श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- बालकाण्ड *
२५१
अपनी बड़ी हुई व्याकुलता जानकर सीताजी सकुचा गयीं और धीरज धरकर हृदयमें विश्वास ले आयीं कि यदि तन, मन और वचनसे मेरा प्रण सच्चा है और श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंमें मेरा चित्त वास्तवमें अनुरक्त है, ॥ २ ॥
तौ भगवानु सकल उर बासी । करिहि मोहि रघुबर कै दासी ॥ जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू । सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ॥
तो सबके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान् मुझे रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीकी दासी अवश्य बनायेंगे। जिसका जिसपर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना । कृपानिधान राम सबु जाना ॥ सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसें । चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसें ॥
प्रभुकी ओर देखकर सीताजीने शरीरके द्वारा प्रेम ठान लिया (अर्थात् यह निश्चय कर लिया कि यह शरीर इन्हींका होकर रहेगा या रहेगा ही नहीं)। कृपानिधान श्रीरामजी सब जान गये। उन्होंने सीताजीको देखकर धनुषकी ओर कैसे ताका, जैसे गरुड़जी छोटे-से साँपकी ओर देखते हैं ॥ ४ ॥
दो०—लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंदु।
पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु ॥ २५१ ॥
इधर जब लक्ष्मणजीने देखा कि रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजीने शिवजीके धनुषकी ओर ताका है, तो वे शरीरसे पुलकित हो ब्रह्माण्डको चरणोंसे दबाकर निम्नलिखित वचन बोले— ॥ २५१ ॥
दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला । धरहु धरनि धरि धीर न डोला ॥ रामु चहहि संकर धनु तोरा । होहु सजग सुनि आयसु मोरा ॥
हे दिग्गजो! हे कच्छप! हे शेष! हे वाराह! धीरज धरकर पृथ्वीको थामे रहो, जिसमें यह हिलने न पावे। श्रीरामचन्द्रजी शिवजीके धनुषको तोड़ना चाहते हैं। मेरी आज्ञा सुनकर सब सावधान हो जाओ ॥ १ ॥
चाप समीप रामु जब आए । नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए ॥ सब कर संसउ अरु अग्यानू । मंद महीपन्ह कर अभिमानू ॥
श्रीरामचन्द्रजी जब धनुषके समीप आये, तब सब स्त्री-पुरुषोंने देवताओं और पुण्योंको मनाया। सबका सन्देह और अज्ञान, नीच राजाओंका अभिमान, ॥ २ ॥
भृगुपति केरि गरब गरुआई । सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई ॥ सिय कर सोचु जनक पछितावा । रानिन्ह कर दारुन दुख दावा ॥
परशुरामजीके गर्वकी गुरुता, देवता और श्रेष्ठ मुनियोंकी कातरता (भय), सीताजीका सोच, जनकका पश्चाताप और रानियोंके दारुण दुःखका दावानल, ॥ ३ ॥
२५२
- रामचरितमानस *
संभुचाप बड़ बोहितु पाईं । चढ़े जाइ सब संगु बनाईं ॥ राम बाहुबल सिंधु अपारु । चहत पारु नहीं कोउ कड़हारु ॥
ये सब शिवजीके धनुषरूपी बड़े जहाजको पाकर, समाज बनाकर उसपर जा चढ़े। ये श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंके बलरूपी अपार समुद्रके पार जाना चाहते हैं, परन्तु कोई केवट नहीं है ॥ ४ ॥
दो०— राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।
चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि ॥ २६० ॥
श्रीरामजीने सब लोगोंकी ओर देखा और उन्हें चित्रमें लिखे हुए—से देखकर फिर कृपाधाम श्रीरामजीने सीताजीकी ओर देखा और उन्हें विशेष व्याकुल जाना ॥ २६० ॥
देखी बिपुल बिकल बैदेही । निमिष बिहात कलप सम तेही ॥ तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा । मुएँ करइ का सुधा तड़ागा ॥
उन्होंने जानकीजीको बहुत ही विकल देखा। उनका एक-एक क्षण कल्पके समान बीत रहा था। यदि प्यासा आदमी पानीके बिना शरीर छोड़ दे, तो उसके मर जानेपर अमृतका तालाब भी क्या करेगा ? ॥ १ ॥
का बरषा सब कृषी सुखानें । समय चुकें पुनि का पछितानें ॥ अस जियँ जानि जानकी देखी । प्रभु पुलके लिखि प्रीति बिसेषी ॥
सारी खेतीके सूख जानेपर वर्षा किस कामकी ? समय बीत जानेपर फिर पछतानेसे क्या लाभ ? जीमें ऐसा समझकर श्रीरामजीने जानकीजीकी ओर देखा और उनका विशेष प्रेम लखकर वे पुलकित हो गये ॥ २ ॥
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा । अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा ॥ दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ । पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ ॥
मन-ही-मन उन्होंने गुरुको प्रणाम किया और बड़ी फुर्तीसे धनुषको उठा लिया। जब उसे [हाथमें] लिया, तब वह धनुष बिजलीकी तरह चमका और फिर आकाशमें मण्डल-जैसा (मण्डलाकार) हो गया ॥ ३ ॥
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें । काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें ॥ तेहि छन राम मध्य धनु तोरा । भरे भुवन धुनि घोर कठोरा ॥
लेते, चढ़ाते और जोरसे खींचते हुए किसीने नहीं लखा (अर्थात् ये तीनों काम इतनी फुर्तीसे हुए कि धनुषको कब उठाया, कब चढ़ाया और कब खींचा, इसका किसीको पता नहीं लगा); सबने श्रीरामजीको [धनुष खींचे] खड़े देखा। उसी क्षण श्रीरामजीने धनुषको बीचसे तोड़ डाला। भयङ्कर कठोर ध्वनिसे [सब] लोक भर गये ॥ ४ ॥
- बालकाण्ड *
२५३
छं०— भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले । चिवकरहिं दिगज डोल महिअहि कोल कूरुम कलमले ॥ सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं । कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं ॥
घोर, कठोर शब्दसे [सब] लोक भर गये, सूर्यके घोड़े मार्ग छोड़कर चलने लगे। दिगज चिग्घाड़ने लगे, धरती डोलने लगी, शेष, वाराह और कच्छप कलमला उठे। देवता, राक्षस और मुनि कानोंपर हाथ रखकर सब व्याकुल होकर विचारने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं, जब [सबको निश्चय हो गया कि] श्रीरामजीने धनुषको तोड़ डाला, तब सब 'श्रीरामचन्द्रजीकी जय' बोलने लगे।
सो०— संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु । बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस ॥ २६१ ॥
शिवजीका धनुष जहाज है और श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंका बल समुद्र है। [धनुष टूटनेसे] वह सारा समाज डूब गया, जो मोहवश पहले इस जहाजपर चढ़ा था [जिसका वर्णन ऊपर आया है] ॥ २६१ ॥
प्रभु दोउ चापखंड महि डारे । देखि लोग सब भए सुखारे ॥ कौसिकरूप पयोनिधि पावन । प्रेम बारि अवगाहु सुहावन ॥
प्रभुने धनुषके दोनों टुकड़े पृथ्वीपर डाल दिये। यह देखकर सब लोग सुखी हुए। विश्वामित्ररूपी पवित्र समुद्रमें, जिसमें प्रेमरूपी सुन्दर अथाह जल भरा है, ॥ १ ॥
रामरूप राकेसु निहारी । बद्धत बीचि पुलकावलि भारी ॥ बाजे नभ गहगहे निसाना । देवबधू नाचहिं करि गाना ॥
रामरूपी पूर्णचन्द्रको देखकर पुलकावलीरूपी भारी लहरें बढ़ने लगीं। आकाशमें बड़े जोरसे नगाड़े बजने लगे और देवाङ्गनाएँ गान करके नाचने लगीं ॥ २ ॥
ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा । प्रभुहि प्रसंसहिं देहिं असीसा ॥ बरिसहिं सुमन रंग बहु माला । गावहिं किंनर गीत रसाला ॥
ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध और मुनीश्वरलोग प्रभुकी प्रशंसा कर रहे हैं और आशीर्वाद दे रहे हैं। वे रंग-बिरंगे फूल और मालाएँ बरसा रहे हैं। किन्नरलोग रसीले गीत गा रहे हैं ॥ ३ ॥
२५४
- रामचरितमानस *
रही भुवन भरि जय जय बानी । धनुषभंग धुनि जात न जानी ॥ मुदित कहहिं जहैं तहैं नर नारी । भंजेउ राम संभुधनु भारी ॥
सारे ब्रह्माण्डमें जय-जयकारकी ध्वनि छा गयी, जिसमें धनुष टूटनेकी ध्वनि जान ही नहीं पड़ती। जहाँ-तहाँ स्त्री-पुरुष प्रसन्न होकर कह रहे हैं कि श्रीरामचन्द्रजीने शिवजीके भारी धनुषको तोड़ डाला ॥ ४ ॥
दो०— बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर ।
करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चौर ॥ २६२ ॥
धीर बुद्धिवाले, भाट, मागध और सूतलोग विरुदावली (कीर्ति) का बखान कर रहे हैं। सब लोग छोड़े, हाथी, धन, मणि और वस्त्र निछावर कर रहे हैं ॥ २६२ ॥
झाँझि मृदंग संख सहनाई । भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई ॥ बाजहिं बहु बाजने सुहाए । जहैं तहैं जुबतिन्ह मंगल गाए ॥
झाँझ, मृदंग, शङ्ख, शहनाई, भेरी, ढोल और सुहावने नगाड़े आदि बहुत प्रकारके सुन्दर बाजे बज रहे हैं। जहाँ-तहाँ युवतियाँ मङ्गलगीत गा रही हैं ॥ १ ॥
सखिन्ह सहित हरषी अति रानी । सूखत धान परा जनु पानी ॥ जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई । पैरत थकें थाह जनु पाई ॥
सखियोंसहित रानी अत्यन्त हर्षित हुई। मानो सूखते हुए धानपर पानी पड़ गया हो। जनकजीने सोच त्यागकर सुख प्राप्त किया। मानो तैरते-तैरते थके हुए पुरुषने थाह पा ली हो ॥ २ ॥
श्रीहत भए भूप धनु टूटे । जैसैं दिवस दीप छबि छूटे ॥ सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती । जनु चातकी पाड़ जलु स्वाती ॥
धनुष टूट जानेपर राजालोग ऐसे श्रीहीन (निस्तेज) हो गये, जैसे दिनमें दीपककी शोभा जाती रहती है। सीताजीका सुख किस प्रकार वर्णन किया जाय; जैसे चातकी स्वातीका जल पा गयी हो ॥ ३ ॥
रामहि लखनु बिलोकत कैसैं । ससिहि चकोर किसोरकु जैसैं ॥ सतानंद तब आयसु दीन्हा । सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा ॥
श्रीरामजीको लक्ष्मणजी किस प्रकार देख रहे हैं, जैसे चन्द्रमाको चकोरका बच्चा देख रहा हो। तब शतानन्दजीने आज्ञा दी और सीताजीने श्रीरामजीके पास गमन किया ॥ ४ ॥
दो०— संग सर्खी सुंदर चतुर गावहिं मंगलचार ।
गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार ॥ २६३ ॥
साथमें सुन्दर चतुर सखियाँ मङ्गलाचारके गीत गा रही हैं; सीताजी बालहंसिनीकी चालसे चलीं। उनके अङ्गोंमें अपार शोभा है ॥ २६३ ॥
- बालकाण्ड *
२५५
सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसैं । छबिगन मध्य महाछबि जैसैं ॥ कर सरोज जयमाल सुहाई । बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई ॥
सखियोंके बीचमें सीताजी कैसी शोभित हो रही हैं; जैसे बहुत-सी छबियोंके बीचमें महाछबि हो। करकमलमें सुन्दर जयमाला है, जिसमें विश्वविजयकी शोभा छायी हुई है ॥ १ ॥
तन सकोचु मन परम उछाहू । गूढ़ प्रेम लिखि परइ न काहू ॥ जाइ समीप राम छबि देखी । रहि जनु कुअँरि चित्र अवरेखी ॥
सीताजीके शरीरमें संकोच है, पर मनमें परम उत्साह है। उनका यह गुप्त प्रेम किसीको जान नहीं पड़ रहा है। समीप जाकर, श्रीरामजीकी शोभा देखकर राजकुमारी सीताजी चित्रमें लिखी-सी रह गयीं ॥ २ ॥
चतुर सर्खीं लिखि कहा बुझाई । पहिरावहु जयमाल सुहाई ॥ सुनत जुगल कर माल उठाई । प्रेम बिबस पहिराइ न जाई ॥
चतुर सर्खीने यह दशा देखकर समझाकर कहा—सुहावनी जयमाला पहनाओ। यह सुनकर सीताजीने दोनों हाथोंसे माला उठायी, पर प्रेमके विवश होनेसे पहनायी नहीं जाती ॥ ३ ॥
सोहत जनु जुग जलज सनाला । ससिहि सभीत देत जयमाला ॥ गावहिं छबि अवलोकि सहेली । सियँ जयमाल राम उर मेली ॥
[उस समय उनके हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे हैं] मानो डंडियोंसहित दो कमल चन्द्रमाको डरते हुए जयमाला दे रहे हों। इस छबिको देखकर सखियाँ गाने लगीं। तब सीताजीने श्रीरामजीके गलेमें जयमाला पहना दी ॥ ४ ॥
सो०—रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन । सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन ॥ २६४ ॥
श्रीरघुनाथजीके हृदयपर जयमाला देखकर देवता फूल बरसाने लगे। समस्त राजागण इस प्रकार सकुचा गये मानो सूर्यको देखकर कुमुदोंका समूह सिकुड़ गया हो ॥ २६४ ॥
पुर अरु ब्योम बाजने बाजे । खल भए मलिन साधु सब राजे ॥ सुर किंनर नर नाग मुनीसा । जय जय जय कहि देहिं असीसा ॥
नगर और आकाशमें बाजे बजने लगे। दुष्टलोग उदास हो गये और सज्जनलोग सब प्रसन्न हो गये। देवता, किन्नर, मनुष्य, नाग और मुनीश्वर जय-जयकार करके आशीर्वाद दे रहे हैं ॥ १ ॥
नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं । बार बार कुसुमांजलि छूटीं ॥ जहैं तहैं बिप्र बेदधुनि करहीं । बंदी बिरिदावलि उच्चरहीं ॥
२५६
- रामचरितमानस *
देवताओंकी स्त्रियाँ नाचती-गाती हैं। बार-बार हाथोंसे पुष्पोंकी अञ्जलियाँ छूट रही हैं। जहाँ-तहाँ ब्राह्मण वेदध्वनि कर रहे हैं और भाटलोग विरुदावली (कुलकीर्ति) बखान रहे हैं ॥ २ ॥
महि पाताल नाक जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा॥ करहिं आरती पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी॥
पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग तीनों लोकोंमें यश फैल गया कि श्रीरामचन्द्रजीने धनुष तोड़ दिया और सीताजीको वरण कर लिया। नगरके नर-नारी आरती कर रहे हैं और अपनी पूँजी (हैसियत) को भुलाकर (सामर्थ्यसे बहुत अधिक) निछावर कर रहे हैं ॥ ३ ॥
सोहति सीय राम कै जोरी। छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी॥ सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता। करति न चरन परस अति भीता॥
श्रीसीता-रामजीकी जोड़ी ऐसी सुशोभित हो रही है मानो सुन्दरता और शृंगाररस एकत्र हो गये हों। सखियाँ कह रही हैं—सीते! स्वामीके चरण छुओ; किन्तु सीताजी अत्यन्त भयभीत हुई उनके चरण नहीं छूतीं ॥ ४ ॥
दो०— गौतम तिय गति सुरति करि नहीं परसति पग पानि।
मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि॥ २६५ ॥
गौतमजीकी स्त्री अहल्याकी गतिका स्मरण करके सीताजी श्रीरामजीके चरणोंको हाथोंसे स्पर्श नहीं कर रही हैं। सीताजीकी अलौकिक प्रीति जानकर रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी मनमें हँसे ॥ २६५ ॥
तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे॥ उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहाँ तहाँ गाल बजावन लागे॥
उस समय सीताजीको देखकर कुछ राजा लोग ललचा उठे। वे दुष्ट, कुपूत और मूढ़ राजा मनमें बहुत तमतमाये। वे अभागे उठ-उठकर, कवच पहनकर, जहाँ-तहाँ गाल बजाने लगे ॥ १ ॥
लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ॥ तोरें धनुषु चाड़ नहीं सरई। जीवत हमहि कुअरि को बरई॥
कोई कहते हैं, सीताको छीन लो और दोनों राजकुमारोंको पकड़कर बाँध लो। धनुष तोड़नेसे ही चाह नहीं सेरेगी (पूरी होगी)। हमारे जीते-जी राजकुमारीको कौन ब्याह सकता है? ॥ २ ॥
जों बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई॥ साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहि लाज लजानी॥
यदि जनक कुछ सहायता करे, तो युद्धमें दोनों भाइयोंसहित उसे भी जीत लो। ये वचन सुनकर साधु राजा बोले—इस [निर्लज्ज] राजसमाजको देखकर तो लाज भी लजा गयी ॥ ३ ॥
- बालकाण्ड *
२५७
बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई॥ सोड़ सूरता कि अब कहूँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई॥
अरे ! तुम्हारा बल, प्रताप, बीरता, बड़ाई और नाक (प्रतिष्ठा) तो धनुषके साथ ही चली गयी। वही बीरता थी कि अब कहींसे मिली है ? ऐसी दुष्ट बुद्धि है, तभी तो विधाताने तुम्हारे मुखोंपर कालिख लगा दी ॥४॥
दो०— देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु।
लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु॥ २६६॥
ईर्ष्या, घमंड और क्रोध छोड़कर नेत्र भरकर श्रीरामजी [की छबि] को देख लो। लक्ष्मणके क्रोधको प्रबल अग्नि जानकर उसमें पतंगे मत बनो ॥२६६॥
बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू॥ जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही॥
जैसे गरुड़का भाग कौआ चाहे, सिंहका भाग खरगोश चाहे, बिना कारण ही क्रोध करनेवाला अपनी कुशल चाहे, शिवजीसे विरोध करनेवाला सब प्रकारकी सम्पत्ति चाहे, ॥१॥
लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई॥ हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा॥
लोभी-लालची सुन्दर कीर्ति चाहे, कामी मनुष्य निष्कलंकता [चाहे तो] क्या पा सकता है ? और जैसे श्रीहरिके चरणोंसे विमुख मनुष्य परमगति (मोक्ष) चाहे, हे राजाओ ! सीताके लिये तुम्हारा लालच भी वैसा ही व्यर्थ है ॥२॥
कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाड़ गई जहँ रानी॥ रामु सुभायै चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं॥
कोलाहल सुनकर सीताजी शंकित हो गयीं। तब सखियाँ उन्हें वहाँ ले गयीं जहाँ रानी (सीताजीकी माता) थीं। श्रीरामचन्द्रजी मनमें सीताजीके प्रेमका बखान करते हुए स्वाभाविक चालसे गुरुजीके पास चले ॥३॥
रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौँ बिधिहि काह करनीया॥ भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं॥
रानियोंसहित सीताजी [दुष्ट राजाओंके दुर्वचन सुनकर] सोचके वश हैं कि न जाने विधाता अब क्या करनेवाले हैं। राजाओंके वचन सुनकर लक्ष्मणजी इधर-उधर ताकते हैं; किन्तु श्रीरामचन्द्रजीके डरसे कुछ बोल नहीं सकते ॥४॥
२५८
- रामचरितमानस *
दो०— अरुन नयन भूकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप ।
मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंधकिसोरहि चोप ॥ २६७ ॥
उनके नेत्र लाल और भाँहें टेढ़ी हो गयीं और वे क्रोधसे राजाओंकी ओर देखने लगे; मानो मतवाले हाथियोंका झुंड देखकर सिंहके बच्चेको जोश आ गया हो ॥ २६७ ॥
खरभरु देखि बिकल पुर नारीं । सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं ॥
तेहिं अवसर सुनि सिवधनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा ॥
खलबली देखकर जनकपुरकी स्त्रियाँ व्याकुल हो गयीं और सब मिलकर राजाओंको गालियाँ देने लगीं। उसी मौकेपर शिवजीके धनुषका टूटना सुनकर भृगुकुलरूपी कमलके सूर्य परशुरामजी आये ॥ १ ॥
देखि महीप सकल सकुचाने । बाज झपट जनु लवा लुकाने ॥
गौरि सरीर भूति भल भ्राजा । भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा ॥
इन्हें देखकर सब राजा सकुचा गये, मानो बाजके झपटनेपर बटेर लुक (छिप) गये हों। गौरि शरीरपर विभूति (भस्म) बड़ी फब रही है और विशाल ललाटपर त्रिपुण्ड्र विशेष शोभा दे रहा है ॥ २ ॥
सीस जटा ससिबदनु सुहावा । रिसबस कछुक अरुन होइ आवा ॥
भूकुटी कुटिल नयन रिस राते । सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते ॥
सिरपर जटा है, सुन्दर मुखचन्द्र क्रोधके कारण कुछ लाल हो आया है। भाँहें टेढ़ी और आँखें क्रोधसे लाल हैं। सहज ही देखते हैं, तो भी ऐसा जान पड़ता है मानो क्रोध कर रहे हैं ॥ ३ ॥
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला । चारु जनैउ माल मृगछाला ॥
कटि मुनिबसन तून दुइ बाँधें । धनु सर कर कुठारु कल काँधें ॥
बैलके समान (ऊँचे और पुष्ट) कंधे हैं; छाती और भुजाएँ विशाल हैं। सुन्दर यज्ञोपवीत धारण किये, माला पहने और मृगचर्म लिये हैं। कमरमें मुनियोंका वस्त्र (वलकल) और दो तरकस बाँधे हैं। हाथमें धनुष-बाण और सुन्दर कंधेपर फरसा धारण किये हैं ॥ ४ ॥
दो०— सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरूप ।
धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहाँ सब भूप ॥ २६८ ॥
शान्त वेष है, परन्तु करनी बहुत कठोर है; स्वरूपका वर्णन नहीं किया जा सकता। मानो वीर-रस ही मुनिका शरीर धारण करके, जहाँ सब राजालोग हैं वहाँ आ गया हो ॥ २६८ ॥
देखत भृगुपति बेषु कराला । उठे सकल भय बिकल भुआला ॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा । लगे करन सब दंड प्रनामा ॥
- बालकाण्ड *
२५९
परशुरामजीका भयानक वेष देखकर सब राजा भयसे व्याकुल हो उठ खड़े हुए और पितासहित अपना नाम कह-कहकर सब दण्डवत्-प्रणाम करने लगे ॥ १ ॥
जेहि सुभार्यँ चितवहिँ हितु जानी । सो जानइ जनु आइ खुटानी ॥ जनक बहोरि आइ सिरु नावा । सीय बोलाइ प्रनामु करावा ॥
परशुरामजी हित समझकर भी सहज ही जिसकी ओर देख लेते हैं, वह समझता है मानो मेरी आयु पूरी हो गयी। फिर जनकजीने आकर सिर नवाया और सीताजीको बुलाकर प्रणाम कराया ॥ २ ॥
आसिष दीन्हि सर्खीं हरषानीं । निज समाज लै गई सयानीं ॥ बिस्वामित्रु मिले पुनि आई । पद सरोज मेले दोउ भाई ॥
परशुरामजीने सीताजीको आशीर्वाद दिया। सखियाँ हर्षित हुईं और [वहाँ अब अधिक देर ठहरना ठीक न समझकर] वे सयानी सखियाँ उनको अपनी मण्डलीमें ले गयीं। फिर विश्वामित्रजी आकर मिले और उन्होंने दोनों भाइयोंको उनके चरणकमलोंपर गिराया ॥ ३ ॥
रामु लखनु दसरथ के ठोटा । दीन्हि असीस देखि भल जोटा ॥ रामहि चितइ रहे थकि लोचन । रूप अपार मार मद मोचन ॥
[विश्वामित्रजीने कहा—] ये राम और लक्ष्मण राजा दशरथके पुत्र हैं। उनकी सुन्दर जोड़ी देखकर परशुरामजीने आशीर्वाद दिया। कामदेवके भी मदको छुड़ानेवाले श्रीरामचन्द्रजीके अपार रूपको देखकर उनके नेत्र थकित (स्तम्भित) हो रहे ॥ ४ ॥
दो०— बहुरि बिलोकि बिदेहे सन कहहु काह अति भीर ।
पूँछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर ॥ २६९ ॥
फिर सब देखकर, जानते हुए भी अनजानकी तरह जनकजीसे पूछते हैं कि कहो, यह बड़ी भारी भीड़ कैसी है? उनके शरीरमें क्रोध छा गया ॥ २६९ ॥
समाचार कहि जनक सुनाए । जेहि कारन महीप सब आए ॥ सुनत बचन फिरि अनत निहारे । देखे चापखंड महि डारे ॥
जिस कारण सब राजा आये थे, राजा जनकने वे सब समाचार कह सुनाये। जनकके वचन सुनकर परशुरामजीने फिरकर दूसरी ओर देखा तो धनुषके टुकड़े पृथ्वीपर पड़े हुए दिखायी दिये ॥ १ ॥
अति रिस बोले बचन कठोरा । कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा ॥ बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू । उलटउँ महि जहाँ लहि तव राजू ॥
अत्यन्त क्रोधमें भरकर वे कठोर वचन बोले—रे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा? उसे शीघ्र दिखा, नहीं तो अरे मूढ़! आज मैं जहाँतक तेरा राज्य है, वहाँतककी पृथ्वी उलट दूँगा ॥ २ ॥
२६०
- रामचरितमानस *
अति डरु उत्तरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥
राजाको अत्यन्त डर लगा, जिसके कारण वे उत्तर नहीं देते। यह देखकर कुटिल राजा मनमें बड़े प्रसन्न हुए। देवता, मुनि, नाग और नगरके स्त्री-पुरुष सभी सोच करने लगे, सबके हृदयमें बड़ा भय है॥ ३ ॥
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥ भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कल्प सम बीता॥
सीताजीकी माता मनमें पछता रही हैं कि हाय! विध्याताने अब बनी-बनायी बात बिगाड़ दी। परशुरामजीका स्वभाव सुनकर सीताजीको आधा क्षण भी कल्पके समान बीतने लगा॥ ४ ॥
दो०— सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु विषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥ २७० ॥
तब श्रीरामचन्द्रजी सब लोगोंको भयभीत देखकर और सीताजीको डरी हुई जानकर बोले— उनके हृदयमें न कुछ हर्ष था, न विषाद—॥ २७० ॥
मासपारायण, नवाँ विश्राम
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
हे नाथ! शिवजीके धनुषको तोड़नेवाला आपका कोई एक दास ही होगा। क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? यह सुनकर क्रोधी मुनि रिसाकर बोले—॥ १ ॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सेवक वह है जो सेवाका काम करे। शत्रुका काम करके तो लड़ाई ही करनी चाहिये। हे राम! सुनो, जिसने शिवजीके धनुषको तोड़ा है, वह सहस्रबाहुके समान मेरा शत्रु है॥ २ ॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥
वह इस समाजको छोड़कर अलग हो जाय, नहीं तो सभी राजा मारे जायेंगे। मुनिके वचन सुनकर लक्ष्मणजी मुसकराये और परशुरामजीका अपमान करते हुए बोले—॥ ३ ॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाई॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
- बालकाण्ड *
२६१
हे गोसाई! लड़कपनमें हमने बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डालीं। किन्तु आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया। इसी धनुषपर इतनी ममता किस कारणसे है? यह सुनकर भृगुवंशकी ध्वजास्वरूप परशुरामजी कुपित होकर कहने लगे— ॥ ४ ॥
दो०— रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार ॥ २७१ ॥
अरे राजपुत्र! कालके वश होनेसे तुझे बोलनेमें कुछ भी होश नहीं है। सारे संसारमें विख्यात शिवजीका यह धनुष क्या धनुहीके समान है? ॥ २७१ ॥
लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनुहु देव सब धनुष समाना ॥
का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें ॥
लक्ष्मणजीने हँसकर कहा—हे देव! सुनिये, हमारे जानमें तो सभी धनुष एक-से ही हैं। पुराने धनुषके तोड़नेमें क्या हानि-लाभ! श्रीरामचन्द्रजीने तो इसे नवीनके धोखेसे देखा था ॥ १ ॥
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ॥
बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा ॥
फिर यह तो छूते ही टूट गया, इसमें रघुनाथजीका भी कोई दोष नहीं है। मुनि! आप बिना ही कारण किसलिये क्रोध करते हैं? परशुरामजी अपने फरसेकी ओर देखकर बोले—अरे दुष्ट! तूने मेरा स्वभाव नहीं सुना ॥ २ ॥
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही ॥
बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही ॥
मैं तुझे बालक जानकर नहीं मारता हूँ। अरे मूर्ख! क्या तू मुझे निरा मुनि ही जानता है? मैं बालब्रह्मचारी और अत्यन्त क्रोधी हूँ। क्षत्रियकुलका शत्रु तो विश्वभरमें विख्यात हूँ ॥ ३ ॥
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही ॥
सहसबाहु भुज छेदनहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा ॥
अपनी भुजाओंके बलसे मैंने पृथ्वीको राजाओंसे रहित कर दिया और बहुत बार उसे ब्राह्मणोंको दे डाला। हे राजकुमार! सहस्रबाहुकी भुजाओंको काटनेवाले मेरे इस फरसेको देख! ॥ ४ ॥
दो०— मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर ॥ २७२ ॥
अरे राजाके बालक! तू अपने माता-पिताको सोचके वश न कर। मेरा फरसा बड़ा भयानक है, यह गर्भोंके बच्चोंका भी नाश करनेवाला है ॥ २७२ ॥
२६२
- रामचरितमानस *
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी । अहो मुनीसु महा भटमानी ॥ पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू । चहत उड़ावन फूँकि पहारू ॥
लक्ष्मणजी हँसकर कोमल वाणीसे बोले—अहो, मुनीश्वर तो अपनेको बड़ा भारी योद्धा समझते हैं। बार-बार मुझे कुल्हाड़ी दिखाते हैं। फूँकसे पहाड़ उड़ाना चाहते हैं ॥ १ ॥
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं । जे तरजनी देखि मरि जाहीं ॥ देखि कुठारू सरासन बाना । मैं कछु कहा सहित अभिमाना ॥
यहाँ कोई कुम्हड़ेकी बतिया (छोटा कच्चा फल) नहीं है, जो तर्जनी (सबसे आगेकी) उँगलीको देखते ही मर जाती हैं। कुठार और धनुष-बाण देखकर ही मैंने कुछ अभिमानसहित कहा था ॥ २ ॥
भृगुसुत समुद्धि जनेउ बिलोकी । जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी ॥ सुर महिसुर हरिजन अरु गाईं । हमरें कुल इन्ह पर न सुराईं ॥
भृगुवंशी समझकर और यज्ञोपवीत देखकर तो जो कुछ आप कहते हैं, उसे मैं क्रोधको रोककर सह लेता हूँ। देवता, ब्राह्मण, भगवान्के भक्त और गौ—इनपर हमारे कुलमें वीरता नहीं दिखायी जाती ॥ ३ ॥
बधें पापु अपकीरति हारें । मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें ॥ कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा । व्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा ॥
क्योंकि इन्हें मारनेसे पाप लगता है और इनसे हार जानेपर अपकीर्ति होती है। इसलिये आप मारें तो भी आपके पैर ही पड़ना चाहिये। आपका एक-एक वचन ही करोड़ों वज्रोंके समान है। धनुष-बाण और कुठार तो आप व्यर्थ ही धारण करते हैं ॥ ४ ॥
दो०—जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।
सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर ॥ २७३ ॥
इन्हें (धनुष-बाण और कुठारको) देखकर मैंने कुछ अनुचित कहा हो, तो उसे हे धीर महामुनि! क्षमा कीजिये। यह सुनकर भृगुवंशमणि परशुरामजी क्रोधके साथ गम्भीर वाणी बोले— ॥ २७३ ॥
कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु । कुटिलकालबस निज कुल घालकु ॥ भानु बंस राकेस कलंकू । निपट निरंकुस अबुध असंकू ॥
हे विश्वामित्र! सुनो, यह बालक बड़ा कुबुद्धि और कुटिल है, कालके वश होकर यह अपने कुलका घातक बन रहा है। यह सूर्यवंशरूपी पूर्णचन्द्रका कलङ्क है। यह बिलकुल उद्गण्ड, मूर्ख और निडर है ॥ १ ॥
- बालकाण्ड *
२६३
काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं॥ तुम्ह हटकहु जौँ चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा॥
अभी क्षणभरमें यह कालका ग्रास हो जायगा। मैं पुकारकर कहे देता हूँ, फिर मुझे दोष नहीं है। यदि तुम इसे बचाना चाहते हो, तो हमारा प्रताप, बल और क्रोध बतलाकर इसे मना कर दो ॥ २ ॥
लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा॥ अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी॥
लक्ष्मणजीने कहा—हे मुनि! आपका सुयश आपके रहते दूसरा कौन वर्णन कर सकता है? आपने अपने ही मुँहसे अपनी करनी अनेकों बार बहुत प्रकारसे वर्णन की है ॥ ३ ॥
नहि संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू॥ बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा॥
इतनेपर भी सन्तोष न हुआ हो तो फिर कुछ कह डालिये। क्रोध रोककर असह्य दुःख मत सहिये। आप वीरताका व्रत धारण करनेवाले, धैर्यवान् और क्षोभरहित हैं। गाली देते शोभा नहीं पाते ॥ ४ ॥
दो०—सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु॥ २७४ ॥
शूरवीर तो युद्धमें करनी (शूरवीरताका कार्य) करते हैं, कहकर अपनेको नहीं जानते। शत्रुको युद्धमें उपस्थित पाकर कायर ही अपने प्रतापकी डींग मारा करते हैं ॥ २७४ ॥
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा॥ सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा॥
आप तो मानो कालको हाँक लगाकर बार-बार उसे मेरे लिये बुलाते हैं। लक्ष्मणजीके कठोर वचन सुनते ही परशुरामजीने अपने भयानक फरसेको सुधारकर हाथमें ले लिया ॥ १ ॥
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू॥ बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यह मरनिहार भा साँचा॥
[और बोले—] अब लोग मुझे दोष न दें। यह कड़ुआ बोलनेवाला बालक मारे जानेके ही योग्य है। इसे बालक देखकर मैंने बहुत बचाया, पर अब यह सचमुच मरनेको ही आ गया है ॥ २ ॥
कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥ खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्वेही॥
२६४
- रामचरितमानस *
विश्वामित्रजीने कहा—अपराध क्षमा कीजिये। बालकोंके दोष और गुणको साधुलोग नहीं गिनते। [परशुरामजी बोले—] तीखी धारका कुठार, मैं दयारहित और क्रोधी, और यह गुरुद्रोही और अपराधी मेरे सामने— ॥ ३ ॥
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें । केवल कौसिक सील तुम्हारें ॥ न त एहि काटि कुठार कठोरें । गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें ॥
उतर दे रहा है। इतनेपर भी मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ, सो हे विश्वामित्र! केवल तुम्हारे शील (प्रेम) से। नहीं तो इसे इस कठोर कुठारसे काटकर थोड़े ही परिश्रमसे गुरुसे उन्नृण हो जाता ॥ ४ ॥
दो०— गाधिसूनु कह हदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ । अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहूँ न बूझ अबूझ ॥ २७५ ॥
विश्वामित्रजीने हृदयमें हँसकर कहा—मुनिको हरा-ही-हरा सूझ रहा है (अर्थात् सर्वत्र विजयी होनेके कारण ये श्रीराम-लक्ष्मणको भी साधारण क्षत्रिय ही समझ रहे हैं)। किन्तु यह लोहमयी (केवल फौलादकी बनी हुई) खाँड़ (खाँड़ा—खड़ग) है, ऊखकी (रसकी) खाँड़ नहीं है [जो मुँहमें लेते ही गल जाय। खेद है,] मुनि अब भी बेसमझ बने हुए हैं; इनके प्रभावको नहीं समझ रहे हैं ॥ २७५ ॥
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा । को नहिं जान बिदित संसारा ॥ माता पितहि उरिन भए नीकें । गुर रिनु रहा सोचु बड़ जी कें ॥
लक्ष्मणजीने कहा—हे मुनि! आपके शीलको कौन नहीं जानता? वह संसारभरमें प्रसिद्ध है। आप माता-पितासे तो अच्छी तरह उन्नृण हो ही गये, अब गुरुका ऋण रहा, जिसका जीमें बड़ा सोच लगा है ॥ १ ॥
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा । दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा ॥ अब आनिअ व्यवहरिआ बोली । तुरत देउँ मैं थैली खोली ॥
वह मानो हमारे ही मत्थे काढ़ा था। बहुत दिन बीत गये, इससे ब्याज भी बहुत बढ़ गया होगा। अब किसी हिसाब करनेवालेको बुला लाइये, तो मैं तुरंत थैली खोलकर दे दूँ ॥ २ ॥
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा । हाय हाय सब सभा पुकारा ॥ भृगुबर परसु देखावहु मोही । बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही ॥
लक्ष्मणजीके कड़वे वचन सुनकर परशुरामजीने कुठार सँभाला। सारी सभा हाय! हाय! करके पुकार उठी। [लक्ष्मणजीने कहा—] हे भृगुश्रेष्ठ! आप मुझे फरसा दिखा रहे हैं? पर हे राजाओंके शत्रु! मैं ब्राह्मण समझकर बचा रहा हूँ (तरह दे रहा हूँ) ॥ ३ ॥
- बालकाण्ड *
२६५
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े॥ अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे॥
आपको कभी रणधीर बलवान् वीर नहीं मिले। हे ब्राह्मण देवता! आप घरहीमें बड़े हैं। यह सुनकर ‘अनुचित है, अनुचित है’ कहकर सब लोग पुकार उठे। तब श्रीरघुनाथजीने इशारेसे लक्ष्मणजीको रोक दिया ॥ ४ ॥
दो०—लखन उत्तर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु ॥ २७६ ॥
लक्ष्मणजीके उत्तरसे, जो आहुतिके समान थे, परशुरामजीके क्रोधरूपी अग्निको बढ़ते देखकर रघुकुलके सूर्य श्रीरामचन्द्रजी जलके समान (शान्त करनेवाले) वचन बोले— ॥ २७६ ॥
नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू॥ जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना॥
हे नाथ! बालकपर कृपा कीजिये। इस सीधे और दुधमुँहे बच्चेपर क्रोध न कीजिये। यदि यह प्रभुका (आपका) कुछ भी प्रभाव जानता, तो क्या यह बेसमझ आपकी बराबरी करता? ॥ १ ॥
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं॥ करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी॥
बालक यदि कुछ चपलता भी करते हैं, तो गुरु, पिता और माता मनमें आनन्दसे भर जाते हैं। अतः इसे छोटा बच्चा और सेवक जानकर कृपा कीजिये। आप तो समदर्शी, सुशील, धीर और ज्ञानी मुनि हैं ॥ २ ॥
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसुकाने॥ हँसत देखि नख सिख रिसब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी॥
श्रीरामचन्द्रजीके वचन सुनकर वे कुछ ठंडे पड़े। इतनेमें लक्ष्मणजी कुछ कहकर फिर मुसकरा दिये। उनको हँसते देखकर परशुरामजीके नखसे शिखातक (सारे शरीरमें) क्रोध छा गया। उन्होंने कहा—हे राम! तेरा भाई बड़ा पापी है ॥ ३ ॥
गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाही॥ सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मोही॥
यह शरीरसे गौरा, पर हृदयका बड़ा काला है। यह विषमुख है, दुधमुँहा नहीं। स्वभावसे ही टेढ़ा है, तेरा अनुसरण नहीं करता (तेरे—जैसा शीलवान् नहीं है)। यह नीच मुझे कालके समान नहीं देखता ॥ ४ ॥
२६६
- रामचरितमानस *
दो०— लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल ।
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल ॥ २७७ ॥
लक्ष्मणजीने हँसकर कहा—हे मुनि! सुनिये, क्रोध पापका मूल है, जिसके वशमें होकर मनुष्य अनुचित कर्म कर बैठते हैं और विश्वभरके प्रतिकूल चलते (सबका अहित करते) हैं ॥ २७७ ॥
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया । परिहरि कोपु करिअ अब दाय। ॥ टूट चाप नहिं जुरिहि रिसाने । बैठिअ होइहिं पाय पिराने ॥
हे मुनिराज! मैं आपका दास हूँ। अब क्रोध त्यागकर दया कीजिये। टूटा हुआ धनुष क्रोध करनेसे जुड़ नहीं जायगा। खड़े-खड़े पैर दुखने लगे होंगे, बैठ जाइये ॥ १ ॥
जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई । जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई ॥ बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं । मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं ॥
यदि धनुष अत्यन्त ही प्रिय हो, तो कोई उपाय किया जाय और किसी बड़े गुणी (कारीगर) को बुलाकर जुड़वा दिया जाय। लक्ष्मणजीके बोलनेसे जनकजी डर जाते हैं और कहते हैं—बस, चुप रहिये, अनुचित बोलना अच्छा नहीं ॥ २ ॥
थर थर काँपहिं पुर नर नारी । छोट कुमार खोट बड़ भारी ॥ भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी । रिस तन जरइ होइ बल हानी ॥
जनकपुरके स्त्री-पुरुष थर-थर काँप रहे हैं [और मन-ही-मन कह रहे हैं कि] छोटा कुमार बड़ा ही खोटा है। लक्ष्मणजीकी निर्भय वाणी सुन-सुनकर परशुरामजीका शरीर क्रोधसे जला जा रहा है और उनके बलकी हानि हो रही है (उनका बल घट रहा है) ॥ ३ ॥
बोले रामहि देड़ निहोरा । बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा ॥ मनु मलीन तनु सुंदर कैसैं । बिष रस भरा कनक घटु जैसैं ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीपर एहसान जनाकर परशुरामजी बोले—तेरा छोटा भाई समझकर मैं इसे बचा रहा हूँ। यह मनका मैला और शरीरका कैसा सुन्दर है, जैसे विषके रससे भरा हुआ सोनेका घड़ा! ॥ ४ ॥
दो०— सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम ।
गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम ॥ २७८ ॥
यह सुनकर लक्ष्मणजी फिर हँसे। तब श्रीरामचन्द्रजीने तिरछी नजरसे उनकी ओर देखा, जिससे लक्ष्मणजी सकुचाकर, विपरीत बोलना छोड़कर, गुरुजीके पास चले गये ॥ २७८ ॥
अति बिनीत मृदु सीतल बानी । बोले रामु जोरि जुग पानी ॥ सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना । बालक बचनु करिअ नहिं काना ॥
- बालकाण्ड *
२६७
श्रीरामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनयके साथ कोमल और शीतल वाणी बोले— हे नाथ! सुनिये, आप तो स्वभावसे ही सुजन हैं। आप बालकके वचनपर कान न कीजिये (उसे सुना-अनसुना कर दीजिये) ॥ १ ॥
बरै बालकु एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ॥ तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी मैं नाथ तुम्हारा॥
बैँ और बालकका एक स्वभाव है। संतजन इन्हें कभी दोष नहीं लगाते। फिर उसने (लक्ष्मणने) तो कुछ काम भी नहीं बिगाड़ा है, हे नाथ! आपका अपराधी तो मैं हूँ ॥ २ ॥
कृपा कोपु बधु बँधब गोसाई। मो पर करिअ दास की नाई॥ कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोड़ करौं उपाई॥
अतः हे स्वामी! कृपा, क्रोध, वध और बन्धन, जो कुछ करना हो, दासकी तरह (अर्थात् दास समझकर) मुझपर कीजिये। जिस प्रकारसे शीघ्र आपका क्रोध दूर हो, हे मुनिराज! बताइये, मैं वही उपाय करूँ ॥ ३ ॥
कह मुनि राम जाइ रिस कैसैं। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसैं॥ एहि कें कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा॥
मुनिने कहा—हे राम! क्रोध कैसे जाय; अब भी तेरा छोटा भाई टेढ़ा ही ताक रहा है। इसकी गर्दनपर मैंने कुठार न चलाया, तो क्रोध करके किया ही क्या? ॥ ४ ॥
दो०—गर्भ स्ववहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।
परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर ॥ २७९ ॥
मेरे जिस कुठारकी घोर करनी सुनकर राजाओंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर पड़ते हैं, उसी फरसेके रहते मैं इस शत्रु राजपुत्रको जीवित देख रहा हूँ ॥ २७९ ॥
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥ भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥
हाथ चलता नहीं, क्रोधसे छाती जली जाती है। [हाय!] राजाओंका घातक यह कुठार भी कुण्ठित हो गया। विधाता विपरीत हो गया, इससे मेरा स्वभाव बदल गया, नहीं तो भला, मेरे हृदयमें किसी समय भी कृपा कैसी? ॥ १ ॥
आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्रि बिहसि सिरु नावा॥ बाउ कृपा मूर्ति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला॥
२६८
- रामचरितमानस *
आज दया मुझे यह दुःसह दुःख सहा रही है। यह सुनकर लक्ष्मणजीने मुसकराकर सिर नवाया [और कहा—] आपकी कृपारूपी वायु भी आपकी मूर्तिके अनुकूल ही है, वचन बोलते हैं, मानो फूल झड़ रहे हैं॥ २ ॥
जों पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता । क्रोध भएँ तनु राख बिधाता ॥ देखु जनक हठि बालकु एहू । कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू ॥
हे मुनि! यदि कृपा करनेसे आपका शरीर जला जाता है, तो क्रोध होनेपर तो शरीरकी रक्षा विधाता ही करेंगे। [परशुरामजीने कहा—] हे जनक! देख, यह मूर्ख बालक हठ करके यमपुरीमें घर (निवास) करना चाहता है॥ ३ ॥
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा । देखत छोट खोट नृपु ढोटा ॥ बिहसे लखनु कहा मन माहीं । मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं ॥
इसको शीघ्र ही आँखोंकी ओट क्यों नहीं करते? यह राजपुत्र देखनेमें छोटा है, पर है बड़ा खोटा। लक्ष्मणजीने हँसकर मन-ही-मन कहा—आँख मूँद लेनेपर कहीं कोई नहीं है॥ ४ ॥
दो०—परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु । संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु ॥ २८० ॥
तब परशुरामजी हृदयमें अत्यन्त क्रोध भरकर श्रीरामजीसे बोले—अरे शठ! तू शिवजीका धनुष तोड़कर उलटा हमींको ज्ञान सिखाता है॥ २८० ॥
बंधु कहइ कटु संमत तोरें । तू छल विनय करसि कर जोरें ॥ करु परितोषु मोर संग्रामा । नाहिं त छाड़ कहाउब रामा ॥
तेरा यह भाई तेरी ही सम्मतिसे कटु वचन बोलता है और तू छलसे हाथ जोड़कर विनय करता है। या तो युद्धमें मेरा सन्तोष कर, नहीं तो राम कहलाना छोड़ दे॥ १ ॥
छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही । बंधु सहित न त मारउँ तोही ॥ भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ । मन मुसुकाहिं रामु सिर नाएँ ॥
अरे शिवद्रोही! छल त्यागकर मुझसे युद्ध कर। नहीं तो भाईसहित तुझे मार डालूँगा। इस प्रकार परशुरामजी कुठार उठाये बक रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजी सिर झुकाये मन-ही-मन मुसकरा रहे हैं॥ २ ॥
गुनह लखन कर हम पर रोषु । कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषु ॥ टेढ़ जानि सब बंदइ काहू । बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू ॥
[श्रीरामचन्द्रजीने मन-ही-मन कहा—] गुनाह (दोष) तो लक्ष्मणका और क्रोध मुझपर करते हैं! कहीं-कहीं सीधेपनमें भी बड़ा दोष होता है। टेढ़ा जानकर सब लोग किसीकी भी वन्दना करते हैं; टेढ़े चन्द्रमाको राहु भी नहीं ग्रसता॥ ३ ॥
- बालकाण्ड *
२६१
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा । कर कुठारु आगें यह सीसा ॥ जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी । मोहि जानिअ आपन अनुगामी ॥
श्रीरामचन्द्रजीने [प्रकट] कहा—हे मुनीश्वर! क्रोध छोड़िये। आपके हाथमें कुठार है और मेरा यह सिर आगे है। जिस प्रकार आपका क्रोध जाय, हे स्वामी! वही कीजिये। मुझे अपना अनुचर (दास) जानिये ॥ ४ ॥
दो०—प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु।
बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु ॥ २८१ ॥
स्वामी और सेवकमें युद्ध कैसा? हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! क्रोधका त्याग कीजिये। आपका [वीरोंका-सा] वेष देखकर ही बालकने कुछ कह डाला था; वास्तवमें उसका भी कोई दोष नहीं है ॥ २८१ ॥
देखि कुठार बान धनु धारी । भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी ॥ नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा । बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा ॥
आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किये देखकर और वीर समझकर बालकको क्रोध आ गया। वह आपका नाम तो जानता था, पर उसने आपको पहचाना नहीं। अपने वंश (रघुवंश) के स्वभावके अनुसार उसने उत्तर दिया ॥ १ ॥
जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाई । पद रज सिर सिसु धरत गोसाई ॥ छमहु चूक अनजानत केरी । चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी ॥
यदि आप मुनिकी तरह आते, तो हे स्वामी! बालक आपके चरणोंकी धूलि सिरपर रखता। अनजानेकी भूलको क्षमा कर दीजिये। ब्राह्मणोंके हृदयमें बहुत अधिक दया होनी चाहिये ॥ २ ॥
हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा । कहहु न कहाँ चरण कहँ माथा ॥ राम मात्र लघु नाम हमारा । परसु सहित बड़ नाम तोहारा ॥
हे नाथ! हमारी और आपकी बराबरी कैसी? कहिये न, कहाँ चरण और कहाँ मस्तक! कहाँ मेरा राममात्र छोटा-सा नाम और कहाँ आपका परशुसहित बड़ा नाम ॥ ३ ॥
देव एकु गुनु धनुष हमारें । नव गुन परम पुनीत तुम्हारें ॥ सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे । छमहु बिप्र अपराध हमारे ॥
हे देव! हमारे तो एक ही गुण धनुष है और आपके परम पवित्र [शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता—ये] नौ गुण हैं। हम तो सब प्रकारसे आपसे हारे हैं। हे विप्र! हमारे अपराधोंको क्षमा कीजिये ॥ ४ ॥
२७०
- रामचरितमानस *
दो०—बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।
बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम ॥ २८२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीने परशुरामजीको बार-बार 'मुनि' और 'विप्रवर' कहा। तब भृगुपति (परशुरामजी) कुपित होकर [अथवा क्रोधकी हँसी हँसकर] बोले—तू भी अपने भाईके समान ही टेढ़ा है ॥ २८२ ॥
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही ॥
चाप स्नुवा सर आहुति जानू। कोपु मोर अति घोर कृसानू ॥
तू मुझे निरा ब्राह्मण ही समझता है? मैं जैसा विप्र हूँ, तुझे सुनाता हूँ। धनुषको स्नुवा, बाणको आहुति और मेरे क्रोधको अत्यन्त भयङ्कर अग्नि जान ॥ १ ॥
समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई ॥
मैं एहिं परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे ॥
चतुरंगिणी सेना सुन्दर समिधाएँ (यज्ञमें जलायी जानेवाली लकड़ियाँ) हैं। बड़े-बड़े राजा उसमें आकर बलिके पशु हुए हैं, जिनको मैंने इसी फरसेसे काटकर बलि दिया है। ऐसे करोड़ों जपयुक्त रणयज्ञ मैंने किये हैं (अर्थात् जैसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ आहुति दी जाती है, उसी प्रकार मैंने पुकार-पुकारकर राजाओंकी बलि दी है) ॥ २ ॥
मोर प्रभाउ बिदित नहीं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें ॥
भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा ॥
मेरा प्रभाव तुझे मालूम नहीं है, इसीसे तू ब्राह्मणके धोखे मेरा निरादर करके बोल रहा है। धनुष तोड़ डाला, इससे तेरा घर्मंड बहुत बढ़ गया है। ऐसा अहंकार है, मानो संसारको जीतकर खड़ा है ॥ ३ ॥
राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी ॥
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं केहि हेतु करौं अभिमाना ॥
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—हे मुनि! विचारकर बोलिये। आपका क्रोध बहुत बड़ा है। और मेरी भूल बहुत छोटी है। पुराना धनुष था, छूते ही टूट गया। मैं किस कारण अभिमान करूँ? ॥ ४ ॥
दो०—जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।
तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ ॥ २८३ ॥
हे भृगुनाथ! यदि हम सचमुच ब्राह्मण कहकर निरादर करते हैं, तो यह सत्य सुनिये, फिर संसारमें ऐसा कौन योद्धा है जिसे हम डरके मारे मस्तक नवायें? ॥ २८३ ॥
देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना ॥
जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ ॥