिधि महेश्वर बड़े प्रसन्न हुए और उमादेवीके साथ सहसा वहाँ प्रकट हो गये। उस समय उनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र शोभा पाते थे। भालदेशमें चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित था। सिरपर जटा धारण किये गौरवर्ण, विशालनेत्र शिवने अपने सम्पूर्ण अंगोंमें विभूति लगा रखी थी। उनके दस भुजाएँ थीं। कण्ठमें नील चिह्न था। उनके श्रीअंग समस्त आभूषणोंसे विभूषित थे। उन सर्वांगसुन्दर शिवके मस्तक भस्ममय त्रिपुण्ड्रसे अंकित थे। ऐसे विशेषणोंसे युक्त परमेश्वर महादेवजीको भगवती उमाके साथ उपस्थित देख मैंने और भगवान् विष्णुने पुनः प्रिय वचनोंद्वारा उनकी स्तुति की। तब पापहारी करुणाकर भगवान् महेश्वरने प्रसन्नचित्त होकर उन श्रीविष्णुदेवको श्वासस्वरूपसे वेदका उपदेश दिया। मुने! उनके बाद शिवने परमात्मा श्रीहरिको गुह्य ज्ञान प्रदान किया। फिर उन परमात्माने कृपा करके मुझे भी वह ज्ञान दिया। वेदका ज्ञान प्राप्त करके कृतार्थ हुए भगवान् विष्णुने मेरे साथ हाथ जोड़ महेश्वरको नमस्कार करके पुनः उनसे पूजनकी विधि बताने तथा सदुपदेश देनेके लिये प्रार्थना की।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! श्रीहरिकी

१२८ * संक्षिप्त शिवपुराण *


यह बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए कृपानिधान भगवान् शिवने प्रीतिपूर्वक यह बात कही।

श्रीशिव बोले—सुरश्रेष्ठगण! मैं तुम दोनोंकी भक्तिसे निश्चय ही बहुत प्रसन्न हूँ। तुमलोग मुझ महादेवकी ओर देखो। इस समय तुम्हें मेरा स्वरूप जैसा दिखायी देता है, वैसे ही रूपका प्रयत्नपूर्वक पूजन-चिन्तन करना चाहिये। तुम दोनों महाबली हो और मेरी स्वरूपभूता प्रकृतिसे प्रकट हुए हो। मुझ सर्वेश्वरके दायें-बायें अंगोंसे तुम्हारा आविर्भाव हुआ है। ये लोकपितामह ब्रह्मा मेरे दाहिने पार्श्वसे उत्पन्न हुए हैं और तुम विष्णु मुझ परमात्माके वाम पार्श्वसे प्रकट हुए हो। मैं तुम दोनोंपर भलीभाँति प्रसन्न हूँ और तुम्हें मनोवांछित वर देता हूँ। मेरी आज्ञासे तुम दोनोंकी मुझमें सुदृढ़ भक्ति हो। ब्रह्मन्! तुम मेरी आज्ञाका पालन करते हुए जगत्की सृष्टि करो और वत्स विष्णो! तुम इस चराचर जगत्का पालन करते रहो।

हम दोनोंसे ऐसा कहकर भगवान् शंकरने हमें पूजाकी उत्तम विधि प्रदान की, जिसके अनुसार पूजित होनेपर वे पूजकको अनेक प्रकारके फल देते हैं। शम्भुकी उपर्युक्त बात सुनकर मेरेसहित श्रीहरिने महेश्वरको हाथ जोड़ प्रणाम करके कहा।

भगवान् विष्णु बोले—प्रभो! यदि हमारे प्रति आपके हृदयमें प्रीति उत्पन्न हुई है और यदि आप हमें वर देना आवश्यक समझते हैं तो हम यही वर माँगते हैं कि आपमें हम दोनोंकी सदा अनन्य एवं अविचल भक्ति बनी रहे।

ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! श्रीहरिकी यह बात सुनकर भगवान् हरने पुनः मस्तक झुकाकर प्रणाम करके हाथ जोड़े खड़े हुए उन नारायणदेवसे स्वयं कहा।

श्रीमहेश्वर बोले—मैं सृष्टि, पालन और संहारका कर्ता हूँ, सगुण और निर्गुण हूँ तथा सच्चिदानन्दस्वरूप निर्विकार परब्रह्म परमात्मा हूँ। विष्णो! सृष्टि, रक्षा और प्रलयरूप गुणों अथवा कार्योंके भेदसे मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नाम धारण करके तीन स्वरूपोंमें विभक्त हुआ हूँ। हरे! वास्तवमें मैं सदा निष्कल हूँ। विष्णो! तुमने और ब्रह्माने मेरे अवतारके निमित्त जो स्तुति की है, तुम्हारी उस प्रार्थनाको मैं अवश्य सच्ची करूँगा; क्योंकि मैं भक्तवत्सल हूँ। ब्रह्मन्! मेरा ऐसा ही परम उत्कृष्ट रूप तुम्हारे शरीरसे इस लोकमें प्रकट होगा, जो नामसे 'रुद्र' कहलायेगा। मेरे अंशसे प्रकट हुए रुद्रकी सामर्थ्य मुझसे कम नहीं होगी। जो मैं हूँ, वही यह रुद्र है। पूजाकी विधि-विधानकी दृष्टिसे भी मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं है। जैसे ज्योतिका जल आदिके साथ सम्पर्क होनेपर भी उसमें स्पर्शदोष नहीं लगता, उसी प्रकार मुझ निर्गुण परमात्माको भी किसीके संयोगसे बन्धन नहीं प्राप्त होता। यह मेरा शिवरूप है। जब रुद्र प्रकट होंगे, तब वे भी शिवके ही तुल्य होंगे। महामुने! उनमें और शिवमें परायेपनका भेद नहीं करना चाहिये। वास्तवमें एक ही रूप सब जगत्में व्यवहार-निर्वाहके लिये दो रूपोंमें विभक्त हो गया है। अतः शिव और रुद्रमें कभी भेदबुद्धि नहीं करनी चाहिये। वास्तवमें सारा दृश्य ही मेरे विचारसे शिवरूप है।

मैं, तुम, ब्रह्मा तथा जो ये रुद्र प्रकट होंगे, वे सब-के-सब एकरूप हैं। इनमें भेद

* रुद्रसंहिता * १२९

नहीं है। भेद माननेपर अवश्य ही बन्धन होगा। तथापि मेरा शिवरूप ही सनातन है। यही सदा सब रूपोंका मूलभूत कहा गया है। यह सत्य, ज्ञान एवं अनन्त ब्रह्म है।$^१$ ऐसा जानकर सदा मनसे मेरे यथार्थ-स्वरूपका दर्शन करना चाहिये। ब्रह्मन्! सुनो, मैं तुम्हें एक गोपनीय बात बता रहा हूँ। मैं स्वयं ब्रह्माजीकी भृकुटिसे प्रकट होऊँगा। गुणोंमें भी मेरा प्राकट्य कहा गया है। जैसा कि लोगोंने कहा है 'हर तामस प्रकृतिके हैं।' वास्तवमें उस रूपमें अहंकारका वर्णन हुआ है। उस अहंकारको केवल तामस ही नहीं, वैकारिक (सात्त्विक) भी समझना चाहिये (क्योंकि सात्त्विक देवगण वैकारिक अहंकारकी ही सृष्टि हैं)। यह तामस और सात्त्विक आदि भेद केवल नाममात्रका है, वस्तुतः नहीं है। वास्तवमें 'हर' को तामस नहीं कहा जा सकता। ब्रह्मन्! इस कारणसे तुम्हें ऐसा करना चाहिये। तुम तो इस सृष्टिके निर्माता बनो और श्रीहरि इसका पालन करें तथा मेरे अंशसे प्रकट होनेवाले जो रुद्र हैं, वे इसका प्रलय करनेवाले होंगे। ये जो 'उमा' नामसे विख्यात परमेश्वरी प्रकृति देवी हैं, इन्हींकी शक्तिभूता वाग्देवी ब्रह्माजीका सेवन करेंगी। फिर इन प्रकृति देवीसे वहाँ जो दूसरी शक्ति प्रकट होगी वे लक्ष्मीरूपसे भगवान् विष्णुका आश्रय लेंगी। तदनन्तर पुनः काली नामसे जो तीसरी शक्ति प्रकट होंगी, वे निश्चय ही मेरे अंशभूत रुद्रदेवको प्राप्त होंगी। वे कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ ज्योतिरूपसे प्रकट होंगी। इस प्रकार मैंने देवीकी शुभस्वरूपा पराशक्तियोंका परिचय दिया। उनका कार्य क्रमशः सृष्टि, पालन और संहारका सम्पादन ही है। सुरश्रेष्ठ! ये सब-की-सब मेरी प्रिया प्रकृति देवीकी अंशभूता हैं। हरे! तुम लक्ष्मीका सहारा लेकर कार्य करो। ब्रह्मन्! तुम्हें प्रकृतिकी अंशभूता वाग्देवीको पाकर मेरी आज्ञाके अनुसार मनसे सृष्टिकार्यका संचालन करना चाहिये और मैं अपनी प्रियाकी अंशभूता परात्पर कालीका आश्रय ले रुद्ररूपसे प्रलय-सम्बन्धी उत्तम कार्य करूँगा। तुम सब लोग अवश्य ही सम्पूर्ण आश्रमों तथा उनसे भिन्न अन्यान्य विविध कार्योंद्वारा चारों वर्णोंसे भरे हुए लोककी सृष्टि एवं रक्षा आदि करके सुख पाओगे। हरे! तुम ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न तथा सम्पूर्ण लोकोंके हितैषी हो। अतः अब मेरी आज्ञा पाकर जगत्में सब लोगोंके लिये मुक्तिदाता बनो। मेरा दर्शन होनेपर जो फल प्राप्त होता है, वही तुम्हारा दर्शन होनेपर भी होगा। मेरी यह बात सत्य है, सत्य है, इसमें संशयके लिये स्थान नहीं है। मेरे हृदयमें विष्णु हैं और विष्णुके हृदयमें मैं हूँ। जो इन दोनोंमें अन्तर नहीं समझता, वही मुझे विशेष प्रिय है।$^२$ श्रीहरि मेरे बायें अंगसे प्रकट हुए हैं। ब्रह्माका दाहिने अंगसे प्राकट्य हुआ है और महाप्रलयकारी विश्वात्मा रुद्र मेरे हृदयसे प्रादुर्भूत होंगे। विष्णो! मैं ही सृष्टि, पालन


१- मूलभूतं सदोक्तं च सत्यज्ञानमनन्तकम्। (शि० पु० रू० सृ० ९। ४०)
२- ममैव हृदये विष्णुर्विष्णोश्च हृदये ह्यहम्॥ उभयोरन्तरं यो वै न जानाति मतो मम। (शि० पु० रू० सृ० ९। ५५-५६)


789 संक्षिप्त शिवपुराण—5 A

१३० * संक्षिप्त शिवपुराण *

और संहार करनेवाले रज आदि त्रिविध गुणोंद्वारा ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रनामसे प्रसिद्ध हो तीन रूपोंमें पृथक्-पृथक् प्रकट होता हूँ। साक्षात् शिव गुणोंसे भिन्न हैं। वे प्रकृति और पुरुषसे भी परे हैं—अद्वितीय, नित्य, अनन्त, पूर्ण एवं निरंजन परब्रह्म परमात्मा हैं। तीनों लोकोंका पालन करनेवाले श्रीहरि भीतर तमोगुण और बाहर सत्त्वगुण धारण करते हैं, त्रिलोकीका संहार करनेवाले रुद्रदेव भीतर सत्त्वगुण और बाहर तमोगुण धारण करते हैं तथा त्रिभुवनकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजी बाहर और भीतरसे भी रजोगुणी ही हैं। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र—इन तीन देवताओंमें गुण हैं, परंतु शिव गुणातीत माने गये हैं। विष्णो! तुम मेरी आज्ञासे इन सृष्टिकर्ता पितामहका प्रसन्नतापूर्वक पालन करो; ऐसा करनेसे तीनों लोकोंमें पूजनीय होओगे। (अध्याय ९)


श्रीहरिको सृष्टिकी रक्षाका भार एवं भोग-मोक्ष-दानका अधिकार दे भगवान् शिवका अन्तर्धान होना

परमेश्वर शिव बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हरे! विष्णो! अब तुम मेरी दूसरी आज्ञा सुनो। उसका पालन करनेसे तुम सदा समस्त लोकोंमें माननीय और पूजनीय बने रहोगे। ब्रह्माजीके द्वारा रचे गये लोकमें जब कोई दुःख या संकट उत्पन्न हो, तब तुम उन सम्पूर्ण दुःखोंका नाश करनेके लिये सदा तत्पर रहना। तुम्हारे सम्पूर्ण दुस्सह कार्योंमें मैं तुम्हारी सहायता करूँगा। तुम्हारे जो दुर्जेय और अत्यन्त उत्कट शत्रु होंगे, उन सबको मैं मार गिराऊँगा। हरे! तुम नाना प्रकारके अवतार धारण करके लोकमें अपनी उत्तम कीर्तिका विस्तार करो और सबके उद्धारके लिये तत्पर रहो। तुम रुद्रके ध्येय हो और रुद्र तुम्हारे ध्येय हैं। तुममें और रुद्रमें कुछ भी अन्तर नहीं है।* जो मनुष्य रुद्रका भक्त होकर तुम्हारी निन्दा करेगा, उसका सारा पुण्य तत्काल भस्म हो जायगा। पुरुषोत्तम विष्णो! तुमसे द्वेष करनेके कारण मेरी


* रुद्रध्येयो भवांश्चैव भवद्ध्येयो हरस्तथा। युवयोरन्तरं नैव तव रुद्रस्य किंचन॥ (शि० पु० रु० सृ० खं० १०। ६)

789 संक्षिप्त शिवपुराण—5 B