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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

* रुद्रसंहिता * १३१

आज्ञासे उसको नरकमें गिरना पड़ेगा। यह बात सत्य है, सत्य है। इसमें संशय नहीं है।$^१$ तुम इस लोकमें मनुष्योंके लिये विशेषतः भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले और भक्तोंके ध्येय तथा पूज्य होकर प्राणियोंका निग्रह और अनुग्रह करो।

ऐसा कहकर भगवान् शिवने मेरा हाथ पकड़ लिया और श्रीविष्णुको सौंपकर उनसे कहा—'तुम संकटके समय सदा इनकी सहायता करते रहना। सबके अध्यक्ष होकर सभीको भोग और मोक्ष प्रदान करना तथा सर्वदा समस्त कामनाओंका साधक एवं सर्वश्रेष्ठ बने रहना। जो तुम्हारी शरणमें आ गया, वह निश्चय ही मेरी शरणमें आ गया। जो मुझमें और तुममें अन्तर समझता है, वह अवश्य नरकमें गिरता है।'$^२$

ब्रह्माजी कहते हैं—देवर्षे! भगवान् शिवका यह वचन सुनकर मेरे साथ भगवान् विष्णुने सबको वशमें करनेवाले विश्वनाथको प्रणाम करके मन्दस्वरमें कहा—

श्रीविष्णु बोले—करुणासिन्धो! जगन्नाथ शंकर! मेरी यह बात सुनिये। मैं आपकी आज्ञाके अधीन रहकर यह सब कुछ करूँगा। स्वामिन्! जो मेरा भक्त होकर आपकी निन्दा करे, उसे आप निश्चय ही नरकवास प्रदान करें। नाथ! जो आपका भक्त है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। जो ऐसा जानता है, उसके लिये मोक्ष दुर्लभ नहीं है।$^३$

श्रीहरिका यह कथन सुनकर दुःखहारी हरने उनकी बातका अनुमोदन किया और नाना प्रकारके धर्मोंका उपदेश देकर हम दोनोंके हितकी इच्छासे हमें अनेक प्रकारके वर दिये। इसके बाद भक्तवत्सल भगवान् शम्भु कृपापूर्वक हमारी ओर देखकर हम दोनोंके देखते-देखते सहसा वहीं अन्तर्धान हो गये। तभीसे इस लोकमें लिंग-पूजाका विधान चालू हुआ है। लिंगमें प्रतिष्ठित भगवान् शिव भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। शिवलिंगकी जो वेदी या अर्घा है, वह महादेवीका स्वरूप है और लिंग साक्षात् महेश्वरका। लयका अधिष्ठान होनेके कारण भगवान् शिवको लिंग कहा गया है; क्योंकि उन्हींमें निखिल जगत्का लय होता है। महामुने! जो शिवलिंगके समीप कोई कार्य करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है।

(अध्याय १०)


१-रुद्रभक्तो नरो यस्तु तव निन्दां करिष्यति। तस्य पुण्यं च निखिलं द्रुतं भस्म भविष्यति॥
नरके पतनं तस्य त्वद्वेषात्पुरुषोत्तम। मदाज्ञया भवेद्विष्णो सत्यं सत्यं न संशयः॥
(शि० पु० रु० सृ० खं० १०। ८-९)

२-त्वां यः समाश्रितो नूनं मामेव सः समाश्रितः। अन्तरं यश्च जानाति निरये पतति ध्रुवम्॥
(शि० पु० रु० सृ० खं० १०। १४)

३-मम भक्तश्च यः स्वामिंस्तव निन्दां करिष्यति। तस्य वै निरये वासं प्रयच्छ नियतं ध्रुवम्॥
त्वद्भक्तो यो भवेत्स्वामिन्मम प्रियतरो हि सः। एवं वै यो विजानाति तस्य मुक्तिर्न दुर्लभा॥
(शि० पु० रु० सृ० खं० १०। ३०-३१)


789 संक्षिप्त शिवपुराण—5 C

१३२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

शिवपूजनकी विधि तथा उसका फल

ऋषि बोले—व्यासशिष्य महाभाग सूतजी ! आपको नमस्कार है। आज आपने भगवान् शिवकी बड़ी अद्भुत एवं परम पावन कथा सुनायी है। दयानिधे! ब्रह्मा और नारदजीके संवादके अनुसार आप हमें शिवपूजनकी वह विधि बताइये, जिससे यहाँ भगवान् शिव संतुष्ट होते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—सभी शिवकी पूजा करते हैं। वह पूजन कैसे करना चाहिये ? आपने व्यासजीके मुखसे इस विषयको जिस प्रकार सुना हो, वह बताइये।

महर्षियोंका वह कल्याणप्रद एवं श्रुतिसम्मत वचन सुनकर सूतजीने उन मुनियोंके प्रश्नके अनुसार सब बातें प्रसन्नतापूर्वक बतायीं।

सूतजी बोले—मुनीश्वरो! आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। परंतु वह रहस्यकी बात है। मैंने इस विषयको जैसा सुना है और जैसी मेरी बुद्धि है, उसके अनुसार आज कुछ कह रहा हूँ। जैसे आपलोग पूछ रहे हैं, उसी तरह पूर्वकालमें व्यासजीने सनत्कुमारजीसे पूछा था। फिर उसे उपमन्युजीने भी सुना था। व्यासजीने शिवपूजन आदि जो भी विषय सुना था, उसे सुनकर उन्होंने लोकहितकी कामनासे मुझे पढ़ा दिया था। इसी विषयको भगवान् श्रीकृष्णने महात्मा उपमन्युसे सुना था। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने नारदजीसे इस विषयमें जो कुछ कहा था, वही इस समय मैं कहूँगा।

ब्रह्माजीने कहा—नारद! मैं संक्षेपसे लिंगपूजनकी विधि बता रहा हूँ, सुनो। जैसा पहले कहा गया है, वैसा जो भगवान् शंकरका सुखमय, निर्मल एवं सनातन रूप है, उसका उत्तम भक्तिभावसे पूजन करे, इससे समस्त मनोवांछित फलोंकी प्राप्ति होगी। दरिद्रता, रोग, दुःख तथा शत्रुजनित पीड़ा—ये चार प्रकारके पाप (कष्ट) तभीतक रहते हैं, जबतक मनुष्य भगवान् शिवका पूजन नहीं करता। भगवान् शिव-की पूजा होते ही सारे दुःख विलीन हो जाते और समस्त सुखोंकी प्राप्ति हो जाती है। तत्पश्चात् समय आनेपर उपासककी मुक्ति भी होती है। जो मानवशरीरका आश्रय लेकर मुख्यतया संतान-सुखकी कामना करता है उसे चाहिये कि वह सम्पूर्ण कार्यों और मनोरथोंके साधक महादेवजीकी पूजा करे।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी सम्पूर्ण कामनाओं तथा प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये क्रमसे विधिके अनुसार भगवान् शंकरकी पूजा करे। प्रातःकाल ब्राह्म मुहूर्तमें उठकर गुरु तथा शिवका स्मरण करके तीर्थोंका चिन्तन एवं भगवान् विष्णुका ध्यान करे। फिर मेरा, देवताओंका और मुनि आदिका भी स्मरण-चिन्तन करके स्तोत्रपाठपूर्वक शंकरजीका विधिपूर्वक नाम ले। उसके बाद शय्यासे उठकर निवासस्थानसे दक्षिण दिशामें जाकर मलत्याग करे। मुने! एकान्तमें मलोत्सर्ग करना चाहिये। उससे शुद्ध होनेके लिये जो विधि मैंने सुन रखी है, उसीको आज कहता हूँ। मनको एकाग्र करके सुनो।

ब्राह्मण गुदाकी शुद्धिके लिये उसमें पाँच बार शुद्ध मिट्टीका लेप करे और धोये। क्षत्रिय चार बार, वैश्य तीन बार और शूद्र दो बार विधिपूर्वक गुदाकी शुद्धिके लिये उसमें


789 संक्षिप्त शिवपुराण—5 D

  • रुद्रसंहिता * १३३

मिट्टी लगाये। लिंगमें भी एक बार प्रयत्नपूर्वक मिट्टी लगानी चाहिये। तत्पश्चात् बायें हाथमें दस बार और दोनों हाथोंमें सात बार मिट्टी लगाकर धोये। तात! प्रत्येक पैरमें तीन-तीन बार मिट्टी लगाये। फिर दोनों हाथोंमें भी मिट्टी लगाकर धोये। स्त्रियोंको शूद्रकी ही भाँति अच्छी तरह मिट्टी लगानी चाहिये। हाथ-पैर धोकर पूर्ववत् शुद्ध मिट्टी ले और उसे लगाकर दाँत साफ करे। फिर अपने वर्णके अनुसार मनुष्य दतुअन करे। ब्राह्मणको बारह अंगुलकी दतुअन करनी चाहिये। क्षत्रिय ग्यारह अंगुल, वैश्य दस अंगुल और शूद्र नौ अंगुलकी दतुअन करे। यह दतुअनका मान बताया गया। मनुस्मृतिके अनुसार कालदोषका विचार करके ही दतुअन करे या त्याग दे। तात! षष्ठी, प्रतिपदा, अमावास्या, नवमी, व्रतका दिन, सूर्यास्तका समय, रविवार तथा श्राद्ध-दिवस—ये दन्तधावनके लिये वर्जित हैं— इनमें दतुअन नहीं करनी चाहिये। दतुअनके पश्चात् तीर्थ (जलाशय) आदिमें जाकर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिये, विशेष देश-काल आनेपर मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नान करना उचित है। स्नानके पश्चात् पहले आचमन करके वह धुला हुआ वस्त्र धारण करे। फिर सुन्दर एकान्त स्थलमें बैठकर संध्याविधिका अनुष्ठान करे। यथायोग्य संध्याविधिका पालन करके पूजाका कार्य आरम्भ करे।

मनको सुस्थिर करके पूजागृहमें प्रवेश करे। वहाँ पूजन-सामग्री लेकर सुन्दर आसनपर बैठे। पहले न्यास आदि करके क्रमशः महादेवजीकी पूजा करे। शिवकी पूजासे पहले गणेशजीकी, द्वारपालोंकी और दिक्पालोंकी भी भलीभाँति पूजा करके पीछे देवताके लिये पीठस्थानकी कल्पना करे। अथवा अष्टदलकमल बनाकर पूजाद्रव्यके समीप बैठे और उस कमलपर ही भगवान् शिवको समासीन करे। तत्पश्चात् तीन आचमन करके पुनः दोनों हाथ धोकर तीन प्राणायाम करके मध्यम प्राणायाम अर्थात् कुम्भक करते समय त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवका इस प्रकार ध्यान करे— उनके पाँच मुख हैं, दस भुजाएँ हैं, शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल कान्ति है, सब प्रकारके आभूषण उनके श्रीअंगोंको विभूषित करते हैं तथा वे व्याघ्रचर्मकी चादर ओढ़े हुए हैं। इस तरह ध्यान करके यह भावना करे कि मुझे भी इनके समान ही रूप प्राप्त हो जाय। ऐसी भावना करके मनुष्य सदाके लिये अपने पापको भस्म कर डाले। इस प्रकार भावनाद्वारा शिवका ही शरीर धारण करके उन परमेश्वरकी पूजा करे। शरीरशुद्धि करके मूलमन्त्रका क्रमशः न्यास करे अथवा सर्वत्र प्रणवसे ही षडंगन्यास करे। ‘ॐ अद्येत्यादि०’ रूपसे संकल्प-वाक्यका प्रयोग करके फिर पूजा आरम्भ करे। पाद्य, अर्घ्य और आचमनके लिये पात्रोंको तैयार करके रखे। बुद्धिमान् पुरुष विधिपूर्वक भिन्न-भिन्न प्रकारके नौ कलश स्थापित करे। उन्हें कुशाओंसे ढककर रखे और कुशाओंसे ही जल लेकर उन सबका प्रोक्षण करे। तत्पश्चात् उन-उन सभी पात्रोंमें शीतल जल डाले। फिर बुद्धिमान् पुरुष देखभालकर प्रणवमन्त्रके द्वारा उनमें निम्नांकित द्रव्योंको डाले। खस और चन्दनको पाद्यपात्रमें रखे। चमेलीके फूल, शीतलचीनी, कपूर, बड़की

१३४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

जड़ तथा तमाल—इन सबको यथोचित-रूपसे कूट-पीसकर चूर्ण बना ले और आचमनीयके पात्रमें डाले। इलायची और चन्दनको तो सभी पात्रोंमें डालना चाहिये। देवाधिदेव महादेवजीके पार्श्वभागमें नन्दीश्वरका पूजन करे। गन्ध, धूप तथा भाँति-भाँतिके दीपोंद्वारा शिवकी पूजा करे। फिर लिंगशुद्धि करके मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक मन्त्रसमूहोंके आदिमें प्रणव तथा अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर उनके द्वारा इष्टदेवके लिये यथोचित आसनकी कल्पना करे। फिर प्रणवसे पद्मासनकी कल्पना करके यह भावना करे कि इस कमलका पूर्वदल साक्षात् अणिमा नामक ऐश्वर्यरूप तथा अविनाशी है। दक्षिणदल लघिमा है। पश्चिमदल महिमा है। उत्तरदल प्राप्ति है। अग्निकोणका दल प्राकाम्य है। नैर्ऋत्यकोणका दल ईशित्व है। वायव्यकोणका दल वशित्व है। ईशानकोणका दल सर्वज्ञत्व है और उस कमलकी कर्णिकाको सोम कहा जाता है। सोमके नीचे सूर्य हैं, सूर्यके नीचे अग्नि हैं और अग्निके भी नीचे धर्म आदिके स्थान हैं। क्रमशः ऐसी कल्पना करनेके पश्चात् चारों दिशाओंमें अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार तथा उनके विकारोंकी कल्पना करे। सोमके अन्तमें सत्त्व, रज और तम— इन तीनों गुणोंकी कल्पना करे। इसके बाद 'सद्योजातं प्रपद्यामि' इत्यादि मन्त्रसे परमेश्वर शिवका आवाहन करके 'ॐ वामदेवाय नमः' इत्यादि वामदेव-मन्त्रसे उन्हें आसनपर विराजमान करे। फिर 'ॐ तत्पुरुषाय विद्महे' इत्यादि रुद्रगायत्रीद्वारा इष्टदेवका सांनिध्य प्राप्त करके उन्हें 'अघोरेभ्योऽथ' इत्यादि अघोरमन्त्रसे वहाँ निरुद्ध करे। फिर 'ईशानः सर्वविद्यानाम्' इत्यादि मन्त्रसे आराध्य देवका पूजन करे।

पाद्य और आचमनीय अर्पित करके अर्घ्य दे। तत्पश्चात् गन्ध और चन्दनमिश्रित जलसे विधिपूर्वक रुद्रदेवको स्नान कराये। फिर पंचगव्यनिर्माणकी विधिसे पाँचों द्रव्योंको एक पात्रमें लेकर प्रणवसे ही अभिमन्त्रित करके उन मिश्रित गव्यपदार्थोंद्वारा भगवान्‌को नहलाये। तत्पश्चात् पृथक्-पृथक् दूध, दही, मधु, गन्नेके रस तथा घीसे नहलाकर समस्त अभीष्टोंके दाता और हितकारी पूजनीय महादेवजीका प्रणवके उच्चारणपूर्वक पवित्र द्रव्योंद्वारा अभिषेक करे। पवित्र जलपात्रोंमें मन्त्रोच्चारणपूर्वक जल डाले। डालनेसे पहले साधक श्वेत वस्त्रसे उस जलको यथोचित रीतिसे छान ले। उस जलको तबतक दूर न करे, जबतक इष्टदेवको चन्दन न चढ़ा ले। तब सुन्दर अक्षतोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक शंकरजीकी पूजा करे। उनके ऊपर कुश, अपामार्ग, कपूर, चमेली, चम्पा, गुलाब, श्वेत कनेर, बेला, कमल और उत्पल आदि भाँति-भाँतिके अपूर्व पुष्प एवं चन्दन आदि चढ़ाकर पूजा करे। परमेश्वर शिवके ऊपर जलकी धारा गिरती रहे, इसकी भी व्यवस्था करे। जलसे भरे भाँति-भाँतिके पात्रोंद्वारा महेश्वरको नहलाये। मन्त्रोच्चारणपूर्वक पूजा करनी चाहिये। वह समस्त फलोंको देनेवाली होती है।

तात! अब मैं तुम्हें समस्त मनोवांछित कामनाओंकी सिद्धिके लिये उन पूजा-सम्बन्धी मन्त्रोंको भी संक्षेपसे बता रहा हूँ, सावधानीके साथ सुनो। पावमानमन्त्रसे, 'वाङ्मे' इत्यादि मन्त्रसे, रुद्रमन्त्र तथा नीलरुद्रमन्त्रसे, सुन्दर एवं शुभ पुरुषसूक्तसे,

* रुद्रसंहिता * १३५

श्रीसूक्तसे, सुन्दर अथर्वशीर्षके मन्त्रसे, 'आ नो भद्रा०' इत्यादि शान्तिमन्त्रसे, शान्तिसम्बन्धी दूसरे मन्त्रोंसे, भारुण्डमन्त्र और अरुणमन्त्रोंसे, अर्थाभीष्टसाम तथा देवव्रतसामसे, 'अभि त्वा०' इत्यादि रथन्तरसामसे, पुरुषसूक्तसे, मृत्युंजयमन्त्रसे तथा पंचाक्षरमन्त्रसे पूजा करे। एक सहस्त्र अथवा एक सौ एक जलधाराएँ गिरानेकी व्यवस्था करे। यह सब वेदमार्गसे अथवा नाममन्त्रोंसे करना चाहिये। तदनन्तर भगवान् शंकरके ऊपर चन्दन और फूल आदि चढ़ाये। प्रणवसे ही मुखवास (ताम्बूल) आदि अर्पित करे। इसके बाद जो स्फटिकमणिके समान निर्मल, निष्कल, अविनाशी, सर्वलोककारण, सर्वलोकमय परमदेव हैं; जो ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र और विष्णु आदि देवताओंकी भी दृष्टिमें नहीं आते; वेदवेत्ता विद्वानोंने जिन्हें वेदान्तमें मन-वाणीके अगोचर बताया है; जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित तथा समस्त रोगियोंके लिये औषधरूप हैं; जिनकी शिवतत्त्वके नामसे ख्याति है तथा जो शिवलिंगके रूपमें प्रतिष्ठित हैं, उन भगवान् शिवका शिवलिंगके मस्तकपर प्रणवमन्त्रसे ही पूजन करे। धूप, दीप, नैवेद्य, सुन्दर ताम्बूल एवं सुरम्य आरतीद्वारा यथोक्त विधिसे पूजा करके स्तोत्रों तथा अन्य नाना प्रकारके मन्त्रोंद्वारा उन्हें नमस्कार करे। फिर अर्घ्य देकर भगवान्‌के चरणोंमें फूल बिखेरे और साष्टांग प्रणाम करके देवेश्वर शिवकी आराधना करे। फिर हाथमें फूल लेकर खड़ा हो जाय और दोनों हाथ जोड़कर निम्नांकित मन्त्रसे सर्वेश्वर शंकरकी पुनः प्रार्थना करे—

अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया।
कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शंकर॥

'कल्याणकारी शिव! मैंने अनजानमें अथवा जान-बूझकर जो जप-पूजा आदि सत्कर्म किये हों, वे आपकी कृपासे सफल हों।'

इस प्रकार पढ़कर भगवान् शिवके ऊपर प्रसन्नतापूर्वक फूल चढ़ाये। स्वस्तिवाचन$^१$ करके नाना प्रकारकी आशीः$^२$ प्रार्थना करे। फिर शिवके ऊपर मार्जन$^३$ करना चाहिये। मार्जनके बाद नमस्कार करके अपराधके लिये क्षमा$^४$-प्रार्थना करते हुए पुनरागमनके लिये विसर्जन$^५$ करना चाहिये। इसके बाद 'अद्या'$^६$ से आरम्भ होनेवाले मन्त्रका उच्चारण करके नमस्कार करे। फिर सम्पूर्ण


१. 'ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥' इत्यादि स्वस्तिवाचनसम्बन्धी मन्त्र हैं।
२. 'काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी शस्यशालिनी। देशोऽयं क्षोभरहितो ब्राह्मणाः सन्तु निर्भयाः॥ सर्वे च सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥' इत्यादि आशीःप्रार्थनाएँ हैं।
३. 'ॐ आपो हि ष्ठामयोभुवः' (यजु० १९। ५०—५२) इत्यादि तीन मार्जन-मन्त्र कहे गये हैं। इन्हें पढ़ते हुए इष्टदेवपर जल छिड़कना 'मार्जन' कहलाता है।
४. 'अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। तानि सर्वाणि मे देव क्षमस्व परमेश्वर॥' इत्यादि क्षमा-प्रार्थनासम्बन्धी श्लोक हैं।
५. 'यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्। अभीष्टफलदानाय पुनरागमनाय च॥' इत्यादि विसर्जनसम्बन्धी श्लोक हैं।
६. 'ॐ अद्या देवा उदिता सूर्यस्य निरंहसः पिपृता निरवद्यात्। तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः।' (यजु० ३३। ४२)

१३६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

भावसे विभोर हो इस प्रकार प्रार्थना करे—
शिवे भक्तिः शिवे भक्तिः शिवे भक्तिर्भवे भवे।
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम॥

'प्रत्येक जन्ममें मेरी शिवमें भक्ति हो, शिवमें भक्ति हो, शिवमें भक्ति हो। शिवके सिवा दूसरा कोई मुझे शरण देनेवाला नहीं। महादेव ! आप ही मेरे लिये शरणदाता हैं।'

इस प्रकार प्रार्थना करके सम्पूर्ण सिद्धियोंके दाता देवेश्वर शिवका पराभक्तिके द्वारा पूजन करे। विशेषतः गलेकी आवाजसे भगवान्‌को संतुष्ट करे। फिर सपरिवार नमस्कार करके अनुपम प्रसन्नताका अनुभव करते हुए समस्त लौकिक कार्य सुखपूर्वक करता रहे।

जो इस प्रकार शिवभक्तिपरायण हो प्रतिदिन पूजन करता है, उसे अवश्य ही पग-पगपर सब प्रकारकी सिद्धि प्राप्त होती है। वह उत्तम वक्ता होता है तथा उसे मनोवांछित फलकी निश्चय ही प्राप्ति होती है। रोग, दुःख, दूसरोंके निमित्तसे होनेवाला उद्वेग, कुटिलता तथा विष आदिके रूपमें जो-जो कष्ट उपस्थित होता है, उसे कल्याणकारी परम शिव अवश्य नष्ट कर देते हैं। उस उपासकका कल्याण होता है। भगवान् शंकरकी पूजासे उसमें अवश्य सद्गुणोंकी वृद्धि होती है—ठीक उसी तरह, जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ते हैं। मुनिश्रेष्ठ नारद! इस प्रकार मैंने शिवकी पूजाका विधान बताया। अब तुम क्या सुनना चाहते हो? कौन-सा प्रश्न पूछनेवाले हो?

(अध्याय ११)
~~ ० ~~

भगवान् शिवकी श्रेष्ठता तथा उनके पूजनकी अनिवार्य आवश्यकताका प्रतिपादन

नारदजी बोले—ब्रह्मन्! प्रजापते! आप धन्य हैं; क्योंकि आपकी बुद्धि भगवान् शिवमें लगी हुई है। विधे! आप पुनः इसी विषयका सम्यक् प्रकारसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

ब्रह्माजीने कहा—तात! एक समयकी बात है, मैं सब ओरसे ऋषियों तथा देवताओंको बुलाकर उन सबको क्षीरसागरके तटपर ले गया, जहाँ सबका हित-साधन करनेवाले भगवान् विष्णु निवास करते हैं। वहाँ देवताओंके पूछनेपर भगवान् विष्णुने सबके लिये शिवपूजनकी ही श्रेष्ठता बतलाकर यह कहा कि 'एक मुहूर्त या एक क्षण भी जो शिवका पूजन नहीं किया जाता, वही हानि है, वही महान्

* रुद्रसंहिता * १३७

छिद्र है, वही अंधापन है और वही मूर्खता है। जो भगवान् शिवकी भक्तिमें तत्पर हैं, जो मनसे उन्हींको प्रणाम और उन्हींका चिन्तन करते हैं, वे कभी दुःखके भागी नहीं होते*। जो महान् सौभाग्यशाली पुरुष मनोहर भवन, सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित स्त्रियाँ, जितनेसे मनको संतोष हो उतना धन, पुत्र-पौत्र आदि संतति, आरोग्य, सुन्दर शरीर, अलौकिक प्रतिष्ठा, स्वर्गीय सुख, अन्तमें मोक्षरूपी फल अथवा परमेश्वर शिवकी भक्ति चाहते हैं, वे पूर्वजन्मोंके महान् पुण्यसे भगवान् सदाशिवकी पूजा-अर्चामें प्रवृत्त होते हैं। जो पुरुष नित्य-भक्तिपरायण हो शिवलिंगकी पूजा करता है, उसको सफल सिद्धि प्राप्त होती है तथा वह पापोंके चक्करमें नहीं पड़ता।

भगवान्‌के इस प्रकार उपदेश देनेपर देवताओंने उन श्रीहरिको प्रणाम किया और मनुष्योंकी समस्त कामनाओंकी पूर्तिके लिये उनसे शिवलिंग देनेके लिये प्रार्थना की। मुनिश्रेष्ठ उस प्रार्थनाको सुनकर जीवोंके उद्धारमें तत्पर रहनेवाले भगवान् विष्णुने विश्वकर्माको बुलाकर कहा—'विश्वकर्मन्! तुम मेरी आज्ञासे सम्पूर्ण देवताओंको सुन्दर शिवलिंगका निर्माण करके दो।' तब विश्वकर्माने मेरी और श्रीहरिकी आज्ञाके अनुसार उन देवताओंको उनके अधिकारके अनुसार शिवलिंग बनाकर दिये।

मुनिश्रेष्ठ नारद! किस देवताको कौन-सा शिवलिंग प्राप्त हुआ, इसका वर्णन आज मैं कर रहा हूँ; उसे सुनो। इन्द्र पद्मराग-मणिके बने हुए शिवलिंगकी और कुबेर सुवर्णमय लिंगकी पूजा करते हैं। धर्म पीतमणिमय (पुखराजके बने हुए) लिंगकी तथा वरुण श्यामवर्णके शिवलिंगकी पूजा करते हैं। भगवान् विष्णु इन्द्रनीलमय तथा ब्रह्मा हेममय लिंगकी पूजा करते हैं। मुने ! विश्वेदेवगण चाँदीके शिवलिंगकी, वसुगण पीतलके बने हुए लिंगकी तथा दोनों अश्विनीकुमार पार्थिवलिंगकी पूजा करते हैं। लक्ष्मीदेवी स्फटिकमय लिंगकी, आदित्यगण ताम्रमय लिंगकी, राजा सोम मोतीके बने हुए लिंगकी तथा अग्निदेव वज्र (हीरे)-के लिंगकी उपासना करते हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मण और उनकी पत्नियाँ मिट्टीके बने हुए शिवलिंगका, मयासुर चन्दननिर्मित लिंगका और नागगण मूँगेके बने हुए शिवलिंगका आदरपूर्वक पूजन करते हैं। देवी मक्खनके बने हुए लिंगकी, योगीजन भस्ममय लिंगकी, यक्षगण दधिनिर्मित लिंगकी, छायादेवी आटेसे बनाये हुए लिंगकी और ब्रह्मपत्नी रत्नमय शिवलिंगकी निश्चितरूपसे पूजा करती हैं। बाणासुर पारद या पार्थिवलिंगकी पूजा करता है। दूसरे लोग भी ऐसा ही करते हैं। ऐसे-ऐसे शिवलिंग बनाकर विश्वकर्माने विभिन्न लोगोंको दिये तथा वे सब देवता और ऋषि उन लिंगोंकी पूजा करते हैं। भगवान् विष्णुने इस तरह देवताओंको उनके हितकी कामनासे शिवलिंग देकर उनसे तथा मुझ ब्रह्मासे पिनाकपाणि महादेवके पूजनकी विधि भी


* भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतचेतसः। भवसंस्मरणा ये च न ते दुःखस्य भाजनाः॥
(शि० पु० रु० सृ० खं० १२। २१)

१३८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

बतायी। पूजन-विधिसम्बन्धी उनके वचनोंको सुनकर देवशिरोमणियोंसहित मैं ब्रह्मा हृदयमें हर्ष लिये अपने धाममें आ गया। मुने! वहाँ आकर मैंने समस्त देवताओं और ऋषियोंको शिव-पूजाकी उत्तम विधि बतायी, जो सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली है।

उस समय मुझ ब्रह्माने कहा—देवताओंसहित समस्त ऋषियो! तुम प्रेमपरायण होकर सुनो; मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे शिवपूजनकी उस विधिका वर्णन करता हूँ, जो भोग और मोक्ष देनेवाली है। देवताओ और मुनीश्वरो! समस्त जन्तुओंमें मनुष्य-जन्म प्राप्त करना प्रायः दुर्लभ है। उनमें भी उत्तम कुलमें जन्म तो और भी दुर्लभ है। उत्तम कुलमें भी आचारवान् ब्राह्मणोंके यहाँ उत्पन्न होना उत्तम पुण्यसे ही सम्भव है। यदि वैसा जन्म सुलभ हो जाय तो भगवान् शिवके सन्तोषके लिये उस उत्तम कर्मका अनुष्ठान करे, जो अपने वर्ण और आश्रमके लिये शास्त्रोंद्वारा प्रतिपादित है। जिस जातिके लिये जो कर्म बताया गया है, उसका उल्लंघन न करे। जितनी सम्पत्ति हो, उसके अनुसार ही दान करे। कर्ममय सहस्रों यज्ञोंसे तपोधज्ञ बढ़कर है। सहस्रों तपोधज्ञोंसे जपयज्ञका महत्त्व अधिक है। ध्यानयज्ञसे बढ़कर कोई वस्तु नहीं है। ध्यान ज्ञानका साधन है; क्योंकि योगी ध्यानके द्वारा अपने इष्टदेव समरस शिवका साक्षात्कार करता है।$^१$ ध्यानयज्ञमें तत्पर रहनेवाले उपासकके लिये भगवान् शिव सदा ही संनिहित हैं। जो विज्ञानसे सम्पन्न हैं, उन पुरुषोंकी शुद्धिके लिये किसी प्रायश्चित्त आदिकी आवश्यकता नहीं है।

मनुष्यको जबतक ज्ञानकी प्राप्ति न हो, तबतक वह विश्वास दिलानेके लिये कर्मसे ही भगवान् शिवकी आराधना करे। जगत्के लोगोंको एक ही परमात्मा अनेक रूपोंमें अभिव्यक्त हो रहा है। एकमात्र भगवान् सूर्य एक स्थानमें रहकर भी जलाशय आदि विभिन्न वस्तुओंमें अनेक-से दीखते हैं। देवताओ! संसारमें जो-जो सत् या असत् वस्तु देखी या सुनी जाती है, वह सब परब्रह्म शिवरूप ही है—ऐसा समझो। जबतक तत्त्वज्ञान न हो जाय, तबतक प्रतिमाकी पूजा आवश्यक है। ज्ञानके अभावमें भी जो प्रतिमा-पूजाकी अवहेलना करता है, उसका पतन निश्चित है। इसलिये ब्राह्मणो! यह यथार्थ बात सुनो। अपनी जातिके लिये जो कर्म बताया गया है, उसका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। जहाँ-जहाँ यथावत् भक्ति हो, उस-उस आराध्य-देवका पूजन आदि अवश्य करना चाहिये; क्योंकि पूजन और दान आदिके बिना पातक दूर नहीं होते।$^२$ जैसे मैले कपड़ेमें रंग बहुत अच्छा नहीं चढ़ता है किंतु जब उसको धोकर स्वच्छ कर लिया जाता है, तब उसपर सब रंग अच्छी तरह चढ़ते हैं,


१. ध्यानयज्ञात्परं नास्ति ध्यानं ज्ञानस्य साधनम्। यतः समरसं स्वेष्टं योगी ध्यानेन पश्यति॥ (शि० पु० रु० सृ० १२। ४६)
२. यत्र यत्र यथाभक्तिः कर्तव्यं पूजनादिकम्। विना पूजनदानादि पातकं न च दूरतः॥ (शि० पु० रु० सृ० खं० १२। ६९)

* रुद्रसंहिता * १३९

उसी प्रकार देवताओंकी भलीभाँति पूजासे जब त्रिविध शरीर पूर्णतया निर्मल हो जाता है, तभी उसपर ज्ञानका रंग चढ़ता है और तभी विज्ञानका प्राकट्य होता है। जब विज्ञान हो जाता है, तब भेदभावकी निवृत्ति हो जाती है। भेदकी सम्पूर्णतया निवृत्ति हो जानेपर द्वन्द्व-दुःख दूर हो जाते हैं और द्वन्द्व-दुःखसे रहित पुरुष शिवरूप हो जाता है।

मनुष्य जबतक गृहस्थ-आश्रममें रहे, तबतक पाँचों देवताओंकी तथा उनमें श्रेष्ठ भगवान् शंकरकी प्रतिमाका उत्तम प्रेमके साथ पूजन करे। अथवा जो सबके एकमात्र मूल हैं, उन भगवान् शिवकी ही पूजा सबसे बढ़कर है; क्योंकि मूलके सींचे जानेपर शाखास्थानीय सम्पूर्ण देवता स्वतः तृप्त हो जाते हैं। अतः जो सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको पाना चाहता है, वह अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिये समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहकर लोककल्याणकारी भगवान् शंकरका पूजन करे। (अध्याय १२)


शिवपूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन

ब्रह्माजी कहते हैं—अब मैं पूजाकी सर्वोत्तम विधि बता रहा हूँ, जो समस्त अभीष्ट तथा सुखोंको सुलभ करानेवाली है। देवताओ तथा ऋषियो! तुम ध्यान देकर सुनो। उपासकको चाहिये कि वह ब्राह्ममुहूर्तमें शयनसे उठकर जगदम्बा पार्वतीसहित भगवान् शिवका स्मरण करे तथा हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर भक्तिपूर्वक उनसे प्रार्थना करे—'देवेश्वर! उठिये, उठिये! मेरे हृदय-मन्दिरमें शयन करनेवाले देवता! उठिये! उमाकान्त! उठिये और ब्रह्माण्डमें सबका मंगल कीजिये। मैं धर्मको जानता हूँ, किंतु मेरी उसमें प्रवृत्ति नहीं होती। मैं अधर्मको जानता हूँ, परंतु मैं उससे दूर नहीं हो पाता। महादेव! आप मेरे हृदयमें स्थित होकर मुझे जैसी प्रेरणा देते हैं, वैसा ही मैं करता हूँ।' इस प्रकार भक्तिपूर्वक कहकर और गुरुदेवकी चरणपादुकाओंका स्मरण करके गाँवसे बाहर दक्षिणदिशामें मल-मूत्रका त्याग करनेके लिये जाय।

मलत्याग करनेके बाद मिट्टी और जलसे धोनेके द्वारा शरीरकी शुद्धि करके दोनों हाथों और पैरोंको धोकर दतुअन करे, सूर्योदय होनेसे पहले ही दतुअन करके मुँहको सोलह बार जलकी अंजलियोंसे धोये। देवताओ तथा ऋषियो! षष्ठी, प्रतिपदा, अमावस्या और नवमी तिथियों तथा रविवारके दिन शिवभक्तको यत्नपूर्वक दतुअनको त्याग देना चाहिये। अवकाशके अनुसार नदी आदिमें जाकर अथवा घरमें ही भलीभाँति स्नान करे। मनुष्यको देश और कालके विरुद्ध स्नान नहीं करना चाहिये। रविवार, श्राद्ध, संक्रान्ति, ग्रहण, महादान, तीर्थ, उपवास-दिवस अथवा अशौच प्राप्त होनेपर मनुष्य गरम जलसे स्नान न करे। शिवभक्त मनुष्य तीर्थ आदिमें प्रवाहके सम्मुख होकर स्नान करे। जो नहानेके पहले तेल लगाना चाहे, उसे विहित एवं निषिद्ध दिनोंका विचार करके ही तैलाभ्यंग करना चाहिये। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तेल

१४० * संक्षिप्त शिवपुराण *

लगाता हो, उसके लिये किसी दिन भी तैलाभ्यंग दूषित नहीं है अथवा जो तेल, इत्र आदिसे वासित हो, उसका लगाना किसी दिन भी दूषित नहीं है। सरसोंका तेल ग्रहणको छोड़कर दूसरे किसी दिन भी दूषित नहीं होता। इस तरह देश-कालका विचार करके ही विधिपूर्वक स्नान करे। स्नानके समय अपने मुखको उत्तर अथवा पूर्वकी ओर रखना चाहिये।

उच्छिष्ट वस्त्रका उपयोग कभी न करे। शुद्ध वस्त्रसे इष्टदेवके स्मरणपूर्वक स्नान करे। जिस वस्त्रको दूसरेने धारण किया हो अथवा जो दूसरोंके पहननेकी वस्तु हो तथा जिसे स्वयं रातमें धारण किया गया हो, वह वस्त्र उच्छिष्ट कहलाता है। उससे तभी स्नान किया जा सकता है, जब उसे धो लिया गया हो। स्नानके पश्चात् देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको तृप्ति देनेवाला स्नानांग तर्पण करना चाहिये। उसके बाद धुला हुआ वस्त्र पहने और आचमन करे। द्विजोत्तमो! तदनन्तर गोबर आदिसे लीप-पोतकर स्वच्छ किये हुए शुद्ध स्थानमें जाकर वहाँ सुन्दर आसनकी व्यवस्था करे। वह आसन विशुद्ध काष्ठका बना हुआ, पूरा फैला हुआ तथा विचित्र होना चाहिये। ऐसा आसन सम्पूर्ण अभीष्ट तथा फलोंको देनेवाला है। उसके ऊपर बिछानेके लिये यथायोग्य मृगचर्म आदि ग्रहण करे। शुद्ध बुद्धिवाला पुरुष उस आसनपर बैठकर भस्मसे त्रिपुण्ड्र लगाये। त्रिपुण्ड्रसे जप-तप तथा दान सफल होता है। भस्मके अभावमें त्रिपुण्ड्रका साधन जल आदि बताया गया है। इस तरह त्रिपुण्ड्र करके मनुष्य रुद्राक्ष धारण करे और अपने नित्यकर्मका सम्पादन करके फिर शिवकी आराधना करे।

तत्पश्चात् तीन बार मन्त्रोच्चारणपूर्वक आचमन करे। फिर वहाँ शिवकी पूजाके लिये अन्न और जल लाकर रखे। दूसरी कोई भी जो वस्तु आवश्यक हो, उसे यथाशक्ति जुटाकर अपने पास रखे। इस प्रकार पूजनसामग्रीका संग्रह करके वहाँ धैर्यपूर्वक स्थिरभावसे बैठे। फिर जल, गन्ध और अक्षतसे युक्त एक अर्घ्यपात्र लेकर उसे दाहिने भागमें रखे। उससे उपचारकी सिद्धि होती है। फिर गुरुका स्मरण करके उनकी आज्ञा लेकर विधिवत् संकल्प करके अपनी कामनाको अलग न रखते हुए पराभक्तिसे सपरिवार शिवका पूजन करे।

एक मुद्रा दिखाकर सिन्दूर आदि उपचारोंद्वारा सिद्धि-बुद्धिसहित विघ्नहारी गणेशका पूजन करे। लक्ष और लाभसे युक्त गणेशजीका पूजन करके उनके नामके आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमः जोड़कर नामके साथ चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग करते हुए नमस्कार करे। (यथा— ॐ गणपतये नमः अथवा ॐ लक्षलाभायुताय सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः) तदनन्तर उनसे क्षमा-प्रार्थना करके पुनः भाई कार्तिकेयसहित गणेशजीका पराभक्तिसे पूजन करके उन्हें बारंबार नमस्कार करे। तत्पश्चात् सदा द्वारपर खड़े रहनेवाले द्वारपाल महोदयका पूजन करके सती-साध्वी गिरिराजनन्दिनी उमाकी पूजा करे। चन्दन, कुंकुम तथा धूप, दीप आदि अनेक उपचारों तथा नाना प्रकारके नैवेद्योंसे शिवाका पूजन करके नमस्कार करनेके पश्चात् साधक शिवजीके समीप जाय। यथासम्भव अपने घरमें मिट्टी, सोना, चाँदी, धातु या अन्य पारे आदिकी शिव-प्रतिमा बनाये और उसे

*रुद्रसंहिता * १४१

नमस्कार करके भक्तिपरायण हो उसकी पूजा करे। उसकी पूजा हो जानेपर सभी देवता पूजित हो जाते हैं।

मिट्टीका शिवलिंग बनाकर विधिपूर्वक उसकी स्थापना करे। अपने घरमें रहनेवाले लोगोंको स्थापना-सम्बन्धी सभी नियमोंका सर्वथा पालन करना चाहिये। भूतशुद्धि एवं मातृकान्यास करके प्राणप्रतिष्ठा करे। शिवालयमें दिक्पालोंकी भी स्थापना करके उनकी पूजा करे। घरमें सदा मूलमन्त्रका प्रयोग करके शिवकी पूजा करनी चाहिये। वहाँ द्वारपालोंके पूजनका सर्वथा नियम नहीं है। भगवान् शिवके समीप ही अपने लिये आसनकी व्यवस्था करे। उस समय उत्तराभिमुख बैठकर फिर आचमन करे, उसके बाद दोनों हाथ जोड़कर तब प्राणायाम करे। प्राणायामकालमें मनुष्यको मूलमन्त्रकी दस आवृत्तियाँ करनी चाहिये। हाथोंसे पाँच मुद्राएँ दिखाये। यह पूजाका आवश्यक अंग है। इन मुद्राओंका प्रदर्शन करके ही मनुष्य पूजा-विधिका अनुसरण करे। तदनन्तर वहाँ दीप निवेदन करके गुरुको नमस्कार करे और पद्मासन या भद्रासन बाँधकर बैठे अथवा उत्तानासन या पर्यङ्कासनका आश्रय लेकर सुखपूर्वक बैठे और पुनः पूजनका प्रयोग करे। फिर अर्घ्यपात्रसे उत्तम शिवलिंगका प्रक्षालन करे। मनको भगवान् शिवसे अन्यत्र न ले जाकर पूजासामग्रीको अपने पास रखकर निम्नांकित मन्त्रसमूहसे महादेवजीका आवाहन करे।

आवाहन कैलासशिखरस्थं च पार्वतीपतिमुत्तमम् ॥ ४७॥ यथोक्तरूपिणं शम्भुं निर्गुणं गुणरूपिणम्। पञ्चवक्त्रं दशभुजं त्रिनेत्रं वृषभध्वजम् ॥ ४८ ॥ कर्पूरगौरं दिव्याङ्गं चन्द्रमौलिं कपर्दिनम्। व्याघ्रचर्मोत्तरीयं च गजचर्माम्बरं शुभम्॥ ४९ ॥ वासुक्यादिपरीताङ्गं पिनाकाद्यायुधान्वितम्। सिद्धयोऽष्टौ च यस्याग्रे नृत्यन्तीह निरन्तरम्॥ ५०॥ जयजयेति शब्दैश्च सेवितं भक्तपुञ्जकैः। तेजसा दुस्सहेनैव दुर्लक्ष्यं देवसेवितम् ॥ ५१ ॥ शरण्यं सर्वसत्त्वानां प्रसन्नमुखपङ्कजम्। वेदैः शास्त्रैर्यथागीतं विष्णुब्रह्मसुतं सदा॥ ५२॥ भक्तवत्सलमानन्दं शिवमावाहयाम्यहम्। (अध्याय १३)

‘जो कैलासके शिखरपर निवास करते हैं, पार्वतीदेवीके पति हैं, समस्त देवताओंसे उत्तम हैं, जिनके स्वरूपका शास्त्रोंमें यथावत् वर्णन किया गया है, जो निर्गुण होते हुए भी गुणरूप हैं, जिनके पाँच मुख, दस भुजाएँ और प्रत्येक मुखमण्डलमें तीन-तीन नेत्र हैं, जिनकी ध्वजापर वृषभका चिह्न अंकित है, अंगकान्ति कर्पूरके समान गौर है, जो दिव्यरूपधारी, चन्द्रमारूपी मुकुटसे सुशोभित तथा सिरपर जटाजूट धारण करनेवाले हैं, जो हाथीकी खाल पहनते और व्याघ्रचर्म ओढ़ते हैं, जिनका स्वरूप शुभ है, जिनके अंगोंमें वासुकि आदि नाग लिपटे रहते हैं, जो पिनाक आदि आयुध धारण करते हैं, जिनके आगे आठों सिद्धियाँ निरन्तर नृत्य करती रहती हैं, भक्तसमुदाय जय-जयकार करते हुए जिनकी सेवामें लगे रहते हैं, दुस्सह तेजके कारण जिनकी ओर देखना भी कठिन है, जो देवताओंसे सेवित तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको शरण देनेवाले हैं, जिनका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला हुआ है, वेदों और शास्त्रोंने जिनकी महिमाका यथावत् गान किया है, विष्णु और ब्रह्मा

१४२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

भी सदा जिनकी स्तुति करते हैं तथा जो परमानन्दस्वरूप हैं, उन भक्तवत्सल शम्भु शिवका मैं आवाहन करता हूँ।'

इस प्रकार साम्ब शिवका ध्यान करके उनके लिये आसन दे। चतुर्थ्यन्त पदसे ही क्रमशः सब कुछ अर्पित करे (यथा— साम्बाय सदाशिवाय नमः आसनं समर्पयामि—इत्यादि)। आसनके पश्चात् भगवान् शंकरको पाद्य और अर्घ्य दे। फिर परमात्मा शम्भुको आचमन कराकर पंचामृत-सम्बन्धी द्रव्योंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक शंकरको स्नान कराये। वेदमन्त्रों अथवा समन्त्रक चतुर्थ्यन्त नामपदोंका उच्चारण करके भक्तिपूर्वक यथायोग्य समस्त द्रव्य भगवान्‌को अर्पित करे। अभीष्ट द्रव्यको शंकरके ऊपर चढ़ाये। फिर भगवान् शिवको वारुण-स्नान कराये। स्नानके पश्चात् उनके श्रीअंगोंमें सुगन्धित चन्दन तथा अन्य द्रव्योंका यत्नपूर्वक लेप करे। फिर सुगन्धित जलसे ही उनके ऊपर जलधारा गिराकर अभिषेक करे। वेदमन्त्रों, षडंगों अथवा शिवके ग्यारह नामोंद्वारा यथावकाश जलधारा चढ़ाकर वस्त्रसे शिवलिंगको अच्छी तरह पोंछे। फिर आचमनार्थ जल दे और वस्त्र समर्पित करे। नाना प्रकारके मन्त्रोंद्वारा भगवान् शिवको तिल, जौ, गेहूँ, मूँग और उड़द अर्पित करे। फिर पाँच मुखवाले परमात्मा शिवको पुष्प चढ़ाये। प्रत्येक मुखपर ध्यानके अनुसार यथोचित अभिलाषा करके कमल, शतपत्र, शंखपुष्प, कुशपुष्प, धत्तूर, मन्दार, द्रोणपुष्प (गूमा), तुलसीदल तथा बिल्वपत्र चढ़ाकर पराभक्तिके साथ भक्तवत्सल भगवान् शंकरकी विशेष पूजा करे। अन्य सब वस्तुओंका अभाव होनेपर शिवको केवल बिल्वपत्र ही अर्पित करे। बिल्वपत्र समर्पित होनेसे ही शिवकी पूजा सफल होती है। तत्पश्चात् सुगन्धित चूर्ण तथा सुवासित उत्तम तैल (इत्र आदि) विविध वस्तुएँ बड़े हर्षके साथ भगवान् शिवको अर्पित करे। फिर प्रसन्नतापूर्वक गुग्गुल और अगुरु आदिकी धूप निवेदन करे। तदनन्तर शंकरजीको घीसे भरा हुआ दीपक दे। इसके बाद निम्नांकित मन्त्रसे भक्तिपूर्वक पुनः अर्घ्य दे और भावभक्तिसे वस्त्रद्वारा उनके मुखका मार्जन करे।

अर्घ्यमन्त्र

रूपं देहि यशो देहि भोगं देहि च शङ्कर।
भुक्तिमुक्तिफलं देहि गृहीत्वार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥

'प्रभो! शंकर! आपको नमस्कार है। आप इस अर्घ्यको स्वीकार करके मुझे रूप दीजिये, यश दीजिये, भोग दीजिये तथा भोग और मोक्षरूपी फल प्रदान कीजिये।'

इसके बाद भगवान् शिवको भाँति-भाँतिके उत्तम नैवेद्य अर्पित करे। नैवेद्यके

* रुद्रसंहिता * । १४३

पश्चात् प्रेमपूर्वक आचमन कराये। तदनन्तर सांगोपांग ताम्बूल बनाकर शिवको समर्पित करे। फिर पाँच बत्तीकी आरती बनाकर भगवान्‌को दिखाये। उसकी संख्या इस प्रकार है—पैरोंमें चार बार, नाभिमण्डलके सामने दो बार, मुखके समक्ष एक बार तथा सम्पूर्ण अंगोंमें सात बार आरती दिखाये। तत्पश्चात् नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा प्रेमपूर्वक भगवान् वृषभध्वजकी स्तुति करे। तदनन्तर धीरे-धीरे शिवकी परिक्रमा करे। परिक्रमाके बाद भक्त पुरुष साष्टांग प्रणाम करे और निम्नांकित मन्त्रसे भक्तिपूर्वक पुष्पांजलि दे—

पुष्पांजलिमन्त्र

अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाद्यत्पूजादिकं मया।
कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शङ्कर॥
तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड।
इति विज्ञाय गौरीश भूतनाथ प्रसीद मे॥
भूमौ स्खलितपादानां भूमिरेवावलम्बनम्।
त्वयि जातापराधानां त्वमेव शरणं प्रभो॥
(अध्याय १३)

'शंकर! मैंने अज्ञानसे या जान-बूझकर जो पूजन आदि किया है, वह आपकी कृपासे सफल हो। मृड! मैं आपका हूँ, मेरे प्राण सदा आपमें लगे हुए हैं, मेरा चित्त सदा आपका ही चिन्तन करता है—ऐसा जानकर हे गौरीनाथ! भूतनाथ! आप मुझपर प्रसन्न होइये। प्रभो! धरतीपर जिनके पैर लड़खड़ा जाते हैं, उनके लिये भूमि ही सहारा है; उसी प्रकार जिन्होंने आपके प्रति अपराध किये हैं उनके लिये भी आप ही शरणदाता हैं।'

—इत्यादि रूपसे बहुत-बहुत प्रार्थना करके उत्तम विधिसे पुष्पांजलि अर्पित करनेके पश्चात् पुनः भगवान्‌को नमस्कार करे। फिर निम्नांकित मन्त्रसे विसर्जन करना चाहिये।

विसर्जन

स्वस्थानं गच्छ देवेश परिवारयुतः प्रभो।
पूजाकाले पुनर्नाथ त्वयाऽऽगन्तव्यमादरात्॥

'देवेश्वर प्रभो! अब आप परिवारसहित अपने स्थानको पधारें। नाथ! जब पूजाका समय हो, तब पुनः आप यहाँ सादर पदार्पण करें।'

इस प्रकार भक्तवत्सल शंकरकी बारंबार प्रार्थना करके उनका विसर्जन करे और उस जलको अपने हृदयमें लगाये तथा मस्तकपर चढ़ाये।

ऋषियो! इस तरह मैंने शिवपूजनकी सारी विधि बता दी, जो भोग और मोक्ष देनेवाली है। अब और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय १३)


विभिन्न पुष्पों, अन्नों तथा जलादिकी धाराओंसे शिवजीकी पूजाका माहात्म्य

ब्रह्माजी बोले—नारद! जो लक्ष्मी-प्राप्तिकी इच्छा करता हो, वह कमल, बिल्वपत्र, शतपत्र और शंखपुष्पसे भगवान् शिवकी पूजा करे। ब्रह्मन्! यदि एक लाखकी संख्यामें इन पुष्पोंद्वारा भगवान् शिवकी पूजा सम्पन्न हो जाय तो सारे पापोंका नाश होता है और लक्ष्मीकी भी प्राप्ति हो जाती है, इसमें संशय नहीं है। प्राचीन पुरुषोंने बीस कमलोंका एक प्रस्थ बताया है। एक सहस्र बिल्वपत्रोंको भी

१४४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

एक प्रस्थ कहा गया है। एक सहस्त्र शतपत्रसे आधे प्रस्थकी परिभाषा की गयी है। सोलह पलोंका एक प्रस्थ होता है और दस टंकोंका एक पल। इस मानसे पत्र, पुष्प आदिको तौलना चाहिये। जब पूर्वोक्त संख्यावाले पुष्पोंसे शिवकी पूजा हो जाती है, तब सकाम पुरुष अपने सम्पूर्ण अभीष्टको प्राप्त कर लेता है। यदि उपासकके मनमें कोई कामना न हो तो वह पूर्वोक्त पूजनसे शिवस्वरूप हो जाता है।

मृत्युंजय-मन्त्रका जब पाँच लाख जप पूरा हो जाता है, तब भगवान् शिव प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। एक लाखके जपसे शरीरकी शुद्धि होती है, दूसरे लाखके जपसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण होता है, तीसरे लाख पूर्ण होनेपर सम्पूर्ण काम्य वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। चौथे लाखका जप होनेपर स्वप्नमें भगवान् शिवका दर्शन होता है और पाँचवें लाखका जप ज्यों ही पूरा होता है, भगवान् शिव उपासकके सम्मुख तत्काल प्रकट हो जाते हैं। इसी मन्त्रका दस लाख जप हो जाय तो सम्पूर्ण फलकी सिद्धि होती है। जो मोक्षकी अभिलाषा रखता है, वह ( एक लाख ) दर्भोंद्वारा शिवका पूजन करे। मुनिश्रेष्ठ ! सर्वत्र लाखकी ही संख्या समझनी चाहिये। आयुकी इच्छावाला पुरुष एक लाख दूर्वाओंद्वारा पूजन करे। जिसे पुत्रकी अभिलाषा हो, वह धतूरेके एक लाख फूलोंसे पूजा करे। लाल डंठलवाला धतूरा पूजनमें शुभदायक माना गया है। अगस्त्यके एक लाख फूलोंसे पूजा करनेवाले पुरुषको महान् यशकी प्राप्ति होती है। यदि तुलसीदलसे शिवकी पूजा करे तो उपासकको भोग और मोक्ष दोनों सुलभ होते हैं। लाल और सफेद आक, अपामार्ग और श्वेत कमलके एक लाख फूलोंद्वारा पूजा करनेसे भी उसी फल ( भोग और मोक्ष )-की प्राप्ति होती है। जपा ( अड़हुल )-के एक लाख फूलोंसे की हुई पूजा शत्रुओंको मृत्यु देनेवाली होती है। करवीरके एक लाख फूल यदि शिवपूजनके उपयोगमें लाये जायँ तो वे यहाँ रोगोंका उच्चाटन करनेवाले होते हैं। बन्धूक ( दुपहरिया )-के फूलोंद्वारा पूजन करनेसे आभूषणकी प्राप्ति होती है। चमेलीसे शिवकी पूजा करके मनुष्य वाहनोंको उपलब्ध करता है, इसमें संशय नहीं है। अलसीके फूलोंसे महादेवजीका पूजन करनेवाला पुरुष भगवान् विष्णुको प्रिय होता है। शमीपत्रोंसे पूजा करके मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है। बेलाके फूल चढ़ानेपर भगवान् शिव अत्यन्त शुभलक्षणा पत्नी प्रदान करते हैं। जूहीके फूलोंसे पूजा की जाय तो घरमें कभी अन्नकी कमी नहीं होती। कनेरके फूलोंसे पूजा करनेपर मनुष्योंको वस्त्रकी प्राप्ति होती है। सेदुआरि या शेफालिकाके फूलोंसे शिवका पूजन किया जाय तो मन निर्मल होता है। एक लाख बिल्वपत्र चढ़ानेपर मनुष्य अपनी सारी काम्य वस्तुएँ प्राप्त कर लेता है। श्रृंगारहार ( हरसिंगार )-के फूलोंसे पूजा करनेपर सुख-सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। वर्तमान ऋतुमें पैदा होनेवाले फूल यदि शिवकी सेवामें समर्पित किये जायँ तो वे मोक्ष देनेवाले होते हैं, इसमें संशय नहीं है। राईके फूल शत्रुओंको मृत्यु प्रदान करनेवाले होते हैं। इन फूलोंको एक-एक लाखकी संख्यामें शिवके ऊपर चढ़ाया जाय तो भगवान् शिव प्रचुर फल प्रदान करते हैं।

* रुद्रसंहिता * । १४५

चम्पा और केवड़ेको छोड़कर शेष सभी फूल भगवान् शिवको चढ़ाये जा सकते हैं।

विप्रवर! महादेवजीके ऊपर चावल चढ़ानेसे मनुष्योंकी लक्ष्मी बढ़ती है। ये चावल अखण्डित होने चाहिये और इन्हें उत्तम भक्तिभावसे शिवके ऊपर चढ़ाना चाहिये। रुद्रप्रधान मन्त्रसे पूजा करके भगवान् शिवके ऊपर बहुत सुन्दर वस्त्र चढ़ाये और उसीपर चावल रखकर समर्पित करे तो उत्तम है। भगवान् शिवके ऊपर गन्ध, पुष्प आदिके साथ एक श्रीफल चढ़ाकर धूप आदि निवेदन करे तो पूजाका पूरा-पूरा फल प्राप्त होता है। वहाँ शिवके समीप बारह ब्राह्मणोंको भोजन कराये। इससे मन्त्रपूर्वक सांगोपांग लक्ष पूजा सम्पन्न होती है। जहाँ सौ मन्त्र जपनेकी विधि हो, वहाँ एक सौ आठ मन्त्र जपनेका विधान किया गया है। तिलोंद्वारा शिवजीको एक लाख आहुतियाँ दी जायें अथवा एक लाख तिलोंसे शिवकी पूजा की जाय तो वह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली होती है। जौद्वारा की हुई शिवकी पूजा स्वर्गीय सुखकी वृद्धि करनेवाली है, ऐसा ऋषियोंका कथन है। गेहूँके बने हुए पकवानसे की हुई शंकरजीकी पूजा निश्चय ही बहुत उत्तम मानी गयी है। यदि उससे लाख बार पूजा हो तो उससे संतानकी वृद्धि होती है। यदि मूँगसे पूजा की जाय तो भगवान् शिव सुख प्रदान करते हैं। प्रियंगु (कँगनी)-द्वारा सर्वाध्यक्ष परमात्मा शिवका पूजन करनेमात्रसे उपासकके धर्म, अर्थ और काम-भोगकी वृद्धि होती है तथा वह पूजा समस्त सुखोंको देनेवाली होती है। अरहरके पत्तोंसे श्रृंगार करके भगवान् शिवकी पूजा करे। यह पूजा नाना प्रकारके सुखों और सम्पूर्ण फलोंको देनेवाली है। मुनिश्रेष्ठ! अब फूलोंकी लक्ष संख्याका तौल बताया जा रहा है। प्रसन्नतापूर्वक सुनो। सूक्ष्म मानका प्रदर्शन करनेवाले व्यासजीने एक प्रस्थ शंखपुष्पको एक लाख बताया है। ग्यारह प्रस्थ चमेलीके फूल हों तो वही एक लाख फूलोंका मान कहा गया है। जूहीके एक लाख फूलोंका भी वही मान है। राईके एक लाख फूलोंका मान साढ़े पाँच प्रस्थ है। उपासकको चाहिये कि वह निष्काम होकर मोक्षके लिये भगवान् शिवकी पूजा करे।

भक्तिभावसे विधिपूर्वक शिवकी पूजा करके भक्तोंको पीछे जलधारा समर्पित करनी चाहिये। ज्वरमें जो मनुष्य प्रलाप करने लगता है, उसकी शान्तिके लिये जलधारा शुभकारक बतायी गयी है। शतरुद्रिय मन्त्रसे, रुद्रीके ग्यारह पाठोंसे, रुद्रमन्त्रोंके जपसे, पुरुषसूक्तसे, छः ऋचावाले रुद्रसूक्तसे, महामृत्युंजय मन्त्रसे, गायत्री-मन्त्रसे अथवा शिवके शास्त्रोक्त नामोंके आदिमें प्रणव और अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर बने हुए मन्त्रोंद्वारा जलधारा आदि अर्पित करनी चाहिये। सुख और संतानकी वृद्धिके लिये जलधाराद्वारा पूजन उत्तम बताया गया है। उत्तम भस्म धारण करके उपासकको प्रेमपूर्वक नाना प्रकारके शुभ एवं दिव्य द्रव्योंद्वारा शिवकी पूजा करनी चाहिये और शिवपर उनके सहस्त्रनाम मन्त्रोंसे घीकी धारा चढ़ानी चाहिये। ऐसा करनेपर वंशका विस्तार होता है, इसमें संशय नहीं है। इसी प्रकार यदि दस हजार मन्त्रोंद्वारा शिवजीकी पूजा की जाय तो प्रमेह

१४६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

रोगकी शान्ति होती है और उपासकको मनोवांछित फलकी प्राप्ति हो जाती है। यदि कोई नपुंसकताको प्राप्त हो तो वह घीसे शिवजीकी भलीभाँति पूजा करे तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराये। साथ ही उसके लिये मुनीश्वरोंने प्राजापत्य व्रतका भी विधान किया है। यदि बुद्धि जड हो जाय तो उस अवस्थामें पूजकको केवल शर्करामिश्रित दुग्धकी धारा चढ़ानी चाहिये। ऐसा करनेपर उसे बृहस्पतिके समान उत्तम बुद्धि प्राप्त हो जाती है। जबतक दस हजार मन्त्रोंका जप पूरा न हो जाय, तबतक पूर्वोक्त दुग्धधारा-द्वारा भगवान् शिवका उत्कृष्ट पूजन चालू रखना चाहिये। जब तन-मनमें अकारण ही उच्चाटन होने लगे—जी उचट जाय, कहीं भी प्रेम न रहे, दुःख बढ़ जाय और अपने घरमें सदा कलह रहने लगे, तब पूर्वोक्त-रूपसे दूधकी धारा चढ़ानेसे सारा दुःख नष्ट हो जाता है। सुवासित तेलसे पूजा करनेपर भोगोंकी वृद्धि होती है। यदि मधुसे शिवकी पूजा की जाय तो राज-यक्ष्माका रोग दूर हो जाता है। यदि शिवपर ईखके रसकी धारा चढ़ायी जाय तो वह भी सम्पूर्ण आनन्दकी प्राप्ति करानेवाली होती है। गंगाजलकी धारा तो भोग और मोक्ष दोनों फलोंको देनेवाली है। ये सब जो-जो धाराएँ बतायी गयी हैं, इन सबको मृत्युंजयमन्त्रसे चढ़ाना चाहिये, उसमें भी उक्त मन्त्रका विधानतः दस हजार जप करना चाहिये और ग्यारह ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये।

(अध्याय १४)


सृष्टिका वर्णन

तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर ब्रह्माजी बोले—मुने! हमें पूर्वोक्त आदेश देकर जब महादेवजी अन्तर्धान हो गये, तब मैं उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ध्यानमग्न हो कर्तव्यका विचार करने लगा। उस समय भगवान् शंकरको नमस्कार करके श्रीहरिसे ज्ञान पाकर परमानन्दको प्राप्त हो मैंने सृष्टि करनेका ही निश्चय किया। तात! भगवान् विष्णु भी वहाँ सदाशिवको प्रणाम करके मुझे आवश्यक उपदेश दे तत्काल अदृश्य हो गये। वे ब्रह्माण्डसे बाहर जाकर भगवान् शिवकी कृपा प्राप्त करके वैकुण्ठधाममें जा पहुँचे और सदा वहीं रहने लगे। मैंने सृष्टिकी इच्छासे भगवान् शिव और विष्णुका स्मरण करके पहलेके रचे हुए जलमें अपनी अंजलि डालकर जलको ऊपरकी ओर उछाला। इससे वहाँ एक अण्ड प्रकट हुआ, जो चौबीस तत्त्वोंका समूह कहा जाता है। विप्रवर! वह विराट् आकारवाला अण्ड जडरूप ही था। उसमें चेतनता न देखकर मुझे बड़ा संशय हुआ और मैं अत्यन्त कठोर तप करने लगा। बारह वर्षोंतक भगवान् विष्णुके चिन्तनमें लगा रहा। तात! वह समय पूर्ण होनेपर भगवान् श्रीहरि स्वयं प्रकट हुए और बड़े प्रेमसे मेरे अंगोंका स्पर्श करते हुए मुझसे प्रसन्नतापूर्वक बोले।

श्रीविष्णुने कहा—ब्रह्मन्! तुम वर माँगो। मैं प्रसन्न हूँ। मुझे तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है। भगवान् शिवकी कृपासे मैं सब कुछ देनेमें समर्थ हूँ।

* रुद्रसंहिता * । १४७

ब्रह्मा बोले—(अर्थात् मैंने कहा—) महाभाग! आपने जो मुझपर कृपा की है, वह सर्वथा उचित ही है; क्योंकि भगवान् शंकरने मुझे आपके हाथोंमें सौंप दिया है। विष्णो! आपको नमस्कार है। आज मैं आपसे जो कुछ माँगता हूँ, उसे दीजिये। प्रभो! यह विराट् रूप चौबीस तत्त्वोंसे बना हुआ अण्ड किसी तरह चेतन नहीं हो रहा है, जडीभूत दिखायी देता है। हरे! इस समय भगवान् शिवकी कृपासे आप यहाँ प्रकट हुए हैं। अतः शंकरकी सृष्टि-शक्ति या विभूतिसे प्राप्त हुए इस अण्डमें चेतनता लाइये।

मेरे ऐसा कहनेपर शिवकी आज्ञामें तत्पर रहनेवाले महाविष्णुने अनन्तरूपका आश्रय ले उस अण्डमें प्रवेश किया। उस समय उन परम पुरुषके सहस्रों मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर थे। उन्होंने भूमिको सब ओरसे घेरकर उस अण्डको व्याप्त कर लिया। मेरे द्वारा भलीभाँति स्तुति की जानेपर जब श्रीविष्णुने उस अण्डमें प्रवेश किया, तब वह चौबीस तत्त्वोंका विकाररूप अण्ड सचेतन हो गया। पातालसे लेकर सत्यलोकतककी अवधिवाले उस अण्डके रूपमें वहाँ साक्षात् श्रीहरि ही विराजने लगे। उस विराट् अण्डमें व्यापक होनेसे ही वे प्रभु 'वैराज पुरुष' कहलाये। पंचमुख महादेवने केवल अपने रहनेके लिये सुरम्य कैलास-नगरका निर्माण किया, जो सब लोकोंसे ऊपर सुशोभित होता है। देवर्षे! सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका नाश हो जानेपर भी वैकुण्ठ और कैलास—इन दो धामोंका यहाँ कभी नाश नहीं होता। मुनिश्रेष्ठ! मैं सत्यलोकका आश्रय लेकर रहता हूँ। तात! महादेवजीकी आज्ञासे ही मुझमें सृष्टि रचनेकी इच्छा उत्पन्न हुई है। बेटा! जब मैं सृष्टिकी इच्छासे चिन्तन करने लगा, उस समय पहले मुझसे अनजानमें ही पापपूर्ण तमोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे अविद्या-पंचक (अथवा पंचपर्वा अविद्या) कहते हैं। तदनन्तर प्रसन्नचित्त होकर शम्भुकी आज्ञासे मैं पुनः अनासक्त-भावसे सृष्टिका चिन्तन करने लगा। उस समय मेरे द्वारा स्थावर-संज्ञक वृक्ष आदिकी सृष्टि हुई, जिसे मुख्य-सर्ग कहते हैं। (यह पहला सर्ग है।) उसे देखकर तथा वह अपने लिये पुरुषार्थका साधक नहीं है, यह जानकर सृष्टिकी इच्छावाले मुझ ब्रह्मासे दूसरा सर्ग प्रकट हुआ, जो दुःखसे भरा हुआ है; उसका नाम है—तिर्यक्स्रोता*। वह सर्ग भी पुरुषार्थका साधक नहीं था। उसे भी पुरुषार्थ-साधनकी शक्तिसे रहित जान जब मैं पुनः सृष्टिका चिन्तन करने लगा, तब मुझसे शीघ्र ही तीसरे सात्त्विक सर्गका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे 'ऊर्ध्वस्रोता' कहते हैं। यह देवसर्गके नामसे विख्यात हुआ। देवसर्ग सत्यवादी तथा अत्यन्त सुखदायक है। उसे भी पुरुषार्थसाधनकी रुचि एवं अधिकारसे रहित मानकर मैंने अन्य सर्गके लिये अपने स्वामी श्रीशिवका चिन्तन आरम्भ किया। तब भगवान् शंकरकी आज्ञासे एक रजोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव


* पशु, पक्षी आदि तिर्यक्स्रोता कहलाते हैं। वायुकी भाँति तिरछा चलनेके कारण ये तिर्यक् अथवा 'तिर्यक्स्रोता' कहे गये हैं।

१४८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

हुआ, जिसे अर्वाक्स्रोता कहा गया है। इस सर्गके प्राणी मनुष्य हैं, जो पुरुषार्थ-साधनके उच्च अधिकारी हैं। तदनन्तर महादेवजीकी आज्ञासे भूत आदिकी सृष्टि हुई। इस प्रकार मैंने पाँच तरहकी वैकृत सृष्टिका वर्णन किया है। इनके सिवा तीन प्राकृत सर्ग भी कहे गये हैं, जो मुझ ब्रह्माके सांनिध्यसे प्रकृतिसे ही प्रकट हुए हैं। इनमें पहला महत्तत्त्वका सर्ग है, दूसरा सूक्ष्म भूतों अर्थात् तन्मात्राओंका सर्ग है और तीसरा वैकारिकसर्ग कहलाता है। इस तरह ये तीन प्राकृत सर्ग हैं। प्राकृत और वैकृत दोनों प्रकारके सर्गोंको मिलानेसे आठ सर्ग होते हैं। इनके सिवा नवाँ कौमारसर्ग है, जो प्राकृत और वैकृत भी है। इन सबके अवान्तर भेदका मैं वर्णन नहीं कर सकता; क्योंकि उसका उपयोग बहुत थोड़ा है।

अब द्विजात्मक सर्गका प्रतिपादन करता हूँ। इसीका दूसरा नाम कौमारसर्ग है, जिसमें सनक-सनन्दन आदि कुमारोंकी महत्त्वपूर्ण सृष्टि हुई है। सनक आदि मेरे चार मानस पुत्र हैं, जो मुझ ब्रह्माके ही समान हैं। वे महान् वैराग्यसे सम्पन्न तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हुए। उनका मन सदा भगवान् शिवके चिन्तनमें ही लगा रहता है। वे संसारसे विमुख एवं ज्ञानी हैं। उन्होंने मेरे आदेश देनेपर भी सृष्टिके कार्यमें मन नहीं लगाया। मुनिश्रेष्ठ नारद! सनकादि कुमारोंके दिये हुए नकारात्मक उत्तरको सुनकर मैंने बड़ा भयंकर क्रोध प्रकट किया। उस समय मुझपर मोह छा गया। उस अवसरपर मैंने मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण किया। वे शीघ्र ही आ गये और उन्होंने समझाते हुए मुझसे कहा—'तुम भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये तपस्या करो।' मुनिश्रेष्ठ! श्रीहरिने जब मुझे ऐसी शिक्षा दी, तब मैं महाघोर एवं उत्कृष्ट तप करने लगा। सृष्टिके लिये तपस्या करते हुए मेरी दोनों भौंहों और नासिकाके मध्यभागसे, जो उनका अपना ही अविमुक्त नामक स्थान है, महेश्वरकी तीन मूर्तियोंमेंसे अन्यतम पूर्णांश, सर्वेश्वर एवं दयासागर भगवान् शिव अर्धनारीश्वररूपमें प्रकट हुए।

जो जन्मसे रहित, तेजकी राशि, सर्वज्ञ तथा सर्वस्रष्टा हैं, उन नीललोहित-नामधारी साक्षात् उमावल्लभ शंकरको सामने देख बड़ी भक्तिसे मस्तक झुका उनकी स्तुति करके मैं बड़ा प्रसन्न हुआ और उन देवदेवेश्वरसे बोला—'प्रभो! आप भाँति-भाँतिके जीवोंकी सृष्टि कीजिये।' मेरी यह बात सुनकर उन देवाधिदेव महेश्वर रुद्रने अपने ही समान बहुत-से रुद्रगणोंकी सृष्टि

* रुद्रसंहिता * १४९

की। तब मैंने अपने स्वामी महेश्वर महारुद्रसे फिर कहा—‘देव! आप ऐसे जीवोंकी सृष्टि कीजिये, जो जन्म और मृत्युके भयसे युक्त हों।’ मुनिश्रेष्ठ! मेरी ऐसी बात सुनकर करुणासागर महादेवजी हँस पड़े और तत्काल इस प्रकार बोले।

महादेवजीने कहा—विधातः! मैं जन्म और मृत्युके भयसे युक्त अशोभन जीवोंकी सृष्टि नहीं करूँगा; क्योंकि वे कर्मोंके अधीन हो दुःखके समुद्रमें डूबे रहेंगे। मैं तो दुःखके सागरमें डूबे हुए उन जीवोंका उद्धारमात्र करूँगा, गुरुका स्वरूप धारण करके उत्तम ज्ञान प्रदानकर उन सबको संसार-सागरसे पार करूँगा। प्रजापते! दुःखमें डूबे हुए सारे जीवकी सृष्टि तो तुम्हीं करो। मेरी आज्ञासे इस कार्यमें प्रवृत्त होनेके कारण तुम्हें माया नहीं बाँध सकेगी।

मुझसे ऐसा कहकर श्रीमान् भगवान् नीललोहित महादेव मेरे देखते-देखते अपने पार्षदोंके साथ वहाँसे तत्काल तिरोहित हो गये। (अध्याय १५)


स्वायम्भुव मनु और शतरूपाकी, ऋषियोंकी तथा दक्षकन्याओंकी संतानोंका वर्णन तथा सती और शिवकी महत्ताका प्रतिपादन

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर मैंने शब्दतन्मात्रा आदि सूक्ष्म-भूतोंको स्वयं ही पंचीकृत करके अर्थात् उन पाँचोंका परस्पर सम्मिश्रण करके उनसे स्थूल आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वीकी सृष्टि की। पर्वतों, समुद्रों और वृक्षों आदिको उत्पन्न किया। कलासे लेकर युगपर्यन्त जो काल-विभाग हैं, उनकी रचना की। मुने! उत्पत्ति और विनाशवाले और भी बहुत-से पदार्थोंका मैंने निर्माण किया, परंतु इससे मुझे संतोष नहीं हुआ। तब साम्ब शिवका ध्यान करके मैंने साधनपरायण पुरुषोंकी सृष्टि की। अपने दोनों नेत्रोंसे मरीचिको, हृदयसे भृगुको, सिरसे अंगिराको, व्यानवायुसे मुनिश्रेष्ठ पुलहको, उदानवायुसे पुलस्त्यको, समान-वायुसे वसिष्ठको, अपानसे क्रतुको, दोनों कानोंसे अत्रिको, प्राणोंसे दक्षको, गोदसे तुमको, छायासे कर्दम मुनिको तथा संकल्पसे समस्त साधनोंके साधन धर्मको उत्पन्न किया। मुनिश्रेष्ठ! इस तरह इन उत्तम साधकोंकी सृष्टि करके महादेवजीकी कृपासे मैंने अपने-आपको कृतार्थ माना। तात! तत्पश्चात् संकल्पसे उत्पन्न हुए धर्म मेरी

१५० * संक्षिप्त शिवपुराण *

आज्ञासे मानवरूप धारण करके साधकोंकी प्रेरणासे साधनमें लग गये। इसके बाद मैंने अपने विभिन्न अंगोंसे देवता, असुर आदिके रूपमें असंख्य पुत्रोंकी सृष्टि करके उन्हें भिन्न-भिन्न शरीर प्रदान किये। मुने ! तदनन्तर अन्तर्यामी भगवान् शंकरकी प्रेरणासे अपने शरीरको दो भागोंमें विभक्त करके मैं दो रूपवाला हो गया। नारद! आधे शरीरसे मैं स्त्री हो गया और आधेसे पुरुष। उस पुरुषने उस स्त्रीके गर्भसे सर्वसाधनसमर्थ उत्तम जोड़ेको उत्पन्न किया। उस जोड़ेमें जो पुरुष था, वही स्वायम्भुव मनुके नामसे प्रसिद्ध हुआ। स्वायम्भुव मनु उच्चकोटिके साधक हुए तथा जो स्त्री हुई, वह शतरूपा कहलायी। वह योगिनी एवं तपस्विनी हुई। तात! मनुने वैवाहिक विधिसे अत्यन्त सुन्दरी शतरूपाका पाणिग्रहण किया और उससे वे मैथुनजनित सृष्टि उत्पन्न करने लगे। उन्होंने शतरूपासे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र और तीन कन्याएँ उत्पन्न कीं। कन्याओंके नाम थे—आकूति, देवहूति और प्रसूति। मनुने आकूतिका विवाह प्रजापति रुचिके साथ किया। मझली पुत्री देवहूति कर्दमको ब्याह दी और उत्तानपादकी सबसे छोटी बहिन प्रसूति प्रजापति दक्षको दे दी। उनकी संतान-परम्पराओंसे समस्त चराचर जगत् व्याप्त है।

रुचिसे आकूतिके गर्भसे यज्ञ और दक्षिणा नामक स्त्री-पुरुषका जोड़ा उत्पन्न हुआ। यज्ञके दक्षिणासे बारह पुत्र हुए। मुने! कर्दमद्वारा देवहूतिके गर्भसे बहुत-सी पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। दक्षके प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ हुईं। उनमेंसे श्रद्धा आदि तेरह कन्याओंका विवाह दक्षने धर्मके साथ कर दिया। मुनीश्वर! धर्मकी उन पत्नियोंके नाम सुनो—श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वसु, शान्ति, सिद्धि और कीर्ति—ये सब तेरह हैं। इनसे छोटी जो शेष ग्यारह सुलोचना कन्याएँ थीं, उनके नाम इस प्रकार हैं—ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संनति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा तथा स्वधा। भृगु, शिव, मरीचि, अंगिरा मुनि, पुलस्त्य, पुलह, मुनिश्रेष्ठ क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ, अग्नि और पितरोंने क्रमशः इन ख्याति आदि कन्याओंका पाणिग्रहण किया। भृगु आदि मुनिश्रेष्ठ साधक हैं। इनकी संतानोंसे चराचर प्राणियोंसहित सारी त्रिलोकी भरी हुई है।

इस प्रकार अम्बिकापति महादेवजीकी आज्ञासे अपने पूर्वकर्मोंके अनुसार बहुत-से प्राणी असंख्य श्रेष्ठ द्विजोंके रूपमें उत्पन्न हुए। कल्पभेदसे दक्षके साठ कन्याएँ बतायी