श्री राम कथा में भारत की सभी समस्याओं का समाधान
Shri Ram Katha Mein Bharat Ki Sabhi Samasyaon Ka Samadhan
राजीव दीक्षित / रोबिन बसराना द्वारा
स्रोत: Rashtraniti & Ram Katha Discourse · Swadeshi Robin Basrana · 2017 (उद्गम)
तो भरत कह रहे हैं कि “नहीं! मेरे राज्य के मंत्रिमंडल में तो नहीं”।
तो राम कहते हैं कि “ध्यान रखना अगर मंत्रिमंडल के अंदर की बात बाहर गई तो राज्य चल नहीं पायेगा”।
जब हमारे हिंदुस्तान में कैबिनेट की मीटिंग चल रही होती है तो अंदर से कोई आ जाता है और न्यूज़ पेपर वालों को खबर देकर चला जाता है। एकदम से खबर अगले दिन हेड लाइन में आ जाती है, सब एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं की खबर कहाँ से ली हुई? हमें तो नहीं मालूम।
तो राम कहते हैं कि “अंदर के कोई फैसले बाहर लीक होते हैं तो ऐसे मंत्रियों को रखना नहीं तुरंत निकाल कर बाहर कर देना” फिर आगे वह पूछते हैं कि “तुम कभी भी कोई योजना बनाते हो तो धन की व्यवस्था कैसे करते हो? क्या प्रजा के ऊपर टैक्स लगाते हो नहीं? कर लगाते हो या अपने राज्य का फालतू खर्च कम करके उससे योजना बनाते हो?” तो भरत कह रहे हैं कि “मैं कोशिश करता हूँ कि मेरे राज्य के फालतू खर्च कम करके और इसी से प्रजा की भलाई के काम करूँ, नए टैक्स लगाने में मुझे विश्वास नहीं है, क्योंकि आप मानते हो ज्यादा टैक्स अच्छे नहीं है”।
आजादी के समय में सरकार 12-13 तरह के टैक्स लेती थी, अब आजादी के 60 साल बाद 63 टैक्स हो चुके हैं और फिर भी वित्त मंत्री का पेट नहीं भरता, हर समय कहते हैं और टैक्स लाओ और टैक्स लाओ, हर दिन उनका स्टेटमेंट होता है, ज्यादा से ज्यादा लोगों को इनकम टैक्स में फंसा दो, 7.5 लाख करोड़ रुपए हम हर साल टैक्स में भरते हैं, फिर भी सरकार का पेट नहीं भरता।
राम जी कहते हैं कि “फालतू खर्च कम करो उससे प्रजा का विकास करो।”
आज की सरकार के 90% खर्च फालतू है, यह सरकार खुद कहती है। फालतू खर्च माने प्रधानमंत्री की पगार, प्रधानमंत्री का वेतन, प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल का वेतन, राष्ट्रपति का वेतन, मुख्यमंत्रियों का वेतन, राज्यपालों का वेतन, सरकारी अधिकारियों का वेतन, कर्मचारियों का वेतन, जिससे विकास का कोई काम नहीं। हमारी सरकार के कुल खर्च का 90% यही खर्च है, मात्र 10% खर्च उपयोग किया जाता है।
राम जी उल्टा कह रहे हैं वह भरत को कह रहे हैं कि “10% खर्च तो अपना होना चाहिए और 90% खर्च प्रजा के ऊपर होना चाहिए”।
अब श्री राम जी की कल्पना में मैं बजट बना रहा हूँ राम राज्य का बजट और अगले साल उस पर बात करूँगा, ऐसा बजट होना चाहिए जिसमें 10% खर्च फालतू का हो, सरकार का हो, बाकी 90% खर्च विकास पर हो, तो बजट ऐसा होना चाहिए, बजट ऐसा तो नहीं कि उनके राज्य में बचत नहीं होता होगा, तब समझ में आएगा कि राम राज्य का बजट कैसा होगा? फिर वह कहते हैं कि “तुम्हारी जो सुरक्षा व्यवस्था है वह तुम्हारे कुल खर्च से 15% के ज्यादा नहीं होनी चाहिए, अधिक से अधिक और कम से कम 5% रहना चाहिए फिर वह आगे कह रहे हैं कि “तुम तुम्हारे राज्य के अधिकारियों और मंत्रियों में कालिटी देखते हो या चापलूसी गुण देखते हो, या उनकी चापलूसी वह तुम्हारे आगे पीछे हां जी -
हां जी करते घूमते हैं, ऐसे लोगों को मंत्री बनाते हो या जो तुम्हारे गलत को गलत कहे सही को सही कहे और तुम्हें सही सलाह दे ऐसे लोगों को मंत्री बनाते हो? तो भरत कहते हैं “हां मैं कोशिश तो करता हूँ बिना चापलूसी करने वालों को मंत्री बनाता हूँ।”
फिर वह आगे पूछ रहे हैं कि “तुम्हारे राज्य में भ्रष्टाचार कितना है”?
तब भरत कह रहे हैं “मेरे राज्य का कुल खर्चा का 1% या उससे कम भ्रष्टाचार है”।
तो राम कहते हैं कि “3% से ऊपर नहीं जाना चाहिए अगर गया तो राज्य व्यवस्था पूरी बदलनी पड़ेगी करप्शन है, लेकिन 3% के ऊपर नहीं।” आज हमारे देश में कुल खर्च का 70% करप्शन है, आज की तारीख में।
फिर राम जी पूछ रहे हैं कि “तुम तुम्हारे राज्य में जो लोग चोरी करते हैं अपराध करते हैं, बेईमानी करते हैं, उनको दण्ड देते हो या नहीं?
तो भरत कहते हैं “दण्ड तो देता हूँ, लेकिन जेल में देता हूँ”।
तो राम जी कह रहे हैं, “दण्ड जेल में नहीं खुले में मिलना चाहिए, मुकदमा जेल में चलना चाहिए”। वह कह रहे हैं जिसको भी दण्ड दो खुले में दो, ताकि प्रजा को मालूम हो कि इस बेईमानी का, इस चोरी का यह दंड है, मुकदमा जेल में चलाओ।”
अभी यहां क्या होता है? दण्ड जेल में होता है, मुकदमा खुले में चलता है। माने रामराज्य का बिल्कुल उल्टा, रावण राज्य का इंसाफ।
राम पूछ रहे हैं कि “तुम प्रजा से सुझाव मांगते हो, अपने बारे में या अपने राज्य के बारे में? तो प्रजा क्या कहती है”?
भरत कहते हैं कि “नियमित रूप से सुझाव लेता हूँ”
राम कहते हैं तो “ठीक है! तो फिर वह पूछ रहे हैं तुम तुम्हारे मंत्रियों का ज्यादा समय प्रमाद में मनोरंजन में, या मौज मस्ती में, तो नहीं बीतता”
भरत कह रहे हैं कि “नहीं! मेरे सब मंत्री मेहनत से काम करते हैं, कोई मनोरंजन नहीं करता, कोई मौज मजा नहीं लेता”,
राम जी ने कहा “यह आपके लिए नहीं है, यह प्रजा के लिए है, राजा को नहीं करना”।
फिर वह आज हमारे यहां क्या होता है? प्रधानमंत्री महीने-महीने भर की छुट्टी पर चले गए यूरोप के यात्रा पर चले गए, राष्ट्रपति चले गए, मुख्यमंत्री चले गए, राज्यपाल चले गए।
राम जी बोल कर गए कि राजा को नहीं करना यह काम प्रजा करें तो ठीक, राजा तो कर ही नहीं सकता, सोच भी नहीं सकता,
फिर वह आगे प्रश्न पूछ रहे हैं कि “क्या तुम्हारी सेना तुम्हारे पूरे अधिकार में है? क्या तुम्हारी सेना तुम्हारे सभी आदेशों को मानती है? क्या सेना में तुम्हारे यहां कोई विद्रोह तो नहीं है?
तो भरत कहते हैं “नहीं है!”
श्री राम कहते हैं, “फिर तुम निश्चित हो सकते हो”।
फिर श्री राम कहते हैं की “सेना में जो सैनिक वीरता दिखाते हैं उनको तुम पुरस्कृत करते हो या नहीं”?
भरत – “हां करता हूं”
श्री राम – “तो यह दूसरों के लिए अच्छा है”, फिर वो पूछ रहे हैं कि “जब तुम फैसला लेते हो तो तुम्हारे सब मंत्री एकमत होते हैं या नहीं, आम राय होती है या नहीं”।
तो भरत कह रहे हैं, “नहीं! कभी-कभी ऐसा भी होता है, कि 50 मंत्री एक तरफ होते हैं और 51 एक तरफ, या 49 एक तरफ 51 एक तरफ, तो फिर मैं 51 वालों की बात मान लेता हूं”।
तो राम कहते हैं “यह अच्छा नहीं है, सबको एक राय होना चाहिए, तभी तुम्हारा राज्य ज्यादा दिन तक चल पायेगा”।
हमारी संसद इसी पर चल रही है जो 51 कह दे वह कानून जो 49 कहे वह कानून नहीं, चाहे वह कितना भी सत्य हो। अभी संसद में ज्यादा सांसदों ने कहा “वेतन भत्ते बढ़ाओ”, तो बढ़ा दिया, कुछ अल्पसंख्यक थे जिन्होंने मना किया, तो उनकी किसी ने सुना नहीं।
राम जी कहते हैं “यह माइनॉरिटी या मैजोरिटी नहीं, एक राय होनी चाहिए, आम राय होनी चाहिए, और जब तक आमराय नहीं बने, तब तक फैसला मत करो, बार-बार बैठो बार-बार बैठो, हमारे यहां प्रजातंत्र के सभी सिद्धांतों को श्री राम जी कह कर चले गए, अब यह हमारा दुर्भाग्य है हमने उनको देखा नहीं, रघुवंशम में बहुत सारे प्रिंसिपल है, हमारी सरकार ने अंग्रेजों की नकल करके पार्लियामेंट डेमोक्रेसी लाए, यदि श्री राम की डेमोक्रेसी लाए होती तो सभी शहीदों की आत्मा को शांति मिल गई होती।
ऐसे-ऐसे बहुत अच्छे प्रश्न किए और यह सारे प्रश्न इतने अद्भुत है, कि एक-एक प्रश्न पर मैं आधे घंटे, 1 घंटे बात कर सकता हूं, लेकिन मैं केवल ध्यान में लाना चाहता हूं, कि श्री राम के राज्य की व्यवस्था कैसी है? रामराज्य कैसा है? और रामराज्य कोई कपोल कल्पना नहीं है, ठोस धरातल पर खड़ी हुई एक धारणा है, जिसमें गणतंत्र है प्रजा का, और राम जी यह सब प्रश्नों का उत्तर जब ले लेंते हैं, भरत से फिर कहते हैं कि “तुम यह सब कर ही रहे हो तो रामराज्य ही चला रहे हो, मेरे आने की जरूरत नहीं है, तुम जाओ मेरी जरूरत जब पड़ेगी, जब तुम रास्ते से भटक जाओगे तब वह कहते हैं कि “कम से कम अपनी खड़ाऊ तो दे दो, वही लेकर जाता हूं, तो ठीक है ले जाओ, लेकिन विचार यह है, इसके हिसाब से राज्य चलाओ इससे अलग मत चलाओ।
तो गांधीजी बार-बार बार-बार रामराज्य की कल्पना कर रहे हैं तो यही कल्पना कर रहे हैं, मैंने कोशिश किया है कि यह जो रामराज्य की कल्पना छुटी पड़ी है, क्योंकि इस पर बात नहीं हुई है, चर्चा नहीं हुई है, मैंने तो जितने भी राम कथा कहने वाले सब से बात की किसी ने मुझे संतुष्ट नहीं किया, हर जगह निराशा हाथ लगी, और राम के दूसरे दूसरे रूपों की बहुत चर्चा करते हैं, राम बड़े कोमल है, राम बड़े दयालु है, उनकी आंखें बहुत सुंदर है, उनके हाथ बहुत सुंदर है, और अजान बाहू है, इन बातों में घंटो-घंटो निकाल सकते हैं, आपको रुला सकते हैं, आपके साथ वह भी रो सकते हैं, लेकिन राम की जिंदगी का जो असली कर्म है उस पर बात नहीं करते। कई राम कथा सुनाने वालों के यहां मैं चुपचाप बैठा हूं कि अब कहेंगे अब कहेंगे, लेकिन बात ही नहीं आती, भरत राम संवाद की बात आती है, तो राम ने गले से लगा लिया और राम के आंसू बहने लगे भरत के भी आंसू बहने लगे, लेकिन यह जो मूल बात कर रहे हैं यह सब बोल कर जाते हैं, शायद उनके मन में
इसको कहने की नैतिकता नहीं हो या हिम्मत नहीं हो, क्योंकि आदमी दूसरे को कहता है, उससे ज्यादा अपने को कहता है, जब मैं बोलता हूँ तो मुझे लगता है कि मैं दूसरों से नहीं अपने से बात कर रहा हूँ, क्योंकि कोई भी बोलने से पहले आदमी अपने से बोलता है, शायद वह नहीं बोल पाते और मैं पूरी विनम्रता से कहता हूँ, आज हिंदुस्तान में जो राम कथा हो रही है और राम की कथा नहीं है, वह व्यापार की कथाएं हैं, उसमें कोई आएगा, आपसे डील करेगा, भैया मुझको इतने लाख चाहिए, आप दे सकते हो तो आप कराओ, आप नहीं दे सकते तो मैं दूसरे से बात करता हूँ, यह सुविधाएं चाहिए, यह सुख चाहिए, इतना पैसा चाहिए, इतना चढ़ावा आना चाहिए, उसके बाद ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए, ऐ.सी. होना चाहिए।
फिर रामचंद्र जी के वन गमन की कहानी ऐ.सी. मंच से सुनाएंगे, दुख का पहाड़ टूट पड़ा श्रीराम पर और हम ए.सी. में बैठ कर उनकी कहानी सुनेंगे, कि रामचंद्र जी को यह दुख है, कि रामचंद्र जी को वह दुख है, तो मुझे लगता है कि हम रामराज्य की तरफ तो बढ़ नहीं पा रहे हैं, राम की कथा का व्यवसाय जरूर इस देश में चल पड़ा है, धंधा भी चल पड़ा है, मेरी ऐसी मान्यता है कि इस देश को रामकथा के व्यवसाय से निकाला जाए और इसको राम के राज्य की तरफ ले जाने वाला कोई प्रेरणा पुंज बनाया जाए। मेरा यह मानना है कि 60 साल से राम कथा सुनने के बाद राम जी का चरित्र प्रवेश नहीं करता है, तो इसको सुनने सुनाने से कोई फायदा नहीं है, और मेरा यह मानना है अगर राम कथा सुनाने से देश रामराज्य की ओर बढ़ने की ओर एक कदम उठता है, तो इसमें बहुत सार्थकता है तो मैं राम जी की कथा को इस दृष्टि से देखता हूँ, कि भारत की आज की सभी समस्याओं का समाधान यह करेगी और इस देश में राम राज्य की स्थापना करेगी, तब जाकर इसकी सार्थकता सिद्ध होगी और शायद राम भी यही चाहते थे। अगर वह व्यवसाय और व्यापार वाले व्यक्ति होते तो यह प्रश्न नहीं पूछते कि तुम ऐसे पुरोहितों को सम्मान नहीं करना, जब पैसे के लिए काम करें उनको बाहर करें, ऐसे ही पुरोहितों का सम्मान करना जो किसी के घर का पानी भी ना पिए निस्वार्थ भाव से काम करें, राम आदर्श बने हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम बने हैं, तब जब उन्होंने महल छोड़ा सुख छोड़े हैं और अपनी सुविधाएं छोड़ी, साधारण व्यक्ति के कष्टों को सहकर जीवन का अनुभव किया है, और उनके बीच में से ऐसे-ऐसे लोगों को तपस्वी बनाकर खड़ा किया है, जिन्होंने चक्रवर्ती का पद संभाला है, तब वह मर्यादा पुरुषोत्तम बने जब तक उनका महलों का जीवन है, कोई उनको मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं कहता, महल छोड़कर वन में चले गए हैं और आदर्श की स्थापना करने में लगे हुए हैं, तब वह मर्यादा पुरुषोत्तम बने हैं, तो हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम की बात करें, उनके रामराज्य की बात करें और कुछ कोशिश करें कि कम से कम कुछ सपना तो देखें इस देश में रामराज्य लाना है, जो हमारे शहीदों का अधूरा है, गांधी जी तो कहते थे कि आजादी के बाद कुछ करना है, तो राम राज्य ही लाएंगे तो मैं मानता हूँ कि यदि हम सब मिलकर इस रामराज्य को लाने में थोड़ा भी लग जाए तो कोई मुश्किल नहीं है कि अगले 3-5 वर्षों में राम राज्य नहीं आयेगा, और इस देश के हर नेता से, प्रधानमंत्री से, मुख्यमंत्री से, राज्यपाल से, एक ही प्रश्न पूछें, तुम राम राज्य के लिए कर क्या रहे हो? रामराज्य में 10% खर्चा फालतू, 90% खर्चा प्रजा के लिए होता है, क्या तुम कर रहे हो? नहीं कर रहे हो तो
छोड़ दो कुर्सी, हम किसी ऐसे को लायेगे, राम-राज्य स्थापित करने में मदद करे, तो मैं मानता हूँ इसको, अभियान के रूप में चलाना है, हम लोग कोशिश कर रहे हैं, स्वदेशी अभियान इस देश में चलाने की, लेकिन एक अभियान ऐसा भी चले, जो राम-राज्य की स्थापना इस देश में कराये, मैं राम जी की आखिरी बात आपसे कहता हूँ, जब विभीषण को राम जी राजा बना रहे हैं, सोने की लंका विभीषण को सौंप कर जा रहे हैं, तो विभीषण उनको कहते हैं, कि “आप यही रह सकते हैं, मैं आपके नीचे काम कर सकता हूँ, मुझे कोई तकलीफ नहीं है, आप सम्राट रहे, राजा रहे”।
श्री राम कहते हैं, मेरी जो मातृभूमि है, वह स्वर्ग से भी महान है, इसलिए मुझे लौटना तो मातृभूमि में है, तुम्हारी ये सोने की लंका तुम्हें मुबारक है, मेरे लिए तो ये मिट्टी के समान है, मेरी तो मातृभूमि स्वर्ग से भी महान है, ये बात हम कभी ना भूलें, श्री राम जी की ये बात हमारे हृदय में रहें, हमारी मातृभूमि स्वर्ग से भी महान है, अमेरिका, यूरोप चाहे सोने की लंका हो, वो हमारे लिए मिट्टी की धूल के बराबर हैं, यदि ये बात हमें समझ में आ जाये, श्री राम जी की, तो भारत से गये, 2 करोड़ NRI, एक क्षण में अमेरिका यूरोप छोड़ देगे, और उनकी बुद्धि और पैसे का सारा उपयोग, इस देश के विकास के लिए हो जायेगा, और ये देश सच में सोने की चिट्ठिया बन जायेगा, इसी के साथ मैं सबको प्रणाम करता हूँ, और श्री राम आप सभी को ऐसी प्रेरणा दे, हम सब मिलकर उनके राज्य की स्थापना करने में लग जाये।
धन्यवाद
- राजीव दीक्षित जी
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