शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* वायवीयसंहिता * ६७७
हैं। विनाशशील जडवर्गको ही यहाँ अविद्या कहा गया है और अविनाशी जीवको विद्या नाम दिया गया है; जो उन दोनों विद्या और अविद्यापर शासन करते हैं, वे महेश्वर उनसे सर्वथा भिन्न—विलक्षण हैं। ये प्रतापी महेश्वर इस जगत्में समष्टिभूत और इन्द्रियवर्गरूप एक-एक जालको अनेक प्रकारसे रचकर इसका विस्तार करते हैं। फिर अन्तमें संहार करके सबको अनेकसे एकमें परिणत कर देते हैं तथा पुनः सृष्टिकालमें सबकी पूर्ववत् रचना करके सबपर आधिपत्य करते हैं। जैसे सूर्य अकेला ही ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलकी दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ स्वयं भी देदीप्यमान होता है, उसी प्रकार ये भजनीय परमेश्वर अकेले ही समस्त कारणरूप पृथ्वी आदि तत्त्वोंका नियमन करते हैं। श्रद्धा और भक्तिके भावसे प्राप्त होनेयोग्य, आश्रयरहित कहे जानेवाले, जगत्की उत्पत्ति और संहार करनेवाले, कल्याण-स्वरूप एवं सोलह कलाओंकी रचना कर उन महादेवको जो जानते हैं, वे शरीरके बन्धनको सदाके लिये त्याग देते हैं अर्थात् जन्म-मृत्युके चक्करसे छूट जाते हैं।
वे ही परमेश्वर तीनों कालोंसे परे, निष्कल, सर्वज्ञ, त्रिगुणाधीश्वर एवं साक्षात् परात्पर ब्रह्म हैं। सम्पूर्ण विश्व उन्हींका रूप है। वे सबकी उत्पत्तिके कारण होकर भी स्वयं अजन्मा हैं, स्तुतिके योग्य हैं, प्रजाओंके पालक, देवताओंके भी देवता और सम्पूर्ण जगत्के लिये पूजनीय हैं। अपने हृदयमें विराजमान उन परमेश्वरकी हम उपासना करते हैं। जो काल आदिसे परे, जिनसे यह समस्त प्रपंच प्रकट होता है, जो धर्मके पालक, पापके नाशक, भोगोंके स्वामी तथा सम्पूर्ण विश्वके धाम हैं, जो ईश्वरोंके भी परम महेश्वर, देवताओंके भी परम देवता तथा पतियोंके भी परम पति हैं, उन भुवनेश्वरोंके भी ईश्वर महादेवको हम सबसे परे जानते हैं। उनके शरीररूप कार्य और इन्द्रिय तथा मनरूपी करण नहीं हैं, उनके समान और उनसे अधिक भी इस जगत्में कोई नहीं दिखायी देता। ज्ञान, बल और क्रियारूप उनकी स्वाभाविक पराशक्ति वेदोंमें नाना प्रकारकी सुनी गयी है। उन्हीं शक्तियोंसे इस सम्पूर्ण विश्वकी रचना हुई है। उसका न कोई स्वामी है, न कोई निश्चित चिह्न है, न उसपर किसीका शासन है। वह समस्त कारणोंका कारण होता हुआ ही उनका अधीश्वर भी है। उनका न कोई जन्मदाता है, न जन्म है, न जन्मके माया-मलादि हेतु ही हैं। वह एक ही सम्पूर्ण विश्वमें, समस्त भूतोंमें गुहारूपसे व्याप्त है। वही सब भूतोंका अन्तरात्मा और धर्माध्यक्ष कहलाता है। वह सब भूतोंके अंदर बसा हुआ, सबका द्रष्टा, साक्षी, चेतन और निर्गुण है। वह एक है, वशी है, अनेकों विवशात्मा निष्क्रिय पुरुषोंको वशमें रखनेवाला है। वह नित्योंका नित्य, चेतनोंका चेतन है। वह एक है, कामनारहित है और बहुतोंकी कामना पूर्ण करनेवाला ईश्वर है। सांख्य और योग अर्थात् ज्ञानयोग और निष्काम कर्मयोगसे प्राप्त करनेयोग्य सबके कारणरूप उन जगदीश्वर परमदेवको जानकर जीव सम्पूर्ण पाशों (बन्धनों)-से मुक्त हो जाता है। वे सम्पूर्ण विश्वके स्रष्टा, सर्वज्ञ, स्वयं ही अपने प्राकट्यके हेतु, ज्ञानस्वरूप, कालके भी स्रष्टा, सम्पूर्ण दिव्य गुणोंसे सम्पन्न, प्रकृति और जीवात्माके
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स्वामी, समस्त गुणोंके शासक तथा संसार-बन्धनसे छुड़ानेवाले हैं। जिन परमदेवने सबसे पहले ब्रह्माजीको उत्पन्न किया और स्वयं उन्हें वेदोंका ज्ञान दिया, अपने स्वरूपविषयक बुद्धिको प्रसन्न (विकसित) करनेवाले उन परमेश्वर शिवको जानकर मैं इस संसारबन्धनसे छूटनेके लिये उनकी शरणमें जाता हूँ।$^१$
यह वेदान्तशास्त्रका परम गोपनीय ज्ञान है; पूर्वकल्पमें मुझे इसका उपदेश किया गया था। मैंने बड़े भारी सौभाग्यसे ब्रह्माजीके मुखसे इस ज्ञानको पाया था। जो शम-दमसे रहित हो, उसे इस परम उत्तम ज्ञानका उपदेश नहीं देना चाहिये। जो अपना पुत्र, सदाचारी तथा शिष्य न हो, उसे भी नहीं देना चाहिये। जिनकी परमदेव परमेश्वरमें परम भक्ति है, जैसे परमेश्वरमें है, वैसे ही गुरुमें भी है, उस महात्मा पुरुषके हृदयमें ही ये बताये हुए रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं।$^२$ अतः संक्षेपसे यह सिद्धान्तकी बात सुनो। भगवान् शिव प्रकृति और पुरुषसे परे हैं। वे ही सृष्टिकालमें जगत्को रचते और संहारकालमें पुनः सबको आत्मसात् कर लेते हैं। (अध्याय ६)
१-परस्त्रिकालादकलः स एव परमेश्वरः। सर्ववित् त्रिगुणाधीशो ब्रह्म साक्षात् परात्परः॥
तं विश्वरूपमभवं भवमीड्यं प्रजापतिम्। देवदेवं जगत्पूज्यं स्वचित्तस्थमुपास्महे॥
कालादिभिः परो यस्मात् प्रपञ्चः परिवर्तते। धर्मावहं पापनुदं भोगेशं विश्वधाम च॥
तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्। पतिं पतीनां परमं परस्ताद्विदाम देवं भुवनेशवरेश्वरम्॥
न तस्य विद्यते कार्यं कारणं च न विद्यते। न तत्समोऽधिकश्चापि क्वचिज्जगति दृश्यते॥
परास्य विविधा शक्तिः श्रुतौ स्वाभाविकी श्रुता। ज्ञानं बलं क्रिया चैव याभ्यो विश्वमिदं कृतम्॥
न तस्यास्ति पतिः कश्चिन्नैव लिङ्गं न चेशिता। कारणं कारणानां च स तेषामधिपाधिपः॥
न चास्य जनिता कश्चिन्न च जन्म कुतश्चन। न जन्महेतवस्तद्वन्मलमायादिसंज्ञकाः॥
स एकः सर्वभूतेषु गूढो व्याप्तश्च विश्वतः। सर्वभूतान्तरात्मा च धर्माध्यक्षः स कथ्यते॥
सर्वभूताधिवासश्च साक्षी चेता च निर्गुणः। एको वशी निष्क्रियाणां बहूनां विवशात्मनाम्॥
नित्यानामप्यसौ नित्यश्चेतनानां च चेतनः। एको बहूनां चाकामः कामानीशः प्रयच्छति॥
सांख्ययोगाधिगम्यं यत् कारणं जगतां पतिम्। ज्ञात्वा देवं पशुः पाशैः सर्वैरेव विमुच्यते॥
विश्वकृद् विश्ववित् स्वात्मयोनिजः कालकृद्गुणी। प्रधानः क्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः पाशमोचकः॥
ब्रह्माणं विदधे पूर्वं वेदांश्चोपादिशत्स्वयम्। यो देवस्तमहं बुद्ध्वा स्वात्मबुद्धिप्रसादतः॥
मुमुक्षुरस्मात् संसारात् प्रपद्ये शरणं शिवम्। (शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। ५५–६८$\frac{१}{२}$)
२-यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। ७५)
* वायवीयसंहिता * ६७९
ब्रह्माजीकी मूर्च्छा, उनके मुखसे रुद्रदेवका प्राकट्य, सप्राण हुए ब्रह्माजीके द्वारा आठ नामोंसे महेश्वरकी स्तुति तथा रुद्रकी आज्ञासे ब्रह्माद्वारा सृष्टि-रचना
तदनन्तर कालमहिमा, प्रलय, ब्रह्माण्डकी स्थिति तथा सर्ग आदिका वर्णन करके वायु-देवताने कहा—पहले ब्रह्माजीने पाँच मानसपुत्रोंको उत्पन्न किया, जो उनके ही समान थे। उनके नाम इस प्रकार हैं— सनक, सनन्दन, विद्वान् सनातन, ऋभु और सनत्कुमार। वे सब-के-सब योगी, वीतराग और ईर्ष्यादोषसे रहित थे। इन सबका मन ईश्वरके चिन्तनमें लगा रहता था। इसलिये उन्होंने सृष्टिरचनाकी इच्छा नहीं की। सृष्टिसे विरत हो सनक आदि महात्मा जब चले गये, तब ब्रह्माजीने पुनः सृष्टिकी इच्छासे बड़ी भारी तपस्या की। इस प्रकार दीर्घकालतक तपस्या करनेपर भी जब कोई काम न बना, तब उनके मनमें दुःख हुआ। उस दुःखसे क्रोध प्रकट हुआ। क्रोधसे आविष्ट होनेपर ब्रह्माजीके दोनों नेत्रोंसे आँसूकी बूँदें गिरने लगीं। उन अश्रुबिन्दुओंसे भूत-प्रेत उत्पन्न हुए। अश्रुसे उत्पन्न हुए उन सब भूतों-प्रेतोंको देखकर ब्रह्माजीने अपनी निन्दा की। उस समय क्रोध और मोहके कारण उन्हें तीव्र मूर्च्छा आ गयी। क्रोधसे आविष्ट हुए प्रजापतिने मूर्च्छित होनेपर अपने प्राण त्याग दिये। तब प्राणोंके स्वामी भगवान् नीललोहित रुद्र अनुपम कृपाप्रसाद प्रकट करनेके लिये ब्रह्माजीके मुखसे वहाँ प्रकट हुए। उन जगदीश्वर प्रभुने अपनेको ग्यारह रूपोंमें प्रकट किया। महादेवजीने अपने उन महामना ग्यारह स्वरूपोंसे कहा—'बच्चो! मैंने लोकपर अनुग्रह करनेके लिये तुमलोगोंकी सृष्टि की है; अतः तुम आलस्यरहित हो सम्पूर्ण लोककी स्थापना, हितसाधन तथा प्रजा-संतानकी वृद्धिके लिये प्रयत्न करो।'
महेश्वरके ऐसा कहनेपर वे रोने और चारों ओर दौड़ने लगे। रोने और दौड़नेके कारण उनका नाम 'रुद्र' हुआ। जो रुद्र हैं, वे निश्चय ही प्राण हैं और जो प्राण हैं, वे महात्मा रुद्र हैं। तत्पश्चात् ब्रह्मपुत्र महेश्वरने दया करके मरे हुए देवता परमेष्ठी ब्रह्माजीको पुनः प्राण-दान दिया। ब्रह्माजीके शरीरमें प्राणोंके लौट आनेपर रुद्रदेवका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उन विश्वनाथने ब्रह्माजीसे यह उत्तम बात कही—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले जगद्गुरु महाभाग विरिंच ! डरो मत ! डरो मत ! मैंने तुम्हारे प्राणोंको नूतन जीवन प्रदान किया है; अतः सुखसे उठो।' स्वप्नमें सुने हुए वाक्यकी भाँति उस मनोहर वचनको सुनकर ब्रह्माजीने प्रफुल्ल कमलके समान सुन्दर नेत्रोंद्वारा धीरेसे भगवान् हरकी ओर देखा। उनके प्राण पहलेकी तरह लौट आये थे। अतः ब्रह्माजीने दोनों हाथ जोड़ स्नेहयुक्त गम्भीर वाणीद्वारा उनसे कहा—'प्रभो! आप दर्शनमात्रसे मेरे मनको आनन्द प्रदान कर रहे हैं; अतः बताइये, आप कौन हैं? जो सम्पूर्ण जगत्के रूपमें स्थित हैं, क्या वे ही भगवान् आप ग्यारह रूपोंमें प्रकट हुए हैं?'
उनकी यह सब बात सुनकर देवताओंके स्वामी महेश्वर अपने परम सुखदायक
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करकमलोंद्वारा ब्रह्माजीका स्पर्श करते हुए बोले—'देव! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं परमात्मा हूँ और इस समय तुम्हारा पुत्र होकर प्रकट हुआ हूँ। ये जो ग्यारह रुद्र हैं, तुम्हारी सुरक्षाके लिये यहाँ आये हैं। अतः तुम मेरे अनुग्रहसे इस तीव्र मूर्च्छाको त्यागकर जाग उठो और पूर्ववत् प्रजाकी सृष्टि करो।'
भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन विश्वात्माने आठ नामोंद्वारा परमेश्वर शिवका स्तवन किया।
ब्रह्माजी बोले—भगवन्! रुद्र! आपका तेज असंख्य सूर्योंके समान अनन्त है। आपको नमस्कार है। रसस्वरूप और जलमय विग्रहवाले आप भवदेवताको नमस्कार है। नन्दी और सुरभि (कामधेनु) ये दोनों आपके स्वरूप हैं। आप पृथ्वीरूपधारी शर्वको नमस्कार है। स्पर्शमय वायुरूपवाले आपको नमस्कार है। आप ही वसुरूपधारी ईश हैं। आपको नमस्कार है। अत्यन्त तेजस्वी अग्निरूप आप पशुपतिको नमस्कार है। शब्दतन्मात्रासे युक्त आकाशरूपधारी आप भीमदेवको नमस्कार है। उग्ररूपवाले यजमानमूर्ति आपको नमस्कार है। सोमरूप आप अमृतमूर्ति महादेवजीको नमस्कार है। इस प्रकार आठ मूर्ति और आठ नामवाले आप भगवान् शिवको मेरा नमस्कार है।*
इस प्रकार विश्वनाथ महादेवजीकी स्तुति करके लोकपितामह ब्रह्माने प्रणामपूर्वक उनसे प्रार्थना की—'भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी मेरे पुत्र भगवान् महेश्वर! कामनाशन! आप सृष्टिके लिये मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए हैं; इसलिये जगत्प्रभो! इस महान् कार्यमें संलग्न हुए मुझ ब्रह्माकी आप सर्वत्र सहायता करें और स्वयं भी प्रजाकी सृष्टि करें।'
ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर कल्याणकारी, त्रिपुरनाशक रुद्रदेवने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी बात मान ली। तदनन्तर प्रसन्न हुए महादेवजीका अभिनन्दन करके सृष्टिके लिये उनकी आज्ञा पाकर भगवान् ब्रह्माने अन्यान्य प्रजाओंकी सृष्टि आरम्भ की। उन्होंने अपने मनसे ही मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अत्रि और वसिष्ठकी सृष्टि की। ये सब ब्रह्माजीके पुत्र कहे गये हैं। धर्म, संकल्प और रुद्रके साथ इनकी संख्या बारह होती है। ये सब पुराने गृहस्थ हैं। देवगणोंसहित इनके बारह दिव्य वंश कहे गये हैं। जो प्रजावान्, क्रियावान् तथा महर्षियोंसे अलंकृत हैं। तत्पश्चात् जलपर स्थित हुए रुद्रसहित ब्रह्माजीने देवताओं, असुरों, पितरों और
* ब्रह्मोवाच—
नमस्ते भगवन् रुद्र भास्करामिततेजसे। नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयात्मने ॥
शर्वाय क्षितिरूपाय नन्दीसुरभये नमः। ईशाय वसवे तुभ्यं नमः स्पर्शमयात्मने ॥
पशूनां पतये चैव पावकायातितेजसे। भीमाय व्योमरूपाय शब्दमात्राय ते नमः ॥
उग्रायोग्रस्वरूपाय यजमानात्मने नमः। महाशिवाय सोमाय नमस्त्वमृतमूर्तये ॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० १२। ४१–४४)
* वायवीयसंहिता * ६८१
मनुष्योंकी सृष्टि करनेका विचार किया। ब्रह्माजीने सृष्टिके लिये समाधिस्थ हो अपने चित्तको एकाग्र किया। तत्पश्चात् मुखसे देवताओंको, कोखसे पितरोंको, कटिके अगले भागसे असुरोंको तथा प्रजनननेन्द्रिय (लिंग)-से सब मनुष्योंको उत्पन्न किया। उनके गुदास्थानसे राक्षस उत्पन्न हुए, जो सदा भूखसे व्याकुल रहते हैं। उनमें तमोगुण और रजोगुणकी प्रधानता होती है। वे रातको विचरते और बलवान् होते हैं। साँप, यक्ष, भूत और गन्धर्व ये भी ब्रह्माजीके अंगोंसे उत्पन्न हुए। उनके पक्षभागसे पक्षी हुए। वक्षःस्थलसे अजंगम (स्थावर) प्राणियोंका जन्म हुआ। मुखसे बकरों और पार्श्वभागसे भुजंगमोंकी उत्पत्ति हुई। दोनों पैरोंसे घोड़े, हाथी, शरभ, नीलगाय, मृग, ऊँट, खच्चर, न्यंकु नामक मृग तथा पशुजातिके अन्यान्य प्राणी उत्पन्न हुए। रोमावलियोंसे ओषधियों और फल-मूलोंका प्राकट्य हुआ। ब्रह्माजीके पूर्ववर्ती मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, त्रिवृत् स्तोम, रथन्तर साम तथा अग्निष्टोम नामक यज्ञकी उत्पत्ति हुई। उनके दक्षिण मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुप् छन्द, पंचदश स्तोम, बृहत्साम और उक्थ नामक यज्ञकी उत्पत्ति हुई। उन्होंने अपने पश्चिम मुखसे सामवेद, जगती छन्द, सप्तदश स्तोम, वैरूप्य साम और अतिरात्र नामक यज्ञको प्रकट किया। उनके उत्तरवर्ती मुखसे एकविंश स्तोम, अथर्ववेद, आप्तोर्याम नामक यम, अनुष्टुपछन्द और वैराज नामक सामका प्रादुर्भाव हुआ। उनके अंगोंसे और भी बहुत-से छोटे-बड़े प्राणी उत्पन्न हुए। उन्होंने यक्ष, पिशाच, गन्धर्व, अप्सराओंके समुदाय, मनुष्य, किंनर, राक्षस, पक्षी, पशु, मृग और सर्प आदि सम्पूर्ण नित्य एवं अनित्य स्थावर-जंगम जगत्की रचना की। उनमेंसे जिन्होंने जैसे-जैसे कर्म पूर्वकल्पोंमें अपनाये थे, पुनः-पुनः सृष्टि होनेपर उन्होंने फिर उन्हीं कर्मोंको अपनाया। उस समय वे अपनी पूर्वभावनासे भावित होकर हिंसा-अहिंसासे युक्त मृदु-कठोर, धर्म-अधर्म तथा सत्य और मिथ्या कर्मको अपनाते हैं; क्योंकि पहलेकी वासनाके अनुकूल कर्म ही उन्हें अच्छे लगते हैं।
इस प्रकार विधाताने ही स्वयं इन्द्रियोंके विषय, भूत और शरीर आदिमें विभिन्नता एवं व्यवहारकी सृष्टि की है। उन पितामहने कल्पके आरम्भमें देवता आदि प्राणियोंके नाम, रूप तथा कार्य-विस्तारको वेदोक्त वर्णनके अनुसार ही निश्चित किया। ऋषियोंके नाम तथा जीविका-साधक कर्म भी उन्होंने वेदोंके अनुसार ही निर्दिष्ट किये। अपनी रात व्यतीत होनेपर अजन्मा ब्रह्माने स्वरचित प्राणियोंको वे ही नाम और कर्म दिये, जो पूर्वकल्पमें उन्हें प्राप्त थे। जिस प्रकार भिन्न-भिन्न ऋतुओंके पुनः-पुनः आनेपर उनके चिह्न और नाम-रूप आदि पूर्ववत् रहते हैं, उसी प्रकार युगादि कालमें भी उनके पूर्वभाव ही दृष्टिगोचर होते हैं। इस प्रकार स्वयम्भू ब्रह्माजीकी लोकसृष्टि उन्हींके विभिन्न अंगोंसे प्रकट हुई हैं। महत्से लेकर विशेषपर्यन्त सब कुछ प्रकृतिका विकार है। यह प्राकृत जगत् चन्द्रमा और सूर्यकी प्रभासे उद्भासित, ग्रह और नक्षत्रोंसे मण्डित, नदियों, पर्वतों तथा समुद्रोंसे अलंकृत और भाँति-भाँतिके रमणीय नगरों एवं समृद्धिशाली जनपदोंसे सुशोभित है। इसीको ब्रह्माजीका वन या ब्रह्मवृक्ष कहते हैं।
६८२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
उस ब्रह्मवनमें अव्यक्त एवं सर्वज्ञ ब्रह्मा विचरते हैं। वह सनातन ब्रह्मवृक्ष अव्यक्त-रूपी बीजसे प्रकट एवं ईश्वरके अनुग्रहपर स्थित है। बुद्धि इसका तना और बड़ी-बड़ी डालियाँ हैं। इन्द्रियाँ भीतरके खोखले हैं। महाभूत इसकी सीमा है। विशेष पदार्थ इसके निर्मल पत्ते हैं। धर्म और अधर्म इसके सुन्दर फूल हैं। इसमें सुख और दुःखरूपी फल लगते हैं तथा यह सम्पूर्ण भूतोंके जीवनका सहारा है। ब्राह्मणलोग द्युलोकको उनका मस्तक, आकाशको नाभि, चन्द्रमा और सूर्यको नेत्र, दिशाओंको कान और पृथ्वीको उनके पैर बताते हैं। वे अचिन्त्य-स्वरूप महेश्वर ही सब भूतोंके निर्माता हैं। उनके मुखसे ब्राह्मण प्रकट हुए हैं। वक्षः-स्थलके ऊपरी भागसे क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई है, दोनों जाँघोंसे वैश्य और पैरोंसे शूद्र उत्पन्न हुए हैं। इस प्रकार उनके अंगोंसे ही सम्पूर्ण वर्णोंका प्रादुर्भाव हुआ है। (अध्याय ७-१२)
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भगवान् रुद्रके ब्रह्माजीके मुखसे प्रकट होनेका रहस्य, रुद्रके महामहिम स्वरूपका वर्णन, उनके द्वारा रुद्रगणोंकी सृष्टि तथा ब्रह्माजीके रोकनेसे उनका सृष्टिसे विरत होना
ऋषि बोले—प्रभो! आपने चतुर्मुख ब्रह्माके मुखसे परमात्मा रुद्रदेवकी सृष्टि बतायी है। इस विषयमें हमको संशय होता है। जो प्रलयकालमें कुपित होकर ब्रह्मा, विष्णु और अग्निसहित समस्त लोकका संहार कर डालते हैं; जिन्हें ब्रह्मा और विष्णु भयसे प्रणाम करते हैं, जिन लोकसंहारकारी महेश्वरके वशमें वे दोनों सदा ही रहते हैं, जिन महादेवजीने पूर्वकालमें ब्रह्मा और विष्णुको अपने शरीरसे प्रकट किया था, जो प्रभु सदा ही उन दोनोंके योगक्षेमका निर्वाह करनेवाले हैं, वे आदिदेव पुरातन पुरुष भगवान् रुद्र अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके पुत्र कैसे हो गये ? तात ! भगवान् ब्रह्माने मुनियोंसे जैसी बात बतायी थी, वह सब आप ठीक-ठीक कहिये। भगवान् शिवके उत्तम यशका श्रवण करनेके लिये हमारे हृदयमें बड़ी श्रद्धा है।
वायुदेवताने कहा—ब्राह्मणो! तुम सब लोग जिज्ञासामें कुशल हो, अतः तुमने यह बहुत ही उचित प्रश्न किया है। मैंने भी पूर्वकालमें पितामह ब्रह्माजीके समक्ष यही प्रश्न रखा था। उसके उत्तरमें पितामहने मुझसे जो कुछ कहा था, वही मैं तुम्हें बताऊँगा। जैसे रुद्रदेव उत्पन्न हुए और फिर जिस प्रकार ब्रह्मा और विष्णुकी परस्पर उत्पत्ति हुई, वह सब विषय सुना रहा हूँ। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—तीनों ही कारणात्मा हैं। वे क्रमशः चराचर जगत्की सृष्टि, पालन और संहारके हेतु हैं और साक्षात् महेश्वरसे प्रकट हुए हैं। उनमें परम ऐश्वर्य विद्यमान है। वे परमेश्वरसे भावित और उनकी शक्तिसे अधिष्ठित हो सदा उनके कार्य करनेमें समर्थ होते हैं। पूर्वकालमें पिता महेश्वरने ही उन तीनोंको तीन कर्मोंमें नियुक्त किया था। ब्रह्माकी सृष्टिकार्यमें, विष्णुकी रक्षाकार्यमें
* वायवीयसंहिता * ६८३
तथा रुद्रकी संहारकार्यमें नियुक्ति हुई थी। कल्पान्तरमें परमेश्वर शिवके प्रसादसे रुद्रदेवने ब्रह्मा और नारायणकी सृष्टि की थी। इसी तरह दूसरे कल्पमें जगन्मय ब्रह्माने रुद्र तथा विष्णुको उत्पन्न किया था। फिर कल्पान्तरमें भगवान् विष्णुने भी रुद्र तथा ब्रह्माकी सृष्टि की थी। इस तरह पुनः ब्रह्माने नारायणकी और रुद्रदेवने ब्रह्माकी सृष्टि की। इस प्रकार विभिन्न कल्पोंमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर परस्पर उत्पन्न होते और एक-दूसरेका हित चाहते हैं। उन-उन कल्पोंके वृत्तान्तको लेकर महर्षिगण उनके प्रभावका वर्णन किया करते हैं।
प्रत्येक कल्पमें भगवान् रुद्रके आविर्भावका जो कारण है, उसे बता रहा हूँ। उन्हींके प्रादुर्भावसे ब्रह्माजीकी सृष्टिका प्रवाह अविच्छिन्नरूपसे चलता रहता है। ब्रह्माण्डसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मा प्रत्येक कल्पमें प्रजाकी सृष्टि करके प्राणियोंकी वृद्धि न होनेसे जब अत्यन्त दुःखी हो मूर्च्छित हो जाते हैं, तब उनके दुःखकी शान्ति और प्रजावर्गकी वृद्धिके लिये उन-उन कल्पोंमें रुद्रगणोंके स्वामी कालस्वरूप नीललोहित महेश्वर रुद्र अपने कारणभूत परमेश्वरकी आज्ञासे ब्रह्माजीके पुत्र होकर उनपर अनुग्रह करते हैं। वे ही तेजोराशि, अनामय, अनादि, अनन्त, धाता, भूतसंहारक और सर्वव्यापी भगवान् ईश परम ऐश्वर्यसे संयुक्त, परमेश्वरसे भावित और सदा उन्हींकी शक्तिसे अधिष्ठित हो उन्हींके चिह्न धारण करते हैं। उन्हींके नामसे प्रसिद्ध हो उन्हींके समान रूप धारणकर उनके कार्य करनेमें समर्थ होते हैं। इनका सारा व्यवहार उन्हीं परमेश्वरके समान होता है। ये उनकी आज्ञाके पालक हैं। सहस्रों सूर्योंके समान उनका तेज है। वे अर्धचन्द्रको आभूषणके रूपमें धारण करते हैं। उनके हार, बाजूबंद और कड़े सर्पमय हैं। वे मूँजकी मेखला धारण करते हैं। जलंधर, विरिंच और इन्द्र उनकी सेवामें खड़े रहते हैं तथा हाथमें कपालखण्ड उनकी शोभा बढ़ाता है। गंगाकी ऊँची तरंगोंसे उनके पिंगलवर्णवाले केश और मुख भीगे रहते हैं। उनके कमनीय कैलास पर्वतके विभिन्न प्रान्त टूटी हुई दाढ़वाले सिंह आदि वन्य पशुओंसे आक्रान्त हैं। उनके बायें कानोंके पास गोलाकार कुण्डल झिलमिलाता रहता है। वे महान् वृषभपर सवारी करते हैं। उनकी वाणी महान् मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर है, कान्ति प्रचण्ड अग्निके समान उद्दीप्त है और बल-पराक्रम भी महान् है। इस प्रकार ब्रह्मपुत्र महेश्वरका विशाल रूप बड़ा भयानक है। वे ब्रह्माजीको विज्ञान देकर सृष्टिकार्यमें उनकी सहायता करते हैं। अतः रुद्रके कृपाप्रसादसे प्रत्येक कल्पमें प्रजापतिकी प्रजासृष्टि प्रवाह-रूपसे नित्य बनी रहती है।
एक समय ब्रह्माजीने नीललोहित भगवान् रुद्रसे सृष्टि करनेकी प्रार्थना की। तब भगवान् रुद्रने मानसिक संकल्पके द्वारा बहुत-से पुरुषोंकी सृष्टि की। वे सब-के-सब उनके अपने ही समान थे। सबने जटाजूट धारण कर रखे थे। सभी निर्भय, नीलकण्ठ और त्रिनेत्र थे। जरा और मृत्यु उनके पास नहीं पहुँचने पाती थी। चमकीले शूल उनके श्रेष्ठ आयुध थे। उन रुद्रगणोंने सम्पूर्ण चौदह भुवनोंको आच्छादित कर लिया था। उन विविध रुद्रोंको देखकर पितामहने रुद्रदेवसे
६८४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
कहा—'देवदेवेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप ऐसी प्रजाओंकी सृष्टि न कीजिये, आपका कल्याण हो। अब दूसरी प्रजाओंकी सृष्टि कीजिये, जो मरणधर्मवाली हों।'
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर परमेश्वर रुद्र उनसे हँसते हुए बोले—'मेरी सृष्टि वैसी नहीं होगी। अशुभ प्रजाओंकी सृष्टि तुम्हीं करो।' ब्रह्माजीसे ऐसा कहकर सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी भगवान् रुद्र उन रुद्रगणोंके साथ प्रजाकी सृष्टिके कार्यसे निवृत्त हो गये।
(अध्याय १३-१४)
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ब्रह्माजीके द्वारा अर्द्धनारीश्वररूपकी स्तुति तथा उस स्तोत्रकी महिमा
वायुदेव कहते हैं—जब फिर ब्रह्माजीकी रची हुई प्रजा बढ़ न सकी, तब उन्होंने पुनः मैथुनी सृष्टि करनेका विचार किया। इसके पहले ईश्वरसे नारियोंका समुदाय प्रकट नहीं हुआ था। इसलिये तबतक पितामह मैथुनी सृष्टि नहीं कर सके थे। तब उन्होंने मनमें ऐसे विचारको स्थान दिया, जो निश्चितरूपसे उनके मनोरथकी सिद्धिमें सहायक था। उन्होंने सोचा कि प्रजाओंकी वृद्धिके लिये परमेश्वरसे ही पूछना चाहिये; क्योंकि उनकी कृपाके बिना ये प्रजाएँ बढ़ नहीं सकतीं। ऐसा सोचकर विश्वात्मा ब्रह्माने तपस्या करनेकी तैयारी की। तब जो आद्या, अनन्ता, लोकभाविनी, सूक्ष्मतरा, शुद्धा, भावगम्या, मनोहरा, निर्गुणा, निष्प्रपंचा, निष्कला, नित्या तथा सदा ईश्वरके पास रहनेवाली जो उनकी परमा शक्ति है, उसीसे युक्त भगवान् त्रिलोचनका अपने हृदयमें चिन्तन करते हुए ब्रह्माजी बड़ी भारी तपस्या करने लगे। तीव्र तपस्यामें लगे हुए परमेष्ठी ब्रह्मापर उनके पिता महादेवजी थोड़े ही समयमें संतुष्ट हो गये। तदनन्तर अपने अनिर्वचनीय अंशसे किसी अद्भुत मूर्तिमें आविष्ट हो भगवान् महादेव आधे शरीरसे नारी और आधे शरीरसे ईश्वर होकर स्वयं ब्रह्माजीके पास गये। उन सर्वव्यापी, सब कुछ देनेवाले, सत्-असत्से रहित, समस्त उपमाओंसे शून्य, शरणागतवत्सल और सनातन शिवको दण्डवत् प्रणाम करके ब्रह्माजी उठे और हाथ जोड़ महादेवजी तथा महादेवी पार्वतीकी स्तुति करने लगे।
ब्रह्मा बोले—देव ! महादेव ! आपकी जय हो। ईश्वर ! महेश्वर ! आपकी जय हो। सर्वगुणश्रेष्ठ शिव ! आपकी जय हो।
* वायवीयसंहिता * ६८५
सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी शंकर! आपकी जय हो। प्रकृतिरूपिणी कल्याणमयी उमे! आपकी जय हो। प्रकृतिकी नायिके! आपकी जय हो। प्रकृतिसे दूर रहनेवाली देवि! आपकी जय हो। प्रकृतिसुन्दरि! आपकी जय हो। अमोघ महामाया और सफल मनोरथवाले देव! आपकी जय हो, जय हो। अमोघ महालीला और कभी व्यर्थ न जानेवाले महान् बलसे युक्त परमेश्वर! आपकी जय हो, जय हो। सम्पूर्ण जगत्की माता उमे! आपकी जय हो। विश्व-जगन्मये! आपकी जय हो। विश्वजगद्धात्रि! आपकी जय हो। समस्त संसारकी सखी-सहायिके! आपकी जय हो। प्रभो! आपका ऐश्वर्य तथा धाम दोनों सनातन हैं। आपकी जय हो, जय हो। आपका रूप और अनुचरवर्ग भी आपकी ही भाँति सनातन है। आपकी जय हो, जय हो। अपने तीन रूपोंद्वारा तीनों लोकोंका निर्माण, पालन और संहार करनेवाली देवि! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। तीनों लोकों अथवा आत्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा—तीनों आत्माओंकी नायिके! आपकी जय हो। प्रभो! जगत्के कारण तत्त्वोंका प्रादुर्भाव और विस्तार आपकी कृपादृष्टिके ही अधीन है, आपकी जय हो। प्रलयकालमें आपकी उपक्षायुक्त कटाक्षपूर्ण दृष्टिसे जो भयानक आग प्रकट होती है, उसके द्वारा सारा भौतिक जगत् भस्म हो जाता है; आपकी जय हो।
देवि! आपके स्वरूपका सम्यक् ज्ञान देवता आदिके लिये भी असम्भव है। आपकी जय हो। आप आत्मतत्त्वके सूक्ष्म ज्ञानसे प्रकाशित होती हैं। आपकी जय हो। ईश्वरि! आपने स्थूल आत्मशक्तिसे चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है। आपकी जय हो, जय हो। प्रभो! विश्वके तत्त्वोंका समुदाय अनेक और एकरूपमें आपके ही आधारपर स्थित है, आपकी जय हो। आपके श्रेष्ठ सेवकोंका समूह बड़े-बड़े असुरोंके मस्तकपर पाँव रखता है। आपकी जय हो। शरणागतोंकी रक्षा करनेमें अतिशय समर्थ परमेश्वरि! आपकी जय हो। संसाररूपी विषवृक्षके उगनेवाले अंकुरोंका उन्मूलन करनेवाली उमे! आपकी जय हो। प्रादेशिक ऐश्वर्य, वीर्य और शौर्यका विस्तार करनेवाले देव! आपकी जय हो। विश्वसे परे विद्यमान देव! आपने अपने वैभवसे दूसरोंके वैभवोंको तिरस्कृत कर दिया है, आपकी जय हो। पंचविध मोक्षरूप पुरुषार्थके प्रयोगद्वारा परमानन्दमय अमृतकी प्राप्ति करानेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। पंचविध पुरुषार्थके विज्ञानरूप अमृतसे परिपूर्ण स्तोत्रस्वरूपिणी परमेश्वरि! आपकी जय हो। अत्यन्त भयानक संसाररूपी महारोगको दूर करनेवाले वैद्यशिरोमणि! आपकी जय हो। अनादि कर्ममल एवं अज्ञानरूपी अन्धकारराशिको दूर करनेवाली चन्द्रिकारूपिणी शिवे! आपकी जय हो। त्रिपुरका विनाश करनेके लिये कालाग्नि-स्वरूप महादेव! आपकी जय हो। त्रिपुरभैरवि! आपकी जय हो। तीनों गुणोंसे मुक्त महेश्वर! आपकी जय हो। तीनों गुणोंका मर्दन करनेवाली महेश्वरि! आपकी जय हो। आदिसर्वज्ञ! आपकी जय हो। सबको ज्ञान देनेवाली देवि! आपकी जय हो। प्रचुर दिव्य अंगोंसे सुशोभित देव!
| ६८६ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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आपकी जय हो। मनोवांछित वस्तु देनेवाली देवि! आपकी जय हो। भगवन्! देव! कहाँ तो आपका उत्कृष्ट धाम और कहाँ मेरी तुच्छ वाणी, तथापि भक्तिभावसे प्रलाप करते हुए मुझ सेवकके अपराधको आप क्षमा कर दें।*
इस प्रकार सुन्दर उक्तियोंद्वारा भगवान् रुद्र और देवीका एक साथ गुणगान करके चतुर्मुख ब्रह्माने रुद्र एवं रुद्राणीको बारंबार नमस्कार किया। ब्रह्माजीके द्वारा पठित यह पवित्र एवं उत्तम अर्द्धनारीश्वर-स्तोत्र शिव तथा पार्वतीके हर्षको बढ़ानेवाला है। जो भक्तिपूर्वक जिस किसी भी गुरुकी शिक्षासे इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह शिव और पार्वतीको प्रसन्न करनेके कारण अपने अभीष्ट फलको प्राप्त कर लेता है। जो समस्त भुवनोंके प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले हैं, जिनके विग्रह जन्म और मृत्युसे रहित हैं तथा जो श्रेष्ठ नर और सुन्दरी नारीके रूपमें एक ही शरीर धारण करके स्थित हैं, उन कल्याणकारी भगवान् शिव और शिवाको मैं प्रणाम करता हूँ। (अध्याय १५)
* ब्रह्मोवाच—
जय देव महादेव जयेश्वर महेश्वर। जय सर्वगुणश्रेष्ठ जय सर्वसुराधिप॥
जय प्रकृतिकल्याणि जय प्रकृतिनायिके। जय प्रकृतिदूरे त्वं जय प्रकृतिसुन्दरि॥
जयामोघमहामाय जयामोघमनोरथ। जयामोघमहालील जयामोघमहाबल॥
जय विश्वजगन्मातर्जय विश्वजगन्मयि। जय विश्वजगद्धात्रि जय विश्वजगत्सखि॥
जय शाश्वतिकैश्वर्य जय शाश्वतिकालय। जय शाश्वतिकाकार जय शाश्वतिकानुग॥
जयात्मत्रयनिर्मात्रि जयात्मत्रयपालिनि। जयात्मत्रयसंहर्त्रि जयात्मत्रयनायिके॥
जयावलोकनायत्तजगत्कारणबृंहण। जयापेक्षाकटाक्षोत्थहुतभुग्भुक्तभौतिक॥
जय देवाद्यविज्ञेये स्वात्मसूक्ष्मदृशोज्ज्वले। जय स्थूलात्मशक्यत्येशे जय व्याप्तचराचरे॥
जय नानैकविन्यस्तविश्वतत्त्वसमुच्चय। जयासुरशिरोनिष्ठश्रेष्ठांगुगकदम्बक॥
जयोपाश्रितसंरक्षासंविधानपटीयसि। जयोन्मूलितसंसारविषवृक्षाङ्कुरोद्गमे॥
जय प्रादेशिकैश्वर्यवीर्यशौर्यविजृम्भण। जय विश्ववहद्भूत निरस्तपरवैभव॥
जय प्रणीतपञ्चार्थप्रयोगपरमामृत। जय पञ्चार्थविज्ञानसुधास्तोत्रस्वरूपिणि॥
जयातिघोरसंसारमहारोगभिषग्वर। जयानादिमलाज्ञानतमःपटलचन्द्रिके॥
जय त्रिपुरकालाग्ने जय त्रिपुरभैरवि। जय त्रिगुणनिर्मुक्त जय त्रिगुणमर्दिनि॥
जय प्रथमसर्वज्ञ जय सर्वप्रबोधिके। जय प्रचुरदिव्याङ्ग जय प्रार्थितदायिनि॥
क्व देव ते परं धाम क्व च तुच्छं हि नो वचः। तथापि भगवन् भक्त्या प्रलपन्तं क्षमस्व माम्॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खंड १५। १६–३१)
* वायवीयसंहिता * ६८७
महादेवजीके शरीरसे देवीका प्राकट्य और देवीके भ्रूमध्यभागसे शक्तिका प्रादुर्भाव
वायुदेवता कहते हैं—तदनन्तर महादेवजी महामेघकी गर्जनाके समान मधुर-गम्भीर, मंगलदायिनी एवं मनोहर वाणीमें बोले—'ब्रह्मन्! तुमने इस समय प्रजाजनोंकी वृद्धिके लिये ही तपस्या की है। तुम्हारी इस तपस्यासे मैं संतुष्ट हूँ और तुम्हें अभीष्ट वर देता हूँ।' इस प्रकार परम उदार तथा स्वभावतः मधुर वचन कहकर देवेश्वर हरने अपने शरीरके वामभागसे देवी रुद्राणीको प्रकट किया। जिन दिव्य गुणसम्पन्ना देवीको ब्रह्मवेत्ता पुरुष परमात्मा शिवकी पराशक्ति कहते हैं तथा जिनमें जन्म, मृत्यु और जरा आदि विकारोंका प्रवेश नहीं है, वे भवानी उस समय शिवके अंगसे प्रकट हुईं। जिनका परमभाव देवताओंको भी ज्ञात नहीं है, वे समस्त देवताओंकी भी अधीश्वरी देवी अपने स्वामीके अंगसे प्रकट हुईं। उन सर्वलोकमहेश्वरी परमेश्वरीको देखकर विराट् पुरुष ब्रह्माने प्रणाम किया और उन सर्वज्ञा, सर्वव्यापिनी, सूक्ष्मा, सदसद्भावसे रहित और अपनी प्रभासे इस सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करनेवाली पराशक्ति महादेवीसे इस प्रकार प्रार्थना की।
ब्रह्माजी बोले—सर्वजगमयी देवि! महादेवजीने सबसे पहले मुझे उत्पन्न किया और प्रजाकी सृष्टिके कार्यमें लगाया। इनकी आज्ञासे मैं समस्त जगत्की सृष्टि करता हूँ। किंतु देवि! मेरे मानसिक संकल्पसे रचे गये देवता आदि समस्त प्राणी बारंबार सृष्टि करनेपर भी बढ़ नहीं रहे हैं। अतः अब मैं मैथुनी सृष्टि करके ही अपनी सारी प्रजाको बढ़ाना चाहता हूँ। आपके पहले नारीकुलका प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। इसलिये नारीकुलकी सृष्टि करनेके लिये मुझमें शक्ति नहीं है। सम्पूर्ण शक्तियोंका आविर्भाव आपसे ही होता है। अतः सर्वत्र सबको सब प्रकारकी शक्ति देनेवाली आप वरदायिनी माया देवेश्वरीसे ही प्रार्थना करता हूँ, संसारभयको दूर करनेवाली सर्वव्यापिनी देवि! इस चराचर जगत्की वृद्धिके लिये आप अपने एक अंशसे मेरे पुत्र दक्षकी पुत्री हो जाइये।
ब्रह्मयोनि ब्रह्माके इस प्रकार याचना करनेपर देवी रुद्राणीने अपनी भौंहोंके मध्यभागसे अपने ही समान कान्तिमती एक शक्ति प्रकट की। उसे देखकर देवदेवेश्वर हरने हँसते हुए कहा—'तुम तपस्याद्वारा ब्रह्माजीकी आराधना करके उनका मनोरथ
६८८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
पूर्ण करो।' परमेश्वर शिवकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके वह देवी ब्रह्माजीकी प्रार्थनाके अनुसार दक्षकी पुत्री हो गयी। इस प्रकार ब्रह्माजीको ब्रह्मरूपिणी अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेवजीके शरीरमें प्रविष्ट हो गयीं। फिर महादेवजी भी अन्तर्धान हो गये। तभीसे इस जगत्के भीतर स्त्रीजातिमें भोग प्रतिष्ठित हुआ और मैथुनद्वारा प्रजाकी सृष्टिका कार्य चलने लगा। मुनिवरो! इससे ब्रह्माजीको भी आनन्द और संतोष प्राप्त हुआ। देवीसे शक्तिके प्रादुर्भावका यह सारा प्रसंग मैंने तुम्हें कह सुनाया। प्राणियोंकी सृष्टिके प्रसंगमें इस विषयका वर्णन किया गया है। यह पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है, अतः अवश्य सुननेयोग्य है। जो प्रतिदिन देवीसे शक्तिके प्रादुर्भावकी इस कथाका कीर्तन करता है, उसे सब प्रकारका पुण्य प्राप्त होता है तथा वह शुभलक्षण पुत्र पाता है।
(अध्याय १६)
भगवान् शिवका पार्वती तथा पार्षदोंके साथ मन्दराचलपर जाकर रहना, शुम्भ-निशुम्भके वधके लिये ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे शिवका पार्वतीको ‘काली’ कहकर कुपित करना और कालीका ‘गौरी’ होनेके लिये तपस्याके निमित्त जानेकी आज्ञा माँगना
वायुदेवता कहते हैं—इस प्रकार महादेवजीसे ही सनातन पराशक्तिको पाकर प्रजापति ब्रह्मा मैथुनी सृष्टि करनेकी इच्छा लेकर स्वयं भी आधे शरीरसे अद्भुत नारी और आधे शरीरसे पुरुष हो गये। आधे शरीरसे जो नारी उत्पन्न हुई थी, वह उनसे शतरूपा ही प्रकट हुई थी। ब्रह्माजीने अपने आधे पुरुष-शरीरसे विराट्को उत्पन्न किया। वे विराट् पुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहलाते हैं। देवी शतरूपाने अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके उद्दीप्त यशवाले मनुको ही पतिरूपमें प्राप्त किया।
इसके पश्चात् मनुके वंश तथा दक्ष-यज्ञ-विध्वंस आदिके प्रसंग सुनाकर वायुदेवताने यह बताया कि भगवान् शंकरने दक्ष तथा देवताओंके अपराध क्षमा कर दिये।
तदनन्तर ऋषियोंने पूछा—प्रभो! अपने गणों तथा देवीके साथ अन्तर्धान होकर भगवान् शिव कहाँ गये, कहाँ रहे और क्या करके विरत हुए?
वायुदेव बोले—महर्षियो! पर्वतोंमें श्रेष्ठ और विचित्र कन्दराओंसे सुशोभित जो परम सुन्दर मन्दराचल है, वही अपनी तपस्याके प्रभावसे देवाधिदेव महादेवजीका प्रिय निवास-स्थान हुआ। उसने पार्वती और शिवको अपने सिरपर ढोनेके लिये बड़ा भारी तप किया था और दीर्घकालके बाद उसे उनके चरणारविन्दोंके स्पर्शका सुख प्राप्त हुआ। उस पर्वतके सौन्दर्यका विस्तारपूर्वक वर्णन सहस्रों मुखोंद्वारा सौ करोड़ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता। उसके सामने समस्त पर्वतोंका सौन्दर्य तुच्छ हो जाता है। इसीलिये महादेवजीने देवीका
- वायवीयसंहिता * ६८९
प्रिय करनेकी इच्छासे उस अत्यन्त रमणीय पर्वतको अपना अन्तःपुर बना लिया। इस सर्वश्रेष्ठ पर्वतका स्मरण करके रैभ्य-आश्रमके समीप स्थित हुए अम्बिकासहित भगवान् त्रिलोचन वहाँसे अन्तर्धान होकर चले गये। मन्दराचलके उद्यानमें पहुँचकर देवी-सहित महेश्वर वहाँकी रमणीय तथा दिव्य अन्तःपुरकी भूमियोंमें रमण करने लगे।
जब इस तरह कुछ समय बीत गया और ब्रह्माजीकी मैथुनी सृष्टिके द्वारा जब प्रजाएँ बढ़ गयीं, तब शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दैत्य उत्पन्न हुए। वे परस्पर भाई थे। उनके तपोबलसे प्रभावित हो परमेष्ठी ब्रह्माने उन दोनों भाइयोंको यह वर दिया था कि 'इस जगत्के किसी भी पुरुषसे तुम मारे नहीं जा सकोगे।' उन दोनोंने ब्रह्माजीसे यह प्रार्थना की थी कि 'पार्वती देवीके अंशसे उत्पन्न जो अयोनिजा कन्या उत्पन्न हो, जिसे पुरुषका स्पर्श तथा रति नहीं प्राप्त हुई हो तथा जो अलंघ्य पराक्रमसे सम्पन्न हो, उसके प्रति कामभावसे पीड़ित होनेपर हम युद्धमें उसीके हाथों मारे जायँ।' उनकी इस प्रार्थनापर ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर स्वीकृति दे दी। तभीसे युद्धमें इन्द्र आदि देवताओंको जीतकर उन दोनोंने जगत्को अनीतिपूर्वक वेदोंके स्वाध्याय और वषट्कार (यज्ञ) आदिसे रहित कर दिया। तब ब्रह्माने उन दोनोंके वधके लिये देवेश्वर शिवसे प्रार्थना की—'प्रभो! आप एकान्तमें देवीकी निन्दा करके भी जैसे-तैसे उन्हें क्रोध दिलाइये और उनके रूप-रंगकी निन्दासे उत्पन्न हुई, कामभावसे रहित, कुमारीस्वरूपा शक्तिको निशुम्भ और शुम्भके वधके लिये देवताओंको अर्पित कीजिये।'
ब्रह्माजीके इस तरह प्रार्थना करनेपर भगवान् नीललोहित रुद्र एकान्तमें पार्वतीकी निन्दा-सी करते हुए मुसकराकर बोले—'तुम तो काली हो।' तब सुन्दर वर्णवाली देवी पार्वती अपने श्यामवर्णके कारण आक्षेप सुनकर कुपित हो उठीं और पतिदेवसे मुसकराकर समाधानरहित वाणीद्वारा बोलीं।
देवीने कहा—प्रभो! यदि मेरे इस काले रंगपर आपका प्रेम नहीं है तो इतने दीर्घकालसे अपनी शिक्षाका आप दमन क्यों करते रहे हैं? कोई स्त्री कितनी ही सर्वांगसुन्दरी क्यों न हो, यदि पतिका उसपर अनुराग नहीं हुआ तो अन्य समस्त गुणोंके साथ ही उसका जन्म लेना व्यर्थ हो जाता है। स्त्रियोंकी यह सृष्टि ही पतिके भोगका प्रधान अंग है। यदि वह उससे वंचित हो गयी तो इसका और कहाँ उपयोग हो सकता है? इसलिये आपने एकान्तमें जिसकी निन्दा की है, उस वर्णको त्यागकर अब मैं दूसरा वर्ण ग्रहण करूँगी अथवा स्वयं ही मिट जाऊँगी।
ऐसा कहकर देवी पार्वती शय्यासे उठकर खड़ी हो गयीं और तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके गद्गद कण्ठसे जानेकी आज्ञा माँगने लगीं।
इस प्रकार प्रेम भंग होनेसे भयभीत हो भूतनाथ भगवान् शिव स्वयं भवानीको प्रणाम करते हुए ही बोले।
भगवान् शिवने कहा—प्रिये! मैंने क्रीडा या मनोविनोदके लिये यह बात कही है। मेरे इस अभिप्रायको न जानकर तुम
६९० * संक्षिप्त शिवपुराण *
कुपित क्यों हो गयीं? यदि तुमपर मेरा प्रेम नहीं होगा तो और किसपर हो सकता है? तुम इस जगत्की माता हो और मैं पिता तथा अधिपति हूँ। फिर तुमपर मेरा प्रेम न होना कैसे सम्भव हो सकता है। हम दोनोंका वह प्रेम भी क्या कामदेवकी प्रेरणासे हुआ है, कदापि नहीं; क्योंकि कामदेवकी उत्पत्तिसे पहले ही जगत्की उत्पत्ति हुई है। कामदेवकी सृष्टि तो मैंने साधारण लोगोंकी रतिके लिये की है। कामदेव मुझे साधारण देवताके समान मानकर मेरा कुछ-कुछ तिरस्कार करने लगा था, अतः मैंने उसे भस्म कर दिया। हम दोनोंका यह लीलाविहार भी जगत्की रक्षाके लिये ही है, अतः उसीके लिये आज मैंने तुम्हारे प्रति यह परिहासयुक्त बात कही थी। मेरे इस कथनकी सत्यता तुमपर शीघ्र ही प्रकट हो जायगी।
देवीने कहा—भगवन्! पतिके प्यारसे वंचित होनेपर जो नारी अपने प्राणोंका भी परित्याग नहीं कर देती, वह कुलांगना और शुभलक्षणा होनेपर भी सत्पुरुषोंद्वारा निन्दित ही समझी जाती है। मेरा शरीर गौरवर्णका नहीं है, इस बातको लेकर आपको बहुत खेद होता है, अन्यथा क्रीडा या परिहासमें भी आपके द्वारा मुझे ‘काली-कलूटी’ कहा जाना कैसे सम्भव हो सकता था। मेरा कालापन आपको प्रिय नहीं है, इसलिये वह सत्पुरुषोंद्वारा भी निन्दित है; अतः तपस्याद्वारा इसका त्याग किये बिना अब मैं यहाँ रह ही नहीं सकती।
शिव बोले—यदि अपनी श्यामलताको लेकर तुम्हें इस तरह संताप हो रहा है तो इसके लिये तपस्या करनेकी क्या आवश्यकता है? तुम मेरी या अपनी इच्छामात्रसे ही दूसरे वर्णसे युक्त हो जाओ।
देवीने कहा—मैं आपसे अपने रंगका परिवर्तन नहीं चाहती। स्वयं भी इसे बदलनेका संकल्प नहीं कर सकती। अब तो तपस्याद्वारा ब्रह्माजीकी आराधना करके ही मैं शीघ्र गौरी हो जाऊँगी।
शिव बोले—महादेवि! पूर्वकालमें मेरी ही कृपासे ब्रह्माको ब्रह्मपदकी प्राप्ति हुई थी। अतः तपस्याद्वारा उन्हें बुलाकर तुम क्या करोगी?
देवीने कहा—इसमें संदेह नहीं कि ब्रह्मा आदि समस्त देवताओंको आपसे ही उत्तम पदोंकी प्राप्ति हुई है, तथापि आपकी आज्ञा पाकर मैं तपस्याद्वारा ब्रह्माजीकी आराधना करके ही अपना अभीष्ट सिद्ध करना चाहती हूँ। पूर्वकालमें जब मैं सतीके नामसे दक्षकी पुत्री हुई थी, तब तपस्याद्वारा ही मैंने आप जगदीश्वरको पतिके रूपमें प्राप्त किया था। इसी प्रकार आज भी तपस्याद्वारा ब्राह्मण ब्रह्माको संतुष्ट करके मैं गौरी होना चाहती हूँ। ऐसा करनेमें यहाँ क्या दोष है? यह बताइये।
महादेवीके ऐसा कहनेपर वामदेव मुसकराते हुए-से चुप रह गये। देवताओंका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे उन्होंने देवीको रोकनेके लिये हठ नहीं किया।
(अध्याय १७—२४)
~~ ० ~~
* वायवीयसंहिता * ६९१
पार्वतीकी तपस्या, एक व्याघ्रपर उनकी कृपा, ब्रह्माजीका उनके पास आना, देवीके साथ उनका वार्तालाप, देवीके द्वारा काली त्वचाका त्याग और उससे कृष्णवर्णा कुमारी कन्याके रूपमें उत्पन्न हुई कौशिकीके द्वारा शुम्भ-निशुम्भका वध
वायुदेव कहते हैं—महर्षियो! तदनन्तर पतिव्रता माता पार्वती पतिकी परिक्रमा करके उनके वियोगसे होनेवाले दुःखको किसी तरह रोककर हिमालय पर्वतपर चली गयीं। उन्होंने पहले सखियोंके साथ जिस स्थानपर तप किया था, उस स्थानसे उनका प्रेम हो गया था। अतः फिर उसीको उन्होंने तपस्याके लिये चुना। तदनन्तर माता-पिताके घर जा उनका दर्शन और प्रणाम करके उन्हें सब समाचार बताकर उनकी आज्ञा ले उन्होंने सारे आभूषण उतार दिये और फिर तपोवनमें जा स्नानके पश्चात् तपस्वीका परमपावन वेष धारण करके अत्यन्त तीव्र एवं परम दुष्कर तपस्या करनेका संकल्प किया। वे मन-ही-मन सदा पतिके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती हुई किसी क्षणिक लिंगमें उन्हींका ध्यान करके पूजनकी बाह्य विधिके अनुसार जंगलके फल-फूल आदि उपकरणोंद्वारा तीनों समय उनका पूजन करती थीं। 'भगवान् शंकर ही ब्रह्माका रूप धारण करके मेरी तपस्याका फल मुझे देंगे।' ऐसा दृढ़ विश्वास रखकर वे प्रतिदिन तपस्यामें लगी रहती थीं। इस तरह तपस्या करते-करते जब बहुत समय बीत गया, तब एक दिन उनके पास कोई बहुत बड़ा व्याघ्र देखा गया। वह दुष्टभावसे वहाँ आया था। पार्वतीजीके निकट आते ही उस दुरात्माका शरीर जड़वत् हो गया। वह उनके समीप चित्रलिखित-सा दिखायी देने लगा। दुष्टभावसे पास आये हुए उस व्याघ्रको देखकर भी देवी पार्वती साधारण नारीकी भाँति स्वभावसे विचलित नहीं हुईं। उस व्याघ्रके सारे अंग अकड़ गये थे। वह भूखसे अत्यन्त पीड़ित हो रहा था और यह सोचकर कि 'यही मेरा भोजन है' निरन्तर देवीकी ओर ही देख रहा था। देवीके सामने खड़ा-खड़ा वह उनकी उपासना-सी करने लगा। इधर देवीके हृदयमें सदा यही भाव आता था कि यह व्याघ्र मेरा ही उपासक है, दुष्ट वन-जन्तुओंसे मेरी रक्षा करनेवाला है। यह सोचकर वे उसपर कृपा करने लगीं। उन्हींकी कृपासे उसके तीनों प्रकारके मल तत्काल नष्ट हो गये। फिर तो उस व्याघ्रको सहसा देवीके स्वरूपका बोध हुआ, उसकी भूख मिट गयी और उसके अंगोंकी जड़ता भी दूर हो गयी। साथ ही उसकी जन्मसिद्ध दुष्टता नष्ट हो गयी और उसे निरन्तर तृप्ति बनी रहने लगी। उस समय उत्कृष्टरूपसे अपनी कृतार्थताका अनुभव करके वह तत्काल भक्त हो गया और उन परमेश्वरीकी सेवा करने लगा। अब वह अन्य दुष्ट जन्तुओंको खदेड़ता हुआ तपोवनमें विचरने लगा। इधर देवीकी तपस्या बढ़ी और तीव्रसे तीव्रतर होती गयी।
देवता शुम्भ आदि दैत्योंके दुराग्रहसे दुःखी हो ब्रह्माजीकी शरणमें गये। उन्होंने शत्रुपीड़नजनित अपने दुःखको उनसे निवेदन
६९२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
किया। शुम्भ और निशुम्भ वरदान पानेके घमंडसे देवताओंको जैसे-जैसे दुःख देते थे, वह सब सुनकर ब्रह्माजीको उनपर बड़ी दया आयी। उन्होंने दैत्यवधके लिये भगवान् शंकरके साथ हुई बातचीतका स्मरण करके देवताओंके साथ देवीके तपोवनको प्रस्थान किया। वहाँ सुरश्रेष्ठ ब्रह्माने उत्तम तपमें परिनिष्ठित परमेश्वरी पार्वतीको देखा। वे सम्पूर्ण जगत्की प्रतिष्ठा-सी जान पड़ती थीं। अपने, श्रीहरिके तथा रुद्रदेवके भी जन्मदाता पिता महामहेश्वरकी भार्या आर्या जगन्माता गिरिराजनन्दिनी पार्वतीजीको ब्रह्माजीने प्रणाम किया।
देवगणोंके साथ ब्रह्माजीको आया देख देवीने उनके योग्य अर्घ्य देकर स्वागत आदिके द्वारा उनका सत्कार किया। बदलेमें उनका भी सत्कार और अभिनन्दन करके ब्रह्माजी अनजानकी भाँति देवीकी तपस्याका कारण पूछने लगे।
ब्रह्माजी बोले—देवि! इस तीव्र तपस्याके द्वारा आप यहाँ किस अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि करना चाहती हैं? तपस्याके सम्पूर्ण फलोंकी सिद्धि तो आपके ही अधीन है। जो समस्त लोकोंके स्वामी हैं, उन्हीं परमेश्वरको पतिके रूपमें पाकर आपने तपस्याका सम्पूर्ण फल प्राप्त कर लिया है अथवा यह सारा ही क्रियाकलाप आपका लीलाविलास है। परंतु आश्चर्यकी बात तो यह है कि आप इतने दिनोंसे महादेवजीके विरहका कष्ट कैसे सह रही हैं?
देवीने कहा—ब्रह्मन्! जब सृष्टिके आदिकालमें महादेवजीसे आपकी उत्पत्ति सुनी जाती है, तब समस्त प्रजाओंमें प्रथम होनेके कारण आप मेरे ज्येष्ठ पुत्र होते हैं। फिर जब प्रजाकी वृद्धिके लिये आपके ललाटसे भगवान् शिवका प्रादुर्भाव हुआ, तब आप मेरे पतिके पिता और मेरे श्वशुर होनेके कारण गुरुजनोंकी कोटिमें आ जाते हैं और जब मैं यह सोचती हूँ कि स्वयं मेरे पिता गिरिराज हिमालय आपके पुत्र हैं, तब आप मेरे साक्षात् पितामह लगते हैं। लोकपितामह! इस तरह आप लोकयात्राके विधाता हैं। अन्तःपुरमें पतिके साथ जो वृत्तान्त घटित हुआ है, उसे मैं आपके सामने कैसे कह सकूँगी? अतः यहाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ। मेरे शरीरमें जो यह कालापन है, इसे सात्त्विकविधिसे त्यागकर मैं गौरवर्णा होना चाहती हूँ।
ब्रह्माजी बोले—देवि! इतने ही प्रयोजनके लिये आपने ऐसा कठोर तप क्यों किया? क्या इसके लिये आपकी इच्छामात्र ही पर्याप्त नहीं थी? अथवा यह आपकी एक लीला ही है। जगन्मातः! आपकी लीला भी लोकहितके लिये ही होती है। अतः आप इसके द्वारा मेरे एक अभीष्ट फलकी सिद्धि कीजिये। निशुम्भ और शुम्भ नामक दो दैत्य हैं, उनको मैंने वर दे रखा है। इससे उनका घमंड बहुत बढ़ गया है और वे देवताओंको सता रहे हैं। उन दोनोंको आपके ही हाथसे मारे जानेका वरदान प्राप्त हुआ है। अतः अब विलम्ब करनेसे कोई लाभ नहीं। आप क्षणभरके लिये सुस्थिर हो जाइये। आपके द्वारा जो शक्ति रची या छोड़ी जायगी, वही उन दोनोंके लिये मृत्यु हो जायगी।
ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर गिरिराजकुमारी देवी पार्वती सहसा अपने काली त्वचाके आवरणको उतारकर
* वायवीयसंहिता * ६९३
गौरवर्णा हो गयीं। त्वचाकोष (काली त्वचामय आवरण) रूपसे त्यागी गयी जो उनकी शक्ति थी उसका नाम 'कौशिकी' हुआ। वह काले मेघके समान कान्तिवाली कृष्णवर्णा कन्या हो गयी। देवीकी वह मायामयी शक्ति ही योगनिद्रा और वैष्णवी कहलाती है। उसके आठ बड़ी-बड़ी भुजाएँ थीं। उसने उन हाथोंमें शंख, चक्र और त्रिशूल आदि आयुध धारण कर रखे थे। उस देवीके तीन रूप हैं—सौम्य, घोर और मिश्र। वह तीन नेत्रोंसे युक्त थी। उसने मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट धारण कर रखा था। उसे पुरुषका स्पर्श तथा रतिका योग नहीं प्राप्त था और वह अत्यन्त सुन्दरी थी। देवीने अपनी इस सनातन शक्तिको ब्रह्माजीके हाथमें दे दिया। वही दैत्यप्रवर शुम्भ और निशुम्भका वध करनेवाली हुई। उस समय प्रसन्न हुए ब्रह्माजीने उस पराशक्तिको सवारीके लिये एक प्रबल सिंह प्रदान किया, जो उनके साथ ही आया था। उस देवीके रहनेके लिये ब्रह्माजीने विन्ध्यगिरिपर वासस्थान दिया और वहाँ नाना प्रकारके उपचारोंसे उनका पूजन किया। विश्वकर्मा ब्रह्माके द्वारा सम्मानित हुई वह शक्ति अपनी माता गौरीको और ब्रह्माजीको क्रमशः प्रणाम करके अपने ही अंगोंसे उत्पन्न और अपने ही समान शक्तिशालिनी बहुसंख्यक शक्तियोंको साथ ले दैत्यराज शुम्भ-निशुम्भको मारनेके लिये उद्यत होकर विन्ध्यपर्वतको चली गयी। उसने समरांगणमें उन दोनों दैत्यराजोंको मार गिराया। उस युद्धका अन्यत्र वर्णन हो चुका है, इसलिये उसकी विस्तृत कथा यहाँ नहीं कही गयी। दूसरे स्थलोंसे उसकी ऊहा कर लेनी चाहिये। अब मैं प्रस्तुत प्रसंगका वर्णन करता हूँ। (अध्याय २५)
गौरीदेवीका व्याघ्रको अपने साथ ले जानेके लिये ब्रह्माजीसे आज्ञा माँगना, ब्रह्माजीका उसे दुष्कर्मी बताकर रोकना, देवीका शरणागतको त्यागनेसे इनकार करना, ब्रह्माजीका देवीकी महत्ता बताकर अनुमति देना और देवीका माता-पितासे मिलकर मन्दराचलको जाना
वायुदेवता कहते हैं—कौशिकीको उत्पन्न करके उसे ब्रह्माजीके हाथमें देनेके पश्चात् गौरीदेवीने प्रत्युपकारके लिये पितामहसे कहा।
देवी बोलीं—क्या आपने मेरे आश्रममें रहनेवाले इस व्याघ्रको देखा है? इसने दुष्ट जन्तुओंसे मेरे तपोवनकी रक्षा की है। यह मुझमें अपना मन लगाकर अनन्यभावसे मेरा भजन करता रहा है। अतः इसकी रक्षाके सिवा दूसरा कोई मेरा प्रिय कार्य नहीं है। यह मेरे अन्तःपुरमें विचरनेवाला होगा। भगवान् शंकर इसे प्रसन्नतापूर्वक गणेश्वरका पद प्रदान करेंगे। मैं इसे आगे करके सखियोंके साथ यहाँसे जाना चाहती हूँ। इसके लिये आप मुझे आज्ञा दें; क्योंकि आप प्रजापति हैं।
६९४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
देवीके ऐसा कहनेपर उन्हें भोली-भाली जान हँसते और मुसकराते हुए ब्रह्माजी उस व्याघ्रकी पुरानी क्रूरतापूर्ण करतूतें बताते हुए उसकी दुष्टताका वर्णन करने लगे।
ब्रह्माजीने कहा—देवि! कहाँ तो पशुओंमें क्रूर व्याघ्र और कहाँ यह आपकी मंगलमयी कृपा। आप विषधर सर्पके मुखमें साक्षात् अमृत क्यों सींच रही हैं? यह केवल व्याघ्रके रूपमें रहनेवाला कोई दुष्ट निशाचर है। इसने बहुत-सी गौओं और तपस्वी ब्राह्मणोंको खा डाला है। यह उन सबको इच्छानुसार ताप देता हुआ मनमाना रूप धारण करके विचरता है। अतः इसे अपने पापकर्मका फल अवश्य भोगना चाहिये। ऐसे दुष्टोंपर आपको कृपा करनेकी क्या आवश्यकता है? इस स्वभावसे ही कलुषित चित्तवाले दुष्ट जीवसे देवीको क्या काम है?
देवी बोलीं—आपने जो कुछ कहा है, वह सब ठीक है। यह ऐसा ही सही, तथापि मेरी शरणमें आ गया है। अतः मुझे इसका त्याग नहीं करना चाहिये।
ब्रह्माजीने कहा—देवि! इसकी आपके प्रति भक्ति है, इस बातको जाने बिना ही मैंने आपके समक्ष इसके पूर्वचरित्रका वर्णन किया है। यदि इसके भीतर भक्ति है तो पहलेके पापोंसे इसका क्या बिगड़नेवाला है; क्योंकि आपके भक्तका कभी नाश नहीं होता। जो आपकी आज्ञाका पालन नहीं करता, वह पुण्यकर्मा होकर भी क्या करेगा। देवि! आप ही अजन्मा, बुद्धिमती, पुरातन शक्ति और परमेश्वरी हैं। सबके बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था आपके ही अधीन है। आपके सिवा पराशक्ति कौन है? आपके बिना किसको कर्मजनित सिद्धि प्राप्त हो सकती है? आप ही असंख्य रुद्रोंकी विविध शक्ति हैं। शक्तिरहित कर्ता काम करनेमें कौन-सी सफलता प्राप्त करेगा? भगवान् विष्णुको, मुझको तथा अन्य देवता, दानव और राक्षसोंको उन-उन ऐश्वर्योंकी प्राप्ति करानेके लिये आपकी आज्ञा ही कारण है। असंख्य ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र, जो आपकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं, बीत चुके हैं और भविष्यमें भी होंगे। देवेश्वरि! आपकी आराधना किये बिना हम सब श्रेष्ठ देवता भी धर्म आदि चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति नहीं कर सकते। आपके संकल्पसे ब्रह्मत्व और स्थावरत्वका तत्काल व्यत्यास (फेर-बदल) भी हो जाता है अर्थात् ब्रह्मा स्थावर (वृक्ष आदि) हो जाता है और स्थावर ब्रह्मा; क्योंकि पुण्य और पापके फलोंकी व्यवस्था आपने ही की है। आप ही जगत्के स्वामी परमात्मा शिवकी अनादि, अमध्य और अनन्त आदि सनातन शक्ति हैं। आप सम्पूर्ण लोकयात्राका निर्वाह करनेके लिये किसी अद्भुत मूर्तिमें आविष्ट हो नाना प्रकारके भावोंसे क्रीड़ा करती हैं। भला, आपको ठीक-ठीक कौन जानता है। अतः यह पापाचारी व्याघ्र भी आज आपकी कृपासे परम सिद्धि प्राप्त करे, इसमें कौन बाधक हो सकता है।
इस प्रकार उनके परम तत्त्वका स्मरण कराकर ब्रह्माजीने जब उचित प्रार्थना की, तब गौरीदेवी तपस्यासे निवृत्त हुईं। तदनन्तर देवीकी आज्ञा लेकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये। फिर देवीने अपने वियोगको न सह सकनेवाले माता-पिता मैना और हिमवान्का दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया
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तथा उन्हें नाना प्रकारसे आश्वासन दिया। इसके बाद देवीने तपस्याके प्रेमी तपोवनके वृक्षोंको देखा। वे उनके सामने फूलोंकी वर्षा कर रहे थे। ऐसा जान पड़ता था, मानो उनसे होनेवाले वियोगके शोकसे पीड़ित हो वे आँसू बरसा रहे हों। अपनी शाखाओंपर बैठे हुए विहंगमोंके कलरवोंके व्याजसे मानो वे व्याकुलतापूर्वक नाना प्रकारसे दीनतापूर्ण विलाप कर रहे थे।
तदनन्तर पतिके दर्शनके लिये उतावली हो उस व्याघ्रको औरस पुत्रकी भाँति स्नेहसे आगे करके सखियोंसे बातचीत करती और देहकी दिव्य प्रभासे दसों दिशाओंको उद्दीपित करती हुई गौरीदेवी मन्दराचलको चली गयीं, जहाँ सम्पूर्ण जगत्के आधार, स्रष्टा, पालक और संहारक पतिदेव महेश्वर विराजमान थे।
(अध्याय २६)
मन्दराचलपर गौरीदेवीका स्वागत, महादेवजीके द्वारा उनके और अपने उत्कृष्ट स्वरूप एवं अविच्छेद्य सम्बन्धपर प्रकाश तथा देवीके साथ आये हुए व्याघ्रको उनका गणाध्यक्ष बनाकर अन्तःपुरके द्वारपर सोमनन्दी नामसे प्रतिष्ठित करना
ऋषियोंने पूछा—अपने शरीरको दिव्य गौरवर्णसे युक्त बनाकर गिरिराजकुमारी देवी पार्वती ने जब मन्दराचल प्रदेशमें प्रवेश किया, तब वे अपने पतिसे किस प्रकार मिलीं? प्रवेशकालमें उनके भवनद्वारपर रहनेवाले गणेश्वरोंने क्या किया तथा महादेवजीने भी उन्हें देखकर उस समय उनके साथ कैसा बर्ताव किया?
उस समय उस भवनमें रहनेवाले श्रेष्ठ पार्षदोंने देवीकी वन्दना की। फिर देवीने विनययुक्त वाणीद्वारा भगवान् त्रिलोचनको प्रणाम किया। वे प्रणाम करके अभी उठने भी नहीं पायी थीं कि परमेश्वरने उन्हें दोनों हाथोंसे पकड़कर बड़े आनन्दके साथ हृदयसे लगा लिया। फिर मुसकराते हुए वे एकटक नेत्रोंसे उनके मुखचन्द्रकी सुधाका पान-सा करने लगे। फिर उनसे बातचीत करनेके लिये उन्होंने पहले अपनी ओरसे वार्ता आरम्भ की।
वायुदेवताने कहा—जिस प्रेमगर्भित रसके द्वारा अनुरागी पुरुषोंके मनका हरण हो जाता है, उस परम रसका ठीक-ठीक वर्णन करना असम्भव है। द्वारपाल बड़ी उतावलीसे राह देखते थे। उनके साथ ही महादेवजी भी देवीके आगमनके लिये उत्सुक थे। जब वे भवनमें प्रवेश करने लगीं, तब शंकित हो उन-उन प्रेमजनित भावोंसे वे उनकी ओर देखने लगे। देवी भी उनकी ओर उन्हीं भावोंसे देख रही थीं।
देवाधिदेव महादेवजी बोले—सर्वांगसुन्दरि प्रिये! क्या तुम्हारी वह मनोदशा दूर हो गयी, जिसके रहते तुम्हारे क्रोधके कारण मुझे अनुनय-विनयका कोई भी उपाय नहीं सूझता था। यदि साधारण लोगोंकी भाँति हम दोनोंमें भी एक-दूसरेके अप्रियका कारण विद्यमान है, तब तो इस चराचर
६९६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
जगत्का नाश हुआ ही समझना चाहिये। मैं अग्निके मस्तकपर स्थित हूँ और तुम सोमके। हम दोनोंसे ही यह अग्नि-सोमात्मक जगत् प्रतिष्ठित है! जगत्के हितके लिये स्वेच्छासे शरीर धारण करके विचरनेवाले हम दोनोंके वियोगमें यह जगत् निराधार हो जायगा। इसमें शास्त्र और युक्तिसे निश्चित किया हुआ दूसरा हेतु भी है। यह स्थावर-जंगमरूप जगत् वाणी और अर्थमय ही है। तुम साक्षात् वाणीमय अमृत हो और मैं अर्थमय परम उत्तम अमृत हूँ। ये दोनों अमृत एक-दूसरेसे विलग कैसे हो सकते हैं। तुम मेरे स्वरूपका बोध करानेवाली विद्या हो और मैं तुम्हारे दिये हुए विश्वासपूर्ण बोधसे जाननेयोग्य परमात्मा हूँ। हम दोनों क्रमशः विद्यात्मा और वेद्यात्मा हैं, फिर हममें वियोग होना कैसे सम्भव है। मैं अपने प्रयत्नसे जगत्की सृष्टि और संहार नहीं करता! एकमात्र आज्ञासे ही सबकी सृष्टि और संहार उपलब्ध होते हैं। वह अत्यन्त गौरवपूर्ण आज्ञा तुम्हीं हो। ऐश्वर्यका एकमात्र सार आज्ञा (शासन) है, क्योंकि वही स्वतन्त्रताका लक्षण है। आज्ञासे वियुक्त होनेपर मेरा ऐश्वर्य कैसा होगा। हमलोगोंका एक-दूसरेसे विलग होकर रहना कभी सम्भव नहीं है। देवताओंके कार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे ही मैंने उस समय उस दिन लीलापूर्वक व्यंग्य वचन कहा था। तुम्हें भी तो यह बात अज्ञात नहीं थी। फिर तुम कुपित कैसे हो गयीं! अतः यही कहना पड़ता है कि तुमने मुझपर भी जो क्रोध किया था, वह त्रिलोकीकी रक्षाके लिये ही था; क्योंकि तुममें ऐसी कोई बात नहीं है, जो जगत्के प्राणियोंका अनर्थ करनेवाली हो।
इस प्रकार प्रिय वचन बोलनेवाले साक्षात् परमेश्वर शिवके प्रति शृंगाररसके सारभूत भावोंकी प्राकृतिक जन्मभूमि देवी पार्वती अपने पतिकी कही हुई यह मनोहर बात सुनकर इसे सत्य जान मुसकराकर रह गयीं, लज्जावश कोई उत्तर न दे सकीं। केवल कौशिकीके यशका वर्णन छोड़कर और कुछ उन्होंने नहीं कहा। देवीने कौशिकीके विषयमें जो कुछ कहा उसका वर्णन करता हूँ।
देवी बोलीं—'भगवन्! मैंने जिस कौशिकीकी सृष्टि की है, उसे क्या आपने नहीं देखा? वैसी कन्या न तो इस लोकमें हुई है और न होगी।' यों कहकर देवीने उसके विन्ध्यपर्वतपर निवास करने तथा समरांगणमें शुम्भ और निशुम्भका वध करके उनपर विजय पानेका प्रसंग सुनाकर उसके बल-पराक्रमका वर्णन किया। साथ ही यह भी बताया कि वह उपासना करनेवाले लोगोंको सदा प्रत्यक्ष फल देती है तथा