श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
[८]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १११-भरतजीका अयोध्या लौटना, | |||
| भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, | |||
| नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके | |||
| चरित्र-श्रवणकी महिमा ..... | ६०९ | १२७-शबरीपर कृपा, नवधा भक्ति- | |
| उपदेश और पम्पासरकी ओर | |||
| प्रस्थान ..... | ६६६ | ||
| अरण्यकाण्ड | १२८-नारद-राम-संवाद ..... | ६७४ | |
| ११२-मंगलाचरण ..... | ६१९ | १२९-संतोंके लक्षण और सत्संग- | |
| भजनके लिये प्रेरणा ..... | ६७८ | ||
| ११३-जयन्तकी कुटिलता और फलप्राप्ति ..... | ६२० | किष्किन्धाकाण्ड | |
| ११४-अत्रि-मिलन एवं स्तुति ..... | ६२२ | १३०-मंगलाचरण ..... | ६८१ |
| ११५-श्रीसीता-अनसूया-मिलन और | |||
| श्रीसीताजीको अनसूयाजीका | |||
| पातिव्रतधर्म कहना ..... | ६२५ | १३१-श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना | |
| और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रता ..... | ६८२ | ||
| ११६-श्रीरामजीका आगे प्रस्थान, विराध- | |||
| वध और शरभङ्ग-प्रसङ्ग ..... | ६२८ | १३२-सुग्रीवका दुःख सुनाना, बालिवधकी | |
| प्रतिज्ञा, श्रीरामजीका मित्र- | |||
| लक्षण-वर्णन ..... | ६८६ | ||
| ११७-राक्षस-वधकी प्रतिज्ञा करना ..... | ६३० | १३३-सुग्रीवका वैराग्य ..... | ६८९ |
| ११८-सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, | |||
| अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक- | |||
| वन-प्रवेश और जटायु-मिलन ..... | ६३१ | १३४-बालि-सुग्रीव-युद्ध, बालि-उद्धार... | ६९० |
| ११९-पञ्चवटी-निवास और श्रीराम- | |||
| लक्ष्मण-संवाद ..... | ६३८ | १३५-ताराका विलाप, ताराको श्रीरामजी- | |
| द्वारा उपदेश और सुग्रीवका राज्याभिषेक | |||
| तथा अंगदको युवराजपद ..... | ६९३ | ||
| १२०-शूर्पणखाकी कथा, शूर्पणखाका | |||
| खर-दूषणके पास जाना और | |||
| खर-दूषणादिका वध ..... | ६४१ | १३६-वर्षा-ऋतु-वर्णन ..... | ६९५ |
| १२१-शूर्पणखाका रावणके निकट जाना, | |||
| श्रीसीताजीका अग्नि-प्रवेश और | |||
| माया-सीता ..... | ६४९ | १३७-शरद-ऋतु-वर्णन ..... | ६९७ |
| १२२-मारीचप्रसंग और स्वर्ण-मृगरूपमें | |||
| मारीचका मारा जाना ..... | ६५२ | १३८-श्रीरामकी सुग्रीवपर नाराजी, | |
| लक्ष्मणजीका कोप ..... | ६९९ | ||
| १२३-श्रीसीताहरण और श्रीसीता-विलाप ..... | ६५७ | १३९-सुग्रीव-राम-संवाद और | |
| सीताजीकी खोजके लिये बंदरोंका | |||
| प्रस्थान ..... | ७०१ | ||
| १२४-जटायु-रावण-युद्ध ..... | ६५८ | १४०-गुफामें तपस्विनीके दर्शन ..... | ७०५ |
| १२५-श्रीरामजीका विलाप, जटायुका | |||
| प्रसंग ..... | ६६० | १४१-वानरोंका समुद्रतटपर आना, सम्पातीसे | |
| भेंट और बातचीत ..... | ७०५ | ||
| १२६-कबन्ध-उद्धार ..... | ६६५ | १४२-समुद्र लॉघनेका परामर्श, जाम्बवन्तका | |
| हनुमान्जीको बल याद दिलाकर | |||
| उत्साहित करना ..... | ७०९ | ||
| १४३-श्रीरामगुणका माहात्म्य ..... | ७११ |
[९]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| सुन्दरकाण्ड | |||
| १४४-मंगलाचरण ..... | ७१३ | १५९-विभीषणका भगवान् श्रीरामजीकी शरणके लिये प्रस्थान और शरणप्राप्ति ..... | ७५२ |
| १४५-हनुमान्जीका लङ्काको प्रस्थान, सुरसासे भेंट, छाया पकड़नेवाली राक्षसीका वध ..... | ७१४ | १६०-समुद्र पार करनेके लिये विचार, रावणदूत शुक्का आना और लक्ष्मणजीके पत्रको लेकर लौटना ..... | ७५९ |
| १४६-लङ्कावर्णन, लङ्कानीपर प्रहार, लङ्कामें प्रवेश ..... | ७१६ | १६१-दूतका रावणको समझाना और लक्ष्मणजीका पत्र देना ..... | ७६२ |
| १४७-हनुमान्-विभीषण-संवाद ..... | ७२० | १६२-समुद्रपर श्रीरामजीका क्रोध और समुद्रकी विनती ..... | ७६६ |
| १४८-हनुमान्जीका अशोकवाटिकामें सीताको देखकर दुःखी होना और रावणका सीताजीको भय दिखलाना ..... | ७२२ | १६३-श्रीराम-गुणगानकी महिमा ..... | ७६९ |
| १४९-श्रीसीता-त्रिजटा-संवाद ..... | ७२४ | लङ्काकाण्ड | |
| १५०-श्रीसीता-हनुमान्-संवाद ..... | ७२६ | १६४-मंगलाचरण ..... | ७७१ |
| १५१-हनुमान्जीद्वारा अशोकवाटिका-विध्वंस, अक्षयकुमार-वध और मेघनादका हनुमान्जीको नागपाशमें बाँधकर सभामें ले जाना ..... | ७३० | १६५-नल-नीलद्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापना ..... | ७७३ |
| १५२-हनुमान्-रावण-संवाद ..... | ७३३ | १६६-श्रीरामजीका सेनासहित समुद्र पार उत्तरना, सुबेल पर्वतपर निवास, रावणकी व्याकुलता ..... | ७७६ |
| १५३-लङ्का-दहन ..... | ७३७ | १६७-रावणको मन्दोदरीका समझाना, रावण-प्रहस्त-संवाद ..... | ७७७ |
| १५४-लङ्का जलानेके बाद हनुमान्जीका सीताजीसे विदा माँगना और चूड़ामणि पाना ..... | ७३८ | १६८-सुबेलपर श्रीरामजीकी झाँकी और चन्द्रोदयवर्णन ..... | ७८२ |
| १५५-समुद्रके इस पार आना, सबका लौटना, मधुवन-प्रवेश, सुग्रीव-मिलन, श्रीराम-हनुमान्-संवाद ..... | ७३९ | १६९-श्रीरामजीके बाणसे रावणके मुकुट-छत्रादिका गिरना ..... | ७८४ |
| १५६-श्रीरामजीका वानरोँकी सेनाके साथ चलकर समुद्रतटपर पहुँचना ..... | ७४५ | १७०-मन्दोदरीका फिर रावणको समझाना और श्रीरामकी महिमा कहना .... | ७८५ |
| १५७-मन्दोदरी-रावण-संवाद ..... | ७४७ | १७१-अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाद ..... | ७८८ |
| १५८-रावणको विभीषणका समझाना और विभीषणका अपमान ..... | ७४९ | १७२-रावणको पुनः मन्दोदरीका समझाना ..... | ८०७ |
| १७३-अंगद-राम-संवाद ..... | ८०९ | ||
| १७४-युद्धारम्भ ..... | ८११ |
$$[१०]$$
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १७५-माल्यवान्का रावणको समझाना ... | ८१९ | १८९-रावण-हनुमान्-युद्ध, रावणका माया रचना, रामजीद्वारा माया-नाश ...... | ८६८ |
| १७६-लक्ष्मण-मेघनाद-युद्ध, लक्ष्मणजीको शक्ति लगना ........................ | ८२४ | १९०-घोर युद्ध, रावणकी मूर्च्छा .......... | ८७१ |
| १७७-हनुमान्जीका सुषेण वैद्यको लाना एवं संजीवनीके लिये जाना, कालनेमि-रावण-संवाद, मकरी-उद्धार, कालनेमि-उद्धार ............. | ८२५ | १९१-त्रिजटा-सीता-संवाद .................. | ८७३ |
| १७८-भरतजीके बाणसे हनुमान्का मूर्च्छित होना, भरत-हनुमान्-संवाद ........ | ८२८ | १९२-राम-रावण-युद्ध, रावण-वध, सर्वत्र जयध्वनि ............................. | ८७६ |
| १७९-श्रीरामजीकी प्रलापलीला, हनुमान्जीका लौटना, लक्ष्मणजीका उठ बैठना ............................ | ८२९ | १९३-मन्दोदरी-विलाप, रावणकी अन्त्येष्टि-क्रिया ......................... | ८८१ |
| १८०-रावणका कुम्भकर्णको जगाना, कुम्भकर्णका रावणको उपदेश और विभीषण-कुम्भकर्ण-संवाद ... | ८३२ | १९४-विभीषणका राज्याभिषेक ........... | ८८४ |
| १८१-कुम्भकर्ण-युद्ध और उसकी परमगति | ८३४ | १९५-हनुमान्जीका सीताजीको कुशल सुनाना, सीताजीका आगमन और अग्नि-परीक्षा ......................... | ८८५ |
| १८२-मेघनादका युद्ध, रामजीका लीलासे नागपाशमें बँधना .......... | ८४२ | १९६-देवताओंकी स्तुति, इन्द्रकी अमृत-वर्षा .............................. | ८८८ |
| १८३-मेघनाद-यज्ञ-विध्वंस, युद्ध और मेघनाद-उद्धार .................... | ८४५ | १९७-विभीषणकी प्रार्थना, श्रीरामजीके द्वारा भरतजीके प्रेमदशाका वर्णन, शीघ्र अयोध्या पहुँचनेका अनुरोध . | ८९६ |
| १८४-रावणका युद्धके लिये प्रस्थान और श्रीरामजीका विजय-रथ तथा वानर-राक्षसोंका युद्ध ................ | ८४९ | १९८-विभीषणका वस्त्राभूषण बरसाना और वानर-भालुओंका उन्हें पहनना | ८९७ |
| १८५-लक्ष्मण-रावण-युद्ध .................. | ८५४ | १९९-पुष्पकविमानपर चढ़कर श्रीसीता-रामजीका अवधके लिये प्रस्थान .. | ८९९ |
| १८६-रावण-मूर्च्छा, रावण-यज्ञ-विध्वंस, राम-रावण-युद्ध ....................... | ८५५ | २००-श्रीरामचरितकी महिमा ............... | ९०३ |
| १८७-इन्द्रका श्रीरामजीके लिये रथ भेजना, राम-रावण-युद्ध ....................... | ८६१ | उत्तरकाण्ड | |
| १८८-रावणका विभीषणपर शक्ति छोड़ना, रामजीका शक्तिको अपने ऊपर लेना, विभीषण-रावण-युद्ध ............................ | ८६७ | २०१-मंगलाचरण ............................ | ९०५ |
| २०२-भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्द ......... | ९०६ | ||
| २०३-श्रीरामजीका स्वागत, भरत-मिलाप, सबका मिलनानन्द .................... | ९१२ | ||
| २०४-राम-राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति ............................. | ९१९ | ||
| २०५-वानरोंकी और निषादकी विदाई .. | ९२६ | ||
| २०६-रामराज्यका वर्णन .................... | ९३० |
[११]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| २०७-पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता, | |||
| सनकादिका आगमन और | |||
| संवाद ..... | ९३४ | शापकी बात सुनना ..... | १००९ |
| २०८-हनुमान्जीके द्वारा भरतजीका | |||
| प्रश्न और श्रीरामजीका उपदेश..... | ९४४ | २१५-रुद्राष्टक ..... | १०११ |
| २०९-श्रीरामजीका प्रजाको उपदेश | |||
| (श्रीरामगीता), पुरवासियोंकी | |||
| कृतज्ञता ..... | ९५० | २१६-गुरुजीका शिवजीसे अपराध-क्षमापन, | |
| शापानुग्रह और काकभुशुण्डिकी | |||
| आगेकी कथा ..... | १०१२ | ||
| २१०-श्रीराम-वसिष्ठ-संवाद, श्रीरामजीका | |||
| भाइयोंसहित अमराईमें | |||
| जाना ..... | ९५४ | २१७-काकभुशुण्डिजीका लोमशजीके | |
| पास जाना और शाप तथा | |||
| अनुग्रह पाना ..... | १०१६ | ||
| २११-नारदजीका आना और स्तुति | |||
| करके ब्रह्मलोकको लौट जाना .... | ९५६ | २१८-ज्ञान-भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक | |
| और भक्तिकी महान् महिमा ..... | १०२४ | ||
| २१२-शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, | |||
| गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा | |||
| और राम-महिमा सुनना ..... | ९५८ | २१९-गरुड़जीके सात प्रश्न तथा | |
| काकभुशुण्डिके उत्तर ..... | १०३२ | ||
| २१३-काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा | |||
| और कलिमहिमा कहना..... | ९९८ | २२०-भजन-महिमा ..... | १०३६ |
| २१४-गुरुजीका अपमान एवं शिवजीके | २२१-रामायण-माहात्म्य, तुलसी-विनय | ||
| और फलस्तुति..... | १०३८ | ||
| २२२-रामायणजीकी आरती ..... | १०४८ | ||
| २२३-गोस्वामी तुलसीदासजीकी संक्षिप्त | |||
| जीवनी ..... | १०४९ | ||
| २२४-श्रीरामशलाका प्रश्नावली ..... | १०५३ |
नवाहपारायणके विश्राम-स्थान
पृष्ठ-संख्या
| पहला विश्राम ..... | १३२ |
|---|---|
| दूसरा ”..... | २३४ |
| तीसरा ”..... | ३३८ |
| चौथा ”..... | ४४० |
| पाँचवाँ ”..... | ५४० |
| छठा ”..... | ६६० |
| सातवाँ ”..... | ७८३ |
| आठवाँ ”..... | ९१८ |
| नवाँ ”..... | १०४७ |
मासपारायणके विश्राम-स्थान
पृष्ठ-संख्या
पृष्ठ-संख्या
| पहला विश्राम ..... | सोलहवाँ विश्राम ..... |
|---|---|
| दूसरा ”..... | सत्रहवाँ ”..... |
| तीसरा ”..... | अठारहवाँ ”..... |
| चौथा ”..... | उन्नीसवाँ ”..... |
| पाँचवाँ ”..... | बीसवाँ ”..... |
| छठा ”..... | इककीसवाँ ”..... |
| सातवाँ ”..... | बाईसवाँ ”..... |
| आठवाँ ”..... | तेईसवाँ ”..... |
| नवाँ ”..... | चौबीसवाँ ”..... |
| दसवाँ ”..... | पचीसवाँ ”..... |
| ग्यारहवाँ ”..... | छब्बीसवाँ ”..... |
| बारहवाँ ”..... | सत्ताईसवाँ ”..... |
| तेरहवाँ ”..... | अट्ठाईसवाँ ”..... |
| चौदहवाँ ”..... | उन्तीसवाँ ”..... |
| पंद्रहवाँ ”..... | तीसवाँ ”..... |
॥ श्रीहरिः ॥
पारायण-विधि
श्रीरामचरितमानसका विधिपूर्वक पाठ करनेवाले महानुभावोंको पाठारम्भके पूर्व श्रीतुलसीदासजी, श्रीवाल्मीकिजी, श्रीशिवजी तथा श्रीहनुमान्जीका आवाहन, पूजन करनेके पश्चात् तीनों भाइयोंसहित श्रीसीतारामजीका आवाहन, घोडशोपचार पूजन और ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर पाठका आरम्भ करना चाहिये। सबके आवाहन, पूजन और ध्यानके मन्त्र क्रमशः नीचे लिखे जाते हैं—
अथ आवाहनमन्त्रः
| तुलसीक | नमस्तुभ्यमिहागच्छ | शुचिब्रत। |
|---|---|---|
| नैरुह्य | उपविश्येदं | पूजनं प्रतिगृह्यताम् ॥ १ ॥ |
ॐ तुलसीदासाय नमः।
| श्रीवाल्मीक | नमस्तुभ्यमिहागच्छ | शुभप्रद। |
|---|---|---|
| उत्तरपूर्वयोर्यध्ये | तिष्ठ | गृहीष्व मेऽर्चनम् ॥ २ ॥ |
ॐ वाल्मीकाय नमः।
| गौरीपते | नमस्तुभ्यमिहागच्छ | महेश्वर। |
|---|---|---|
| पूर्वदक्षिणयोर्यध्ये | तिष्ठ | पूजां गृहाण मे ॥ ३ ॥ |
ॐ गौरीपतये नमः।
| श्रीलक्ष्मण | नमस्तुभ्यमिहागच्छ | सहप्रियः। |
|---|---|---|
| याम्यभागे | समातिष्ठ | पूजनं संगृहाण मे ॥ ४ ॥ |
ॐ श्रीसपत्नीकाय लक्ष्मणाय नमः।
| श्रीशत्रुघ्न | नमस्तुभ्यमिहागच्छ | सहप्रियः। |
|---|---|---|
| पीठस्य पश्चिमे | भागे | पूजनं स्वीकुरुष्व मे ॥ ५ ॥ |
ॐ श्रीसपत्नीकाय शत्रुघ्नाय नमः।
| श्रीभरत | नमस्तुभ्यमिहागच्छ | सहप्रियः। |
|---|---|---|
| पीठकस्योत्तरे | भागे | तिष्ठ पूजां गृहाण मे ॥ ६ ॥ |
ॐ श्रीसपत्नीकाय भरताय नमः।
| श्रीहनुमन्मस्तुभ्यमिहागच्छ | कृपानिधे। |
|---|---|
| पूर्वभागे | समातिष्ठ |
ॐ हनुमते नमः।
[१४]
अथ प्रधानपूजा च कर्तव्या विधिपूर्वकम्। पुष्पाञ्जलिं गृहीत्वा तु ध्यानं कुर्यात्परस्य च ॥ ८ ॥ रक्ताम्भोजदलाभिरामनयनं पीताम्बरालङ्कृतं श्यामाङ्गं द्विभुजं प्रसन्नवदनं श्रीसीतया शोभितम्। कारुण्यामृतसागरं प्रियगणैर्भ्रात्रादिभिर्भावं वन्दे विष्णुशिवादिसेव्यमनिशं भक्तेष्टसिद्धिप्रदम् ॥ ९ ॥ आगच्छ जानकीनाथ जानक्या सह राघव। गृहाण मम पूजां च वायुपुत्रादिभिर्युतः ॥ १० ॥
इत्यावाहनम्
सुवर्णरचितं राम दिव्यास्तरणशोभितम्। आसनं हि मया दत्तं गृहाण मणिचित्रितम् ॥ ११ ॥
इति षोडशोपचारैः पूजयेत्
ॐ अस्य श्रीमन्मानसरामायणश्रीरामचरितस्य श्रीशिवकाकभुशुण्डियाज्ञवल्क्यगोस्वामितुलसीदासा ऋषयः श्रीसीतारामो देवता श्रीरामनाम बीजं भवरोगहरी भक्तिः शक्तिः मम नियन्त्रिताशेषविघ्नतया श्रीसीतारामप्रीतिपूर्वकसकलमनोरथसिद्ध्यर्थं पाठे विनियोगः।
अथ आचमनम्
श्रीसीतारामाभ्यां नमः। श्रीरामचन्द्राय नमः। श्रीरामभद्राय नमः। इति मन्त्रत्रितयेन आचमनं कुर्यात्। श्रीयुगलबीजमन्त्रेण प्राणायामं कुर्यात्॥
अथ करन्यासः
जग मंगल गुनग्राम राम के। दानि मुक्ति धन धरम धाम के॥ अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥ तर्जनीभ्यां नमः।
राम सकल नामन्ह तें अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥ मध्यमाभ्यां नमः।
उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई॥ अनामिकाभ्यां नमः।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहि तबहीं॥ कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
[१५]
मामभिरक्षय रघुकुल नायक । धृतं बर चाप रुचिरं कर सायक ॥ करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
इति करन्यासः
अथ हृदयादिन्यासः
जग मंगल गुणग्राम राम के । दानि मुक्ति धन धरम धाम के ॥ हृदयाय नमः ।
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ॥ शिरसे स्वाहा।
राम सकल नामन्ह तें अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका ॥ शिखायै वषट्।
उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई ॥ कवचाय हुम्।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहि तबहीं ॥ नेत्राभ्यां वौषट्।
मामभिरक्षय रघुकुल नायक । धृतं बर चाप रुचिरं कर सायक ॥ अस्त्राय फट्।
इति हृदयादिन्यासः
अथ ध्यानम्
मामवलोकय पंकज लोचन । कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन ॥ नील तामरस स्याम काम अरि । हृदय कंज मकरंद मधुप हरि ॥ जातुधान बरुथ बल भंजन । मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन ॥ भूसुर ससि नव बृंद बलाहक । असरन सरन दीन जन गाहक ॥ भुज बल बिपुल भार महि खंडित । खर दूषन बिराध बध पंडित ॥ रावनारि सुखरूप भूपबर । जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर ॥ सुजस पुरान बिदित निगमागम । गावत सुर मुनि संत समागम ॥ कारुनीक व्यलीक मद खंडन । सब बिधि कुसल कोसला मंडन ॥ कलि मल मथन नाम ममताहन । तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन ॥
इति ध्यानम्
— ✎ — ✎ — ✎ —
मायामुक्त नारदजी
A black and white line drawing of Lord Vishnu standing on clouds. He has four arms, wearing a crown and jewelry. He holds a conch shell in his upper right hand, a lotus in his lower right hand, and a mace in his left hand. His right hand is raised in a blessing gesture. A devotee is prostrate on the ground before him, with their head resting on his feet. The background consists of stylized clouds.
तब मुनि अति सभीत हरि चरना । गहे पाहि प्रनतारति हरना ॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीरामचरितमानस
प्रथम सोपान
बालकाण्ड
श्लोक
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि । मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ॥ १ ॥
अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १ ॥
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ । याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम् ॥ २ ॥
श्रद्धा और विश्वासके स्वरूप श्रीपार्वतीजी और श्रीशङ्करजीकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्तःकरणमें स्थित ईश्वरको नहीं देख सकते ॥ २ ॥
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम् । यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ॥ ३ ॥
ज्ञानमय, नित्य, शङ्कररूपी गुरुकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होनेसे ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है ॥ ३ ॥
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ । वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ॥ ४ ॥
श्रीसीतारामजीके गुणसमूहरूपी पवित्र वनमें विहार करनेवाले, विशुद्ध विज्ञानसम्पन्न कवीश्वर श्रीवाल्मीकिजी और कपीश्वर श्रीहनुमानजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ४ ॥
१८
- रामचरितमानस *
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम् । सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम् ॥ ५ ॥
उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करनेवाली, क्लेशोंकी हरनेवाली तथा सम्पूर्ण कल्याणोंकी करनेवाली श्रीरामचन्द्रजीकी प्रियतमा श्रीसीताजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ५ ॥
यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रजौ यथाहेर्भ्रमः । यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम् ॥ ६ ॥
जिनकी मायाके वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर हैं, जिनकी सत्तासे रस्सीमें सपंके भ्रमकी भाँति यह सारा दृश्य-जगत् सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण ही भवसागरसे तरनेकी इच्छावालोंके लिये एकमात्र नौका हैं, उन समस्त कारणोंसे पर (सब कारणोंके कारण और सबसे श्रेष्ठ) राम कहानेवाले भगवान् हरिकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ६ ॥
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्रचिदन्यतोऽपि । स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा- भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति ॥ ७ ॥
अनेक पुराण, वेद और [तन्त्र] शास्त्रसे सम्मत तथा जो रामायणमें वर्णित है और कुछ अन्यत्रसे भी उपलब्ध श्रीरघुनाथजीकी कथाको तुलसीदास अपने अन्तःकरणके सुखके लिये अत्यन्त मनोहर भाषारचनामें विस्तृत करता है ॥ ७ ॥
सो०—जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन । करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन ॥ १ ॥
जिन्हें स्मरण करनेसे सब कार्य सिद्ध होते हैं, जो गणोंके स्वामी और सुन्दर हाथीके मुखवाले हैं, वे ही बुद्धिके राशि और शुभ गुणोंके धाम (श्रीगणेशजी) मुझपर कृपा करें ॥ १ ॥
मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन । जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन ॥ २ ॥
जिनकी कृपासे गूँगा बहुत सुन्दर बोलनेवाला हो जाता है और लँगड़ा-लूला दुर्गम पहाड़पर चढ़ जाता है, वे कलियुगके सब पापोंको जला डालनेवाले दयालु (भगवान्) मुझपर द्रवित हों (दया करें), ॥ २ ॥
- बालकाण्ड * १९
नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन। करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन॥ ३॥
जो नील कमलके समान श्यामवर्ण हैं, पूर्ण खिले हुए लाल कमलके समान जिनके नेत्र हैं और जो सदा क्षीरसागरमें शयन करते हैं, वे भगवान् (नारायण) मेरे हृदयमें निवास करें॥ ३॥
कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन। जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन॥ ४॥
जिनका कुन्दके पुष्प और चन्द्रमाके समान (गौर) शरीर है, जो पार्वतीजीके प्रियतम और दयाके धाम हैं और जिनका दीनोंपर स्नेह है, वे कामदेवका मर्दन करनेवाले (शङ्करजी) मुझपर कृपा करें॥ ४॥
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ ५॥
मैं उन गुरु महाराजके चरणकमलकी वन्दना करता हूँ, जो कृपाके समुद्र और नररूपमें श्रीहरि ही हैं और जिनके वचन महामोहरूपी घने अन्धकारके नाश करनेके लिये सूर्य-किरणोंके समूह हैं॥ ५॥
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥
मैं गुरु महाराजके चरणकमलोंकी रजकी वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि(सुन्दर स्वाद), सुगन्ध तथा अनुरागरूपी रससे पूर्ण है। वह अमर मूल (सञ्जीवनी जड़ी)का सुन्दर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भवरोगोंके परिवारको नाश करनेवाला है॥ १॥
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥ जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥
वह रज सुकृती (पुण्यवान् पुरुष) रूपी शिवजीके शरीरपर सुशोभित निर्मल विभूति है और सुन्दर कल्याण और आनन्दकी जननी है, भक्तके मनरूपी सुन्दर दर्पणके मैलको दूर करनेवाली और तिलक करनेसे गुणोंके समूहको वशमें करनेवाली है॥ २॥
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥ दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
श्रीगुरु महाराजके चरण-नखोंकी ज्योति मणियोंके प्रकाशके समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदयमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है; वह जिसके हृदयमें आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं॥ ३॥
२० * रामचरितमानस *
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥ सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥ उसके हृदयमें आते ही हृदयके निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसाररूपी रात्रिके दोष-दुःख मिट जाते हैं एवं श्रीरामचरित्ररूपी मणि और माणिक्य, गुप्त और प्रकट जहाँ जो जिस खानमें है, सब दिखायी पड़ने लगते हैं— ॥४॥
दो०— जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान। कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥ १॥ जैसे सिद्धाञ्जनको नेत्रोंमें लगाकर साधक, सिद्ध और सुजान पर्वतों, वनों और पृथ्वीके अंदर कौतुकसे ही बहुत-सी खानें देखते हैं॥१॥
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥ तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥ श्रीगुरु महाराजके चरणोंकी रज कोमल और सुन्दर नयनामृत-अञ्जन है, जो नेत्रोंके दोषोंका नाश करनेवाला है। उस अञ्जनसे विवेकरूपी नेत्रोंको निर्मल करके मैं संसाररूपी बन्धनसे छुड़ानेवाले श्रीरामचरित्रका वर्णन करता हूँ॥१॥
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥ सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥ पहले पृथ्वीके देवता ब्राह्मणोंके चरणोंकी वन्दना करता हूँ, जो अज्ञानसे उत्पन्न सब संदेहोंको हरनेवाले हैं। फिर सब गुणोंकी खान संत-समाजको प्रेमसहित सुन्दर वाणीसे प्रणाम करता हूँ॥२॥
साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥ जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥ संतोंका चरित्र कपासके चरित्र (जीवन)-के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। (कपासकी डोडी नीरस होती है, संत-चरित्रमें भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है; कपास उज्ज्वल होता है, संतका हृदय भी अज्ञान और पापरूपी अन्धकारसे रहित होता है, इसलिये वह विशद है, और कपासमें गुण (तन्तु) होते हैं, इसी प्रकार संतका चरित्र भी सद्गुणोंका भण्डार होता है, इसलिये वह गुणमय है।) [जैसे कपासका धागा सूईके किये हुए छेदको अपना तन देकर ढक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जानेका कष्ट सहकर भी वस्त्रके रूपमें परिणत होकर दूसरोंके गोपनीय स्थानोंको ढकता है उसी प्रकार] संत स्वयं दुःख सहकर दूसरोंके छिद्रों (दोषों)-को ढकता है, जिसके कारण उसने जगत्में वन्दनीय यश प्राप्त किया है॥३॥
- बालकाण्ड * २१
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥ राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥ संतोंका समाज आनन्द और कल्याणमय है, जो जगत्में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। जहाँ (उस संतसमाजरूपी प्रयागराजमें) रामभक्तिरूपी गङ्गाजीकी धारा है और ब्रह्मविचारका प्रचार सरस्वतीजी हैं॥ ४॥
बिधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी॥ हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी॥ विधि और निषेध (यह करो और यह न करो) रूपी कर्मोंकी कथा कलियुगके पापोंको हरनेवाली सूर्यतनया यमुनाजी हैं और भगवान् विष्णु और शङ्करजीकी कथाएँ त्रिवेणीरूपसे सुशोभित हैं, जो सुनते ही सब आनन्द और कल्याणोंकी देनेवाली हैं॥ ५॥
बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा॥ सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा॥ [उस संतसमाजरूपी प्रयागमें] अपने धर्ममें जो अटल विश्वास है वह अक्षयवट है, और शुभकर्म ही उस तीर्थराजका समाज (परिकर) है। वह (संतसमाजरूपी प्रयागराज) सब देशोंमें, सब समय सभीको सहजहीमें प्राप्त हो सकता है और आदरपूर्वक सेवन करनेसे क्लेशोंको नष्ट करनेवाला है॥ ६॥
अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ॥ वह तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है, एवं तत्काल फल देनेवाला है; उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है॥ ७॥
दो०—सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग। लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग॥ २॥ जो मनुष्य इस संत-समाजरूपी तीर्थराजका प्रभाव प्रसन्न मनसे सुनते और समझते हैं और फिर अत्यन्त प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीरके रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों फल पा जाते हैं॥ २॥
मजन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला॥ सुनि आचरज करै जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई॥ इस तीर्थराजमें स्नानका फल तत्काल ऐसा देखनेमें आता है कि कौए कोयल बन जाते हैं और बगुले हंस। यह सुनकर कोई आश्चर्य न करे, क्योंकि सत्संगकी महिमा छिपी नहीं है॥ १॥
२२ * रामचरितमानस *
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥
जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना॥
वाल्मीकिजी, नारदजी और अगस्त्यजीने अपने-अपने मुखोंसे अपनी होनी (जीवनका वृत्तान्त) कही है। जलमें रहनेवाले, जमीनपर चलनेवाले और आकाशमें विचरनेवाले नाना प्रकारके जड़-चेतन जितने जीव इस जगत्में हैं, ॥ २ ॥
मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥
सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥
उनमेंसे जिसने जिस समय जहाँ कहीं भी जिस किसी यत्नसे बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति (ऐश्वर्य) और भलाई पायी है, सो सब सत्संगका ही प्रभाव समझना चाहिये। वेदोंमें और लोकमें इनकी प्राप्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है ॥ ३ ॥
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
सतसंगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला॥
सत्संगके बिना विवेक नहीं होता और श्रीरामजीकी कृपाके बिना वह सत्संग सहजमें मिलता नहीं। सत्संगति आनन्द और कल्याणकी जड़ है। सत्संगकी सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल हैं ॥ ४ ॥
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥
दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारसके स्पर्शसे लोहा सुहावना हो जाता है (सुन्दर सोना बन जाता है)। किन्तु दैवयोगसे यदि कभी सज्जन कुसंगतिमें पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँपकी मणिके समान अपने गुणोंका ही अनुसरण करते हैं (अर्थात् जिस प्रकार साँपका संसर्ग पाकर भी मणि उसके विषको ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाशको नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टोंके संगमें रहकर भी दूसरोंको प्रकाश ही देते हैं, दुष्टोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता) ॥ ५ ॥
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी॥
सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितोंकी वाणी भी संत-महिमाका वर्णन करनेमें सकुचाती है; वह मुझसे किस प्रकार नहीं कही जाती, जैसे साग-तरकारी बेचनेवालेसे मणियोंके गुणसमूह नहीं कहे जा सकते ॥ ६ ॥
दो०— बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥ ३ (क)॥
* बालकाण्ड * २३
मैं संतोंको प्रणाम करता हूँ, जिनके चित्तमें समता है, जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु! जैसे अञ्जलिमें रखे हुए सुन्दर फूल [जिस हाथने फूलोंको तोड़ा और जिसने उनको रखा उन] दोनों ही हाथोंको समानरूपसे सुगन्धित करते हैं [वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनोंका ही समानरूपसे कल्याण करते हैं] ॥ ३ (क) ॥
संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।
बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु॥ ३ (ख)॥
संत सरलहृदय और जगत्के हितकारी होते हैं, उनके ऐसे स्वभाव और स्नेहको जानकर मैं विनय करता हूँ, मेरी इस बाल-विनयको सुनकर कृपा करके श्रीरामजीके चरणोंमें मुझे प्रीति दें॥ ३ (ख)॥
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥
अब मैं सच्चे भावसे दुष्टोंको प्रणाम करता हूँ, जो बिना ही प्रयोजन, अपना हित करनेवालेके भी प्रतिकूल आचरण करते हैं। दूसरोंके हितकी हानि ही जिनकी दृष्टिमें लाभ है, जिनको दूसरोंके उजड़नेमें हर्ष और बसनेमें विषाद होता है॥ १॥
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥
जो हरि और हरके यशरूपी पूर्णिमाके चन्द्रमाके लिये राहुके समान हैं (अर्थात् जहाँ कहीं भगवान् विष्णु या शङ्करके यशका वर्णन होता है, उसीमें वे बाधा देते हैं) और दूसरोंकी बुराई करनेमें सहस्रबाहुके समान वीर हैं। जो दूसरोंके दोषोंको हजार आँखोंसे देखते हैं और दूसरोंके हितरूपी घीके लिये जिनका मन मक्खीके समान है (अर्थात् जिस प्रकार मक्खी घीमें गिरकर उसे खराब कर देती है और स्वयं भी मर जाती है, उसी प्रकार दुष्ट लोग दूसरोंके बने-बनाये कामको अपनी हानि करके भी बिगाड़ देते हैं)॥ २॥
तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥
उदय केत सम हित सब ही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥
जो तेज (दूसरोंको जलानेवाले ताप) में अग्नि और क्रोधमें यमराजके समान हैं, पाप और अवगुणरूपी धनमें कुबेरके समान धनी हैं, जिनकी बढ़ती सभीके हितका नाश करनेके लिये केतु (पुच्छल तारे) के समान है, और जिनके कुम्भकर्णकी तरह सोते रहनेमें ही भलाई है॥ ३॥
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥
२४ * रामचरितमानस *
जैसे ओले खेतीका नाश करके आप भी गल जाते हैं, वैसे ही वे दूसरोंका काम बिगाड़नेके लिये अपना शरीरतक छोड़ देते हैं। मैं दुष्टोंको [हजार मुखवाले] शेषजीके समान समझकर प्रणाम करता हूँ, जो पराये दोषोंका हजार मुखोंसे बड़े रोषके साथ वर्णन करते हैं॥ ४॥
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥
पुनः उनको राजा पृथु (जिन्होंने भगवान्का यश सुननेके लिये दस हजार कान माँगे थे) के समान जानकर प्रणाम करता हूँ, जो दस हजार कानोंसे दूसरोंके पापोंको सुनते हैं। फिर इन्द्रके समान मानकर उनकी विनय करता हूँ, जिनको सुरा (मदिरा) नीकी और हितकारी मालूम देती है [इन्द्रके लिये भी सुरानीक अर्थात् देवताओंकी सेना हितकारी है] ॥ ५॥
बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा॥
जिनको कठोर वचनरूपी वज्र सदा प्यारा लगता है और जो हजार आँखोंसे दूसरोंके दोषोंको देखते हैं॥ ६॥
दो०—उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति॥ ४॥
दुष्टोंकी यह रीति है कि वे उदासीन, शत्रु अथवा मित्र, किसीका भी हित सुनकर जलते हैं। यह जानकर दोनों हाथ जोड़कर यह जन प्रेमपूर्वक उनसे विनय करता है॥ ४॥
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥
मैंने अपनी ओरसे विनती की है, परन्तु वे अपनी ओरसे कभी नहीं चूकेंगे। कौओंको बड़े प्रेमसे पालिये; परन्तु वे क्या कभी मांसके त्यागी हो सकते हैं?॥ १॥
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥
अब मैं संत और असंत दोनोंके चरणोंकी वन्दना करता हूँ; दोनों ही दुःख देनेवाले हैं, परन्तु उनमें कुछ अन्तर कहा गया है। वह अन्तर यह है कि एक (संत) तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरे (असंत) मिलते हैं तब दारुण दुःख देते हैं। (अर्थात् संतोंका बिछुड़ना मरनेके समान दुःखदायी होता है और असंतोंका मिलना)॥ २॥
उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥
सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥
* बालकाण्ड * २५
दोनों (संत और असंत) जगत्में एक साथ पैदा होते हैं; पर [एक साथ पैदा होनेवाले] कमल और जोंककी तरह उनके गुण अलग-अलग होते हैं। (कमल दर्शन और स्पर्शसे सुख देता है, किन्तु जोंक शरीरका स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगती है।) साधु अमृतके समान (मृत्यूरूपी संसारसे उबारनेवाला) और असाधु मदिराके समान (मोह,प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करनेवाला) है, दोनोंको उत्पन्न करनेवाला जगद्रूपी अगाध समुद्र एक ही है। [शास्त्रोंमें समुद्रमन्थनसे ही अमृत और मदिरा दोनोंकी उत्पत्ति बतायी गयी है] ॥ ३ ॥
भल अनभल निज निज करतूती । लहत सुजस अपलोक बिभूती ॥
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू । गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू ॥
गुन अवगुन जानत सब कोई । जो जेहि भाव नीक तेहि सोई ॥
भले और बुरे अपनी-अपनी करनीके अनुसार सुन्दर यश और अपयशकी सम्पत्ति पाते हैं। अमृत, चन्द्रमा, गङ्गाजी और साधु एवं विष, अग्नि, कलियुगके पापोंकी नदी अर्थात् कर्मनाशा और हिंसा करनेवाला व्याध, इनके गुण-अवगुण सब कोई जानते हैं; किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है ॥ ४-५ ॥
दो०— भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु ॥ ५ ॥
भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचताको ही ग्रहण किये रहता है। अमृतकी सराहना अमर करनेमें होती है और विषकी मारनेमें ॥ ५ ॥
खल अघ अगुन साधु गुन गाहा । उभय अपार उदधि अवगाहा ॥
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने । संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने ॥
दुष्टोंके पापों और अवगुणोंकी और साधुओंके गुणोंकी कथाएँ—दोनों ही अपार और अथाह समुद्र हैं। इसीसे कुछ गुण और दोषोंका वर्णन किया गया है, क्योंकि बिना पहचाने उनका ग्रहण या त्याग नहीं हो सकता ॥ १ ॥
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए । गनि गुन दोष बेद बिलगाए ॥
कहहिं बेद इतिहास पुराना । बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना ॥
भले, बुरे सभी ब्रह्माके पैदा किये हुए हैं, पर गुण और दोषोंको विचारकर वेदोंने उनको अलग-अलग कर दिया है। वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि ब्रह्माकी यह सृष्टि गुण-अवगुणोंसे सनी हुई है ॥ २ ॥
दुख सुख पाप पुन्य दिन राती । साधु असाधु सुजाति कुजाती ॥
दानव देव ऊँच अरु नीचू । अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू ॥
२६ * रामचरितमानस *
माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा॥ कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा॥ सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा॥ दुःख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाति, दानव-देवता, ऊँच-नीच, अमृत-विष, सुजीवन (सुन्दर जीवन)-मृत्यु, माया-ब्रह्म, जीव-ईश्वर, सम्पत्ति-दरिद्रता, रंक-राजा, काशी-मगध, गङ्गा-कर्मनाशा, मारवाड़-मालवा, ब्राह्मण-कसाई, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य, [ये सभी पदार्थ ब्रह्माकी सृष्टिमें हैं।] वेद-शास्त्रोंने उनके गुण-दोषोंका विभाग कर दिया है॥ ३-५॥
दो०—जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥ ६॥ विधाताने इस जड़-चेतन विश्वको गुण-दोषमय रचा है; किन्तु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको छोड़कर गुणरूपी दूधको ही ग्रहण करते हैं॥ ६॥
अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥ काल सुभाउ करम बरिआईं। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं॥ विधाता जब इस प्रकारका (हंसका-सा) विवेक देते हैं, तब दोषोंको छोड़कर मन गुणोंमें अनुरक्त होता है। काल-स्वभाव और कर्मकी प्रबलतासे भले लोग (साधु) भी मायाके वशमें होकर कभी-कभी भलाईसे चूक जाते हैं॥ १॥
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥ खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥ भगवान्के भक्त जैसे उस चूकको सुधार लेते हैं और दुःख-दोषोंको मिटाकर निर्मल यश देते हैं, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम सङ्ग पाकर भलाई करते हैं; परन्तु उनका कभी भंग न होनेवाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता॥ २॥
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥ उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥ जो [वेषधारी] ठग हैं, उन्हें भी अच्छा (साधुका-सा) वेष बनाये देखकर वेषके प्रतापसे जगत् पूजता है; परन्तु एक-न-एक दिन वे चौड़े आ ही जाते हैं, अन्ततक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहुका हाल हुआ॥ ३॥
किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥ हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥
* बालकाण्ड * २७
बुरा वेष बना लेनेपर भी साधुका सम्मान ही होता है, जैसे जगत्में जाम्बवान् और हनुमान्जीका हुआ। बुरे संगसे हानि और अच्छे संगसे लाभ होता है, यह बात लोक और वेदमें है और सभी लोग इसको जानते हैं॥४॥
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥ साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं॥
पवनके संगसे धूल आकाशपर चढ़ जाती है और वही नीच (नीचेकी ओर बहनेवाले) जलके संगसे कीचड़में मिल जाती है। साधुके घरके तोता-मैना राम-राम सुमिरते हैं और असाधुके घरके तोता-मैना गिन-गिनकर गालियाँ देते हैं॥५॥
धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई॥ सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता॥
कुसंगके कारण धुआँ कालिख कहलाता है, वही धुआँ [सुसंगसे] सुन्दर स्याही होकर पुराण लिखनेके काममें आता है और वही धुआँ जल, अग्नि और पवनके संगसे बादल होकर जगत्को जीवन देनेवाला बन जाता है॥६॥
दो०—ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग। होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग॥७ (क)॥
ग्रह, ओषधि, जल, वायु और वस्त्र—ये सब भी कुसंग और सुसंग पाकर संसारमें बुरे और भले पदार्थ हो जाते हैं। चतुर एवं विचारशील पुरुष ही इस बातको जान पाते हैं॥७ (क)॥
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह। ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह॥७ (ख)॥
महीनेके दोनों पखवाड़ोंमें उजियाला और अँधेरा समान ही रहता है, परन्तु विधाताने इनके नाममें भेद कर दिया है (एकका नाम शुक्ल और दूसरेका नाम कृष्ण रख दिया)। एकको चन्द्रमाका बढ़ानेवाला और दूसरेको उसका घटानेवाला समझकर जगत्ने एकको सुयश और दूसरेको अपयश दे दिया॥७ (ख)॥
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि। बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥७ (ग)॥
जगत्में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलोंकी सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ॥७ (ग)॥
देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब। बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब॥७ (घ)॥